✍️ CD Sharma · 📅 25 Aug 2026 · 🏷️ तर्पण विधि, Tarpan Vidhi, पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण, भीष्म तर्पण, यम तर्पण, पितृपक्ष, cdsharma.in
सनातन धर्म में जलदान (तर्पण) द्वारा देव, ऋषि, मनुष्य और अपने पूर्वजों (पितरों) के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विधान है। तर्पण का अर्थ है — 'तृप्त करना'। आश्विन मास के पितृपक्ष, प्रत्येक मास की अमावस्या अथवा नित्य संध्यावंदन के उपरांत किया गया तर्पण कुल में शांति, आरोग्य एवं वंश-वृद्धि प्रदान करता है।
शुद्ध जल से आचमन कर कुश की पवित्री (अंगूठी) धारण करें और अपने ऊपर जल छिड़ककर आत्म-शुद्धि करें:
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
दाहिने हाथ में अक्षत, जल और त्रिकुशा (तीन कुशाएं) लेकर संकल्प बोलें:
ॐ विष्णुः ३ श्रीमद्भगवतो विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य नर्मदाया दक्षिण दिग्भागे... (नगर/ग्राम का नाम)... नाम संवत्सरे, श्रीसूर्ये... (दक्षिणायने/उत्तरायणे)... अयने, आश्विन मासे, पितृपक्षे,... तिथौ,... वासरे,... गोत्रोत्पन्नः... शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं देवर्षिपितृमनुष्याणां तर्पणमहं करिष्ये।
(संकल्प का जल ताम्रपात्र में छोड़ दें।)
(मुद्रा: पूर्वाभिमुख, पद्मासन/सुखासन, जनेऊ सव्य अर्थात् बायें कंधे पर, सामग्री: त्रिकुशा, अक्षत एवं शुद्ध जल, उंगलियों के अग्रभाग अर्थात् देवतीर्थ से १-१ अंजलि जल दें)
ॐ ब्रह्माद्या देवताः सर्वे ऋषयो मुनयस्तथा।
असुरा यातुधानाश्च मातरश्चण्डिकास्तथा॥
दिक्पाला लोकपालाश्च सर्वे देवाधिदेवताः।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मद्दत्तेनाम्बुना सदा॥
(१ अंजलि जल देवतीर्थ से समर्पित करें।)
(मुद्रा: उत्तराभिमुख, जनेऊ कण्ठोत्तरी / निवीति अर्थात् माला की भांति गले में, सामग्री: त्रिकुशा, जौ/अक्षत एवं जल, ऋषितीर्थ से २-२ अंजलि जल दें)
अत्रिर्मरीचिरङ्गिराः पुलस्त्यः पुलहस्तथा।
सनकः सनन्दनश्चैव सनातनस्तृतीयकः॥
वसिष्ठो नारदश्चैव भृगुश्चैव प्रचेतसा।
आसुरिः कपिलश्चैव वोढुः पञ्चशिखस्तथा॥
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मद्दत्तेनाम्बुना सदा॥
(२ अंजलि जल समर्पित करें।)
(मुद्रा: दक्षिणाभिमुख, बायां घुटना मोड़कर बैठें, जनेऊ अपसव्य अर्थात् दाहिने कंधे पर, सामग्री: कुशा की जड़/मोटक, काले तिल एवं जल, अंगूठे के मूल अर्थात् पितृतीर्थ से ३-३ अंजलि जल दें)
(क) चतुर्दश यम तर्पण
यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च।
वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च॥
औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने।
वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः॥
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मद्दत्तेनाम्बुना सदा॥
(प्रत्येक नाम से अथवा सम्पूर्ण श्लोक बोलकर ३ अंजलि जल दें।)
(ख) पितृवर्ग तर्पण (३-३ बार जलांजलि)
हाथ में काले तिल, जल और कुश का मोटक लेकर पितृतीर्थ से ३-३ बार जल अर्पित करें:
अस्मत् पिता, प्रपिता, वृद्धप्रपिता वसुरुद्रादित्यस्वरूपेभ्यः इदं सतिलं जलं तेभ्यः स्वधा नमः॥ (३ बार)
अस्मत् माता, प्रमाता, वृद्धप्रमाता वसुरुद्रादित्यस्वरूपा इदं सतिलं जलं ताभ्यः स्वधा नमः॥ (३ बार)
अस्मत् नाना, प्रनाना, वृद्धप्रनाना वसुरुद्रादित्यस्वरूपेभ्यः इदं सतिलं जलं तेभ्यः स्वधा नमः॥ (३ बार)
अस्मत् नानी, प्रनानी, वृद्धप्रनानी वसुरुद्रादित्यस्वरूपा इदं सतिलं जलं ताभ्यः स्वधा नमः॥ (३ बार)
ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मद्दत्तेनाम्बुना सदा॥ (१ अंजलि)
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मद्दत्तेनाम्बुना सदा॥ (१ अंजलि)
मातृमातामहादयः ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मद्दत्तेनाम्बुना सदा॥ (१ अंजलि)
वैयाघ्रपदगोत्राय सांकृत्यप्रवराय च।
अपुत्राय ददाम्येतत् सलिलं भीष्मवर्मणे॥
(अथवा) अपुत्राय जलं दद्यात् गङ्गापुत्राय भीष्मणे॥ (१ अंजलि)
एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
(सूर्यदेव को अर्घ्य देकर हाथ जोड़कर नमस्कार करें।)
अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मद्दत्तेनाम्बुना सदा॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥
ॐ केशवाय नमः। ॐ माधवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः॥
अनेन देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणेन पितृरूपी जनार्दन-वासुदेवः प्रीयताम्, न मम।
(हाथ में जल लेकर ताम्रपात्र में छोड़ दें और पितृदेवों को साष्टांग प्रणाम करें।)
अभी कोई कमेंट नहीं — सबसे पहले आप लिखें!