दीपश्राद्ध

by | Nov 12, 2020 | 0 comments

दीपश्राद्ध Deepshraddha

हमारी परम्पराओं में बहुत सी बातें ऐसी हैं, जिनके बारे में हम बिलकुल नहीं जानते। कुछ के बारे में जानते भी है, तो आधे-अधूरे या गलत रुप से। दीपश्राद्ध भी उन्हीं में एक है। प्रस्तुत प्रसंग में थोड़ी चर्चा किए देता हूँ।
नित्यकर्मों में  देव और पितृ दोनों कार्य आते हैं। कई कारणों से देवकार्य की तुलना में पितृकार्य अधिक आवश्यक माना गया है। पितृकर्मों के लिए पितरों की महती कृपा है हम पर कि काफी सुविधा दे रखा है उन्होंने। यथा— नित्य तर्पण की विधि है। ये नहीं कर पाते यदि हम, तो कम से कम प्रत्येक अमावस्या को कर लेना चाहिए। ये मासिक कृत्य भी यदि हम नहीं कर पाते हैं, तो कम से कम आश्विन और चैत्र मास के पितृपक्षों में पूरे पन्द्रह दिन जलादि प्रदान करना चाहिए। ये भी यदि नहीं कर सकते, तो चाहिए कि आश्विन मास की अमावस्या को तो अवश्य विधिवत मुण्डनादि सम्पन्न करके, तर्पण और पिण्डदान कर ही लें। यदि ये भी नहीं कर पाते, वैसी स्थिति में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को सायंकाल दीपश्राद्ध का विधान है—ये पितरों का आशीष प्राप्त करने का अन्तिम उपाय है। यदि ये भी नहीं करते तो समझ लें कि पितरों को बहुत निराशा होगी और वे हमें शापित भी कर सकते हैं।
प्रसंगवश एक और बात यहाँ स्पष्ट करना चाहता हूँ कि जाने-अनजाने अपने कर्मों का दुष्प्रभाव हम भोगते रहते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि कष्ट और समस्या का कारण क्या है। किन्तु सच्चाई ये है कि कुलदेवता और पितृदेवता की अवहेलना का बहुत बड़ा योगदान है हमारी समस्याओं में। जीवन की बहुत सी जटिल समस्यायें भी इन दोनों की प्रसन्नता और कृपा से प्राप्त की जा सकती है। अतः इन कृत्यों को अत्यावश्यक और अपरिहार्य समझकर अंगीकार करना चाहिए। अस्तु।

ऊँ नमः पितृभ्यः

दीपश्राद्ध (Deepshraddha) विधि

दीपश्राद्ध

(कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी-सायंकालीन-कृत्य)
शौचाचारोपरान्त (स्नान, पवित्र वस्त्र-धारण, शिखा-बन्धन) पूर्वाभिमुख कम्बलासन पर बैठ कर—
ऊँ केशवाय नमः, ऊँ नारायणाय नमः, ऊँ माधवाय नमः- मन्त्रों से क्रमशः तीन बार आचमन करें, तत्पश्चात् ऊँ हृषिकेशाय नमःमन्त्रोच्चारण पूर्वक अंगूठे की जड़ से होठों को पोंछ कर हाथ धोले।
पवित्री धारण– तीन कुशाओं का बटा हुआ पवित्री बायें हाथ की अनामिका अँगुली में एवं दो कुशाओं का दायें हाथ की अनामिका अँगुली में इस मन्त्र से धारण करें –
ऊँ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः।।
अब यह मन्त्र बोल कर विनियोग करें – ऊँ अपवित्रः पवित्रोवेत्यस्य वामदेव ऋषिः विष्णुर्देवता गायत्री छन्दः हृदि पवित्रकरणे विनियोगः ।।
इस मन्त्र से शरीर पर जल छिड़के:- ऊँ अपवित्रः पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स वाह्याभ्यन्तरः शुचिः ।।
पुनः विनियोग :- ऊँ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरूपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मों देवता आसने विनियोगः ।।
इस मन्त्र से आसन के चारो ओर जल छिड़कें : –  ऊँ पृथ्वि ! त्वया धृता लोकाः देवि ! त्वं विष्णुनाधृता। त्वं च धारय मां देवि ! पवित्रं कुरु चासनम् ।।
तत्पश्चात् कुशा, तिल, अक्षत, जल, श्वेत पुष्पादि (रंगीन वर्जित) लेकर संकल्प करे –

संकल्प

Deepshraddha

हरिः ऊँ तत्सत् अद्य श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोह्नि द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराह कल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथम चरणे बौद्धावतारे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशान्तरगते…नगरे….ग्रामे….क्षेत्रे….विक्रमसम्वत्सरे शालिवाहनशाके कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे चतुर्दश्याम् तिथौ….वासरे….गोत्रोत्पन्न….शर्माहं, मम कायिक-वाचिक-मानसिक ज्ञाताज्ञात सकल दोष परिहारार्थं श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त फलप्रापत्यर्थं श्रीपितृणाम् प्रीत्यर्थं च पितृदीपावली सुअवसरे सायं काले दीपश्राद्धकर्ममहं करिष्ये।
तत्पश्चात् तीन बार अपने सामने और दाहिने, इस मन्त्र से जौ का छिड़काव करें—
ऊँ श्राद्ध भूम्यै नमः । ऊँ श्राद्ध भूम्यै नमः। ऊँ श्राद्ध भूम्यै नमः।
तत्पश्चात् पितृगायत्री (अथवा देव गायत्री) मन्त्र का तीन बार जप करे—
पितृगायत्री- ऊँ देवताभ्यः पितृभ्यः महायोगिभ्यः एव च । नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः।।
तत्पश्चात् विश्वेदेवा एवं अपने पितरों का ध्यान करते हुए दो कुशा पूरब की ओर और बारह कुशा दक्षिण की ओर स्थापित करें। आगे इन्हीं कुशाओं पर बारी-बारी से संकल्प बोलकर प्रज्वलित दीपों को स्थापित करते जाना है।
अब, जल, कुश का टुकड़ा और जौ तथा प्रज्वलित दीप हाथ में लेकर सर्वप्रथम पितृपक्ष (अपने कुल) के विश्वेदेवा के निमित्त संकल्प करे। यहाँ और इससे आगे भी जहाँ संकल्प बोलना है, ऊपर दिये गये पूरा संकल्प बोलना आवश्यक नहीं है। अतः संक्षिप्त संकल्प—
ऊँ अद्य….गोत्र….शर्माऽहं….गोत्राणाम् अस्मद् पितृ पितामह प्रपितामहानाम् (क्रमशः अपने पिता, दादा एवं परदादा के नामों का उच्चारण करना चाहिए)….शर्मन्….शर्मन्….. शर्मादीनाम्  वसुरूद्रादित्य स्वरूपानाम् एवं..गोत्राणाम् अस्मद् मातृ पितामही प्रपितामहीनाम् (क्रमशः अपनी माता, दादी एवं परदादी का नामोच्चारण करना चाहिए) ….देवी…देवी…देवीनाम् गायत्री सावित्री सरस्वती स्वरूपानाम् श्राद्ध सम्बन्धिनो विश्वेदेवा इदम् प्रज्वलित दीपं वो नमः —  बोलकर पूरब में रखे गए एक कुशा पर दीपक रख दे।
पुनः जौ, कुश, जल और दीपक लेकर मातृपक्ष (ननिहाल कुल) के विश्वेदेवा के निमित्त संकल्प करे। संक्षिप्त संकल्प—
ऊँ अद्य…गोत्र…शर्माऽहं….गोत्राणाम् अस्मद् मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामहादीनाम् (क्रमशः अपने नाना,परनाना और छरनाना के नामों का उच्चारण करें) …शर्मन्…शर्मन्…शर्मादीनाम् वसुरूद्रादित्य स्वरूपानाम् एवं अस्मद् मातामही, प्रमातामही, वृद्धप्रमातामहीनाम्(क्रमशः अपनी नानी, परनानी, छरनानी का नामोच्चारण करें। ध्यातव्य है कि सही नाम गोत्र ज्ञात न रहने पर रिक्त स्थान पर अमुक शब्द का उच्चारण करे) गायत्री सावित्री सरस्वती स्वरूपाणाम् श्राद्ध सम्बन्धी विश्वेदेवा इदम् प्रज्वलित दीपं वो नमः  – बोलकर पूरब में रखे दूसरे कुश पर दीपक रख दे।
घ्यातव्य है कि अब तक पूर्वाभिमुख बैठे हैं तथा जनेऊ और गमछा सव्य यानी बायें कंधे पर  है और सुखासन, अर्धपद्मासन या पद्मासन की मुद्रा है। अब आगे से दिशा, मुद्रा, गमछा और जनेऊ सभी बदल जायेंगे। बैठने की मुद्रा होगी – बायें पैर को पीछे की ओर मोड़ कर एवं दाहिने पैर को खड़ा रखते हुए उकड़ू बैठे, यहाँ यह भी ध्यान रखना है कि दाहिना हाथ घुटने के अन्दर हो, न कि बाहर। जनेऊ और गमछा दाहिने कंधे पर तथा दक्षिणाभिमुख हो जायें। संकल्प में कुश और जल तो होंगे, किन्तु जौ के स्थान पर तिल-चावल का प्रयोग किया जाएगा।
आगे के बारह दीप दक्षिण की ओर पहले रखे गए बारहों कुशाओं पर क्रमशः अलग-अलग संकल्प वाक्यों के साथ स्थापित किए जायेंगे। रिक्त स्थानों में क्रमशः पिता, दादा, परदादा, माता, दादी, परदादी तथा नाना, परनाना, छरनाना, नानी, परनानी, छरनानी का नामोच्चारण संकल्प वाक्य में करते जाना चाहिए।

पितृदीप

१. ऊँ अद्य….गोत्रः …शर्माऽहं…गोत्रः पितः …शर्मन् वसु स्वरूप प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलित दीपः ते स्वधा।
२. ऊँ अद्य….गोत्रः …शर्माऽहं…गोत्रः पितामहः …शर्मन् रूद्र स्वरूप प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलित दीपः ते स्वधा।
३. ऊँ  अद्य….गोत्रः …शर्माऽहं…गोत्रः प्रपितामहः …शर्मन् आदित्य स्वरूप प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलित दीपः ते स्वधा।
४. ऊँ अद्य….गोत्रः …शर्माऽहं…गोत्राः मातः …देव्याः गायत्री स्वरूपा प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलित दीपः ते स्वधा।
५. ऊँ अद्य….गोत्रः …शर्माऽहं…गोत्राः पितामही सावित्री स्वरूपा प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलित दीपः ते स्वधा।
६. ऊँ अद्य….गोत्रः …शर्माऽहं…गोत्रः प्रपितामहीः ….देव्याः सरस्वती स्वरूपा प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलित दीपः ते स्वधा।
७. ऊँ अद्य….गोत्रः …शर्माऽहं…गोत्रः मातामहः …शर्मन् वसु स्वरूप प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलित दीपः ते स्वधा।
८. ऊँ अद्य….गोत्रः …शर्माऽहं…गोत्रः प्रमातामहः …शर्मन् रूद्र स्वरूप प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलित दीपः ते स्वधा।
९. ऊँ अद्य….गोत्रः …शर्माऽहं…गोत्रः वृद्धप्रमातामहः …शर्मन् आदित्य स्वरूप प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलित दीपः ते स्वधा।
१०. ऊँ अद्य….गोत्रः …शर्माऽहं…गोत्राः मतामही …देव्याः गायत्री स्वरूपा प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलित दीपः ते स्वधा।
११. ऊँ अद्य….गोत्रः …शर्माऽहं…गोत्राः प्रमातामही…देव्याः सावित्री स्वरूपा प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलित दीपः ते स्वधा।
१२. ऊँ अद्य….गोत्रः …शर्माऽहं…गोत्रः वृद्धप्रमातामही…देव्याः सरस्वती स्वरूपा प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलित दीपः ते स्वधा।
इस प्रकार चौदह दीपों का दीपश्राद्ध कर्म पूरा हुआ। प्रसंगवश यहाँ यह भी कह देना आवश्यक लग रहा है कि पार्वणश्राद्ध की तरह, यहाँ चाचा, चाची, सास, ससुर आदि अन्य सम्बन्धियों के नाम से दीपदान आवश्यक
नहीं है, क्योंकि ऋषियों ने प्रधान चौदह में ही सबको समाहित कर लिया है।
अब पुनः सबका स्मरण करते हुए आशीष याचना करे। तत्पश्चात्  पुनः तिल, चावल कुश जलादि लेकर यथाशक्ति दक्षिणा संकल्प करे—
ऊँ अद्य….गोत्रः….शर्माऽहं कृत दीपश्राद्ध सिद्ध्यर्थं यथाशक्ति दक्षिणाद्रव्यं यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय दातुमहमुत्सृजे। (यह संकल्प पूर्वाभिमुख एवं सव्य जनेऊ और गमछे से करना चाहिए)
क्षमा प्रार्थना— प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत् । स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादितिश्रुतिः।।
पुनः दण्डवत प्रणाम करने के बाद अक्षत छिड़क कर विसर्जन करे।

*** इति दीपश्राद्धम् ***

प्रस्तोता— कमलेश पुण्यार्क,
श्री योगेश्वर आश्रम,
मैनपुरा, चन्दा,
कलेर, अरवल, विहार
मो. 08986286163

यह भी पढ़ें।

Written By Chhatradhar Sharma

***************************** Bhagawat Katha, Ram Katha ***************************** I'm an EXPERIENCED Web developer, I'm ready to do your job. Please initiate a CHAT to discuss complete requirements. I have more than 9 YEARS of experience in Web Development and Designing. I can do your job within time. Thanks, CDSHARMA https://www.cdsharma.in

Related Posts

कुछ याद रहे कुछ भुला दिए

कुछ याद रहे कुछ भुला दिए

कुछ याद रहे कुछ भुला दिए हम प्रतिक्षण बढ़ते जाते हैं, हर पल छलकते जाते हैं, कारवां पीछे नहीं दिखता, हर चेहरे बदलते जाते हैं। हर पल का संस्मरण लिए, कुछ धरे,...

चौरासी लाख योनियों का रहस्य

चौरासी लाख योनियों का रहस्य

चौरासी लाख योनियों का रहस्य हिन्दू धर्म में पुराणों में वर्णित ८४००००० योनियों के बारे में आपने कभी ना कभी अवश्य सुना होगा। हम जिस मनुष्य योनि में जी रहे हैं...

देवर्षि नारद

देवर्षि नारद

जब दूसरा सत्ययुग चल रहा था, उस सतयुग में सारस्वत नामक एक ब्राह्मण हुए, उन्हें सारे वेद वेदाङ्ग पुराण कंठस्थ थे । उत्तम बुद्धि तो ब्राह्मण के पास थी ही, साथ ही...

Comments

0 Comments

Trackbacks/Pingbacks

  1. नरक चतुर्दशी-दीपश्राद्ध का पर्व, -पं. छत्रधर शर्मा » Surta - […] दीपश्राद्ध के संपूर्ण विधान को यहॉं देख सकते हैं- दीपश्राद्ध […]
  2. धनतेरस क्‍यों और कैसे मनाते हैं ? -आचार्य शेखर प्रसाद शर्मा. - […] नरकचतुदर्श पर दीपश्राद्ध के संपूर्ण विधान को यहॉं देख सकते हैं- दीपश्राद्ध […]

Submit a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Copy न करें, Share करें।