✍️ CD Sharma · 📅 25 Aug 2026 · 🏷️ दीपश्राद्ध, Deep Shraddha Vidhi, कार्तिक चतुर्दशी दीपदान, पितृ तर्पण, यम चतुर्दशी, 14 दीपदान संकल्प, पितृ दोष शांति, cdsharma.in
सम्पूर्ण दीपश्राद्ध: लुप्तप्राय वैदिक परम्परा, माहात्म्य एवं सम्पूर्ण अनुष्ठान विधान
सनातन धर्म के नित्यकर्मों में देवकार्य और पितृकार्य दोनों को समान रूप से अनिवार्य माना गया है। धर्मशास्त्रों का स्पष्ट मत है कि देवकार्य की तुलना में पितृकार्य की उपेक्षा अधिक अनिष्टकारी होती है, क्योंकि देवगण तो भावग्राही हैं, किंतु अतृप्त पितरों का असंतोष कुल में अशांति, वंश-वृद्धि में अवरोध और अज्ञात व्याधियों का कारण बन जाता है।
पितरों के ऋण से विमुक्त होने और उनका आशीष प्राप्त करने के लिए शास्त्रों ने उत्तरोत्तर रियायतें प्रदान की हैं:
यदि कोई साधक प्रमादवश, अज्ञानवश अथवा विषम परिस्थितियों के कारण उपर्युक्त सभी अवसरों पर पितृकार्य करने से वंचित रह गया हो, तो उसके लिए कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (नरक/यम चतुर्दशी) की सायंकाल में 'दीपश्राद्ध' का अचूक शास्त्रीय विधान है।
यह वर्ष का अंतिम अवसर माना जाता है जब दीपों के प्रकाश और मंत्रोच्चार से पितरों को मार्ग दिखाकर तृप्त किया जा सकता है। इस तिथि पर दीपदान न करने से पितर अत्यंत निराश होकर अपने लोक लौट जाते हैं।
स्नान कर श्वेत अथवा पीत धोती धारण करें, शिखा-बंधन करें और पूर्वाभिमुख होकर ऊनी आसन पर बैठें।
आचमन विधि: दायें हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें:
तत्पश्चात अंगूठे के मूल भाग से होंठ पोंछकर हाथ धो लें:
पवित्री धारण: बायें हाथ की अनामिका उंगली में ३ कुशा की पवित्री और दायें हाथ की अनामिका में २ कुशा की पवित्री इस मंत्र से धारण करें:
ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्॥
देह शुद्धि (मार्जन): विनियोग: ॐ अपवित्रः पवित्रोवेत्यस्य वामदेव ऋषिः, विष्णुर्देवता, गायत्री छन्दः, हृदि पवित्रकरणे विनियोगः। अपने शरीर एवं पूजन सामग्री पर जल छिड़कें:
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
आसन पूजन एवं शुद्धि: विनियोग: ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतलं छन्दः, कूर्मो देवता, आसने विनियोगः। आसन के चारों ओर जल छिड़कें:
ॐ पृथ्वि! त्वया धृता लोका देवि! त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि! पवित्रं कुरु चासनम्॥
हाथ में कुशा, काले तिल, अक्षत, जल और श्वेत पुष्प लेकर पूर्व दिशा की ओर मुख रखकर सम्पूर्ण देश-काल युक्त संकल्प पढ़ें:
हरिः ॐ तत्सत् अद्य श्रीभगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे बौद्धावतारे भूर्लोके जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशान्तर्गते... (नगर/ग्राम का नाम)... क्षेत्रे... (संवत्सर का नाम)... संवत्सरे, श्रीसूर्ये... (दक्षिणायने/उत्तरायणे)... ऋतौ... (शरद्/हेमन्त)... कार्तिक मासे, कृष्ण पक्षे, चतुर्दश्याम् तिथौ... (वार का नाम)... वासरे, ... (अपना गोत्र)... गोत्रोत्पन्नः... (अपना नाम)... शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं, मम कायिक-वाचिक-मानसिक-ज्ञाताज्ञात सकल दोष परिहारार्थं, श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त फलप्राप्त्यर्थं, श्रीपितॄणां तृप्तिपूर्वक-अक्षय-आशीर्वाद-प्राप्त्यर्थं च पितृदीपावली-पुण्यपर्वणि सायं काले दीपश्राद्धकर्ममहं करिष्ये। (संकल्प का जल ताम्रपात्र में छोड़ दें।)
हाथ में जौ (यव) लेकर अपने सामने और दाहिनी ओर भूमि पर तीन बार छिड़कें:
तत्पश्चात हाथ जोड़कर पितृ गायत्री मंत्र का तीन बार सस्वर जप करें:
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥
(मुद्रा: सुखासन/पद्मासन, जनेऊ व गमछा सव्य अर्थात् बायें कंधे पर, हाथ में जल, जौ, कुश और प्रज्वलित दीपक लें)
१. पितृपक्ष (स्वकुल) के विश्वेदेवा निमित्त संकल्प:
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्माऽहं... (पितृ कुल का गोत्र)... गोत्राणाम् अस्मद् पितृ-पितामह-प्रपितामहानाम्... (पिता, दादा, परदादा का नाम)... शर्मणाम् वसुरुद्रादित्य स्वरूपाणां तथा... (मातृ कुल का गोत्र)... गोत्राणाम् अस्मद् मातृ-पितामही-प्रपितामहीनाम्... (माता, दादी, परदादी का नाम)... देवीनाम् गायत्री-सावित्री-सरस्वती स्वरूपाणां श्राद्धसम्बन्धिनो विश्वेदेवा इदं प्रज्वलितं दीपं वो नमः। (दीपक को पूर्व दिशा में रखी पहली कुशा पर स्थापित करें।)
२. मातृपक्ष (ननिहाल कुल) के विश्वेदेवा निमित्त संकल्प:
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्माऽहं... (नाना के कुल का गोत्र)... गोत्राणाम् अस्मद् मातामह-प्रमातामह-वृद्धप्रमातामहानाम्... (नाना, परनाना, छरनाना का नाम)... शर्मणाम् वसुरुद्रादित्य स्वरूपाणां तथा... गोत्राणाम् अस्मद् मातामही-प्रमातामही-वृद्धप्रमातामहीनाम्... (नानी, परनानी, छरनानी का नाम)... देवीनाम् गायत्री-सावित्री-सरस्वती स्वरूपाणां श्राद्धसम्बन्धिनो विश्वेदेवा इदं प्रज्वलितं दीपं वो नमः। (दीपक को पूर्व दिशा में रखी दूसरी कुशा पर स्थापित करें।)
अब विश्वेदेवा का कार्य पूर्ण हो चुका है। यहाँ से पितरों का मुख्य कृत्य आरंभ होता है, अतः निम्नलिखित शास्त्रीय नियमों का पालन करें:
दक्षिण दिशा में रखी १२ कुशाओं पर क्रमशः एक-एक प्रज्वलित दीपक हाथ में तिल-जल लेकर संकल्पपूर्वक स्थापित करें:
१. पिता के निमित्त (वसु रूप):
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्माऽहं... (पिता का गोत्र)... गोत्रः पितः... (पिता का नाम)... शर्मन् वसुरूप प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलितः दीपः ते स्वधा।
२. दादा (पितामह) के निमित्त (रुद्र रूप):
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्माऽहं... (दादा का गोत्र)... गोत्रः पितामहः... (दादा का नाम)... शर्मन् रुद्ररूप प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलितः दीपः ते स्वधा।
३. परदादा (प्रपितामह) के निमित्त (आदित्य रूप):
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्माऽहं... (परदादा का गोत्र)... गोत्रः प्रपितामहः... (परदादा का नाम)... शर्मन् आदित्यरूप प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलितः दीपः ते स्वधा।
४. माता के निमित्त (गायत्री रूपा):
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्माऽहं... (माता का गोत्र)... गोत्रा मातः... (माता का नाम)... देवी गायत्रीस्वरूपा प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलितः दीपः ते स्वधा।
५. दादी (पितामही) के निमित्त (सावित्री रूपा):
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्माऽहं... (दादी का गोत्र)... गोत्रा पितामही... (दादी का नाम)... देवी सावित्रीस्वरूपा प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलितः दीपः ते स्वधा।
६. परदादी (प्रपितामही) के निमित्त (सरस्वती रूपा):
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्माऽहं... (परदादी का गोत्र)... गोत्रा प्रपितामही... (परदादी का नाम)... देवी सरस्वतीस्वरूपा प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलितः दीपः ते स्वधा।
७. नाना (मातामह) के निमित्त (वसु रूप):
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्माऽहं... (नाना का गोत्र)... गोत्रः मातामहः... (नाना का नाम)... शर्मन् वसुरूप प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलितः दीपः ते स्वधा।
८. परनाना (प्रमातामह) के निमित्त (रुद्र रूप):
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्माऽहं... (परनाना का गोत्र)... गोत्रः प्रमातामहः... (परनाना का नाम)... शर्मन् रुद्ररूप प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलितः दीपः ते स्वधा।
९. छरनाना (वृद्धप्रमातामह) के निमित्त (आदित्य रूप):
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्माऽहं... (छरनाना का गोत्र)... गोत्रः वृद्धप्रमातामहः... (छरनाना का नाम)... शर्मन् आदित्यरूप प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलितः दीपः ते स्वधा।
१०. नानी (मातामही) के निमित्त (गायत्री रूपा):
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्माऽहं... (नानी का गोत्र)... गोत्रा मातामही... (नानी का नाम)... देवी गायत्रीस्वरूपा प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलितः दीपः ते स्वधा।
११. परनानी (प्रमातामही) के निमित्त (सावित्री रूपा):
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्माऽहं... (परनानी का गोत्र)... गोत्रा प्रमातामही... (परनानी का नाम)... देवी सावित्रीस्वरूपा प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलितः दीपः ते स्वधा।
१२. छरनानी (वृद्धप्रमातामही) के निमित्त (सरस्वती रूपा):
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्माऽहं... (छरनानी का गोत्र)... गोत्रा वृद्धप्रमातामही... (छरनानी का नाम)... देवी सरस्वतीस्वरूपा प्रीत्यर्थं दीपश्राद्धे एष प्रज्वलितः दीपः ते स्वधा।
(विशेष: यदि किसी पूर्वज का नाम या गोत्र विस्मृत हो, तो उनके स्थान पर 'अमुक' शब्द का उच्चारण करें। शास्त्रानुसार इन १४ प्रधान दीपों में ही चाचा, ताऊ, बुआ, मौसी, सास, ससुर आदि समस्त ज्ञात-अज्ञात कुल-संबंधियों का समावेश हो जाता है।)
दिशा व मुद्रा की पुनः वापसी: पुनः पूर्वाभिमुख होकर बैठें और जनेऊ को अपसव्य से सव्य (बायें कंधे पर) कर लें। हाथ में तिल, अक्षत, कुश और जल लेकर दक्षिणा संकल्प करें:
ॐ अद्य... (अपना गोत्र)... गोत्रः... (अपना नाम)... शर्मा/वर्मा/गुप्तोऽहं मया कृतस्य अस्य दीपश्राद्धकर्मणः साद्गुण्यार्थं सांगतासिद्ध्यर्थं च यथाशक्ति दक्षिणाद्रव्यं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दातुमहमुत्सृजे। (जल व दक्षिणा भूमि पर या ताम्रपात्र में छोड़ दें।)
क्षमा प्रार्थना एवं स्तुति: दोनों हाथ जोड़कर पितृदेवों एवं श्रीहरि विष्णु से त्रुटियों की क्षमा मांगें:
प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः॥ अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमध्वं पितृदेवताः॥
विसर्जन एवं साष्टांग प्रणाम: पितृगणों के सम्मुख साष्टांग दंडवत प्रणाम कर वंश-वृद्धि एवं शांति की प्रार्थना करें। तत्पश्चात हाथों में अक्षत लेकर दीपों पर छिड़कते हुए विसर्जन करें:
ॐ पितृभ्यो नमः, ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
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