महामृत्युंजय मंत्र जप विधि: संपूर्ण शास्त्रीय विधान, विनियोग, न्यास, ध्यान एवं नियम | cdsharma.in
✍️ CD Sharma · 📅 21 Aug 2026 · 🏷️ महामृत्युंजय मंत्र, Maha Mrityunjaya Mantra, शिव साधना, जप विधि, न्यास विधि, रुद्राक्ष माला, cdsharma.in
महामृत्युंजय मंत्र साधना: शास्त्रीय रहस्य एवं संपूर्ण जप विधान
ऋग्वेद (७.५९.१२) एवं यजुर्वेद में वर्णित महामृत्युंजय मंत्र देवाधिदेव महादेव का सबसे शक्तिशाली और संजीवनी स्वरूप मंत्र है। यह मंत्र अकाल मृत्यु के भय, असाध्य रोगों, मानसिक संतापों और ग्रह-दोषों के निवारण हेतु अचूक माना गया है।
महामृत्युंजय मूल मंत्र एवं संपुट स्वरूप
१. वैदिक मूल मंत्र (ऋग्वेदोक्त):
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यौर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
२. मृत-संजीवनी महामृत्युंजय मंत्र (तांत्रिक/सम्पुटित स्वरूप):
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यौर्मुक्षीय माऽमृतात् स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ॥
मंत्र का सरल हिन्दी अर्थ:
हम तीन नेत्रों वाले (भूत, वर्तमान, भविष्य के ज्ञाता) भगवान शिव की आराधना करते हैं, जो समस्त संसार में दिव्य सुगंध (चेतना) फैलाते हैं और सभी जीवों का पोषण एवं संवर्धन करते हैं। जिस प्रकार पका हुआ खरबूजा अपनी बेल के बंधन से अनायास ही मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार हम मृत्यु (संसार के जन्म-मरण चक्र और रोगों) के बंधन से मुक्त होकर अमरत्व (मोक्ष) को प्राप्त हों।
जप पूर्व की आवश्यक तैयारी एवं नियम
- आसन एवं दिशा: पूर्व या उत्तर (ईशान कोण) की ओर मुख करके बैठें। ऊनी कम्बल या कुश का आसन सर्वश्रेष्ठ है।
- माला: शुद्ध एवं संस्कारित १०८ मनकों वाली रुद्राक्ष माला का ही प्रयोग करें। माला को गोमुखी (Japa Bag) के भीतर रखकर ढककर जपें।
- समय: ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) अथवा प्रदोष काल जप के लिए सर्वोत्तम है।
- स्थापना: सम्मुख भगवान शिव की प्रतिमा, पारद/नर्मदेश्वर शिवलिंग अथवा महामृत्युंजय यंत्र स्थापित कर शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
चरणबद्ध दैनिक जप अनुष्ठान विधि
१. पवित्रीकरण एवं आचमन
हाथ में जल लेकर अपने ऊपर एवं पूजा सामग्री पर छिड़कें:
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
तत्पश्चात दायें हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें:
- ॐ केशवाय नमः (प्रथम आचमन)
- ॐ नारायणाय नमः (द्वितीय आचमन)
- ॐ माधवाय नमः (तृतीय आचमन)
- ॐ हृषीकेशाय नमः (हाथ धो लें)
२. महासंकल्प (Sankalpam)
दायें हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर संकल्प बोलें:
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य... (वर्तमान संवत्सर, मास, पक्ष, तिथि का उच्चारण करें) मम आत्मनः श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त-पुण्यफल-प्राप्त्यर्थं, मम सकल-दुरित-रोग-शोक-निवारणार्थं, दीर्घायु-आरोग्य-ऐश्वर्य-प्राप्त्यर्थं श्रीसाम्बसदाशिव-प्रीतये महामृत्युंजय-मन्त्र-जपमहं करिष्ये।
(जल को ताम्रपात्र अथवा भूमि पर छोड़ दें।)
३. विनियोगः (Viniyoga)
दायें हाथ में जल लेकर विनियोग मंत्र पढ़ें और भूमि पर जल छोड़ें:
अस्य श्रीमहामृत्युंजय-मन्त्रस्य वशिष्ठ ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीत्र्यम्बकरुद्रो देवता, ह्रीं शक्तिः, श्रीं बीजं, मम सर्वारिष्ट-निवारणार्थं जपे विनियोगः।
- हिन्दी अर्थ: इस महामृत्युंजय मंत्र के ऋषि वशिष्ठ हैं, अनुष्टुप छंद है, देवता श्री त्र्यम्बक (रुद्र) हैं, ह्रीं शक्ति है, श्रीं बीज है और समस्त अनिष्टों के निवारण हेतु इसका विनियोग किया जा रहा है।
४. ऋष्यादिन्यासः (Rishyadi Nyasa)
दाहिने हाथ की उंगलियों से निर्दिष्ट अंगों को स्पर्श करें:
- वशिष्ठ ऋषये नमः — शिरसि (सिर को स्पर्श करें)
- अनुष्टुप् छन्दसे नमः — मुखे (मुख को स्पर्श करें)
- श्रीत्र्यम्बकरुद्र देवतायै नमः — हृदि (हृदय को स्पर्श करें)
- ह्रीं शक्तये नमः — पादयोः (दोनों चरणों को स्पर्श करें)
- श्रीं बीजाय नमः — गुह्ये (नाभि के निचले भाग को स्पर्श करें)
- विनियोगाय नमः — सर्वाङ्गे (संपूर्ण शरीर पर हाथ फेरें)
५. करन्यासः (Kara Nyasa)
दोनों हाथों की उंगलियों को परस्पर स्पर्श करते हुए ऊर्जा जाग्रत करें:
- ॐ त्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः (दोनों अंगूठों को स्पर्श करें)
- ॐ त्रीं तर्जनीभ्यां नमः (तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें)
- ॐ त्रूं मध्यमाभ्यां नमः (मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें)
- ॐ त्रैं अनामिकाभ्यां नमः (अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें)
- ॐ त्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः (कनिष्ठिका उंगलियों को स्पर्श करें)
- ॐ त्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः (हथेलियों के आगे और पीछे स्पर्श करें)
६. हृदयादि अङ्गन्यासः (Anga Nyasa)
- ॐ त्रां हृदयाय नमः (दाहिने हाथ से हृदय को स्पर्श करें)
- ॐ त्रीं शिरसे स्वाहा (सिर को स्पर्श करें)
- ॐ त्रूं शिखायै वषट् (शिखा स्थान को स्पर्श करें)
- ॐ त्रैं कवचाय हुम् (दोनों भुजाओं को परस्पर क्रॉस कर कंधों को स्पर्श करें)
- ॐ त्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् (दोनों नेत्रों एवं आज्ञा चक्र को स्पर्श करें)
- ॐ त्रः अस्त्राय फट् (सिर के ऊपर से हाथ घुमाकर दाहिने हाथ की तर्जनी व मध्यमा से बायें हाथ पर ताली बजाएं)
७. शिव ध्यानम् (Shiva Dhyanam)
हाथ जोड़कर भगवान त्र्यम्बक के स्वरूप का ध्यान करें:
हस्ताम्भोजयुगस्थकुम्भयुगलादुद्धृत्य तोयं शिरः
सिञ्चन्तं करयोर्युगेन वहतं स्वाङ्के स्थितां प्रेयसीम्।
चारुब्रह्मपदासनं प्रणतनुत्पाशं त्रिनेत्रं विभुं
ध्यायेत्तं शशिशेखरं भयहरं मृत्युंजयं सर्वदम्॥
- हिन्दी भावार्थ: जिनके चार कमलरूपी हाथों में से दो हाथों में अमृत कलश हैं जिनसे वे स्वयं अपने मस्तक का अभिषेक कर रहे हैं, तीसरे हाथ में अमृत कुंभ लिए हैं और चौथे हाथ से अपनी गोद में बैठी शक्ति (पार्वती) का आलिंगन कर रहे हैं; जो पद्मासन पर विराजमान हैं, त्रिनेत्रधारी हैं, जिनके मस्तक पर बालचंद्र सुशोभित है, जो समस्त भयों और मृत्यु का नाश करने वाले हैं—उन दयालु महामृत्युंजय भगवान का हम ध्यान करते हैं।
माला पूजन एवं जप विधि
- माला को गंगाजल से धोकर चंदन व अक्षत लगाएं।
- प्रार्थना करें: “त्वं माले सर्वदेवानां सर्वसिद्धिप्रदा मता। शिवेन सहिता देवि मम सिद्धिं प्रदापय॥”
- जप करते समय तर्जनी (Index Finger) का स्पर्श माला से न होने दें। माला को मध्यमा उंगली पर रखकर अंगूठे से मनकों को अपनी ओर खींचें।
- १०८ मनके पूर्ण होने पर सुमेरु (शीर्ष मनका) को लांघें नहीं; माला को वहीं से पलटकर पुनः अगला चक्र प्रारंभ करें।
- प्रतिदिन न्यूनतम १, ३, ५ या ११ माला का मानसिक अथवा उपांशु (होंठ हिलें पर ध्वनि बाहर न आए) जप करें।
जप समर्पण एवं क्षमा प्रार्थना (Japa Samarpanam)
जप समाप्ति पर आचमनी से दायें हाथ में जल लेकर भगवान शिव के चरणों में जप का फल समर्पित करें:
गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादान्महेश्वर॥
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः, जपसमर्पणं मस्तु ॥
क्षमा प्रार्थना:
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर॥
आसन के नीचे थोड़ा सा जल छिड़ककर उसे मस्तक पर लगाएं, इसके बिना जप का फल इंद्रदेव को प्राप्त हो जाता है।
साधना काल के आवश्यक नियम
- जप काल में पूर्ण सात्विक आहार (लहसुन, प्याज व तामसिक भोजन से रहित) ग्रहण करें।
- वाणी पर संयम रखें, असत्य भाषण और क्रोध से बचें।
- मंत्र का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए। यदि वैदिक मंत्र कठिन लगे, तो केवल लघु मंत्र “ॐ जूं सः” अथवा “ॐ नमः शिवाय” से भी आरंभ किया जा सकता है।
← सभी लेख देखें