शाकद्वीपीय ब्राह्मण

by | May 22, 2022 | 0 comments

शाकद्वीपीय ब्राह्मण

(मनुर्भव)
‍‌13/10/2018 और 14/10/2018

(यह वार्ता केवल ज्ञानवर्धन हेतु ही है, प्रश्नकर्ता हमारे श्रद्धेय हैं, आदरणीय हैं।)

प्रश्न: श्रीविजय पाण्डेय रायपुर

सृष्टि कि रचना के अनुसार हम जहाँ रहते हैंं वह जम्बूद्वीप है। जम्बूद्वीप खारा जल से घिरा हुआ है। इसके आगे वृताकार क्रमशः पल्क्ष द्वीप, सालमलि, कुश ,क्रौंच ,शाक एवं पुष्कर द्वीप है।

ये सब क्रमशः ईखरस, मदिरा, मठा ,घृत ,क्षीर एवं मिठा जल के समुद्रों से घिरा हुआ है।

खारा सागर से आगे के द्वीपों मे मनुष्यों का आना जाना नही होता।

बाकी के द्वीप देवताओं गंधर्वों, अप्सराओं, यक्षों, विद्याधरों, किम्पुरुषों आदि का विहार स्थल है।

शाक द्वीप क्षीर सागर से घिरा है जहाँ शेषशायी विष्णुजी का निवास कहा जाता है ,जहाँ चाक्षुष मन्वंतर मे समुद्र मंथन कि घटना हुई ।

इसके आगे के्ल पुष्कर द्वीप है जो मीठा जल से घिरा है।

मुझे ये जानना है कि शाकद्वीपीय ब्राह्मण जम्बूद्वीप मे कब और कैसे आये? ,और क्यों आये?

ऐसे श्रेष्ठ स्थान को छोड़ कर इस जम्बूद्वीप मे क्या करने आये थे?

अन्यथा न लें और जिज्ञासा पूरी करें।

उत्तर: श्रीभागवतानन्द गु्रू

शाकद्वीपीय ब्राह्मण मनुष्य योनि में नहीं आते थे। हम भविष्य पुराण के अनुसार देव मानव हैं, और साध्यगण में हमारी गिनती होती थी। हम सूर्य तथा निक्षुभा के वंशज हैं तथा हमारे राजा मेधातिथि हैं। श्रीकृष्ण जी के पुत्र साम्ब की चिकित्सा हेतु शाकद्वीप से यहां आए किन्तु हमारे द्वीप का नाश हो गया प्राकृतिक आपदा से। इसीलिए हम यहां प्रवासी हैं जब तक द्वीप बन न जाये।
दो प्रकार के ब्राह्मण प्रसिद्ध हैं। एक जो देवताओं के ब्राह्मण हैं, और दूसरे जो मनुष्यों के ब्राह्मण हैं। देवताओं के ब्राह्मण शाकद्वीपीय हैं तथा मनुष्यों के ब्राह्मण कान्यकुब्ज इत्यादि। हमें भोजक, मग आदि भी कहते हैं और इसका कारण निम्न है :-

भोजयन्ति सहस्रांशुं तस्मात्ते भोजकाः स्मृताः..
(निर्णय सिंधु, भविष्य पुराण, साम्ब पुराण)

सृजामि प्रथमं वर्णं मगसंज्ञमनूपमम् (भविष्य पुराण)

सूर्य के तेज से मग नामक अनुपम वर्ण का सर्वप्रथम सृजन किया।

यो हि मगेति वै प्रोक्तो मगो दिव्यो द्विजोत्तम ।
दिव्याश्चैते स्मृताः विप्राः आदित्याङ्ग समुद्भवाः ।। 

‘शब्दकल्पद्रुम’ नामक शब्दकोश में ‘ऋतव्रत’शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का पर्याय कहा गया है ।

अक्षरं चैव ओंकारं सार्धमात्रा द्वयेस्थिताम्।
वदन्ति चार्ध मात्रस्थं मकारं व्यंजनात्मकम् ।।
ध्यायन्ति च मकारं ये ज्ञानं तेषां मद्यत्मकम् ।
मकार ध्यान योगाश्च मगाः ह्येते प्रकीर्तिताः ।। (भविष्यपुराण )

हेमाद्रिकल्पतरु में कहा गया है कि ब्राह्मण दो प्रकार के होते हैं- एक दिव्य और दूसरा भौम ।

द्विविधा ब्राह्मणा राजन् ! दिव्या भौमास्तथैव च ।
भोजकादित्य- जाताहि दिव्यास्ते परिकीर्तिता ।।
(भविष्यपुराण)

जम्बूद्वीपीय विप्रों के लिए भौम संज्ञा है और शाकद्वीपीयों के लिए दिव्य ।

भोजयेत् ब्राह्मणान् दिव्यान्भौमाश्चापि सदक्षिणाम् ।।तथा च दिव्याश्चैते स्मृताः विप्रा आदित्यांग समुद्भवाः॥
(भविष्यपुराण)

मगाश्च भोजकश्चैव याजको वाचकस्तथा ।
वेदाङ्गचैव दिव्यश्च सौरः सूर्य ऋतव्रतः ।
यज्वी जापक इत्येते शाकद्वीप निवासितः ।
(भविष्यपुराण)

भास्करांगभवा विप्राः शाकद्वीपनिवासिनः ।
सर्वपूज्याः सर्वमान्या सर्वलोकनमस्कृताः ।।
(विप्रपूजन पद्धति)

सूर्यांगसम्भवा विप्राः शाकद्वीपनिवासिनः ।
मगब्राह्मण भूयिष्ठाः सर्वयज्ञेषु पूजिताः ।। 
(यज्ञकल्पलता)

आजकल मूर्खतावश अन्य ब्राह्मण शाकद्वीपीयों का अपमान करते हैं, जबकि शाकद्वीपीयों के सम्मान की बात शास्त्रों में ही है।

मगांनां भोजनं भक्तया शक्तया दानं प्रकल्पयेत् । दशपूर्वान्दशपरानात्मना सहभारत ।। 
(महाभारत)

सर्वेषामेव भूतानामुत्तमाः पुरुषास्मृताः ।
पुरुषेभ्यो द्विजः श्रेष्ठो द्विजेभ्योग्रन्थ पारगः ।।
ग्रन्थिभ्यो वेदविद्वांसस्तेभ्यस्तत्वार्थचिंतकाः ।
अर्थविद्भ्यश्च ज्ञानार्थं प्रतिबुध्ये विशिष्यते ।।
ज्ञानार्थविदां कोटिभ्यो वरिष्ठः योगिनोस्मृताः ।
योगिनां कोटि कोटिभ्यो भोजकश्चोत्तमेः भवेत् ।।
योगिह्यायोग निष्ठाश्चपितरो योग सम्भवः ।
भोजिते भोजके सर्वे प्रीताः  स्युस्ते न संशयः ।। 
(भविष्यपुराण)

मेघाच्छन्नो यदा सूर्यः श्राद्धादौ यज्ञ कर्मणिः ।
शाकद्वीपद्विजस्तत्र स्थापनीयः प्रयत्नतः ।।
(साम्बपुराण)

लुप्ते सूर्ये वह्नि हीने शाकद्वीप द्विजस्थिते ।
तत्र यज्ञादिकं कर्म करणीयं न दोषभाक् ।।

मम पूजा करंगत्वा शाकद्वीपादि हानय।
तान मगान् मम पूजार्थं शाकद्वीपायहानय ।
आरुह्य गरुडं साम्बः शीघ्रं गत्वाऽविचारयन् ।। (भविष्यपुराण, साम्बपुराण, ब्रह्मपुराण)

शाकद्वीपमनुप्राप्य संप्रहृष्टतनूरुहः ।
तत्रापश्यद्यथोद्दिष्टान् साम्बस्तेजस्विनो मगान् ।।
(भविष्य पुराण)

ऊपर के श्लोकों में इस बात का प्रमाण है कि सूर्य के न रहने पर जो कार्य निषिद्ध हैं, वे सभी कार्य शाकद्वीपीय ब्राह्मण की उपस्थिति से किये जा सकते हैं।

शाकद्वीपीय ब्राह्मण तीन ही विधाओं के कारण अधिक प्रसिद्ध हुए हैं :- आयुर्वेद, तंत्र एवं ज्यौतिष।

(भगवान श्री वेदव्यास जी ने जो लिखा, हम वही जानते हैं.. विवेकी को संकेत पर्याप्त है। हर व्यक्ति कुछ न कुछ जानता है लेकिन एक ही व्यक्ति सब कुछ नहीं जानता)

प्रश्न: श्रीविजय पाण्डेय रायपुर

शाकद्वीपीय और कान्यकुब्ज को आपने श्रेष्ठ कहा बाकी के सरयूपारीण सब ऐरे गैरे हैंं क्या।
इनका भी इतिहास बता दीजिये।

कहने को तो हम भी कह सकते हैंं कि हम सूर्यवंशी हैं।
वह इसलिये कि सावर्णि हमारा गोत्र है।
सावर्णि जी सूर्य पुत्र हैंं जो आठवें मनवन्तर के अधिपति होंगे।

अच्छा ये बताइये कि आपके विवेक मे किसी को कोइ संदेह नही पर क्या सभी शाकद्वीपीय ब्राह्मणों मे वो सब गुण विद्यमान है कि कहने को शाकद्वीपीय हैं?

उत्तर: श्रीभागवतानन्द गु्रू

सभी प्राणियों में पुरुष (मनुष्य) श्रेष्ठ हैं। पुरुषों में द्विजाति श्रेष्ठ है, और उनमें भी ग्रंथवेत्ता श्रेष्ठ हैं। ग्रंथों में भी वेद के जानने वाले श्रेष्ठ हैं और उसके अर्थ का चिंतन करने वाले उनसे भी श्रेष्ठ हैं। अर्थ जानने वाले लोगों में भी शास्त्रार्थ में कुशल जन श्रेष्ठ हैं तथा उनसे श्रेष्ठ संज्ञा योगियों की है। उन योगियों से भी श्रेष्ठ शाकद्वीपीय ब्राह्मण होते हैं जिनके सम्मान से सबों की प्रीति होती है, इसमें कोई संशय नहीं है। ऐसा भविष्य पुराण का वचन है जिसे जम्बूद्वीप में ही बैठकर सर्वज्ञ वेदव्यास जी ने लिखा और वे स्वयं भी शाकद्वीपीय नहीं थे। इसी आधार पर शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का निर्णय कान्यकुब्ज ब्राह्मण कुल में जन्मे स्वामी करपात्री जी ने दिया था तथा रंका गढ़ के दरबार में दक्षिणी द्रविड़ ब्राह्मणों ने भी इसका समर्थन किया था।

विशेष:

हमने सरयूपारीण को कुछ अनुचित कहा क्या ? आप व्यर्थ में द्वेष क्यों पाल रहे हैं ? लड़ना है तो व्यास जी से लड़िये न ? हमने तो अपने पक्ष से ग्रंथो से प्रमाण दिया है, आप भी दीजिए। हमने तो कुछ निंदा नहीं की है किसी की। और सरयूपारीण मूलतः कान्यकुब्ज ही हैं, भिन्न नहीं। श्रोत्रिय और सरयूपारीण आदि कान्यकुब्ज मूल के ही हैं जो बाद में उपजातियां बन गईं। हमने किसी को ऐरा गैरा कहा क्या जो आप आक्षेप कर रहे हैं ?? जो ब्राह्मण अपने धर्म में स्थित है वह पूज्य है चाहे शाकद्वीपीय हो या कान्यकुब्ज हो या कोई और। जो ब्राह्मण अपने धर्म से च्युत हो गया है, वह निंद्य है चाहे शाकद्वीपीय हो या कान्यकुब्ज हो या कोई और। लेकिन शाकद्वीपीयों की विशिष्टता इतिहास पुराणों में सर्वत्र है, जिसका प्रमाण हमने दिया हैं। इतिहास पुराण के प्रणेता भी स्वयं शाकद्वीपीय नहीं थे और न ही उन्हें पैसे दिए गए। जो सत्य है, जो लिखा, वही हमने कहा और माना।

विनम्रता – श्रीविजय पाण्डेय रायपुर

आपको छेड़े बिना मजा नही आता।
लड़ना तो हमे आपसे ही है।
अभी आपने ठीक कहा।
ब्राह्मण वंश से नही गुणों से जाना जाता है।
कहने को तो लोड़हा (पीसने का पत्थर) कहीं ये कहे कि मै महादेव का भाई हूँ तो—–😜😆😆😆

प्रतिउत्तर: श्रीभागवतानन्द गु्रू

वंश गुणों का आधार है। वंश के आधार पर बात न होती तो कुलीन शब्द का प्रयोग ही नहीं होता। वंश का आधार न होता तो गोत्र का महत्व भी न होता। वंश ही आधार है। जैसे जमीन घर का आधार। अब उस पर घर बने या न बने, अलग बात है। वैसे ही वंश के बाद गुण आये न आये, अलग बात है।

आक्षेप: श्रीविजय पाण्डेय रायपुर

कामों के अनुसार सूद्रों ने जाती बांट ली ,वैश्यों ने बांट ली ये बात समझ मे आती है ।
पर ब्राह्मणों को आपलोगों ने बांट दिया ?
आश्चर्य है।
ब्राह्मण तो भगवान ने मुख से प्रगट किया तब भेद नही था।
देवताओं के ब्राह्मण, वाह भाई।
सतयुग की बात कलयुग मे?

हमने तो यही पढ़ा है कि कलयुग मे, सूर्यवंशी राम और चंद्र वंशियों का वंश भी समाप्त हो जायेगा।

मरु और देवापि तपश्या कर रहे हैंं जो आगे सतयुग मे अपना वंश आगे बढ़ायेंगे।

किसी समय मे शाकद्वीपीय श्रेष्ठ रहे होंगे ।
कलयुग मे सभी ब्राह्मण समान हैंं।
यहां कोई देव ब्राह्मण और कोई मनुष्य ब्राह्मण नही है।

उत्तर: श्रीभागवतानन्द गु्रू

आपको ये बात समझ में नहीं आती। क्योंकि वेदों में जातियां हैं, कुलाल (कुम्हार), बढ़ई, निषाद, सूत आदि का वर्णन वेदों में भी है। शेष कई का वर्णन पुराणों में है। इसीलिए आपस में किसी ने कुछ नहीं बांटा। भगवान ने ब्राह्मण को प्रकट किया तो क्षत्रियों को भी किया और वैश्यों को भी किया, शूद्रों को भी किया। लेकिन सबों को नहीं किया। अर्थात किसी व्यक्तिविशेष को नहीं किया। अपितु ब्राह्मण के गुण, क्षत्रिय के गुण आदि विराट पुरुष से उत्पन्न हुए, न कि कोई शरीरधारी जीव। फिर मनुष्यों की रचना हुई जिनमें उनके पूर्वकल्प के कर्मफल के अनुसार जो जो गुण डाले गए, वे उस वर्ण की संज्ञा से युक्त हो गए और फिर अपनी संतानों में जन्म के माध्यम से ये गुण आगे बढ़ाते गए। और आप बांटने का भेदभाव हमारे ऊपर लगाते हैं ? कान्यकुब्जों से भेदभाव किसने किया ? सरयूपारीण जनों ने राम जी पर ब्रह्महत्या का आरोप क्यों लगाया ? आप कान्यकुब्जों से अलग कब हुए और क्यों ? हम किसी पर आरोप नहीं लगा रहे, बस ये सिद्ध कर रहे हैं कि ब्राह्मण विराट विष्णु के मुख से निकला तो केवल उसका गुण निकला। बाद में अलग अलग कुलों की उत्पत्ति होती गयी।

ऐसे ही भृगुवंशी ब्राह्मण और सूर्यवंशी कन्याओं से कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की उत्पत्ति बाद में हुई। ऐसे ही अग्निकुंड से परमार (चौहान) क्षत्रियों की उत्पत्ति वशिष्ठजी के द्वारा बाद में हुईं। वशिष्ठ और विश्वामित्र के संघर्ष में नंदिनी गाय द्वारा बहुत से म्लेच्छों की नई सृष्टि हुई। शरीर और कुल तो नए बनते रहते हैं। वैसे ही देवताओं और शाकद्वीप के राजा मेधातिथि की प्रार्थना पर सूर्यदेव और निक्षुभा के संयोग से शाकद्वीपीय मगसंज्ञक ब्राह्मणों का जन्म हुआ है।

‘देवताओं के ब्राह्मण’ ये बात भविष्य पुराण ने कही है, हमने खुद से बनाकर नहीं कही। सत्ययुग की बात कलियुग में लागू यदि हम कर रहे हैं, तो आप यह प्रमाणित करें कि सभी ब्राह्मण एक हैं कलियुग में, इसका कोई शास्त्रीय वचन है क्या ? ऐसे तो सत्ययुग के वचन को आप कलियुग में लागू करते ही हैं जैसे :- यह ‘ज्येष्ठ पुत्र’ का अधिकार है, यहां सभी पुत्रों को समान क्यों नहीं मानते ? यह ‘वेदोक्त’ है, यहां सभी ग्रंथों को समान क्यों नहीं मानते ?

वंश समाप्त हो जाएगा या बचा रहेगा, यह तब देखा जाएगा जब समाप्त होगा। अभी तो नहीं हुआ है न। अभी तो तुलसी, शालिग्राम, जगन्नाथ जी धरती पर हैं न। और चंद्रवंशी और सूर्यवंशी के नाश होने की बात उनकी राज्यसत्तासम्बन्धी विषय से है, न कि अस्तित्व के सम्बंध में। किसी समय शाकद्वीपीय श्रेष्ठ रहे होंगे यह बात सत्य है और आज जो आचारभ्रष्ट नहीं हुए वे भी श्रेष्ठ हैं यह भी सत्य है। और रही बात आज की, तो हेमाद्रि जी तेरहवीं शताब्दी के हैं, शाकद्वीपीय भी नहीं थे, किन्तु उनके वचन सर्वमान्य हैं और इनको शंकराचार्य अथवा करपात्री स्वामी जी भी नहीं काटते। उन्होंने कलियुग में भी शाकद्वीपीयों को दिव्य ब्राह्मण ही कहा है।

आक्षेप: श्रीविजय पाण्डेय रायपुर

धीरेंद्र जी,

कल के अपमान के बाद मै किसी के पोस्ट पर प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया।
बस अब तो मूक द्रष्टा बन कर रहना अच्छा है।

श्रीभागवतानंद गुरु:

अपमान ?? 🙄🙄🙄.. हमने कौन सा अपमान कर दिया किसी का ?? आपने पूछा, हमने उत्तर दिया। पुष्टि हेतु श्लोक के प्रमाण दिए.. फिर आपने कहना शुरू किया कि सभी एक नहीं, कोई दिव्य आदि की बात नहीं, जाति अपने से बांट ली, भेदभाव किया, कलियुग में मान्य नहीं आदि आदि। तो हमने भी सबों के शास्त्रीय उत्तर दिए, अपमान तो किया ही नहीं।

रही बात एक होने की, तो न उसकी आवश्यकता है, न वह सम्भव है। सभी मंत्रालय एक नहीं होते। सभी गांव एक जैसे नहीं होते, सभी ब्राह्मणों का अलग अलग काम, स्थान, विभाग और महत्व है, एक हो ही नहीं सकते क्योंकि यह अप्राकृतिक और अनावश्यक है। पूरे घर में एक ही हाल हो तो क्या होगा ? कमरे तो बांटने ही होंगे न। अभी खाद्य वस्तुओं का स्वाद एक ही हो तो ?? विभाजन ही पुष्ट करता है यदि प्रकृतिसम्मत हो तो। ऐसे आज ब्राह्मणों को एक ही साथ जोड़ रहे हैं, कल को वर्ण मिटाकर हिंदुओं को जोड़ने के नाम पर मटियामेट कर दीजिएगा। फिर हिंदुओं को भी मिटाकर सभी इंसान एक हैं, कह दीजिए।
मैंने यदि किसी का कोई अपमान किया है, तो मेरी उस पंक्ति या उक्ति को प्रस्तुत करें। एक तो मिलेगी नहीं, दूसरे यदि मिल भी गयी, तो उसके पीछे प्रतिपक्ष की ही किसी पंक्ति या उक्ति का आधार है, ऐसा मैं प्रमाणित कर दूंगा। जो भी प्रमाण मैंने दिए हैं, वह खुद से नहीं बनाए। ऋषिप्रणीत आचार्यसम्मत ग्रंथों से ही दिए हैं।

आक्षेप: श्रीविजय पाण्डेय रायपुर

इसका जवाब तो दूँगा ,नवरात्र के बाद।

एक शब्द कहूंगा आपमे भेद दृष्टि है।
और पुराण का कहना है जिसमें भेद दृष्टि है वह चार वेद और छःशास्त्र को पढ़ कर भी शास्त्र के सद्भाव को नही समझा।

श्रीभागवतानंद गुरु:

भेद दृष्टि होती तो हमारी प्रथम मुलाकात में आपको मैं प्रणाम करने नहीं झुकता। भेददृष्टि होती तो मैं यह नहीं कहता कि हरेक आचारवान सम्माननीय है और हरेक आचारभ्रष्ट निंद्य। भेददृष्टि होती तो कृपाशंकर शास्त्री जी, जो स्वयं भी सरयूपारीण हैं, उन्हें कभी न कभी हमारे साथ प्रत्यक्ष निवास करते हुए ऐसा अवश्य लगता। भेददृष्टि का आधार वंशानुगत असमानता है। स्वामी करपात्री जी ने कान्यकुब्ज तथा पुरी पीठाधीश्वर महाराज जी ने मैथिल ब्राह्मण कुल में जन्म लिया है, क्या मैं उन्हें प्रणाम नहीं करता ? भेददृष्टि का आधार, इसका उद्देश्य और परिणाम, दोनों ही अपमानसम्बन्धी नहीं हैं। आप अपने वंश पर गर्व करें, हम उसका सम्मान करते हैं, लेकिन जब हम अपने वंश पर गर्व करें, वो भी प्रामाणिक आधार पर, तो आपसे भी यही अपेक्षा है। भेददृष्टि न रखें तो लोकमर्यादा का नाश हो जाएगा। सबों को एक ही दृष्टि से देखने पर प्रकृति की विविधता के अनुसार किये गए मर्यादा और विभाजन की रेखा समाप्त हो जाएगी और संकरता का प्रसार होगा। सम्मान करने के लिए एक होना आवश्यक नहीं। और यदि आप मेरी अभेददृष्टि देखना चाहते हैं तो कभी लम्बा समय बिताइए, मैं पौधों और पत्थरों को भी जितना अधिक सम्मान और विनम्रता से व्यवहार करता हूँ, आपको अभेद का भी अनुभव हो जाएगा।

श्रीविजय पाण्डेय रायपुर

प्रणाम करने कि बात कहाँ से आ गई?
आपसे आयु मे तीन गुना से अधिक बड़ा हूँ फिर भी मै आपके चरण छूते हुऐ फोटो लेना अपनी शान समझा।

वह इसलिए कि मै ज्ञान का पुजारी हूँ।

ज्ञानी भेद व्यवहार मे रखता है अंतःकरण मे नही।

मैला लेकर चलने वाले को कोई गले नही लगाता।
इतनी दूरी तो बना कर रखना ही पड़ता है।

श्रीभागवतानंद गुरु:

यह आपका बड़प्पन है कि आपने हमें मान दिया। लेकिन क्या बदले में हमने मान नहीं दिया ?? ज्ञानी हूँ या नहीं, यह पता नहीं। लेकिन मैं भी भेद व्यवहार में ही रखता हूँ, अन्तःकरण में नहीं। व्यवहार में भेद रखने के लिए स्पर्शास्पर्श का भेद करता हूँ लेकिन किसी को दुःख में देखकर घाव भी पोंछता हूँ। आपने पूछा था कि शाकद्वीप छोड़कर हमलोग क्यों आये ? हमने उत्तर दिया, वो भी प्रमाण के साथ। उसी के अंतर्गत यह भी कहा कि हमें यहां बचाकर लाने के पीछे क्या कारण था, हमारे द्वीप के साथ ही हमें क्यों नष्ट नहीं होने दिया, इसमें देवविप्र सम्बन्धी प्रमाण भी दिया। आपने कलियुग में नकारा तो हेमाद्रि आदि के वचन बताए। अब कैसे आपका अपमान हो गया ?? या हमने कौन सी भेदभाव की बात कर दी ??
प्रणाम करने की बात कहां से आई, मैं बताऊं ?? आपने कहा कि मुझमें भेददृष्टि है। उसी के उत्तर में मैंने कहा कि इस प्रकार से है, और इस प्रकार से नहीं है। और भेददृष्टि है तो उसका आधार अपमान नहीं हैं, सम्मान ही हैं, जो आपके साथ, अन्य जनों के साथ बिताए व्यवहार में दिखता भी है।

श्रीविजय पाण्डेय रायपुर

कल को वर्ण मिटाकर हिन्दुओं को जोड़ने के नाम पर मटियामेट कर दीजिएगा।
हिन्दुओं को भी मिटा कर सभी इंसान एक है कह दीजिए।

अपने इस बात को याद रखिये ,इसका उत्तर मै नवरात्र के बाद दूंगा।
फिर बताइयेगा कि मटियामेट कौन कर रहा है।

श्रीभागवतानंद गुरु:

कौन कहते हैं, कौन सुनते हैं, हम नहीं जानते। हमने जो पढा, सो कहा। और जिसके बारे में जो पढा, उसके बारे में वैसा ही कहा। यदि मैं शाकद्वीपीय न भी होता तो भी जो पढ़ता वही कहता। जैसे मैं इंद्र नहीं हूँ, लेकिन जो इंद्र के बारे में, उनकी श्रेष्ठता के बारे में पढ़ा वही कहा। इंद्र बनूं तो भी वही कहूंगा। वैसे ही शाकद्वीपीय हूँ तो भी कहूंगा, न हूँ तो भी कहूंगा। जो पढा सो कहा।

आम के सभी वृक्ष क्या एक ही स्वाद देते हैं ? अलग अलग स्थान, काल, प्रजाति के अनुसार होते हैं। गुजरात, पहाड़ी, दक्षिणी और पूर्वी गायों के दूध में क्या समान गुण होते हैं ? सबों को एक ही कह दें तो ? अनर्थ हो जाएगा। जिसका महत्व जिस रूप में जहां वर्णित है, उसको यथावत स्वीकार कर लेने में क्या समस्या है ? आपको कोई अपशब्द तो नहीं कहा गया न ? संघ वाले और यहां तक कि अब तो प्रमुख भी वर्ण हटवा कर सभी हिंदू एक हैं, नारा लगा ही रहे हैं, आधुनिक लड़के तो एक कदम आगे निकल कर, इंसानियत से बड़ा धर्म कोई नहीं, वाले नारे के नाम पर भ्रष्ट हुए ही जा रहे हैं। इसमें क्या विवाद ??

ब्रह्मयामल तन्त्र, साम्ब पुराण, विष्णु पुराण, भविष्य पुराण, महाभारत, निर्णय सिंधु, चतुर्वर्ग चिंतामणि आदि हमने तो नहीं लिखे न ? वहां जो लिखा है, वह मेरे द्वारा प्रायोजित नहीं था। न ही मैंने पैसे देकर शाकद्वीपीय कुल में जन्म मांगा था। और न ही मैंने किसी ब्राह्मण को नीचा दिखाया है और यह कहा कि उसका अपमान करो, और न यह कहा कि शाकद्वीपीय यदि आचारभ्रष्ट हो जाए तो भी पूज्य है। फिर हमपर आरोप क्यों लग रहे हैं ? हमने जो पढ़ा, जहाँ और जैसा पढ़ा, सब तो सामने रख दिया न ? हां, हम संकरता के विरोधी हैं। ब्राह्मण शूद्र में समानता नहीं हो सकती, यह वर्णसंकरता है। शाकद्वीपीय कान्यकुब्ज में नहीं हो सकती, यह जातिसंकरता है। जो जहां हैं, अपने कुल के कार्य और महत्व को जानें, और आचार्यसम्मत मार्ग से चलते हुए, आचारवान् बनकर अपने कुल की कीर्ति बढ़ाएं, बिना किसी के तुलना या समानता का झगड़ा किये। लेकिन इस कारण हम केवल अप्राकृतिक वंशाधारित समानता के नाम पर ग्रंथवाक्यों को कैसे नकार सकते हैं ? हम और क्या कर दें ? अब क्या देह त्याग दें ?

जम्बूद्वीप के ब्राह्मण यदि तुलना भी करें तो पञ्च गौड़ और पञ्च द्रविड़ में करें। शाकद्वीप के ब्राह्मणों से किसी तुलना ? भाई, हमारा वंश भी अलग, द्वीप भी अलग। अभी तो क्रौंच, शाल्मली और श्वेतद्वीप के ब्राह्मण आये ही नहीं हैं !! अपने अपने द्वीप के ब्राह्मणों से बहस कीजिए न। हमें तो बक्श दीजिये। शाकद्वीप और उसके ब्राह्मणों के बारे में शास्त्र जो कहते हैं, उसे हमने जाना और माना। जम्बूद्वीप के ब्राह्मणों के बारे में जो शास्त्रों ने कहा, उसकी परवाह आप कीजिए। वैसे भी स्वयं श्रीकृष्ण जी की आज्ञा और कृपा से हमलोग आये थे, उन्हीं की कृपा से जी खा लेंगे, वो भी बिना सम्मान खोये और बिना किसी और का सम्मान खाये…

ब्राह्मण एक वर्ण है, तो हम सभी ब्राह्मण हैं। जैसे आम का फल है, तो सभी आम एक फल हुए। अब उसमें से कौन सा आम ? कौन सा ब्राह्मण ?? तो भाई, ये आम मालदा है, यह दशहरी है, या चौसा है, यह लंगड़ा है, या हापुस है, आदि आदि। तक क्या सबों को एक नहीं कह सकते ? नहीं, इसमें ये गुण है, स्वाद है, लाभ है, हानि है। ये अमुक मौसम, तापमान, खाद, वर्षा से सही उगता है, आदि आदि। वैसे ही भाई, ब्राह्मण में भी यह शाकद्वीप वाले हुए, ये जम्बूद्वीप वाले हुए। जम्बूद्वीप वालों में ये मैथिल हुए, ये श्रोत्रिय हुए, ये बंग हुए, ये दक्षिण से हुए, ये कान्यकुब्ज हुए, सरयूपारीण हुए, आदि आदि। इनमें से इस ब्राह्मण का इतिहास ऐसा है, इनकी दक्षता अमुक कर्म में है, इनकी विशेष प्रतिष्ठा इस अवसर या कार्य में , इस क्षेत्र में है। ये शाकद्वीप वाले हैं, इनका इतिहास, प्रवास, आगमन, महत्व, ऐसे ऐसे हैं दक्षता आयुर्वेद, तन्त्र, ज्यौतिष आदि में हैं, आदि आदि। इसमें क्या झगड़ा ?? इतने सीधे और सपाट विषय को इतना उग्र क्यों बनाया जा रहा है ?

इस चर्चा का प्रारम्भ पांडेय जी के उस प्रश्न से हुआ था कि शाकद्वीप वाले इधर कैसे आये ? क्या बात हो गई ? हमने अपना इतिहास और महत्व शास्त्र के आधार ओर बताया, वो भी बिना किसी का अपमान या निंदा किये। आपसे जब आपके इतिहास के बारे में पूछा जाए, तो आप अपना महत्व शास्त्र के आधार पर बता दें, बिना किसी का अपमान या निंदा किये .. और क्या ?? सीधी सीधी बात है… ☺️☺️💐☺️☺️ लेकिन जैसे शाकद्वीपीय के लिए दिव्य और जम्बूद्वीपीय के लिए भौम आदि शब्द ग्रंथों में आये हैं और कलियुग में गैर शाकद्वीपीय महापुरुषों ने भी माना है, तो उसमें नकारना उचित भी नहीं है।

Written By Chhatradhar Sharma

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