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जिन्हें सर्पों से भय लगता है, वे इस लघु कथा को पढ़ लें।

✍️ CD Sharma · 📅 17 Aug 2026 · 🏷️ आस्तिक, सर्प भय

जिन्हें सर्पों से भय लगता है, वे इस लघु कथा को पढ़ लें।

कभी सर्पों का भय नहीं रहेगा।

​महाराज प्राचेतस दक्ष जी की साठ कन्याएं हुई, उनमें से चार कन्याओं का विवाह उन्होंने तार्क्ष्य नाम कश्यपजी से कर दिया।

उनका नाम था - कद्रू, विनिता, यामिनी और पतंगी।

​चारों ने कश्यप जी से अलग-अलग प्रकार के संतानों को जन्म दिया।

​कद्रू ने सर्पों को जन्म दिया, विनिता के दो पुत्र हुए गरुड़ और अरुण

​गरुड़ जी भगवान विष्णु की सेवा में नियुक्त हुए, और अरुण सूर्य नारायण का रथ हांकने के काम में लग गया।

​पतंगी और यामिनी ने पक्षी और सलभों को जन्म दिया।

एक शर्त और एक छल

​एक दिन सर्पों की माता कद्रू ने विनिता से कहा बहन एक बात बता कि सूर्य नारायण के घोड़ों का रंग क्या है?

​विनिता ने सहज भाव से उत्तर दिया कि सभी घोड़े श्वेत रंग के हैं, आखिर उसका बेटा अरुण ही तो सूर्य नारायण का रथ हांकता था,तब घोड़ों के बारे में उनसे अधिक जानकारी और किसे हो सकती है।

​तब कद्रू ने कहा नहीं सूर्य नारायण के सभी घोड़े काले रंग के हैं।

​जब अपनी अपनी बातों पर दोनों अड़े रहे,तब कद्रू ने कहा, फिर तो हो जाए शर्त।

यदि तुम जीत गई तो आजीवन मै तुम्हारी सेवा करुंगी, और यदि तुम हार गई तो जीवन भर मेरी सेवा करनी पड़ेगी।


​विनिता ने शर्त स्वीकार कर लिया। कल देखने जाने की बात तय हुई।

​सांयकाल के समय कद्रू ने अपने पुत्रों को बुलाया, सभी चले आए।

​कद्रू ने कहा देखो पुत्रों मेरे और तुम्हारी विमाता के बीच ऐसी ऐसी शर्त लगी है। मैं जानती हूं कि सूर्य नारायण के रथ के घोड़े श्वेत रंगों के है, फिर भी मैंने होड़ में काले रंग के होने की बात कही है।

अब जितने काले काले नाग को ध्यान से मेरी बात सुनो। कल प्रातः हम दोनों अपनी अपनी बातें प्रमाणित करने सूर्य के निकट जाएंगी,तब तुम सब अभी प्रस्थान करो और घोड़ों को ऐसा लपेट लेना कि सभी घोड़े काले दिखाई दें।


​वासुकी ने और कहा कि माता ये अन्याय है, और मैं अनीति करने वाली का साथ कभी नहीं दूंगा। तब और भी बहुत से सर्पों ने उसका पक्ष लिया,तो कद्रू ने उनको श्राप दे दिया --

कही करें मूर्खों माता की आज्ञा का उलंघन करने वालों,जाओ मैं श्राप देती हूं,तुम सब जनमेजय के यज्ञ कुण्ड में गिर कर मरोगे।


​शर्त कद्रू जीत गई, विनिता को दासी बनना पड़ा।

गरुड़ की प्रतिज्ञा और सर्पों का भय

​एक दिन गरुड़ कद्रू को प्रणाम कर कहने लगा मैं आपका कौन सा हित करुं कि आप मेरी माता को दासी होने से मुक्त कर दें।

​कद्रू ने अमृत की मांग की, गरुड़ अमरावती पुरी गया, इंद्र से लड़ाई कर अमृत छीन लाया,अपनी माता को मुक्त किया,समय पाकर इंद्र वापस अमृत छीन ले गया।

​इधर वासुकी माता के श्राप भय से थर थर कांपता हुआ ब्रह्मा जी के शरण में गया,श्राप की बात कह के कहने लगा पितामह हमारी रक्षा करो।

​ब्रह्मा जी ने कहा पुत्र वासुकी तुम वापस जाओ और अपनी बहन जगतकारु का विवाह जगतकारु नाम के महात्मा से कर दो। उनसे जो संतान होगा वही तुम सब की रक्षा करेगा।

​वासुकी प्रणाम कर वापस हुआ और ब्रह्मा जी के कथनानुसार अपनी बहन का विवाह जगतकारु महात्मा से कर दिया।

महात्मा आस्तिक का जन्म और रक्षा

​वासुकी की बहन पति सेवा में रत रहने लगी।

​एक दिन संध्या का समय था महात्मा जी गहरी नींद में सोए थे,समय निकल न जाए इस भय से उसने पति को जगा दिया, स्वामी संध्या का समय हो गया है,जागिए।

​फिर क्या था इतनी सी बात पर महात्मा ने अपनी पत्नी का त्याग कर दिया।

​पत्नी रोने लगी। कही - स्वामी आपसे जो मुझे संतान होगा वही मेरे भाइयों की रक्षा करेगा,यही जानकर आपके साथ मेरा विवाह हुआ है,अब मै क्या मुह लेकर भैय्या वासुकी के पास जाऊंगी।

​इतना सुनकर महात्मा जी ने कहा -- अस्ती। (मतलब जाओ तुम्हारे पेट में मेरा संतान है।)

​अपनी बहन को वापस आया जानकर वासुकी डर गया, उसने कहा बहन अब हमें यज्ञ कुण्ड में गिरने से कौन बचाएगा?

​तब जगत्कारु ने कहा भैय्या आप चिंता ना करें मैं गर्भवती हूं।

​वासुकी का भय जाता रहा। बालक का जन्म हुआ -- आस्तिक नाम रखा गया।

​समय आने पर आस्तिक ने जनमेजय को यज्ञ से निवारण कर अपने भाइयों की रक्षा की।

आज भी जो व्यक्ति महात्मा आस्तिक का स्मरण करता है,इस कथा को श्रद्धा पूर्वक पढ़ता है, उसे, उसके परिवार को कभी सर्प भय नहीं रहता।


राधे राधे।

पं. श्री विजय पाण्डेयजी

पाटन, रायपुर छत्तीसगढ़

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