हरि मेरो हरो ज्ञान अभिमान।
कोई बात सुनो नहीं जब लौं, होय न करूणा गान॥०१॥
सोई धन छिन लेहू यदुनन्दन, बिस्मृत रहे भगवान्॥०२॥
ज्ञान मान सब झार निकालहु, चलतो अन्तिम प्रान॥०३॥
बेद पुरान को तत्व न चाहि, केवल पदपद्मन् ध्यान॥०૪॥
“छत्रधर” सब जग जोरि मैं राख्यो, केवल हितु भगवान्॥०५॥
श्रीशुक्लयजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी
श्रीशुक्लयजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी ॐ मङ्गलाचरणम् वन्दे सिद्धिप्रदं देवं गणेशं प्रियपालकम् । विश्वगर्भं च विघ्नेशं अनादिं मङ्गलं विभूम् ॥ अथ ध्यानम् -...
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