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शास्त्रोक्त श्राद्ध नियम, फल एवं वर्जनाएं : ७० प्रामाणिक श्लोक व हिन्दी अनुवाद | cdsharma.in

✍️ CD Sharma · 📅 02 Oct 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ श्राद्ध नियम, Shradh Rules and Regulations, पितृ पक्ष, Pitru Paksha Guidelines, श्राद्ध श्लोक अनुवाद, Shradh Shlokas Hindi Meaning, कुतप काल, Kutapa Muhurat, पिण्डदान विधि, Pinda Daan Niyam, पितृ तर्पण, Pitru Tarpana, स्मृति व पुराण, Hindu Dharmashastra,

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शास्त्रोक्त श्राद्ध नियम, फल एवं वर्जनाएं : ७० प्रामाणिक श्लोक व हिन्दी अनुवाद | cdsharma.in

शास्त्रोक्त श्राद्ध नियम, फल एवं वर्जनाएं (प्रमाण सहित ७० सूत्र)

लेखक : पं. श्रीदीनदयालमणि त्रिपाठी (विद्यावारिधि) स्रोत साभार : आदि शंकर वैदिक विद्या संस्थान (दूरभाष : 9044016661)

सनातन धर्म में श्राद्ध केवल एक परम्परा नहीं, अपितु पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और आत्मिक सम्बन्ध की अभिव्यक्ति है। पुराणों एवं स्मृतियों में श्राद्ध के फल, उपयुक्त समय, प्रशस्त व निषिद्ध द्रव्य, ब्राह्मण परीक्षा तथा विधि-निषेधों का सूक्ष्म विवेचन मिलता है। यहाँ धर्मशास्त्रों से संकलित ७० प्रामाणिक श्लोक, उनके सन्दर्भ एवं सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत हैं:

१. श्राद्ध से पितृ तृप्ति एवं फल

श्राद्ध के द्वारा प्रसन्न हुए पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष तथा स्वर्ग आदि प्रदान करते हैं:

भक्त्या-तुष्यन्ति पितरस्तुष्टाः कामान्दिशन्ति ते। पुत्रं पौत्रं धनं धान्यं कामान्यान्मनसेच्छति ॥ भक्त्याचाराधितो दद्यान्नृणां प्रीतः पितामह। (पद्मपुराण, सृष्टि० ३४।२१७-२१८)
पितृन्त्रीणाति यो भक्त्या ते पुनः प्रीणयन्ति तम्। यच्छन्ति पितरः पुष्टिं स्वर्गारोग्यं प्रजाफलम् ॥ (पद्मपुराण, सृष्टि० ९।६७)
एवमायुर्धनं विद्यां स्वर्गमोक्षसुखानि च। प्रयच्छन्ति सुतं राज्यं नृणां तुष्टाः पितामहाः ॥ (पद्मपुराण, सृष्टि० १०।१२५)
आयुः प्रज्ञां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पितामहाः ॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति १।२७०)
प्रजां पुष्टिं यशः स्वर्गमारोग्यं च धनं तथा। नृणां श्राद्धैः सदा प्रीताः प्रयच्छन्ति पितामहाः ॥ (शंखस्मृति १४।३३)
आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च। प्रयच्छन्तु तथा राज्यं प्रीता नृणां पितामहाः ॥ (लघ्वाश्वलायनस्मृति २३।१०२)
आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च ॥ प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितरः श्राद्धतर्पिताः। (ब्रह्मपुराण २२०।११९-१२०)

२. तीर्थ में श्राद्ध का समय

श्राद्ध के योग्य समय हो या न हो, तीर्थ में पहुँचते ही मनुष्य को सर्वदा स्नान, तर्पण और श्राद्ध करना चाहिये:

अकालेऽप्यथ काले वा तीर्थे श्राद्धं सदा नरैः ॥ प्राप्तैरेव सदा स्नानं कर्तव्यं पितृतर्पणम्। पिण्डदानं च कर्तव्यं पितॄणां चातिवल्लभम् ॥ (पद्मपुराण, सृष्टि० ३४।२१८-२१९)

३. पक्ष एवं समय की श्रेष्ठता

शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष और पूर्वाह्न की अपेक्षा अपराह्न श्राद्ध के लिये श्रेष्ठ माना जाता है:

यथा चैवापरः पक्षः पूर्वपक्षाद्विशिष्यते । तथा श्राद्धस्य पूर्वाह्णादपराह्नो विशिष्यते ॥ (मनुस्मृति ३।२७८; महाभारत, अनु० ८७।१९)
यथैव शुक्लपक्षाद्वै पितृणामसितः प्रियः ॥ तथापराह्नः पूर्वाह्णात् पितृणामतिरिच्यते। (मार्कण्डेयपुराण ३१।३५-३६)

४. श्राद्ध में वर्जित काल व दिन

पूर्वाह्न में, शुक्लपक्ष में, रात्रि में, अपने जन्मदिन में और युग्म (जोड़े) दिनों में श्राद्ध नहीं करना चाहिये:

पूर्वाह्ने शुक्लपक्षे च रात्रौ जन्मदिनेषु वा। युग्मेष्वहस्सु च श्राद्धं न च कुर्वीत पण्डितः। (महाभारत, अनु० १४५)

५. सायंकाल श्राद्ध निषेध

सायंकाल में श्राद्ध नहीं करना चाहिये। सायंकाल का समय 'राक्षसी बेला' नाम से प्रसिद्ध है, जो सभी शुभ कार्यों में निन्दित है:

सायाह्नस्त्रिमुहूर्तः स्याच्छ्राद्धं तत्र न कारयेत्। राक्षसी नाम सा वेला गर्हिता सर्वकर्मसु ॥ (मत्स्यपुराण २२।८३; स्कन्दपुराण, प्रभास० २०५।४-५)

६. रात्रि व सन्ध्याकाल निषेध

रात्रि में श्राद्ध नहीं करना चाहिये, उसे राक्षसी कहा गया है। दोनों सन्ध्याओं में तथा सूर्य के तत्काल उदित होने पर (पूर्वाह्नकाल में) भी श्राद्ध नहीं करना चाहिये:

रात्रौ श्राद्धं न कुर्वीत राक्षसी कीर्तिता हि सा। सन्ध्ययोरुभयोश्चैव सूर्ये चैवाचिरोदिते ॥ (मनुस्मृति ३।२८०)
न च नक्तं श्राद्धं कुर्वीत । (आपस्तम्बधर्मसूत्र २।७।१७।२३)

७. चतुर्दशी तिथि का नियम

चतुर्दशी को सामान्य श्राद्ध करने से कुप्रजा (निन्दित सन्तान) उत्पन्न होती है। परन्तु जिनके पितर युद्ध में शस्त्र से मारे गये हों, वे चतुर्दशी को श्राद्ध करने से प्रसन्न होते हैं:

'चतुर्दश्यां तु कुप्रजाः' (कूर्मपुराण, उ० २०।२१)
तस्माच्छ्राद्धं न कर्तव्यं चतुर्दश्यां द्विजातिभिः । शस्त्रेण तु हतानां वै तत्र श्राद्धं प्रकल्पयेत् ॥ (कूर्मपुराण, उ० २०।२२)
प्रतिपत्प्रभृतिष्वेतान् वर्जयित्वा चतुर्दशीम्। शस्त्रेण तु हता ये वै तेभ्यस्तत्र प्रदीयते ॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति १।२६४)
प्रतिपत्प्रभृतिह्येतद्वर्जयित्वा चतुर्दशीम् । शस्त्रेण तु हता ये वै तेषां श्राद्धं प्रदीयते ॥ (ब्रह्मोक्त याज्ञवल्क्यसंहिता ५।२०)

८. चतुर्दशी श्राद्ध का दोष

चतुर्दशी को सामान्य पितरों का श्राद्ध नहीं करना चाहिये। जो चतुर्दशी को श्राद्ध करता है, उसके घर में नवयुवकों की मृत्यु होती है तथा श्राद्ध करने वाला स्वयं भी युद्ध का भागी होता है:

पितृपक्षे चतुर्दश्यां यः श्राद्धं कुरुते नरः। सन्ततिस्तु हनिष्यन्ति विनाशस्त्रहते मृते ॥ श्राद्धं दानं चतुर्दश्यां विना शस्त्रनिपातने । ज्येष्ठपुत्रो विनश्यति पितृणां वा अधोगतिः ॥ (ब्रह्मोक्त याज्ञवल्क्यसंहिता ५।२१-२२)
अवश्यं तु युवानोऽस्य प्रमीयन्ते नरा गृहे ॥ युद्धभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वञ्छ्राद्धं चतुर्दशीम्। (महाभारत, अनु० ८७।१६-१७)

९. कृष्णपक्ष की प्रशस्त तिथियाँ

कृष्णपक्ष में केवल चतुर्दशी को छोड़कर दशमी से अमावस्या तक की सभी तिथियाँ श्राद्धकर्म में जैसी श्रेष्ठ मानी गयी हैं, वैसी दूसरी (प्रतिपदा से नवमी तक) नहीं:

कृष्णपक्षे दशम्यादौ वर्जयित्वा चतुर्दशीम्। श्राद्धे प्रशस्तास्तिथयो यथैता न तथेतराः ॥ (मनुस्मृति ३।२७६)
श्राद्धकर्मणि तिथ्यस्तु प्रशस्ता न तथेतराः ॥ (महाभारत, अनु० ८७।१८)

१०. कुतप काल का लक्षण

दिन के आठवें भाग (मुहूर्त) में जब सूर्य का ताप घटने लगता है, उस समय का नाम 'कुतप' है। उसमें पितरों के लिये दिया हुआ दान अक्षय होता है:

दिवसस्याष्टमे भागे मन्दी भवति भास्करः । स कालः कुतपो ज्ञेयः पितृणां दत्तमक्षयम् ॥ (वसिष्ठस्मृति ११।३३)
दिवसस्याष्टमे भागे मन्दी भवति भास्करे। सकालः कुतपो नाम पितॄणां दत्तमक्षयम् ॥ (महाभारत, आदि० ९३)
मुहूर्तास्तत्र विज्ञेया दश पञ्च च सर्वदा। तत्राष्टमो मुहूर्तो यः स कालः कुतपः स्मृतः ॥ (प्रजापतिस्मृति १५९)
अह्नो मुहूर्ता विख्याता दश पञ्च स्मृतः... (मत्स्यपुराण २२।८४)
अह्नो मुहूर्ता विख्याता... स्मृतः । मध्याह्नात्सर्वदा यस्मान्मन्दी भवति भास्करः ॥ (पद्मपुराण, सृष्टि० १।१८५-१८६)

११. आठ प्रकार के 'कुतप'

मध्याह्नकाल, खड्गपात्र (गैंडे के सींग का पात्र), नेपाल का कम्बल, चाँदी, कुश, तिल, गौ और दौहित्र (पुत्री का पुत्र)—ये आठों ही 'कुतप' नाम से प्रसिद्ध हैं:

तस्मादनन्तफलदस्तत्रारम्भो विशिष्यते । खड्गपात्रं च कुतपस्तथा नैपालकम्बलः ॥ रुक्मं दर्भास्तिला गावो दौहित्रश्चाष्टमः स्मृतः । (पद्मपुराण, सृष्टि० १।१८७-१८८)
मध्याह्नः खड्गपात्रं च तथा नेपालकम्बलः । रूप्यं दर्भास्तिला गावो दौहित्रश्चाष्टमः स्मृतः ॥ (मत्स्यपुराण २२।८६)

१२. श्राद्ध में पवित्र एवं प्रशंसनीय वस्तुएं

श्राद्ध में तीन वस्तुएँ अत्यन्त पवित्र हैं—दौहित्र, कुतपकाल तथा तिल। तीन वस्तुएँ प्रशंसनीय हैं—शुद्धि, अक्रोध तथा जल्दबाजी न करना। श्राद्धकर्ता और भोक्ता दोनों के लिए क्रोध, लम्बा मार्ग चलना और उतावली वर्जित हैं:

त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः। त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ॥ (मनुस्मृति ३।२३५; वसिष्ठस्मृति ११।३२; महाभारत, आदि० ९३, अनु० १४५; स्कन्दपुराण, प्रभास० २०५।१३)
त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः। रजतस्य तथा दानं कथासंकीर्तनादिकम् ॥ वर्ज्यानि कुर्वता श्राद्धं क्रोधोऽध्वगमनं त्वरा। भोक्तुरप्यत्र राजेन्द्र त्रयमेतन्न शस्यते ॥ (विष्णुपुराण ३।१५।५२-५३)
त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः । वर्ज्यानि चाहुर्विप्रेन्द्र कोपोऽध्वगमनं त्वरा ॥ (मार्कण्डेयपुराण ३१।६३-६४)

१३. एकान्त व गुप्त श्राद्ध का विधान

श्राद्ध एकान्त में, गुप्त रूप से करना चाहिये। पिण्डदान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पड़ने पर वह पितरों को प्राप्त नहीं होता:

एकान्ते तु गृहे गुप्ते पितृणां श्राद्धमिष्यते। नीचदृष्ट्या हतं तच्च पितॄन्नैवोपतिष्ठति ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं गुप्तं च कारयेत्। पितृणां तृप्तिदं प्रोक्तं स्वयमेव स्वयम्भुवा ॥ (पद्मपुराण, सृष्टि० ३४।२०७-२०८)

१४. अस्वामिक भूमि पर श्राद्ध

दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिये। वन, पर्वत, पवित्र तीर्थ और देवालय—ये किसी की निजी भूमि में नहीं आते, क्योंकि इन पर किसी का व्यक्तिगत स्वामित्व नहीं होता:

पारक्ये भूमिभागे तु पितृणां नैव निर्वपेत्। स्वामिभिस्तद् विहन्येत मोहाद्यत् क्रियते नरैः ॥ अटव्यः पर्वताः पुण्यास्तीर्थान्यायतनानि च। सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न हि तेषु परिग्रहः ॥ (कूर्मपुराण, उ० २२।१६-१७)

१५. पितृकार्य में ब्राह्मण परीक्षा

मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण की परीक्षा भले न करे, परन्तु पितृकार्य में प्रयत्नपूर्वक विद्वान् व सदाचारी ब्राह्मण की परीक्षा करनी चाहिये:

न ब्राह्मणं परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित्। पित्र्ये कर्मणि तु प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः ॥ (मनुस्मृति ३।१४९)
दैवे कर्मणि ब्राह्मणं न परीक्षेत । प्रयत्नात् पित्र्ये परीक्षेत । (विष्णुस्मृति ८२)
ब्राह्मणान्न परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित्। पित्र्ये कर्मणि सम्प्राप्ते युक्तमाहुः परीक्षणम् ॥ (शंखस्मृति १४।१)
ब्राह्मणं न परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित्। पित्र्ये कर्मणि सम्प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः ॥ (व्याघ्रपादस्मृति २७५)
न ब्राह्मणान्परीक्षेत देवकर्मण्युपस्थिते। पैत्रकर्मणि सम्प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः ॥ (स्कन्दपुराण, प्रभास० २०५।५८)

१६. ब्राह्मणों द्वारा पितृतृप्ति

श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों के माध्यम से ही होती है, इसीलिए ब्रह्माजी ने श्राद्ध के निमित्त ब्राह्मणों का सृजन किया:

श्राद्धान्ब्राह्मणांस्तेन सृजता पद्मयोनिना। (स्कन्दपुराण, नागर० २२१।४७)

१७. ब्राह्मण निमन्त्रण की अनिवार्यता

श्राद्ध के अवसर पर योग्य ब्राह्मण को निमन्त्रित करना आवश्यक है। जो बिना ब्राह्मण के श्राद्ध करता है, उसके घर पितर भोजन नहीं करते और शाप देकर लौट जाते हैं:

तस्माद्विप्रः प्रकर्तव्यो दाने श्राद्धे च पर्व। आदौ परीक्षयेद्विप्रं श्राद्धे दाने प्रकारयेत्। नाश्नन्ति तस्य वै गेहे पितरो विप्रवर्जिताः ॥ शापं दत्त्वा ततो यान्ति श्राद्धाद्विप्रं विवर्जितात्। महापापी भवेत्सोऽपि ब्रह्महा स च कथ्यते ॥ (पद्मपुराण, भूमि० ६७।२९-३१)

१८. श्राद्ध भोजन में स्त्री निषेध

श्राद्ध का मुख्य भोजन स्त्री को नहीं कराना चाहिये, भले ही वह व्रतचारिणी क्यों न हो:

न भोजयेत् स्त्रियं श्राद्धे यद्यपि व्रतचारिणीम्। पात्रं तस्यै समं स्यादिति धर्मविद्ब्रवीत् ॥ (बृहत्पराशरस्मृति ७।७१)

१९. योगी का महत्त्व

यदि श्राद्ध-भोजन करने वाले सहस्र ब्राह्मणों के सम्मुख एक भी सिद्ध योगी उपस्थित हो, तो वह यजमान सहित उन सभी का उद्धार कर देता है:

सहस्रस्यापि विप्राणां योगी चेत्पुरतः स्थितः। सर्वान्भोक्तंस्तारयति यजमानं तथा नृप॥ (विष्णुपुराण ३।१५।५६)
ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यो योगी त्वग्राशनो यदि। यजमानं च भोक्तंश्च नौरिवाम्भसि तारयेत् ॥ (मार्कण्डेयपुराण ३२।३०)
ब्राह्मणानां सहस्राणि एको योगी भवेद्यदि ॥ यजमानं च भोक्तंश्च नौरिवाम्भसि तारयेत् । (ब्रह्मपुराण २२०।१११-११२)

२०. मन्त्रज्ञ ब्राह्मण की महत्ता

जिस श्राद्ध में लाखों मन्त्रहीन ब्राह्मण भोजन करते हैं, वहाँ यदि वेदों का मन्त्रवेत्ता एक ही ब्राह्मण सन्तुष्ट हो जाए, तो वह उन सबके बराबर फल प्रदान करता है:

सहस्रं हि सहस्राणामनृचां यत्र भुञ्जते । एकस्तान्मन्त्रवित्प्रीतः सर्वानर्हति धर्मतः ॥ (मनुस्मृति ३।१३१)

२१. ब्राह्मण संख्या का नियम

देवकार्य में दो और पितृकार्य में तीन, अथवा दोनों में एक-एक ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिये। अत्यन्त सम्पन्न होने पर भी श्राद्ध में व्यर्थ विस्तार नहीं करना चाहिये:

द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा । भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे ॥ (मनुस्मृति ३।१२५; बौधायनस्मृति २।८।२९)
द्वौ दैवे श्राद्धे कुर्यान्न विस्तरम् ॥ (श्रीमद्भागवत ७।१५।३)
द्वौ दैवे त्रींस्तथा पित्र्ये एकैकमुभयत्र वा ॥ भोजयेत् सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे। (मत्स्यपुराण १७।१३-१४)
पितृणामयुजः कामं युग्मान् दैवे द्विजोत्तमान्। एकैकं वा पितृणां च देवानां च स्वशक्तितः । (मार्कण्डेयपुराण ३१।३७-३८)
पितृणामयुजोयुग्मं देवानामपि योजयेत्। देवानामेकमपि वा पितृणां च निवेदयेत्॥ (वराहपुराण १४।१०)
प्रायोपवेशयेत् पीठे युग्मान्दैवेऽथ पित्र्यके। अयुग्मात् प्राङ्‌मुखान्दैवे त्रीन् पैत्र्ये चैकमेव वा ॥ (अग्निपुराण १६३।२)
द्वौ वा दैवे त्रीन् पित्र्ये। एकैकमुभयत्र वा। (पारस्करगृह्यसूत्र, परिशिष्ट १।१६-१७)

२२. भोजन कराने योग्य दस सम्बन्धी

नाना, मामा, भानजा, श्वशुर, गुरु, दौहित्र, जामाता (दामाद), बान्धव, ऋत्विज् तथा यज्ञ कराने वाले—इन दस को श्राद्ध में भोजन कराना उत्तम है:

मातामहं मातुलं च स्वस्त्रीयं श्वशुरं गुरुम्। दौहित्रं विट्पतिं बन्धुमृत्विज्याज्यौ च भोजयेत्। (मनुस्मृति ३।१४८)

२३. निकट सम्बन्धियों की उपेक्षा का दोष

जो श्राद्धकाल आने पर भी राग-द्वेष या भय से पाँच कोस के भीतर रहने वाले दामाद, भानजे व बहन को छोड़कर दूसरों को भोजन कराता है, उसके श्राद्ध को पितर और देवता ग्रहण नहीं करते:

सम्प्राप्ते श्राद्धकालेऽपि पञ्चक्रोशान्तरे स्थितम्। जामातरं परित्यज्य तथा च दुहितुः सुतम् । स्वसारं चैव स्वस्त्रीयं परित्यज्य प्रवर्तते । कामात्क्रोधाद् भयाद्वापि अन्यं भोजयते यदा ॥ पितरो नैव भुञ्जन्ति दैवाश्चैव न भुञ्जते । एतच्च पातकं तस्य पितृघातसमं कृतम् ॥ (पद्मपुराण, भूमि० ६७।८-१०)

२४. बान्धवों का त्याग न करना

अपना भानजा तथा भाई-बन्धु यदि विद्याहीन भी हों, तो भी श्राद्ध में उनका त्याग नहीं करना चाहिये:

सम्बन्धिनं तथा सन्तं दौहित्रं दुहितुः पतिम् ॥ भागिनेयं विशेषेण तथा बन्धुगणानपि। नातिक्रमेन्नरस्त्वेतान्मूर्खानपि वरानने ॥ (स्कन्दपुराण, प्रभास० २०५।५६-५७)
दौहित्रं योजयेच्छ्राद्धे पितृणां परितुष्टये ॥ (स्कन्दपुराण, नागर० २२१।४८)

२५. भिक्षुक व ब्रह्मचारी का सत्कार

श्राद्ध में निमन्त्रित ब्राह्मणों के बैठ जाने पर भोजन हेतु उपस्थित भिक्षुक या ब्रह्मचारी को भी इच्छापूर्वक भोजन कराना चाहिये; क्योंकि अतिथि-सत्कार के बिना श्राद्ध प्रशंसनीय नहीं होता:

भिक्षुको ब्रह्मचारी वा भोजनार्थमुपस्थितः । उपविष्टेषु यः श्राद्धे कामं तमपि भोजयेत् ॥ अतिथिर्यस्य नाश्नाति न तच्छ्राद्धं प्रशस्यते। तस्मात् प्रयत्नाच्छ्राद्धेषु पूज्या ह्यतिथयो द्विजैः ॥ (कूर्मपुराण, उ० २२।३१-३२)

२६. श्राद्धकाल में उपस्थित अतिथि

श्राद्धकाल में आए हुए अतिथि का विधिवत् पूजन-सत्कार करना चाहिये। अपूजित अतिथि श्राद्ध के समस्त फल को नष्ट कर देता है:

तस्मादभ्यर्चयेत्प्राप्तं श्राद्धकालेऽतिथिं बुधः । श्राद्धक्रियाफलं हन्ति नरेन्द्रापूजितोऽतिथिः ॥ (विष्णुपुराण ३।१५।२५)
द्विजेन्द्रापूजितोऽतिथिः ॥ (वराहपुराण १४।२०)

२७. मित्रों को निमन्त्रण न देना

श्राद्ध को मित्रता का साधन नहीं बनाना चाहिये। मित्रों को धन देकर सन्तुष्ट करें, किन्तु श्राद्ध में भोजन उसी को कराएं जो न मित्र हो न शत्रु (मध्यस्थ हो):

न श्राद्धे भोजयेन्मित्रं धनैः कार्योऽस्य संग्रहः। नारिं न मित्रं यं विद्यात्तं श्राद्धे भोजयेद्द्विजम् ॥ (मनुस्मृति ३।१३८)
न श्राद्धे... पैशाची दक्षिणा सा हि नैवामुत्र फलप्रदा ॥ (कूर्मपुराण, उ० २१।२३)
यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च ॥ न प्रीणन्ति पितॄन् देवान् स्वर्गं च न स गच्छति । यश्च श्राद्धे कुरुते सङ्गतानि न देवयानेन पथा स याति । स वै मुक्तः पिप्पलं बन्धनाद्वा स्वर्गाल्लोकाच्च्यवते श्राद्धमित्रः ॥ तस्मान्मित्रं श्राद्धकृन्नाद्रियेत दद्यान्मित्रेभ्यः संग्रहार्थं धनानि। यन्मन्यते नैव शत्रुं न मित्रं तं मध्यस्थं भोजयेद्धव्यकव्ये ॥ (महाभारत, अनु० ९०।४१-४३)
न च तेन मित्रकर्म कुर्यात् । (गौतमधर्मसूत्र २।६।१२)

२८. श्राद्धस्थल से वर्जित व्यक्ति व प्राणी

अंगहीन, पतित, कुष्ठी, नास्तिक, मुर्गा, सूअर, कुत्ता, नग्न, मत्त, धूर्त, रजस्वला स्त्री तथा पाखण्डी को श्राद्धस्थल से दूर रखना चाहिये:

..हीनाङ्गः पतितः कुष्ठी व्रणी पुक्कसनास्तिकौ । कुक्कुटाः शूकरा श्वानो वर्ज्याः श्राद्धेषु दूरतः । वीभत्सुमशुचिं नग्नं मत्तं धूर्तं रजस्वलाम्। नीलकाषायवसनं पाषण्डांश्च विवर्जयेत् ॥ (कूर्मपुराण, उ० २२।३४-३५)
हीनाङ्गः पतितः कुष्ठी वणिक्पुक्कसनास्तिकः ॥ कुक्कुटः शूकरश्वानो वर्ज्याः श्राद्धेषु दूरतः। वीभत्समशुचिं म्लेच्छं न स्पृशेच्च रजस्वलाम् ॥ नीलकाषायवसनं पाषण्डांश्च विवर्जयेत्। (औशनसस्मृति ५।३२-३४)

२९. पिण्डदान समय त्याज्य

पिण्डदान के समय चाण्डाल, श्वपच, काषायवस्त्रधारी, कुष्ठी, ब्रह्महत्यारा तथा वर्णसंकर को उस स्थान से दूर रखना चाहिये:

चाण्डालश्वपचौ वर्ज्यौ निवापे समुपस्थिते । काषायवासाः कुष्ठी वा पतितो ब्रह्महापि वा। संकीर्णयोनिर्विप्रश्च सम्बन्धी पतितश्च यः। वर्जनीया बुधैरेते निवापे समुपस्थिते ॥ (महाभारत, अनु० ९१।४३-४४)

३०. हविष्य पर दूषित दृष्टि का प्रभाव

देवताओं और पितरों के हविष्य को यदि रजस्वला, कुष्ठरोगिणी या वन्ध्या स्त्री देख ले, तो उसे देवता व पितर १३ वर्षों तक ग्रहण नहीं करते:

श्राद्धकल्पे च दैवे च तैर्थिके पर्वणीषु च ॥ रजस्वला च या नारी श्वित्रिकापुत्रिका च या। एताभिश्चक्षुषा दृष्टं हविर्नाश्नन्ति देवताः ॥ पितरश्च न तुष्यन्ति वर्षाण्यपि त्रयोदश। (महाभारत, अनु० १२७।१२-१४)

३१. दृष्टिदोष से अन्न की व्यर्थता

जहाँ रजस्वला स्त्री, कुत्ता, चाण्डाल और सूअर श्राद्ध के अन्न को देख लेते हैं, वह अन्न व्यर्थ हो जाता है और प्रेतभाग बन जाता है:

यच्छ्राद्धं वीक्षते श्वा वा नारी वाऽथ रजस्वला। पतितो वा वराहो वा तच्छ्राद्धं व्यर्थतां व्रजेत् ॥ (स्कन्दपुराण, नागर० २१७।४३)
श्राद्धं संपश्यते श्वा चेन्नारी चैव रजस्वला। अन्त्यजः शूकरश्चान्नं तदस्माकं तु भोजनम् ॥ (स्कन्दपुराण, प्रभास० २२३।३९)

३२. आच्छादित स्थान में श्राद्ध का निर्देश

नपुंसक, पापी, रोगी, कुक्कुट, श्वान, वानर, सूअर, रजस्वला एवं अशौचयुक्त व्यक्ति की दृष्टि पड़ने से पितर भाग ग्रहण नहीं करते; अतः श्राद्ध ओट (घिरे हुए स्थान) में करना चाहिये:

षण्ढापविद्धचाण्डालपापिपाषण्डिरोगिभिः। कृकवाकुश्वनग्नैश्च वानरग्रामसूकरैः ॥ उदक्यासूतकाशौचिमृतहारैश्च वीक्षिते । श्राद्धे सुरा न पितरो भुञ्जते पुरुषर्षभ । तस्मात्परिश्रिते कुर्याच्छ्राद्धं श्रद्धासमन्वितः । (विष्णुपुराण ३।१६।१२-१४)
नग्नाः पातकिनश्चैव हन्युर्दृष्ट्या पितृक्रियाम्। अपुमानपविद्धश्च कुक्कुटो ग्रामसूकरः ॥ श्वा चैव हन्ति श्राद्धानि यातुधानाश्च दर्शनात्। (मार्कण्डेयपुराण ३२।२१-२२)

३३. भोजन करते विप्रों पर दृष्टि निषेध

चाण्डाल, सूअर, कुक्कुट, कुत्ता, रजस्वला और नपुंसक भोजन करते हुए ब्राह्मणों को न देखें; इनके देखने से होम, दान व भोजन निष्फल हो जाते हैं:

चाण्डालश्च वराहश्च कुक्कुटः श्वा तथैव च। रजस्वला च षण्ढश्च नेक्षेरन्नश्नतो द्विजान् ॥ होमे प्रदाने भोज्ये च यदेभिरभिवीक्ष्यते। दैवे कर्मणि पित्र्ये वा तद्गच्छत्ययथातथम्॥ (मनुस्मृति ३।२३९-२४०)
यं देशं च न पश्यन्ति कुक्कुटश्वानशूकराः । (वराहपुराण १८८।२३)
यन्न पश्यन्ति ते भोज्यं श्वानः कुक्कुटसूकराः। (वराहपुराण १९०।२३)
श्वचाण्डालपतितावेक्षणे दुष्टम् । (गौतमधर्मसूत्र २।६।२५)

३४. श्राद्ध में वर्जित दुग्ध

एक खुर वाले पशुओं (घोड़ा आदि), ऊँटनी, भेड़, मृगी, भैंस, चँवरी गाय और हाल की ब्याही गाय (१० दिन के भीतर) का दूध वर्जित है। माँगकर लाया गया दूध भी न लें:

क्षीरमेकशफानां यदौष्ट्रमाविकमेव च। मार्गं च माहिषं चैव वर्जयेच्छ्राद्धकर्मणि ॥ (विष्णुपुराण ३।१६।११)
मार्गमाविकमौष्ट्रं च सर्वमैकशफं च यत् ॥ माहिषं चामरं चैव धेन्वा गोश्चाप्यनिर्दशम् । पित्र्यर्थं मे प्रयच्छस्वेत्युक्त्वा यच्चाप्युपाहृतम्॥ वर्जनीयं सदा सद्भिस्तत्पयः श्राद्धकर्मणि। (मार्कण्डेयपुराण ३२।१७-१९)
माहिषं चामरं मार्गमाविकैकशफोद्भवम्। स्त्रैणमौष्ट्रमाविकं च दधि क्षीरं घृतं त्यजेत् ॥ (ब्रह्मपुराण २२०।१६९)

३५. गोदुग्ध, दधि व घृत की श्रेष्ठता

सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्माजी ने सबसे पहले गौओं को रचा; अतः श्राद्ध में गोदुग्ध, गोधि और विशेष रूप से गाय का घी ही श्रेष्ठ है:

पशून्विसृजता तेन पूर्वं गावो विनिर्मिताः। तेन तासां पयः शस्तं श्राद्धे सर्पिर्विशेषतः ॥ (स्कन्दपुराण, नागर० २२१।४९)

३६. श्राद्ध में प्रशस्त धान्य एवं फल

जौ, धान, तिल, गेहूँ, मूंग, सावाँ, सरसों का तेल तथा आम, बेल, अनार, बिजौरा, आँवला, नारियल, खजूर, द्राक्षा, परवल, बेर आदि फल श्राद्ध में यत्नपूर्वक देने चाहिये:

यवैर्व्रीहितिलैर्माषैर्गोधूमैश्चणकैस्तथा। सन्तर्पयेत्पितॄन्मुद्गैः श्यामाकैः सर्षपद्रवैः ॥ आम्रमात्रातकं बिल्वं दाडिमं बीजपूरकम् । प्राचीनामलकं क्षीरं नारिकेलं परूषकम् ॥ नारङ्गं च सखजूरं द्राक्षानीलकपित्थकम् । पटोलं च प्रियालं च कर्कन्धूबदराणि च ॥ विकङ्कतं वत्सकं च कस्त्वारु (रु) -वारुकानपि। एतानि फलजातानि श्राद्धे देयानि यत्नतः ॥ (ब्रह्मपुराण २२०।१५४, १५६-१५८)

३७. अन्य प्रशस्त अन्न

यव (जौ), काँगनी, मूंग, गेहूँ, धान, तिल, मटर, कचनार और सरसों श्राद्ध में अत्यंत शोभनीय एवं फलदायी हैं:

यवाः प्रियङ्गवो मुद्गा गोधूमा व्रीहयस्तिलाः। निष्पावाः कोविदाराश्च सर्षपाश्चात्र शोभनाः ॥ (विष्णुपुराण ३।१६।६)
यवव्रीहि सगोधूमतिला मुद्गाः ससर्षपाः। प्रियङ्गवः कोविदारा निष्पावाश्चातिशोभनाः ॥ (मार्कण्डेयपुराण ३२।१०)

३८. दूषित व बासी अन्न का त्याग

जिसमें बाल या कीड़े पड़ गये हों, जिसे कुत्ते ने देखा हो, जो बासी, दुर्गन्धित हो तथा जिस पर पहने वस्त्र की हवा लग गई हो—उसे श्राद्ध में त्याग देना चाहिये:

केशकीटावपन्नं च तथा श्वभिरवेक्षितम् ॥ पूति पर्युषितं चैव वार्ताक्यभिषवांस्तथा। वर्जनीयानि वै श्राद्धे यच्च वस्त्रानिलाहतम् ॥ (मार्कण्डेयपुराण ३२।२५-२६)

३९. श्राद्ध में पूर्णतः वर्जित वस्तुएं

मसूर, राजमाष, कुलथी, गाजर, कुम्हड़ा, लौकी, बैंगन, हींग, प्याज, लहसुन, काला नमक, अलसी, जामुन, सिंघाड़ा आदि श्राद्ध में पूर्णतः निषिद्ध हैं:

मसूरशणनिष्पावाराजमाषाः कुलुत्थकाः ॥ पद्मबिल्वार्कधत्तूरपारिभद्राटरूषकाः । न देयाः पितृकार्येषु पयश्चाजाविकं तथा ॥ कोद्रवोदारवरटकपित्थं मधुकातसी। एतान्यपि न देयानि पितृभ्यः श्रियमिच्छता ॥ (पद्मपुराण, सृष्टि० ९।६४-६६)
पिप्पली क्रमुकं चैव तथा चैव मसूरकम् । कूष्माण्डालाबुवार्ताकान् भूस्तृणं सुरसं तथा ॥ कुसुम्भपिण्डमूलं वै तन्दुलीय कमेव च। राजमाषांस्तथा क्षीरं माहिषं च विवर्जयेत् ॥ (कूर्मपुराण, उ० २०।४६-४७)
राजमाषानणूंश्चैव मसूरांश्च विसर्जयेत् ॥ अलाबु गृञ्जनं चैव पलाण्डुं पिण्डमूलकम् । (विष्णुपुराण ३।१६।७-८)
अश्राद्धेयानि धान्यानि कोद्रवाः पुलकास्तथा । हिंगुद्रव्येषु शाकेषु पलाण्डुं लशुनं तथा ॥ सौभाञ्जनः कोविदारस्तथा गृञ्जनकादयः । कूष्माण्डजात्यलाबू च कृष्णं लवणमेव च ॥ अङ्कुराद्यास्तथा वा इह शृङ्गाटकानि च ॥ वर्जयेल्लवणं सर्वं तथा जम्बूफलानि च। अवक्षुतावरुदितं तथा श्राद्धे च वर्जयेत् ॥ (महाभारत, अनु० ९१।३८-४१)
कूष्माण्डं महिषीक्षीरं आढक्या राजसर्षपाः। मसूराश्चणकाश्चैव षडेते श्राद्धघातकाः ॥ (व्याघ्रपादस्मृति १७९)

४०. शब्द बाधक वातावरण

जहाँ चक्की चलने की घरघराहट, ओखली कूटने का शब्द अथवा सूप फटकने की आवाज होती हो, वहाँ किया गया श्राद्ध निष्फल हो जाता है:

घरट्टोलूखलोत्थौ च यत्र शब्दौ व्यवस्थितौ । शूर्पस्य वा विशेषेण तच्छ्राद्धं व्यर्थतां व्रजेत् ॥ (स्कन्दपुराण, नागर० २१७।४६)

४१. श्राद्धकर्ता के लिये त्याज्य कर्म

दातुन करना, पान खाना, तेल मालिश, मैथुन, औषधि सेवन, पराया अन्न खाना, यात्रा करना, कलह, क्रोध, भार ढोना और दिन में सोना—ये सब श्राद्धकर्ता को त्यागने चाहिये:

दन्तधावनताम्बूलं स्नेहस्नानमभोजनम्। रसौषधं परान्नं च श्राद्धकृत् सप्त वर्जयेत् ॥ (व्याघ्रपादस्मृति १५५)
दन्तधावनताम्बूले तैलाभ्यङ्गं तथैव च। रत्योषधिपरान्नानि श्राद्धकर्ता विवर्जयेत् ॥ अध्वानं कलहं क्रोधं व्यवायंच धुरं तथा। श्राद्धकर्ता च भोक्ता च दिवास्वापं च वर्जयेत् ॥ (नारदपुराण, पूर्व० २८।३-४)

४२. श्राद्धभोक्ता व कर्ता के लिये नियम

श्राद्ध में भोजन के बाद पुनः भोजन करना, मार्ग चलना, सवारी पर चढ़ना, परिश्रम, मैथुन, स्वाध्याय, दान लेना-देना, कलह और दिन में शयन—दोनों के लिये वर्जित है:

पुनर्भोजनमध्वानं भाराध्ययनमैथुनम् । दानं प्रतिग्रहो होमः श्राद्धभुगष्ट वर्जयेत् ॥ (व्याघ्रपादस्मृति १५६)
पुनर्भोजनमध्वानं यानमायासमैथुनम् । श्राद्धकृच्छ्राद्धभुक्चैव सर्वमेतद् विवर्जयेत् ॥ स्वाध्यायं कलहं चैव दिवास्वप्नं च सर्वदा। (मत्स्यपुराण १६।५६-५७)

४३. भूमि पर तिल विकिरण

श्राद्धभूमि में सर्वत्र तिल बिखेरने चाहिये; क्योंकि तिलों के द्वारा असुरों और राक्षसों से आक्रान्त भूमि शुद्ध हो जाती है:

तिलान् प्रविकिरेत् तत्र सर्वतो बन्धयेदजान्। असुरोपहतं सर्वं तिलैः शुध्यत्यजेन वा ॥ (कूर्मपुराण, उ० २२।१८)
उर्व्यां च तिलविक्षेपाद्यातुधानान्निवारयेत् ॥ (विष्णुपुराण ३।१६।१४)
तिलानवकिरेत् तत्र नानावर्णान् समन्ततः । अशुद्धमपवित्रं च तिलैः शुध्यति शोभने ॥ (महाभारत, अनु० १४५)
तिलैर्वा विकिरेत्। (गौतमधर्मसूत्र २।६।२७)

४४. तिल्हीन श्राद्ध का दोष

जो श्राद्ध तिलों से रहित होता है अथवा जो क्रोधपूर्वक किया जाता है, उसके हविष्य को राक्षस व पिशाच छीन लेते हैं:

तिलैर्विरहितं श्राद्धं कृतं क्रोधवशेन च। यातुधानाः पिशाचाश्च विप्रलुम्पन्ति तद्धविः ॥ (महाभारत, अनु० ९०।२२)

४५. तिल की प्रचुरता

जिस श्राद्ध में तिल की मात्रा अधिक रहती है, मनुजी के अनुसार वह श्राद्ध अक्षय फल देने वाला होता है:

वर्धमानतिलं श्राद्धमक्षयं मनुरब्रवीत्। (महाभारत, अनु० ८८।४)

४६. श्वेत तिलों से तर्पण निषेध

जो सफेद तिलों से पितरों का तर्पण करता है, उसका तर्पण निष्फल होता है। केवल काले तिलों का ही प्रयोग करना चाहिये:

अकृष्णैर्यत्तिलैर्मोहात्तर्पयेत्पितृसञ्चयम् ॥ भूम्यां ददाति यदपो दाता चैव जले स्थितः । वृथा तद्दीयते दानं नोपतिष्ठति कस्यचित् ॥ (पद्मपुराण, सृष्टि० ५१।४९-५०)

४७. श्राद्ध के रक्षक तत्व

तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं, कुश राक्षसों से बचाते हैं, श्रोत्रिय विप्र पंक्ति की रक्षा करते हैं और निष्काम यति के भोजन से श्राद्ध अक्षय होता है:

तिलाः पिशाचाद्रक्षन्ति दर्भा रक्षन्ति राक्षसात् ॥ रक्षन्ति श्रोत्रियाः पङ्क्तिं यतिभिर्भुक्तमक्षयम्। (महाभारत, आदि० ९३)

४८. अग्नि में पूर्व आहुति

श्राद्ध में पिण्डदान से पूर्व अग्नि को भाग अर्पित किया जाता है; अग्नि में आहुति देने के पश्चात् किये गये पिण्डदान को ब्रह्मराक्षस दूषित नहीं करते:

एतस्मात् कारणाच्चाग्नेः प्राक् तावद्दीयते नृप ॥ निवप्ते चाग्निपूर्वं वै निवापे पुरुषर्षभ । न ब्रह्मराक्षसास्तं वै निवापं धर्षयन्त्युत ॥ (महाभारत, अनु० ९२।११-१२)

४९. चाँदी के पात्रों का महत्त्व

सोने, चाँदी और ताँबे के पात्र पितरों को प्रिय हैं। श्राद्ध में चाँदी का दर्शन, दान अथवा पात्र का प्रयोग पितरों की प्रीति बढ़ाने वाला और राक्षसों का नाशक है:

राजतं च तथा पात्रं शस्तं श्राद्धेषु पुत्रक ॥ रजतस्य तथा कार्यं दर्शनं दानमेव वा। राजते हि स्वधा दुग्धा पितृभिः श्रूयते मही। तस्मात् पितॄणां रजतमभीष्टं प्रीतिवर्धनम् ॥ (मार्कण्डेयपुराण ३१।६४-६५)
सौवर्णं राजतं ताम्रं पितॄणां पात्रमुच्यते ॥ रजतस्य तथा किञ्चिद्दर्शनं पुण्यदायकम्। (स्कन्दपुराण, प्रभास० २०६।१११-११२)

५०. चाँदी के पात्र से जलदान

पितरों के लिये चाँदी के पात्र से श्रद्धापूर्वक केवल जल भी दिया जाए, तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। शिवनेत्र से उत्पन्न होने के कारण चाँदी पितरों को अतिप्रिय है:

राजतैर्भाजनैरेषामथो वा राजतान्वितैः । वार्यपि श्रद्धया दत्तमक्षयायोपकल्पते ॥ (मनुस्मृति ३।२०२)
सर्वेषां राजतं पात्रमथवा राजतान्वितम्॥ दृष्ट्वा विप्रान् पुरोधाय पितॄन्प्रीणाति सर्वदा। (पद्मपुराण, सृष्टि० ९।५८-५९)
वार्यपि श्रद्धया दत्तमक्षयायोपकल्पते। तथाऽर्घ्ये पिण्डभोज्यादौ पितॄणां राजतं मतम्। शिवनेत्रोद्भवं यस्मात् तस्मात् पितृवल्लभम्। (मत्स्यपुराण १७।२२-२३)

५१. मुद्रिका (अंगूठी) धारण कर तर्पण

तर्जनी में चाँदी की अंगूठी पहनकर तर्पण करने से लाख गुना तथा अनामिका में सोने की अंगूठी धारण कर तर्पण करने से करोड़ गुना फल प्राप्त होता है:

रौप्याङ्गुलीयं तर्जन्यां धृत्वा यस्तर्पयेत्पितॄन् । सर्वं च शतसाहस्रगुणं भवति नान्यथा ॥ तथैवानामिकायां तु धृत्वा स्वर्णाङ्गुलीं बुधः। तर्पयेत्पितृसन्दोहं लक्षकोटिगुणं भवेत् ॥ (पद्मपुराण, सृष्टि० ५१।५६-५७)

५२. मैथुन व क्षौर के उपरान्त तर्पण निषेध

जो मनुष्य मैथुन अथवा क्षौरकर्म (बाल-दाढ़ी बनवाने) के तुरंत बाद बिना शुद्ध हुए तर्पण करता है, वह जल रक्ततुल्य हो जाता है और दाता नरकगामी होता है:

कृत्वा तु मैथुनं क्षौरं यो देवांस्तर्पयेत् पितॄन्। रुधिरं तद्भवेत्तोयं दाता च नरकं व्रजेत् ॥ (ब्रह्मवैवर्तपुराण, ब्रह्म० २७।४५)

५३. हाथ अथवा लोहे से परोसने का निषेध

ब्राह्मणों के हाथ में सीधे नमक या व्यंजन नहीं परोसना चाहिये और न ही लोहे के पात्र से देना चाहिये; ऐसा भोजन राक्षस ग्रहण करते हैं:

न दद्यात् तत्र हस्तेन प्रत्यक्षलवणं तथा । न चायसेन पात्रेण न चैवाश्रद्धया पुनः ॥ (औशनसस्मृति ५।५९; कूर्मपुराण, उ० २२।६१)
हस्ते दत्त्वा तु वै स्नेहाल्लवणं व्यञ्जनानि च॥ आयसेन च पात्रेण तद्वै रक्षांसि भुञ्जते । (स्कन्दपुराण, प्रभास० २०६।३८-३९)

५४. एक हाथ से अन्न परोसने का दोष

एक हाथ से लाया हुआ अन्नपात्र या भोजन जो परोसा जाता है, उसे दुष्टचित्त असुर तत्काल छीन लेते हैं; अतः दोनों हाथों से पात्र पकड़कर परोसें:

उभयोर्हस्तयोर्मुक्तं यदन्नमुपनीयते। तद्विप्रलुम्पन्त्यसुराः सहसा दुष्टचेतसः ॥ (मनुस्मृति ३।२२५)

५५. श्राद्ध स्थल की बनावट

गोबर से लिपे, पवित्र, एकान्त और दक्षिण दिशा की ओर किञ्चित ढालू (दक्षिणप्लव) स्थान पर श्राद्ध करना चाहिये, जहाँ पापियों की दृष्टि न पड़े:

शुचिं देशं विविक्तं च गोमयेनोपलेपयेत्। दक्षिणाप्रवणं चैव प्रयत्नेनोपपादयेत् ॥ (मनुस्मृति ३।२०६)
पराश्रिते शुचौ देशे दक्षिणाप्रवणं तथा। (नारदपुराण, पूर्व० ५१।११२)
विविक्ते गृहमध्यस्थे मनोज्ञे दक्षिणाप्लवे । न यत्र जायते दृष्टिः पापानां क्रूरकर्मिणाम् ॥ (स्कन्दपुराण, नागर० २१७।४२)
गोमयेनानुलिप्ते तु दक्षिणाप्लवनस्थले ॥ (पद्मपुराण, सृष्टि० ९।८७)

५६. मिट्टी के पात्र में भोजन निषेध

श्राद्ध में मिट्टी के बर्तनों में पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन नहीं कराना चाहिये; ऐसा करने से दाता और भोक्ता दोनों नरकगामी होते हैं:

मृण्मयेषु च पात्रेषु यः श्राद्धे भोजयेत् पितॄन्। अन्नदाता च भोक्ता च तावेव नरकं व्रजेत् ॥ (अत्रिसंहिता १५४)
पात्रे तु मृण्मये यो वै श्राद्धे भोजयते पितॄन्। स याति नरकं घोरं भोक्ता चैव पुरोधसः ॥ (औशनसस्मृति ५।६१)
मृण्मयेषु च पात्रेषु श्राद्धे भोजयते पितॄन्॥ दातुश्च नोपतिष्ठेत भोक्ता च नरकं व्रजेत् । (दाल्भ्यस्मृति ३९-४०)

५७. भोजन के समय आसुरी स्थितियां

सिर ढककर (पगड़ी बाँधकर), दक्षिण मुख करके अथवा जूता पहनकर भोजन करने से वह सम्पूर्ण अन्न राक्षसों को प्राप्त होता है:

यद्वेष्टितशिरा भुङ्क्ते यद् भुङ्क्ते दक्षिणामुखः। सोपानत्कश्च यद् भुङ्क्ते तद्वै रक्षांसि भुञ्जते ॥ (मनुस्मृति ३।२३८)
...सर्वं विद्यात् तदासुरम् ॥ (महाभारत, अनु० ९०।१९)

५८. अपने घर श्राद्ध कर अन्यत्र भोजन

जो अपने घर में श्राद्ध करके उसी दिन अज्ञानवश दूसरे के श्राद्ध में भोजन करता है, उसके श्राद्ध का फल नष्ट हो जाता है और वह पाप का भागी बनता है:

श्राद्धं कृत्वा परश्राद्धे योऽश्नीयादज्ञानमोहितः॥ दातुः श्राद्धफलं नास्ति भोक्ता किल्बिषभुग्भवेत्। (स्कन्दपुराण, वैष्णव० धर्म० ६।६४-६५)

५९. उष्ण अन्न परोसने का विधान

ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक गरम-गरम अन्न परोसना चाहिये; केवल फल, फूल और शीतल पेय पदार्थ ही ठण्डे देने चाहिये:

उष्णमन्नं द्विजातिभ्यः श्रद्धया विनिवेशयेत्॥ अन्यत्र फलपुष्पेभ्यः पानकेभ्यश्च पण्डितः। (स्कन्दपुराण, प्रभास० २०६।३७-३८)

६०. मौन व भोजन के गुणों की प्रशंसा न करना

जब तक अन्न गरम रहता है, ब्राह्मण मौन रहकर भोजन करते हैं और भोजन के गुणों की चर्चा नहीं करते, तभी तक पितर तृप्त होकर भोजन करते हैं:

यावदुष्णं भवत्यन्नं यावदश्नन्ति वाग्यताः। पितरस्तावदश्नन्ति यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥ (मनुस्मृति ३।२३७)
तावद्धि पितरोऽश्नन्ति यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥ (वसिष्ठस्मृति ११।२९)
भुञ्जीत-वाग्यतो-स्पृष्टं न ब्रूयात् प्रकृतान् गुणान्। तावद्धि पितरोऽश्नन्ति यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥ (औशनसस्मृति ५।६३)
भुञ्जीरन् वाग्यताः शिष्टा न ब्रूयुः प्राकृतान् गुणान्। तावद्धि... (कूर्मपुराण, उ० २२।६५)
यावदुष्णं भवत्यन्नं यावद् भुञ्जन्ति वाग्यताः । अश्नन्ति पितरस्तावद्यावन्नोक्ता हविर्गुणाः। (यमस्मृति ३८)
यावदूष्णा भवत्यन्ने यावदश्नन्ति वाग्यताः ॥ तावदश्नन्ति पितरो यावन्नोक्ता हविर्गुणाः। (विष्णुधर्मोत्तर० १।१४०।४५-४६)
यावदुष्णं भवत्यन्नं यावन्मौनेन भुज्यते । तावदश्नन्ति पितरो यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥ (स्कन्दपुराण, काशी० पू० ४०।९४)

६१. अयोग्य पात्रों को श्राद्ध अन्न देने का फल

वैद्य को दिया अन्न पीब-रक्त के समान, देवलक (पुजारी वृत्ति वाले) को दिया व्यर्थ, सूदखोर को दिया अस्थिर तथा व्यापारी को दिया अन्न परलोक में फलहीन होता है:

सोमविक्रयिणे विष्ठा भिषजे पूयशोणितम् ॥ नष्टं देवलके दत्तमप्रतिष्ठं च वार्धुषे । यत्तु वाणिजके दत्तं नेह नामुत्र तद्भवेत् ॥ (महाभारत, अनु० ९०।१३-१४)

६२. वस्त्रदान की महिमा व स्वरूप

श्राद्ध में रेशमी, सूती अथवा बिना कटा नया वस्त्र दान करना चाहिये। सन या कपास का नया सूत दें; ऊन, पाट का सूत अथवा बिना कोर वाला वस्त्र न दें:

वस्त्राभावे क्रिया नास्ति यज्ञा वेदास्तपांसि च। तस्माद्वासांसि देयानि श्राद्धकाले विशेषतः ॥ कौशेयं क्षौमकार्पासं दुकूलमहतं तथा। श्राद्धे त्वेतानि यो दद्यात्कामानाप्नोति चोत्तमान् ॥ (ब्रह्मपुराण २२०।१३९-१४०)
क्षौमसूत्रं नवं दद्याच्छोणं कार्पासिकं तथा। पत्रोर्णं पट्टसूत्रं च कौशेयं च विवर्जयेत् ॥ वर्जयेच्चादशं प्राज्ञो यद्यप्यव्याहतं भवेत्। न प्रीणयन्त्यथैतानि दातुश्चाप्यनयो भवेत् ॥ (ब्रह्मपुराण २२०।१४६-१४७)

६३. जूठे पात्र उठाने का नियम

स्त्री, ज्ञानहीन अथवा व्रतरहित पुरुष श्राद्ध के उच्छिष्ट (जूठे) पात्रों को न उठाए; अपने कल्याण की इच्छा रखने वाला पुत्र स्वयं ही पिता के श्राद्ध में पात्र उठाए:

न स्त्री प्रचालयेत्तानि ज्ञानहीनो न चाव्रतः । स्वयं पुत्रोऽथवा यस्य वाञ्छेदभ्युदयं परम् ॥ (स्कन्दपुराण, प्रभास० २०६।४२)

६४. पिण्डों का विसर्जन

श्राद्ध के पिण्डों को गौ, ब्राह्मण अथवा बकरी को खिला दें, अथवा पवित्र अग्नि या बहते जल में विसर्जित कर दें:

एवं निर्वपणं कृत्वा पिण्डांस्तांस्तदनन्तरम्। गां विप्रमजमग्निं वा प्राशयेदप्सु वा क्षिपेत् ॥ (मनुस्मृति ३।२६०)
ततो निर्वपने वृत्ते तान् पिण्डांस्तदनन्तरम्। ब्राह्मणोऽग्निरजो गौर्वा भक्षयेदप्सु वा क्षिपेत् ॥ (महाभारत, अनु० १४५)

६५. सन्तान कामना हेतु मध्यम पिण्ड भक्षण

पुत्र की कामना रखने वाली पत्नी पितामह के मध्यम पिण्ड को मन्त्रोच्चारणपूर्वक ग्रहण करे:

पत्नी वा मध्यमं पिण्डं पुत्रकामां हि प्राशयेत्। आधत्त पितरो गर्भं कुमारं पुष्करस्रजम् ॥ (महाभारत, अनु० १४५)
मध्यमं पिण्डं पत्नी पुत्रकामा प्राश्नीयादाधत्त पितरो गर्भमिति। (गोभिलगृह्यसूत्र ४।३।२७) (अर्थात्: हे पितृगण! आप मेरे गर्भ में कमलों की माला धारण करने वाले तेजस्वी पुत्र को स्थापित करें।)

६६. विभिन्न कामनाओं हेतु पिण्ड व्यवस्था

भोगार्थी अग्नि में, प्रजार्थी पत्नी को, कान्तिकामी गौ को, प्रज्ञा-कीर्ति चाहने वाला जल में, दीर्घायु चाहने वाला कौओं को पिण्ड दे; अथवा दक्षिण मुख कर आकाश में समर्पित करे:

पिण्डमग्नौ सदा दद्याद्भोगार्थी सततं नरः। पत्न्यै दद्यात्प्रजार्थी च मध्यमं मन्त्रपूर्वकम् ॥ उत्तमां द्युतिमन्विच्छन्पिण्डं गोषु प्रयच्छति। प्रज्ञां चैव यशः कीर्तिमप्सु चैव निवेदयेत् ॥ प्रार्थयन्दीर्घमायुश्च वायसेभ्यः प्रयच्छति। कुमारशालामन्विच्छन्कुक्कुटेभ्यः प्रयच्छति ॥ (ब्रह्मपुराण २२०।१४९-१५१)
पिण्डमग्नौ सदा देयाद्भोगार्थी सततं नरः। प्रजार्थं पत्न्यै वै दद्यान्मध्यमं मन्त्रपूर्वकम् ॥ उत्तमां द्युतिमन्विच्छन्गोषु नित्यं प्रदापयेत्। प्रज्ञामिच्छेद्यशः कीर्तिमप्सु नित्यं प्रवेशयेत् ॥ प्रार्थयन्दीर्घमायुश्च वायसेभ्यः प्रदापयेत्। कुमारलोकमन्विच्छन्कुक्कुटेभ्यः प्रदापयेत्॥ आकाशे प्रक्षिपेद्वापि स्थितो वा दक्षिणामुखः । पितृणां स्थानमाकाशं दक्षिणा चैव दिक्तथा ॥ (स्कन्दपुराण, प्रभास० २०६।७६-७९)

६७. आत्महत्या करने वाले का श्राद्ध निषेध

अग्नि, विष आदि से आत्महत्या करने वाले के निमित्त अशौच, श्राद्ध या तर्पण का विधान नहीं है; यदि किया भी जाए तो वह प्रेत को प्राप्त नहीं होता:

आत्मनस्त्यागिनां चैव निर्वर्ततोदकक्रिया। (मनुस्मृति ५।८९; दाल्भ्यस्मृति ८७)
आत्मत्यागिनः पतिताश्च नाशौचोदकभाजः। (विष्णुस्मृति २२)
आत्मनस्त्यागिनां चैव श्राद्धमेषां न कारयेत् ॥ (लिखितस्मृति ६६)
महापातकिनां चैव तथा चैवात्मघातिनाम्। उदकपिण्डदानं च श्राद्धं चैव तु यत्कृतम्। नोपतिष्ठति तत्सर्वं राक्षसैर्विप्रलुप्यते ॥ (संवर्तस्मृति १७५)
सुराप्य आत्मत्यागिन्यो नाशौचोदकभाजनाः ॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति ३।६)
व्यापादयेत् तथात्मानं स्वयं योऽग्निविषादिभिः । विहितं तस्य नाशौचं नाग्निर्नैवोदकादिकम् ॥ (कूर्मपुराण, उ० २३।७३)

६८. अमावस्या व श्राद्ध में दही मथने का दोष

श्राद्ध के दिन अथवा अमावस्या को दही बिलोना (मथना) निषिद्ध है; इस दिन मट्ठा मदिरा के समान और निकाला गया घी गोमांस के समान माना गया है:

पितृश्राद्धे अमावस्यां मन्थानं कुरुते यदि। घृतं गोमांसवत्प्रोक्तं तक्रं चापि सुरासमम् ॥ (व्याघ्रपादस्मृति १५७)
अमावस्यां पितृश्राद्धे मन्थनं यस्तु कारयेत्। तत्तक्रं मदिरातुल्यं घृतं गोमांसवत्स्मृतम् ॥ (स्कन्दपुराण, प्रभास० २०६।५६)

६९. पिण्डदान, हवन व तर्पण में हाथों का नियम

श्राद्ध के भोजन, हवन तथा पिण्डदान में एक हाथ का प्रयोग करें, किन्तु पितृ तर्पण में दोनों हाथों को मिलाकर जल अंजलि दी जाती है:

श्राद्धे हवनकाले च दद्यादेकेन पाणिना । उभाभ्यां तर्पणे दद्यादिति धर्मो व्यवस्थितः ॥ (लघुयमस्मृति ९९)
श्राद्धे भोजनकाले च पाणिनैकेन दापयेत्॥ उभाभ्यां तर्पणे दद्याद्विधिरेष सनातनः। (पद्मपुराण, सृष्टि० ५१।४७-४८)
श्राद्धे हवनकाले च पाणिनैकेन निर्वपेत् । तर्पणे तूभयं कुर्यादेष एव विधिः सदा ॥ (ब्रह्मपुराण ६०।५५; नारदपुराण, पूर्व० ५६।६२-६३)
श्राद्धसाधनकाले तु पाणिनैकेन दीयते। तर्पणं तूभयेनैव विधिरेष सदा स्मृतः ॥ (मत्स्यपुराण २२।९१)
श्राद्धे हवनकाले च दद्यादेकेन पाणिना । उभाभ्यां तर्पणे दद्यादेष धर्मो व्यवस्थितः ॥ (नारदपुराण, पूर्व० १४।९४)

७०. नाभिमात्र जल में तर्पण विधि

नाभि पर्यन्त गहरे जल में खड़े होकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करें। दोनों हाथों को मिलाकर गोश्रृंग (गाय के सींग) प्रमाण जल उठाकर पितरों का ध्यान करते हुए आकाश व जल में विसर्जित करें:

नाभिमात्रे जले स्थित्वा हृदयेनानुचिन्तयेत्। आगच्छन्तु मे पितरो गृह्णन्त्वेताञ्जलाञ्जलीन् ॥ हस्तौ कृत्वा तु सुसंयुक्तौ पूरयित्वा जलेन च। गोशृङ्गमात्रमुद्धृत्य जलमध्ये जलं क्षिपेत्॥ आकाशे च क्षिपेद्वारि वारिस्थो दक्षिणामुखः। पितृणां स्थानमाकाशं दक्षिणा दिक्तथैव च। (लघुयमस्मृति ९२-९४)
नाभिमात्रे जले स्थित्वा हृदयेन तु चिन्तयेत्। आगच्छन्तु मे पितरो गृह्णन्त्वेताञ्जलाञ्जलीन् ॥ हस्तौ कृत्वा तु संयुक्तौ पूरयित्वा जलेन च। गोशृङ्गमात्रमुद्धृत्य जलमध्ये विनिःक्षिपेत्॥ आकाशे च क्षिपेद्वारि वारिस्थो दक्षिणामुखः। पितृणां स्थानमाकाशं दक्षिणादिक् तथैव च ॥ (नारदपुराण, पूर्व० १४।८७-८९)


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