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श्रीमद्देवीभागवतोक्त गायत्री हृदयम्: सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, अर्थ एवं फलश्रुति | cdsharma.in

✍️ CD Sharma · 📅 21 Sep 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ गायत्री हृदयम्, Gayatri Hridayam, Gayatri Hridayam Sanskrit, Devi Bhagavata Purana, Gayatri Mantra Sadhana, Veda Mata Gayatri, गायत्री साधना, श्रीमद्देवीभागवत, अथर्ववेदीय गायत्री रहस्य, cdsharma.in

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श्रीमद्देवीभागवतोक्त गायत्री हृदयम्: सम्पूर्ण संस्कृत पाठ, अर्थ एवं फलश्रुति | cdsharma.in

॥ अथ श्रीमद्देवीभागवते महापुराणे गायत्रीहृदयम् ॥

(द्वादश स्कन्ध — चतुर्थ अध्याय)

'गायत्री हृदयम्' वेदमाता गायत्री की आराधना का परम गोपनीय एवं प्रभावोत्पादक स्तोत्र है। श्रीमद्देवीभागवत महापुराण के बारहवें स्कन्ध में भगवान श्रीनारायण ने देवर्षि नारद के पूछने पर इस रहस्यमय विद्या का उद्घाटन किया है। यह विद्या साधक को पिण्ड (स्वयं के शरीर) और ब्रह्माण्ड (विराट् स्वरूप) की एकात्मता का बोध कराती है।

प्रस्तावना एवं नारद-नारायण संवाद

नारद उवाच । भगवन्देवदेवेश भूतभव्य जगत्प्रभो । कवचं च श्रुतं दिव्यं गायत्रीमन्त्रविग्रहम् ॥ १॥

अधुना श्रोतुमिच्छामि गायत्रीहृदयं परम् । यद्धारणाद्भवेत्पुण्यं गायत्रीजपतोऽखिलम् ॥ २॥

  • हिन्दी अर्थ: देवर्षि नारद जी बोले—हे देवदेवेश! हे भूत, भविष्य और सम्पूर्ण जगत् के स्वामी प्रभो! आपके श्रीमुख से मैंने गायत्री मन्त्र के साक्षात् विग्रहस्वरूप दिव्य 'गायत्री कवच' का श्रवण किया। अब मैं परम पावन 'गायत्री हृदय' सुनना चाहता हूँ, जिसके केवल धारण व पाठ करने मात्र से सम्पूर्ण गायत्री-जप का पूर्ण पुण्य-फल प्राप्त हो जाता है।

श्रीनारायण उवाच । देव्याश्च हृदयं प्रोक्तं नारदाथर्वणे स्फुटम् । तदेवाहं प्रवक्ष्यामि रहस्यातिरहस्यकम् ॥ ३॥

विराड्रूपां महादेवीं गायत्रीं वेदमातरम् । ध्यात्वा तस्यास्त्वथाङ्गेषु ध्यायेदेताश्च देवताः ॥ ४॥

पिण्डब्रह्माण्डयोरैक्याद्भावयेत्स्वतनौ तथा । देवीरूपे निजे देहे तन्मयत्वाय साधकः ॥ ५॥

नादेवोऽभ्यर्चयेद्देवमिति वेदविदो विदुः । ततोऽभेदाय काये स्वे भावयेद्देवता इमाः ॥ ६॥

  • हिन्दी अर्थ: भगवान श्रीनारायण ने कहा—हे नारद! अथर्ववेद में भगवती गायत्री का जो हृदय स्पष्ट रूप से वर्णित है, वही रहस्यों का परम रहस्य मैं तुम्हें बताता हूँ। वेदमाता महादेवी गायत्री के विराट् स्वरूप का ध्यान करके उनके विभिन्न अंगों में अधिष्ठित देवताओं का ध्यान करना चाहिए। "पिण्ड और ब्रह्माण्ड एक ही हैं"—इस सिद्धान्त के अनुसार साधक अपने ही शरीर में देवी का विराट् रूप अनुभव करे, जिससे वह भगवती के साथ तन्मय (एकाकार) हो सके। वेदवेत्ता ऋषियों का कथन है कि "जो स्वयं देव नहीं बनता, वह देव की सच्ची पूजा नहीं कर सकता" (नादेवो देवमर्चयेत्)। अतः अभेद भाव की सिद्धि के लिए अपने शरीर के अंगों में इन देवताओं की भावना करनी चाहिए।

विनियोग एवं षडङ्ग-न्यास

अथ तत्सम्प्रवक्ष्यामि तन्मयत्वमयो भवेत् । गायत्रीहृदयस्यास्याप्यहमेव ऋषिः स्मृतः ॥ ७॥

गायत्रीछन्द उद्दिष्टं देवता परमेश्वरी । पूर्वोक्तेन प्रकारेण कुर्यादङ्गानि षट् क्रमात् । आसने विजने देशे ध्यायेदेकाग्रमानसः ॥ ८॥

  • ऋषि: श्रीनारायण
  • छन्द: गायत्री
  • देवता: परमेश्वरी (विराड्रूपा गायत्री)
  • विधि: किसी एकान्त, पवित्र स्थान पर कुशासन अथवा शुद्धासन पर बैठकर एकाग्रचित्त होकर पूर्वोक्त विधि से षडङ्ग-न्यास करें और फिर अर्थ-न्यास (विराट् भावना) करें।

अथार्थन्यासः (विराट् स्वरूप का अङ्ग-न्यास)

साधक अपने शरीर के विभिन्न अंगों में विराट् गायत्री के निम्नलिखित स्वरूपों और देवताओं का चिन्तन करे:

  • द्यौर्मूर्ध्नि दैवतम् — मस्तक पर द्युलोक (स्वर्गलोक)।
  • दन्तपङ्क्तावश्विनौ — दोनों दन्त-पंक्तियों में अश्विनीकुमार।
  • उभे सन्ध्ये चौष्ठौ — दोनों ओष्ठों (होंठों) में दोनों संध्याएँ (प्रातः व सायं)।
  • मुखमग्निः — मुख में अग्निदेव।
  • जिह्वा सरस्वती — जिह्वा पर भगवती सरस्वती।
  • ग्रीवायां तु बृहस्पतिः — ग्रीवा (गले) में देवगुरु बृहस्पति।
  • स्तनयोर्वसवोऽष्टौ — दोनों स्तनों में आठों वसु।
  • बाह्वोर्मरुतः — दोनों भुजाओं में उनचास मरुद्गण।
  • हृदये पर्जन्यः — हृदय में मेघराज पर्जन्य (इन्द्र)।
  • आकाशमुदरम् — उदर (पेट) में आकाश।
  • नाभावन्तरिक्षम् — नाभि में अन्तरिक्ष लोक।
  • कट्योरिन्द्राग्नी — कटि (कमर) में इन्द्र और अग्निदेव।
  • जघने विज्ञानघनः प्रजापतिः — जघन (नितम्ब) में विज्ञानघन प्रजापति।
  • कैलासमलये ऊरू — दोनों जंघाओं (ऊरुओं) में कैलास और मलय पर्वत।
  • विश्वेदेवा जान्वोः — दोनों घुटनों (जानुओं) में विश्वेदेव गण।
  • जङ्घायां कौशिकः — दोनों पिंडलियों (जंघाओं) में कौशिक ऋषि।
  • गुह्यमयने — गुह्य भाग में दोनों अयन (उत्तरायण और दक्षिणायन)।
  • ऊरू पितरः — जांघों के मूल में समस्त पितृगण।
  • पादौ पृथिवी — दोनों चरणों में साक्षात् पृथ्वी देवी।
  • वनस्पतयोऽङ्गुलीषु — पैरों की अँगुलियों में समस्त वनस्पति-जगत।
  • ऋषयो रोमाणि — शरीर के समस्त रोम-कूपों में महर्षिगण।
  • नखानि मुहूर्तानि — समस्त नखों में काल-मुहूर्त।
  • अस्थिषु ग्रहाः — हड्डियों में समस्त नवग्रह।
  • असृङ्मांसमृतवः — रक्त और माँस में छहों ऋतुएँ।
  • संवत्सरा वै निमिषम् — पलकों के झपकने (निमिष) में संवत्सर (वर्ष)।
  • अहोरात्रावादित्यश्चन्द्रमाः — दिन और रात में क्रमशः सूर्य और चन्द्रमा।

शरणागति एवं नमस्कार मन्त्र

प्रवरं दिव्यां गायत्रीं सहस्रनेत्रां शरणमहं प्रपद्ये ।

  • अर्थ: सहस्रों दिव्य नेत्रों वाली, सर्वश्रेष्ठ एवं परात्पर देवी गायत्री की मैं अनन्य भाव से शरण ग्रहण करता हूँ।

ॐ तत्सवितुर्वरेण्याय नमः ।

  • अर्थ: उन जगत्-उत्पादक सूर्यमण्डल-मध्यवर्ती वरणीय परमेश्वर को नमस्कार है।

ॐ तत्पूर्वाजयाय नमः ।

  • अर्थ: जो अनादि काल से अजेय एवं सर्वोत्कृष्ट हैं, उन्हें नमस्कार है।

तत्प्रातरादित्याय नमः ।

  • अर्थ: प्रातःकालीन बाल-आदित्य स्वरूप परमात्मा को नमस्कार है।

तत्प्रातरादित्यप्रतिष्ठायै नमः ।

  • अर्थ: प्रातःकालीन आदित्य मण्डल में प्रतिष्ठित पराशक्ति गायत्री को नमस्कार है।

फलश्रुति (माहात्म्य एवं लाभ)

प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति । सायंप्रातरधीयानः अपापो भवति । सर्वतीर्थेषु स्नातो भवति । सर्वैर्देवैर्ज्ञातो भवति ।

  • पापनाश: प्रातःकाल इसका पाठ करने से रात्रि में अज्ञानवश हुए पाप नष्ट हो जाते हैं; सायं काल पाठ करने से दिनभर के संचित पाप विनष्ट होते हैं। जो दोनों समय (प्रातः-सायं) इसका नियमपूर्वक पाठ करता है, वह निष्पाप हो जाता है।
  • तीर्थ-स्नान का फल: उसे समस्त तीर्थों में स्नान करने का पुण्य सहज ही प्राप्त होता है और वह समस्त देवताओं का कृपापात्र बन जाता है।

अवाच्यवचनात्पूतो भवति । अभक्ष्यभक्षणात्पूतो भवति । अभोज्यभोजनात्पूतो भवति । अचोष्यचोषणात्पूतो भवति । असाध्यसाधनात्पूतो भवति । दुष्प्रतिग्रहशतसहस्रात्पूतो भवति । पङ्क्तिदूषणात्पूतो भवति । अमृतवचनात्पूतो भवति । अथाब्रह्मचारी ब्रह्मचारी भवति ।

  • अनेक दोषों से शुद्धि: अनुचित वचन बोलने से, अभक्ष्य खाने से, अनुचित भोजन ग्रहण करने से, अयोग्य वस्तु के आस्वादन से, असाध्य कुकर्मों से तथा लाखों प्रकार के अनुचित दान (दुष्प्रतिग्रह) लेने से उत्पन्न दोष इस पाठ से तत्काल नष्ट हो जाते हैं। पङ्क्ति-दूषण के दोष से शुद्धि मिलती है तथा जो अब्रह्मचारी है, वह भी इस पाठ के प्रभाव से ब्रह्मचर्य के पावन पुण्य का भागीदार बन जाता है।

अनेन हृदयेनाधीतेन क्रतुसहस्रेणेष्टं भवति । षष्टिशतसहस्रगायत्र्या जप्यानि फलानि भवन्ति । अष्टौ ब्राह्मणान्सम्यग्ग्राहयेत् । तस्य सिद्धिर्भवति । य इदं नित्यमधीयानो ब्राह्मणः प्रातः शुचिः सर्वपापैः प्रमुच्यत इति । ब्रह्मलोके महीयते । इत्याह भगवान् श्रीनारायणः ॥

  • महायज्ञ एवं कोटि जप फल: इस 'गायत्री हृदय' का एक बार पाठ करने से एक हजार यज्ञ (क्रतु) संपन्न करने का फल मिलता है तथा साठ लाख (६०,००,०००) गायत्री मन्त्र के जप का अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।
  • सिद्धि विधान: इस दिव्य रहस्य को जो साधक आठ योग्य, सात्विक ब्राह्मणों को विधिवत ग्रहण कराता है, उसे इस स्तोत्र की पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है।
  • परम गति: जो द्विज प्रातःकाल पवित्र होकर नित्य इसका पाठ करता है, वह संसार के समस्त पाप-बंधनों से मुक्त होकर अन्त में परम ब्रह्मलोक में पूजित और प्रतिष्ठित होता है। ऐसा स्वयं भगवान श्रीनारायण ने कहा है।

॥ इति श्रीदेवीभागवते महापुराणे द्वादशस्कन्धे गायत्रीहृदयं नाम चतुर्थोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥

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