ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय…
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी, स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी॥ ॐ जय…
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय…
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…
दीनबन्धु दुःखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे।
अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥ ॐ जय…
तन मन धन सब कुछ है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥ ॐ जय जगदीश हरे…
🪔 जय गणेश जय गणेश देवा आजश्रीगणेश बुधवार
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
एक दन्त दयावन्त, चार भुजा धारी।
माथे सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी॥ जय गणेश…
पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा॥ जय गणेश…
अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥ जय गणेश…
'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥ जय गणेश…
दीनन की लाज रखो, शम्भु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो, जाऊँ बलिहारी॥ जय गणेश…
🪔 ॐ जय शिव ओंकारा भगवान शिव सोमवार
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय…
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय…
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय…
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
चन्दन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी॥ ॐ जय…
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय…
कर के मध्य कमण्डलु, चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी, जगपालन कारी॥ ॐ जय…
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका॥ ॐ जय…
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा…
🪔 जय अम्बे गौरी माँ दुर्गा शुक्रवार, मंगलवार
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ जय अम्बे…
माँग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥ जय अम्बे…
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥ जय अम्बे…
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥ जय अम्बे…
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योती॥ जय अम्बे…
शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥ जय अम्बे…
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥ जय अम्बे…
ब्रह्माणी रुद्राणी, तुम कमला रानी।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ जय अम्बे…
चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरों।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥ जय अम्बे…
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुख हरता, सुख सम्पति करता॥ जय अम्बे…
भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ जय अम्बे…
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥ जय अम्बे…
श्री अम्बेजी की आरति, जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख-सम्पति पावे॥ जय अम्बे गौरी…
🪔 आरती कीजै हनुमान लला की श्रीहनुमान मंगलवार, शनिवार
आरती कीजै हनुमान लला की।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
जाके बल से गिरिवर काँपे।
रोग दोष जाके निकट न झाँके॥
अंजनि पुत्र महा बलदाई।
सन्तन के प्रभु सदा सहाई॥
दे बीरा रघुनाथ पठाए।
लंका जारि सिया सुधि लाए॥
लंका सो कोट समुद्र-सी खाई।
जात पवनसुत बार न लाई॥
लंका जारि असुर संहारे।
सियारामजी के काज सँवारे॥
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।
आनि संजीवन प्राण उबारे॥
पैठि पाताल तोरि जम-कारे।
अहिरावण की भुजा उखारे॥
बाएँ भुजा असुरदल मारे।
दाहिने भुजा सन्तजन तारे॥
सुर नर मुनि आरती उतारें।
जय जय जय हनुमान उचारें॥
कंचन थार कपूर लौ छाई।
आरती करत अंजना माई॥
जो हनुमानजी की आरती गावे।
बसि बैकुण्ठ परम पद पावे॥
🪔 आरती कुंजबिहारी की श्रीकृष्ण
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली; भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की…
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै; बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिनी संग,
अतुल रति गोप कुमारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की…
जहाँ ते प्रकट भई गंगा, सकल मन हारिणि श्री गंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा; बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की…
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।
चहुँ दिसि गोपि ग्वाल धेनू; हँसत मृदु मंद, चाँदनी चंद, कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की…
🪔 ॐ जय लक्ष्मी माता माँ लक्ष्मी शुक्रवार
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥ ॐ जय…
उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥ ॐ जय…
दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥ ॐ जय…
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥ ॐ जय…
जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता, मन नहीं घबराता॥ ॐ जय…
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥ ॐ जय…
शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥ ॐ जय…
महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता…
🪔 श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन श्रीराम (गोस्वामी तुलसीदास)
श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।
नवकंज-लोचन कंज-मुख कर कंज पद कंजारुणं॥
कन्दर्प अगणित अमित छबि नवनील-नीरद सुन्दरं।
पटपीत मानहुँ तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं॥
भजु दीनबन्धु दिनेश दानव-दैत्यवंश-निकन्दनं।
रघुनन्द आनँदकन्द कोशलचन्द दशरथ-नन्दनं॥
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणं।
आजानुभुज शर-चाप-धर संग्राम-जित-खरदूषणं॥
इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं।
मम हृदय-कंज निवास कुरु कामादि खलदल-गंजनं॥
🪔 जय लक्ष्मी रमणा (श्रीसत्यनारायण) श्रीसत्यनारायण गुरुवार
जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।
सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा॥ जय लक्ष्मी…
रत्न जड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजै।
नारद करत नीराजन, घण्टा ध्वनि बाजै॥ जय लक्ष्मी…
प्रगट भये कलि कारण, द्विज को दरस दियो।
बूढ़ो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो॥ जय लक्ष्मी…
दुर्बल भील कठारो, जिन पर कृपा करी।
चन्द्रचूड़ एक राजा, जिनकी विपति हरी॥ जय लक्ष्मी…
वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीन्हीं।
सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति कीन्हीं॥ जय लक्ष्मी…
भाव भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धर्यो।
श्रद्धा धारण कीन्हीं, तिनको काज सर्यो॥ जय लक्ष्मी…
ग्वाल बाल संग राजा, बन में भक्ति करी।
मनवांछित फल दीन्हों, दीनदयाल हरी॥ जय लक्ष्मी…
चढ़त प्रसाद सवायो, कदली फल मेवा।
धूप दीप तुलसी से, राजी सत्यदेवा॥ जय लक्ष्मी…
श्री सत्यनारायणजी की आरति, जो कोई नर गावे।
ऋद्धि-सिद्धि सुख-सम्पति, सहज रूप पावे॥ जय लक्ष्मी रमणा…
🪔 जय सरस्वती माता माँ सरस्वती
जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सद्गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥ जय सरस्वती…
चन्द्रवदनि पद्मासिनि, द्युति मंगलकारी।
सोहे शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी॥ जय सरस्वती…
बाएँ कर में वीणा, दाएँ कर माला।
शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला॥ जय सरस्वती…
देवी शरण जो आए, उनका उद्धार किया।
पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया॥ जय सरस्वती…
विद्या ज्ञान प्रदायिनि, ज्ञान प्रकाश भरो।
मोह अज्ञान और तिमिर का, जग से नाश करो॥ जय सरस्वती…
धूप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो।
ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो॥ जय सरस्वती…
माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे।
हितकारी सुखकारी, ज्ञान भक्ति पावे॥ जय सरस्वती माता…
🪔 जय जय श्री शनिदेव श्रीशनिदेव शनिवार
जय जय श्री शनिदेव, भक्तन हितकारी।
सूरज के पुत्र प्रभु, छाया महतारी॥ जय जय…
श्याम अंग वक्र-दृष्टि, चतुर्भुजा धारी।
नीलाम्बर धार नाथ, गज की असवारी॥ जय जय…
क्रीट मुकुट शीश राजित, दिपत है लिलारी।
मुक्तन की माला गले, शोभित बलिहारी॥ जय जय…
मोदक मिष्ठान पान, चढ़त हैं सुपारी।
लोहा तिल तेल उड़द, महिषी अति प्यारी॥ जय जय…
देव दनुज ऋषि मुनि, सुमिरत नर नारी।
विश्वनाथ धरत ध्यान, शरण हैं तुम्हारी॥ जय जय श्री शनिदेव…
📖 व्रत-कथाएँ
📖 एकादशी व्रत-कथा (उत्पत्ति)
सतयुग में मुर नाम का एक बलशाली दैत्य था, जिसने इन्द्र सहित सब देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने उससे दीर्घ युद्ध किया और थककर बदरिकाश्रम की सिंहावती नामक गुफा में विश्राम करने लगे। मुर उन्हें सोया जानकर मारने आया, तभी भगवान के शरीर से एक तेजस्वी कन्या प्रकट हुई जिसने मुर का वध कर दिया।
जागने पर भगवान ने प्रसन्न होकर कन्या से वर माँगने को कहा। कन्या ने कहा — जो मेरे दिन उपवास करे, उसके पाप नष्ट हों और उसे आपका धाम मिले। वह दिन एकादशी था, इसलिए भगवान ने उसका नाम 'एकादशी' रखा और वरदान दिया कि एकादशी का व्रत करने वाले पर मेरी विशेष कृपा रहेगी।
विधि: दशमी की रात से संयम, एकादशी को उपवास (या फलाहार), भगवान विष्णु का पूजन, विष्णुसहस्रनाम/गीता पाठ व रात्रि-जागरण; द्वादशी को ब्राह्मण-भोजन/दान के बाद पारण। एकादशी को चावल नहीं खाए जाते।
📖 श्रीसत्यनारायण व्रत-कथा (पाँच अध्याय का सार)
अध्याय 1 — नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों के पूछने पर सूत जी बताते हैं कि नारद जी ने मृत्युलोक के दुखी जीवों के लिए भगवान विष्णु से उपाय पूछा। भगवान ने सत्यनारायण व्रत बताया — श्रद्धा से किसी भी दिन, विशेषतः पूर्णिमा को, सवाया प्रसाद (केला, घी, दूध, गेहूँ का आटा/सूजी, शक्कर) बनाकर कथा सुनना और प्रसाद बाँटना।
अध्याय 2 — काशी के एक निर्धन ब्राह्मण को वृद्ध ब्राह्मण के रूप में भगवान ने यह व्रत बताया; व्रत से उसका दारिद्र्य मिटा। उसे देखकर एक लकड़हारे ने भी व्रत किया और सम्पन्न हुआ।
अध्याय 3 — राजा उल्कामुख को व्रत करते देख साधु नामक वैश्य ने संतान होने पर व्रत का संकल्प लिया, पर पुत्री कलावती के जन्म और विवाह तक टालता रहा। संकल्प भूलने से वह परदेस में चोरी के झूठे आरोप में बन्दी हुआ।
अध्याय 4 — घर पर पत्नी लीलावती व पुत्री ने व्रत किया तो वैश्य छूटा; लौटते समय उसने दण्डी स्वामी (भगवान) से झूठ कहा कि नाव में केवल लता-पत्र हैं, तो धन सचमुच लता-पत्र हो गया; क्षमा माँगने पर धन लौटा। कलावती प्रसाद छोड़कर पति को देखने दौड़ी तो पति की नाव डूब गई; प्रसाद ग्रहण करते ही सब ठीक हुआ।
अध्याय 5 — राजा तुंगध्वज ने वन में ग्वालों द्वारा अर्पित प्रसाद का अनादर किया और कष्ट पाया; पश्चाताप करके व्रत करने पर उसका राज्य-वैभव लौटा।
सीख: संकल्प किया व्रत टालें नहीं, प्रसाद का अनादर न करें, सत्य का पालन करें।
📖 प्रदोष व्रत-कथा
प्रदोष व्रत प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी को सूर्यास्त के आसपास के 'प्रदोष काल' में भगवान शिव की पूजा के लिए किया जाता है। एक कथा के अनुसार चन्द्रदेव को दक्ष प्रजापति के शाप से क्षय रोग हो गया; उन्होंने त्रयोदशी को भगवान शिव की आराधना की, तब शिव ने उन्हें मस्तक पर धारण कर रोग से मुक्त किया और वे पुनः बढ़ने लगे।
दूसरी प्रसिद्ध कथा में एक निर्धन ब्राह्मणी अपने पुत्र और राह में मिले एक राजकुमार को पालती थी। ऋषि शाण्डिल्य के कहने पर उसने प्रदोष व्रत किया; कालान्तर में राजकुमार को उसका खोया राज्य मिला और उसने ब्राह्मणी के पुत्र को मंत्री बनाया।
वार के अनुसार फल: सोम प्रदोष — मनोकामना व आरोग्य; भौम (मंगल) प्रदोष — ऋण व रोग से मुक्ति; शनि प्रदोष — संतान-सुख। विधि: दिन भर व्रत, प्रदोष काल में शिवलिंग का अभिषेक, बेलपत्र, धूप-दीप, 'ॐ नमः शिवाय' जप व कथा।
📖 सोमवार व्रत-कथा
एक नगर में एक धनी साहूकार रहता था जिसके कोई संतान नहीं थी। वह प्रत्येक सोमवार को शिव-पार्वती का पूजन करता था। माता पार्वती ने शिव जी से उसकी इच्छा पूरी करने को कहा। शिव जी ने कहा कि उसके भाग्य में संतान नहीं है, फिर भी पार्वती के आग्रह पर पुत्र का वर दिया — पर वह केवल बारह वर्ष जीवित रहेगा।
पुत्र हुआ। ग्यारह वर्ष का होने पर साहूकार ने उसे मामा के साथ काशी पढ़ने भेजा। राह में एक नगर में एक राजकुमारी के विवाह में, काने वर के बदले संयोग से साहूकार के पुत्र का विवाह हो गया; उसने सच्चाई राजकुमारी की चुनरी पर लिख दी। काशी में बारहवें वर्ष उसके प्राण निकल गए, पर पार्वती जी के आग्रह पर शिव जी ने उसे जीवन दान दिया, क्योंकि उसके माता-पिता का व्रत अटूट था।
शिक्षा पूरी कर वह राजकुमारी को लेकर घर लौटा। शिव जी ने साहूकार को स्वप्न में कहा कि तुम्हारे सोमवार व्रत से प्रसन्न होकर मैंने तुम्हारे पुत्र को दीर्घायु दी है। विधि: सोमवार को व्रत, शिवलिंग पर जल/दूध, बेलपत्र अर्पण, कथा व एक समय भोजन।
📖 मंगलवार व्रत-कथा (श्रीहनुमान)
एक नगर में एक ब्राह्मण दम्पति रहते थे, जो संतान न होने से दुखी थे। ब्राह्मण हनुमान जी की पूजा के लिए वन चला गया और पत्नी घर पर मंगलवार का व्रत करती थी — मंगलवार को भोजन बनाकर हनुमान जी को भोग लगाने के बाद ही स्वयं खाती थी। एक मंगलवार किसी कारण भोजन न बन सका तो उसने संकल्प लिया कि अगले मंगलवार भोग लगाकर ही अन्न ग्रहण करूँगी; छह दिन भूखी रहने से वह मूर्छित हो गई।
उसकी निष्ठा से प्रसन्न होकर हनुमान जी ने दर्शन दिए और एक सुन्दर बालक दिया, जिसका नाम मंगल रखा गया। ब्राह्मण लौटा तो बालक को देखकर उसे पत्नी पर संदेह हुआ और उसने बालक को कुएँ में गिरा दिया; पर घर लौटने पर बालक मुस्कुराता हुआ आ गया। रात को हनुमान जी ने स्वप्न में बताया कि यह पुत्र उन्हीं का दिया है। ब्राह्मण ने पश्चाताप किया और दोनों मिलकर मंगलवार व्रत करने लगे।
विधि: मंगलवार को व्रत, लाल पुष्प-सिन्दूर-चोला, हनुमान चालीसा/सुन्दरकाण्ड पाठ, गुड़-चने का भोग; एक समय भोजन, नमक रहित।
📖 बृहस्पतिवार (गुरुवार) व्रत-कथा
एक प्रतापी राजा था जो दान-पुण्य करता था, पर उसकी रानी को दान करना अच्छा नहीं लगता था। एक दिन बृहस्पति देव साधु के वेश में भिक्षा माँगने आए। रानी ने कहा — मैं इस धन से तंग आ गई हूँ, कोई उपाय बताओ कि यह नष्ट हो जाए। साधु ने कहा कि गुरुवार को घर लीपना, बाल धोना, कपड़े धोना, मांस-मदिरा का सेवन — ये सब करने से धन नष्ट हो जाएगा।
रानी ने वैसा ही किया और कुछ ही समय में सब वैभव नष्ट हो गया; राजा परदेस चला गया और रानी-दासी भूखी रहने लगीं। तब फिर साधु रूप में बृहस्पति देव आए और रानी के पश्चाताप करने पर गुरुवार व्रत की विधि बताई — पीले वस्त्र पहनकर, केले के पेड़ की पूजा, चने की दाल-गुड़ का भोग, पीला भोजन एक समय, कथा-श्रवण।
रानी ने श्रद्धा से व्रत किया, उसका वैभव लौट आया, राजा भी घर लौटा और रानी दान-पुण्य करने लगी। विधि: गुरुवार को केले/विष्णु पूजन, हल्दी-चने की दाल-गुड़ अर्पण, कथा; उस दिन बाल-कपड़े न धोएं।
📖 शुक्रवार व्रत-कथा (संतोषी माता)
एक बुढ़िया के सात पुत्र थे; छह कमाते थे और सबसे छोटा निकम्मा था। माँ बाकी बेटों की जूठन छोटे को खिलाती थी। यह जानकर वह परदेस कमाने चला गया और वहाँ एक सेठ के यहाँ नौकरी करके धनी हो गया, पर घर भूल गया। घर पर उसकी पत्नी को सास-जेठानियाँ बहुत सताती थीं।
एक दिन उसने स्त्रियों को संतोषी माता का व्रत करते देखा और विधि पूछी — शुक्रवार को सवा आने का गुड़-चना लेकर कथा सुनना, भोग लगाना, और उस दिन खटाई न खाना-न देना; मनोकामना पूरी होने पर उद्यापन। उसने श्रद्धा से व्रत किया; माता ने उसके पति को स्वप्न में घर की याद दिलाई और वह धन लेकर लौटा।
उद्यापन में जेठानियों ने छल से बच्चों को खटाई खिलवा दी, जिससे पति पर संकट आया; बहू ने फिर विधिपूर्वक उद्यापन किया तो संकट टला और सब ठीक हुआ। विधि: शुक्रवार को गुड़-चने का भोग, कथा, आरती; उस दिन घर में कोई खट्टी वस्तु न खाए।
📖 शनिवार व्रत-कथा (शनिदेव)
एक बार नवग्रहों में विवाद हुआ कि सबसे बड़ा कौन है। वे न्याय के लिए राजा विक्रमादित्य के पास गए। राजा ने नौ धातुओं — सोना, चाँदी, काँसा, पीतल, सीसा, राँगा, जस्ता, अभ्रक व लोहे — के आसन बनवाए और ग्रहों को क्रम से बैठने को कहा; लोहे का आसन अन्त में होने से शनिदेव को सबसे पीछे स्थान मिला। अपमानित होकर शनिदेव ने कहा — मेरी साढ़ेसाती में बड़े-बड़े का पतन होता है।
राजा पर साढ़ेसाती आई। एक घोड़े के व्यापारी के रूप में शनिदेव आए; राजा घोड़े पर बैठा तो वह उसे वन में ले जाकर गायब हो गया। राजा पर चोरी का झूठा आरोप लगा, उसके हाथ-पैर कटवा दिए गए और उसे तेली के यहाँ कोल्हू चलाना पड़ा। साढ़ेसाती के अंत में राजा ने शनिदेव की स्तुति की; शनिदेव प्रसन्न हुए, राजा के अंग लौट आए और उसे राज्य व सम्मान मिला। राजा ने वर माँगा कि आप किसी को इतना कष्ट न दें।
विधि: शनिवार को व्रत, पीपल में जल व सरसों के तेल का दीपक, काले तिल-उड़द-तेल का दान, शनि-स्तोत्र/हनुमान चालीसा पाठ।
📖 रविवार व्रत-कथा (सूर्यदेव)
एक बुढ़िया प्रत्येक रविवार को प्रातः स्नान कर, घर को गोबर से लीपकर सूर्यदेव का पूजन करती और एक समय भोजन करती थी। सूर्यदेव की कृपा से उसका घर धन-धान्य से भरा रहता था। उसकी पड़ोसन ईर्ष्यावश अपनी गाय को घर में बाँधने लगी ताकि बुढ़िया को लीपने के लिए गोबर न मिले।
उस रविवार बुढ़िया पूजन न कर सकी और दुखी होकर भूखी ही सो गई। रात में सूर्यदेव ने स्वप्न में उसे एक दिव्य गाय दी जो सोने का गोबर देती थी। पड़ोसन ने चुपके से वह गोबर ले लेना शुरू किया; यह जानकर सूर्यदेव ने आँधी चलाई ताकि बुढ़िया गाय को घर में बाँधे। राजा ने गाय छीन ली, तो उसके महल में दुर्गन्धित गोबर भर गया; स्वप्न में चेतावनी मिलने पर राजा ने गाय लौटा दी और पड़ोसन को दण्ड दिया, तथा सारी प्रजा को रविवार व्रत करने का आदेश दिया।
विधि: रविवार को सूर्योदय पर ताँबे के लोटे से अर्घ्य (जल में रोली, अक्षत, लाल पुष्प), आदित्यहृदय स्तोत्र, एक समय बिना नमक का भोजन।
📖 करवा चौथ व्रत-कथा
एक साहूकार के सात बेटे और वीरवती नाम की एक बेटी थी। विवाह के बाद पहली करवा चौथ पर वीरवती मायके में थी और निर्जल व्रत से भूख-प्यास से व्याकुल हो गई। भाइयों से बहन की दशा देखी न गई; उन्होंने पीपल के पेड़ के पीछे दीपक जलाकर छलनी की ओट से दिखाया कि चन्द्रमा निकल आया। वीरवती ने उसे चन्द्रमा समझकर अर्घ्य दिया और भोजन कर लिया।
भोजन करते ही ससुराल से पति की मृत्यु का समाचार आया। दुखी वीरवती को इन्द्राणी (कहीं-कहीं माता पार्वती) ने बताया कि झूठे चन्द्र-दर्शन से व्रत भंग हुआ है। वीरवती ने पूरे वर्ष प्रत्येक चतुर्थी का व्रत किया और अगली करवा चौथ को विधिपूर्वक व्रत किया; उसकी निष्ठा से उसके पति को जीवन मिला।
विधि: कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को सूर्योदय से चन्द्रोदय तक निर्जल व्रत, संध्या को करवा (मिट्टी का पात्र) सहित गौरी-गणेश-शिव पूजन व कथा, चन्द्रोदय पर छलनी से चन्द्र-दर्शन व अर्घ्य देकर पति के हाथ से जल ग्रहण।
📖 अहोई अष्टमी व्रत-कथा
एक साहूकारनी के सात बेटे थे। दीपावली से पहले घर लीपने के लिए वह जंगल से मिट्टी लेने गई। मिट्टी खोदते हुए उसकी कुदाल से अनजाने में स्याहु (साही) का एक बच्चा मर गया। दुखी स्याहु ने उसे शाप दिया कि तेरी कोख भी सूनी होगी। एक-एक करके साहूकारनी के सातों बेटे एक वर्ष के भीतर चल बसे।
रोती हुई साहूकारनी ने गाँव की वृद्धाओं को अपनी भूल बताई। उन्होंने कहा कि तूने अनजाने में पाप किया है और पश्चाताप कर लिया है; अब कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता (स्याहु व उसके बच्चों के चित्र सहित) का व्रत-पूजन कर और क्षमा माँग। साहूकारनी ने श्रद्धा से प्रति वर्ष यह व्रत किया; अहोई माता की कृपा से उसके सातों पुत्र उसे पुनः मिले (कथा के कुछ रूपों में उसे पुनः सात पुत्र हुए)।
विधि: कार्तिक कृष्ण अष्टमी को माताएँ संतान की दीर्घायु के लिए दिन भर व्रत रखती हैं, दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाकर पूजन करती हैं और तारे देखकर अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं।
📖 हरतालिका तीज व्रत-कथा
पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती ने बाल्यावस्था से ही भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप आरम्भ किया — वर्षों तक केवल पत्ते खाकर, फिर निराहार रहकर। उनकी दशा देखकर पिता चिन्तित थे। उसी समय नारद जी भगवान विष्णु की ओर से विवाह का प्रस्ताव लाए और हिमालय ने स्वीकार कर लिया।
यह सुनकर पार्वती दुखी हुईं। उनकी सखियाँ उन्हें हरकर (इसलिए 'हरत' + 'आलिका' = सखी द्वारा हरण) घने वन की एक गुफा में ले गईं। वहाँ भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में पार्वती ने बालू का शिवलिंग बनाकर रात भर जागरण सहित पूजन किया। भगवान शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वर दिया। बाद में हिमालय ने भी प्रसन्नता से शिव-पार्वती का विवाह कराया।
विधि: भाद्रपद शुक्ल तृतीया को सुहागिनें अखण्ड सौभाग्य व कुमारियाँ मनोवांछित वर के लिए निर्जल व्रत रखती हैं, मिट्टी/बालू से शिव-पार्वती-गणेश बनाकर पूजन, कथा व रात्रि-जागरण करती हैं; अगले दिन पारण।
📖 वट सावित्री व्रत-कथा
मद्र देश के राजा अश्वपति की तेजस्वी पुत्री सावित्री ने वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पति रूप में चुना। नारद जी ने बताया कि सत्यवान की आयु केवल एक वर्ष शेष है, फिर भी सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही और विवाह करके वन में सास-ससुर की सेवा करने लगी।
नियत दिन से तीन दिन पहले से उसने उपवास किया। उस दिन सत्यवान लकड़ी काटने गया तो सावित्री भी साथ गई। सिर में पीड़ा होने पर सत्यवान वटवृक्ष के नीचे सावित्री की गोद में लेट गया और यमराज उसके प्राण लेकर चल पड़े। सावित्री उनके पीछे चलती रही। उसकी धर्मयुक्त बातों से प्रसन्न होकर यमराज ने वर दिए — ससुर की आँखें व राज्य, पिता को सौ पुत्र, और स्वयं को सौ पुत्र। अंतिम वर से बँधकर यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े।
विधि: ज्येष्ठ अमावस्या (कहीं ज्येष्ठ पूर्णिमा) को सुहागिनें वटवृक्ष का पूजन, कच्चे सूत से परिक्रमा, सावित्री-सत्यवान की कथा व व्रत करती हैं।
📖 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कथा
मथुरा के अत्याचारी राजा कंस ने अपनी बहन देवकी का विवाह वसुदेव से किया। विदा के समय आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवाँ पुत्र तेरा काल होगा। कंस ने दोनों को कारागार में डाल दिया और उनकी छह संतानों को जन्म लेते ही मार डाला; सातवें गर्भ (बलराम) को योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया।
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की आधी रात, रोहिणी नक्षत्र में भगवान विष्णु ने चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर फिर शिशु रूप धारण किया। उनकी माया से पहरेदार सो गए, बेड़ियाँ खुल गईं और कारागार के द्वार खुल गए। वसुदेव शिशु को टोकरी में रखकर उफनती यमुना पार कर गोकुल में नन्द-यशोदा के घर छोड़ आए और वहाँ जन्मी कन्या (योगमाया) को ले आए। कंस ने कन्या को मारना चाहा तो वह आकाश में उड़कर बोली — तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है।
विधि: दिन भर व्रत, मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, पंचामृत अभिषेक, झूला, माखन-मिश्री व पंजीरी का भोग; अगले दिन नन्दोत्सव व पारण।
📖 महाशिवरात्रि व्रत-कथा
चित्रभानु नाम का एक शिकारी साहूकार का ऋणी था। ऋण न चुका पाने पर साहूकार ने उसे शिवरात्रि के दिन शिवमठ में बन्दी रखा, जहाँ उसने अनजाने में शिव-कथा सुनी। संध्या को छूटकर वह शिकार के लिए वन गया और भूखा-प्यासा एक बेल के पेड़ पर चढ़कर रात बिताने लगा। पेड़ के नीचे एक शिवलिंग था। प्रतीक्षा में वह बेलपत्र तोड़कर नीचे गिराता रहा, जो शिवलिंग पर चढ़ते गए, और उसकी पानी की कुप्पी से जल भी गिरता रहा।
रात के अलग-अलग पहरों में एक-एक करके हिरणियाँ और हिरण आए; हर एक ने अपने परिवार से मिलकर लौटने का वचन माँगा और शिकारी ने दया करके जाने दिया। इस तरह अनजाने में उसका उपवास, जागरण, बेलपत्र-अर्पण और जलाभिषेक हो गया। सुबह सारा हिरण-परिवार वचन निभाने लौटा तो उनकी सत्यनिष्ठा देखकर शिकारी का हृदय बदल गया और उसने हिंसा छोड़ दी। भगवान शिव ने प्रकट होकर उसे मोक्ष का वर दिया।
विधि: फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को व्रत, चारों पहर शिवलिंग का अभिषेक (जल, दूध, दही, घी, शहद), बेलपत्र, 'ॐ नमः शिवाय' जप व रात्रि-जागरण।
📖 गणेश चतुर्थी / संकष्टी चतुर्थी कथा आज
एक बार देवताओं में यह प्रश्न उठा कि सबसे पहले किसकी पूजा हो। भगवान शिव ने कहा — जो पृथ्वी की परिक्रमा करके सबसे पहले लौटे, वही प्रथम पूज्य होगा। कार्तिकेय अपने मयूर पर उड़ चले, पर गणेश जी ने अपने वाहन मूषक के साथ माता-पिता शिव-पार्वती की सात परिक्रमा कर लीं और कहा — माता-पिता में ही सम्पूर्ण लोक समाए हैं। उनकी बुद्धि से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें प्रथम पूज्य होने का वर दिया।
चतुर्थी पर चन्द्र-दर्शन न करने की कथा: एक बार गणेश जी को देखकर चन्द्रमा उनके रूप पर हँस पड़े; गणेश जी ने शाप दिया कि चतुर्थी को जो तुम्हें देखेगा उसे मिथ्या कलंक लगेगा (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी पर श्रीकृष्ण पर भी स्यमन्तक मणि की चोरी का कलंक लगा था)। चन्द्रमा के क्षमा माँगने पर गणेश जी ने कहा कि संकष्टी चतुर्थी को चन्द्र-दर्शन व अर्घ्य से व्रत पूर्ण होगा।
विधि: संकष्टी (कृष्ण चतुर्थी) को दिन भर व्रत, संध्या को गणेश पूजन, दूर्वा व मोदक अर्पण, चन्द्रोदय पर अर्घ्य देकर पारण; विनायक (शुक्ल) चतुर्थी को मध्याह्न पूजन।
📖 नवरात्रि व्रत-कथा
महिषासुर नामक दैत्य ने ब्रह्मा जी से वर पाया था कि कोई पुरुष उसे न मार सके। वर के बल पर उसने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। दुखी देवता ब्रह्मा, विष्णु व महेश के पास गए; उनके क्रोध और सब देवताओं के तेज से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। देवताओं ने उन्हें अपने-अपने अस्त्र दिए — शिव ने त्रिशूल, विष्णु ने चक्र, इन्द्र ने वज्र, हिमालय ने सिंह।
देवी ने नौ दिन तक महिषासुर की सेना से युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया — इसीलिए नवरात्र व विजयादशमी। भगवान राम ने भी रावण-वध से पूर्व शक्ति की आराधना की थी। नौ दिनों में देवी के नौ रूपों का पूजन होता है: शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री।
विधि: प्रतिपदा को कलश-स्थापना व अखण्ड ज्योति, प्रतिदिन देवी के उस दिन के रूप का पूजन, दुर्गासप्तशती पाठ, अष्टमी/नवमी को कन्या-पूजन व हवन; दशमी को पारण।
आरतियाँ लोक-प्रचलित पारम्परिक पाठ हैं — क्षेत्र व परम्परा के अनुसार शब्दों में थोड़ा भेद मिलता है। व्रत-कथाएँ पारम्परिक कथाओं का संक्षिप्त सार हैं; विस्तृत कथा व विधि हेतु प्रामाणिक व्रत-पुस्तक या आचार्य से मार्गदर्शन लें। आज के व्रत व्रत-त्योहार कैलेंडर व पंचांग में भी देखें।