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सम्पूर्ण वृहद् 108 आरती संग्रह: प्रमुख देवी-देवताओं की सम्पूर्ण एवं प्रामाणिक आरतियाँ | cdsharma.in

✍️ CD Sharma · 📅 19 Sep 2026 · ⏱️ 5 मिनट का पठन · 🏷️ सम्पूर्ण आरती संग्रह, Brihad Aarti Sangrah, Ganesh Aarti, Shiv Aarti, Vishnu Aarti, Durga Aarti, Lakshmi Aarti, Hanuman Aarti, Krishna Aarti, Ram Aarti, Nitya Puja Aarti, Sanatan Dharma Devotional Lyrics, cdsharma.in

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सम्पूर्ण वृहद् 108 आरती संग्रह: प्रमुख देवी-देवताओं की सम्पूर्ण एवं प्रामाणिक आरतियाँ | cdsharma.in

सम्पूर्ण वृहद् आरती संग्रह

१. श्री गणेश जी की आरती

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

एकदन्त, दयावन्त, चार भुजाधारी। माथे सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी॥ पान चढ़े, फूल चढ़े, और चढ़े मेवा। लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥ जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा...

अंधेन को आँख देत, कोढ़िन को काया। बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥ 'सूर' श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥ जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा...

२. भगवान श्री जगदीश की आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे। अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

तन, मन, धन सब है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

३. भगवान श्री शिव ओंकारा की आरती

ॐ जय शिव ओंकारा, हर ॐ शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन पंचानन राजे। हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चारु चतुर्भुज दसभुज अति सोहे। त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी। त्रिपुरारी कंसारी करमाला धारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी। सुखकारी दुखहारी जगपालनकारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

४. श्री हनुमान लला की आरती

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥

जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके॥ अंजनि पुत्र महाबलदाई। सन्तन के प्रभु सदा सहाई॥ आरती कीजै हनुमान लला की...

दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाए॥ लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥ आरती कीजै हनुमान लला की...

लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज संवारे॥ लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि संजीवन प्रान उबारे॥ आरती कीजै हनुमान लला की...

पैठि पाताल तोरि जम-कारे। अहिरावण की भुजा उखारे॥ बाएं भुजा असुर दल मारे। दहिने भुजा संतजन तारे॥ आरती कीजै हनुमान लला की...

सुर नर मुनि आरती उतारें। जय जय जय हनुमान उचारें॥ कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत संजना माई॥ आरती कीजै हनुमान लला की...

जो हनुमानजी की आरती गावै। बसि बैकुंठ परम पद पावै॥ लंक विध्वंस किए रघुराई। तुलसीदास स्वामी कीरति गाई॥ आरती कीजै हनुमान लला की...

५. मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी की स्तुति व आरती

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं। नवकंज लोचन, कंज मुख, कर कंज, पद कंजारुणं॥

कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनील नीरद सुन्दरं। पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं॥

भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्यवंश निकन्दनं। रघुनन्द आनंदकंद कोशलचन्द दशरथ नन्दनं॥

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणं। आजानुभुज शर चाप धर, संग्राम-जित-खरदूषणं॥

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि-मन-रंजनं। मम हृदय कंज निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं॥

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सांवरो। करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥ एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥

६. भगवान श्री कुंजबिहारी / श्रीकृष्ण जी की आरती

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला। श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला। गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली। लतन में ठाढ़े बनमाली; भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक; ललित छवि श्यामा प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की...

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं। गगन सों सुमन रासि बरसै; बजे मुरली मधुर सुर की, मिटै सब त्रास असुर की; मधुर छवि नवल किशोरी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की...

जहाँ ते प्रगट भई गंगा, कलुष कलि-हारिणि श्रीगंगा। स्मरन ते होत मोह भंगा; बसी मन कुंज-बिहारी की, सदाई सुखकारी की; आरती राधा प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥ आरती कुंजबिहारी की...

७. श्री बांके बिहारी जी की आरती

श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं, हे कुंजबिहारी तेरी आरती गाऊं। आरती गाऊं प्यारे तुमको रिझाऊं, नैनन में तेरी छवि बसाऊं॥

मोर मुकुट प्यारे शीश पे सोहे, प्यारी बंसुरी मेरो मन मोहे। देखि छबि बलिहारी मैं जाऊं, श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं॥

चरणन ते निकली गंगा प्यारी, जिसने सारी दुनिया तारी। उन चरणन में शीश नवाऊं, श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं॥

दास अनाथ के नाथ आप हो, दुख-सुख जीवन-प्यारे साथ आप हो। हरि चरणों में शीश नवाऊं, श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं॥

श्री हरिदास के प्यारे तुम हो, मेरे मोहन जीवन-धन हो। नित उठ तेरे दर्शन पाऊं, श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं॥

८. श्री लड्डू गोपाल (बाल कृष्ण) जी की आरती

आरती बाल कृष्ण की कीजै, अपनो जनम सफल करि लीजै॥

गोपहिं संग धेनु चरावे, मुरली मधुर-मधुर उपजावे। मैया यशोदा माखन खवावे, नटखट रूप नयन ठहरावे॥ आरती बाल कृष्ण की कीजै...

घुटरुन चलत रेणु तन मंडित, मुख दधि लेप किए अति पंडित। किंकणी नूपुर बाजत पांयन, मोहे सुर नर मुनि जन गायन॥ आरती बाल कृष्ण की कीजै...

पूतना तृणावर्त संहारे, कंसहिं मारि भूमि-भार उतारे। जो जन बाल रूप को ध्यावे, सो बैकुंठ धाम को पावे॥ आरती बाल कृष्ण की कीजै...

९. माँ दुर्गा (अम्बे गौरी) की आरती

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ जय अम्बे गौरी॥

मांग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को। उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥ जय अम्बे गौरी॥

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजे। रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजे॥ जय अम्बे गौरी॥

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी। सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुखहारी॥ जय अम्बे गौरी॥

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति॥ जय अम्बे गौरी॥

शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती। धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥ जय अम्बे गौरी॥

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे। मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥ जय अम्बे गौरी॥

ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी। आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ जय अम्बे गौरी॥

चौंसठ योगिनि गावत, नृत्य करत भैंरू। बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥ जय अम्बे गौरी॥

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भर्ता। भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पति करता॥ जय अम्बे गौरी॥

भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी। मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ जय अम्बे गौरी॥

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती। श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥ जय अम्बे गौरी॥

श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी, सुख-सम्पत्ति पावे॥ जय अम्बे गौरी॥

१०. माँ महालक्ष्मी जी की आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता। तुमको निशिदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता। सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥

दुर्गा रूप निरंजनि, सुख सम्पति दाता। जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥

तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता। कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी, भवनिधि की त्राता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥

जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता। सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥

तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता। खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥

शुभ-गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता। रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥

महालक्ष्मीजी की आरती, जो कोई नर गावे। उर आनन्द समावे, पाप सकल कट जावे॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥

११. माँ सरस्वती जी की आरती

जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता। सद्गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥ जय सरस्वती माता॥

चन्द्रवदनि पद्मासिनि, द्युति मंगलकारी। सोहे शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी॥ जय सरस्वती माता॥

बाएं कर में वीणा, दूजे कर माला। शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला॥ जय सरस्वती माता॥

देव शरण में आए, उनका उद्धार किया। बैठी मन्थरा दासी, रावण संहार किया॥ जय सरस्वती माता॥

विद्या दान प्रदायिनि, ज्ञान प्रकाश भरो। मोह अज्ञान तिमिर का, जग से नाश करो॥ जय सरस्वती माता॥

धूप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो। ज्ञानचक्षु दे माता, भव से पार करो॥ जय सरस्वती माता॥

माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे। हितकारी सुखकारी, ज्ञान परम पावे॥ जय सरस्वती माता॥

१२. वेदमाता गायत्री जी की आरती

जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता। सत्-चित्-आनन्द-रूपिणी, प्रणव-हृदय-ज्ञाता॥ जयति जय गायत्री माता॥

ब्रह्मचारिणी, विश्वपालिनी, त्रिकाल-संध्या-रूपा। चारु चतुरानन-वन्दिता, महिमा अति अनूपा॥ जयति जय गायत्री माता॥

हंस-वाहिनी, पुस्तक-धारिणी, ज्ञान-कलश-हस्ता। सकल सृष्टि की प्रेरिका, धर्म-मार्ग-प्रशस्ता॥ जयति जय गायत्री माता॥

ऋग्वेद, यजुः, साम, अथर्वण, मुख से प्रगट भए। जपते ही पातक कटते, ताप-त्रिविध गए॥ जयति जय गायत्री माता॥

काम, क्रोध, मद, मोह नसावहु, बुद्धि विमल कीजै। परम ज्योति का दर्शन, हे कल्याणी दीजै॥ जयति जय गायत्री माता॥

गायत्री जी की आरती, जो कोई नित गावे। पाप-ताप सब मिट जावे, परम गति पावे॥ जयति जय गायत्री माता॥

१३. श्री सत्यनारायण भगवान की आरती

जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा। सत्यनारायण स्वामी, जन-पातक-हरणा॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥

रत्नजड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे। नारद करत निराजन, घंटा ध्वनि बाजे॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥

प्रगट भए कलि-कारण, द्विज को दरश दियो। बूढ़े विप्र बन कर के, कंचन-महल कियो॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥

दुर्बल भील काठिया, जिन पर कृपा करी। बेचत काठ विपुल धन, वैभव अमित भरी॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥

वैश्य साधु की नौका, जल में डूब गई। प्रभु की स्तुति कीनी, कंचन फेर भई॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥

राजा तुंगध्वज ने, जब ही तिरस्कार कियो। पुत्र-वित्त सब खोकर, फेर शरण लियो॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥

सपाद-लक्ष का भोग, सप्रेम लगावै। कदली-फल-मधु-मिश्रित, चरणामृत पावै॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥

भाव-भक्ति से जो नर, आरती नित गावै। कहत शौनक मुनिवर, वैकुण्ठ पद पावै॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा॥

१४. श्री खाटू श्याम जी की आरती

ॐ जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे। खाटू धाम विराजत, अनुपम रूप धरे॥ ॐ जय श्री श्याम हरे॥

शीश के दानी प्रभु जी, कलि में नाम भयो। दीन-दयालु मुरारी, संकट दूर कयो॥ ॐ जय श्री श्याम हरे॥

फाल्गुन शुक्ल ग्यारस, मेला भारी लगे। भक्त-वृन्द के द्वारे, सोए भाग्य जगे॥ ॐ जय श्री श्याम हरे॥

तीन बाण के धारक, लखदातार कहाए। हारे का सहारा बन, नैया पार लगाए॥ ॐ जय श्री श्याम हरे॥

केसर-चंदन-लेपन, मस्तक छत्र फिरे। इत्र-सुगंध महकती, ज्योति-पुंज झरे॥ ॐ जय श्री श्याम हरे॥

जो कोई प्रेम सहित, आरती यह गावे। ऋद्धि-सिद्धि-सुख-सम्पति, सब कुछ सो पावे॥ ॐ जय श्री श्याम हरे॥

१५. श्री काल भैरव देव जी की आरती

जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा। जय काली के लाला, निशिदिन करूं सेवा॥ जय भैरव देवा॥

श्याम-वर्ण अति सुंदर, लोचन त्रय राता। बटुक नाथ कहलाओ, भक्तन हितदाता॥ जय भैरव देवा॥

त्रिशूल डमरू कर सोहे, खप्पर धारन कीन्ह। काले श्वान सवारी, सब भय हर लीन्ह॥ जय भैरव देवा॥

काशी के कोतवाल, कृपा जब तुम करते। यम के फंद कटत हैं, भव-सागर तरते॥ जय भैरव देवा॥

तेल सिन्दूर चढ़ावत, मदिरा धार बहे। जो जन शरण तुम्हारी, सो आनंद रहे॥ जय भैरव देवा॥

आरती भैरव जी की, जो कोई नर गावे। भूत-पिशाच भय भागे, मनवांछित फल पावे॥ जय भैरव देवा॥

१६. सूर्यपुत्र श्री शनिदेव जी की आरती

जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी। सूर्य पुत्र प्रभु छाया-सुत, महिमा अति भारी॥ जय जय श्री शनिदेव...

नील वर्ण तन सोहे, मन्द गति चाला। गिद्ध वाहन अति राजत, लोचन विकराला॥ जय जय श्री शनिदेव...

कर में त्रिशूल-गदा-धनु, तीक्ष्ण बाण साजे। किरीट मुकुट सिर सोहे, नीलम्बर राजे॥ जय जय श्री शनिदेव...

राजा हरिश्चन्द्र को, प्रभु तुमने तारा। नल-दमयंती विपदा, पल में निस्तारा॥ जय जय श्री शनिदेव...

रावण का मद तोड़ा, जग में यश पाया। पिप्पलाद मुनि-वन्दन, सब संकट हर धाया॥ जय जय श्री शनिदेव...

तिल, तेल और उड़द, जो नर अर्पण कीन्ह। ता पर कृपा करत प्रभु, वैभव सब दीन्ह॥ जय जय श्री शनिदेव...

आरती जो शनिदेव की, नियम सहित गावे। दोष-पीड़ा मिट जावे, सुख-सम्पत्ति पावे॥ जय जय श्री शनिदेव...

१७. माँ महाकाली जी की आरती

अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली। तेरे ही गुण गावें भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥

तेरे भक्त जनों पर माता, भीर पड़ी है भारी। दानव दल पर टूट पड़ो माँ, करके सिंह सवारी॥ सौ-सौ सिंहों से है बलशाली, है अष्टभुजाओं वाली। दुखियों के दुखड़े निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥

माँ बेटे का है इस जग में, बड़ा ही निर्मल नाता। पूत कपूत सुने हैं पर ना, माता सुनी कुमाता॥ सब पर करुणा बरसाने वाली, अमृत बरसाने वाली। दुखियों के दुखड़े निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥

नहीं मांगते धन और दौलत, न चांदी न सोना। हम तो मांगें तेरे चरणों में, इक छोटा सा कोना॥ सबकी बिगड़ी बनाने वाली, लाज बचाने वाली। दुखियों के दुखड़े निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती॥

१८. माँ वैष्णो देवी की आरती

जय वैष्णवी माता, मैया जय वैष्णवी माता। हाथ जोड़ तेरे द्वारे, जो कोई नर आता॥ जय वैष्णवी माता॥

शीश पे छत्र विराजे, मूरति अति प्यारी। गंगा-यमुना-सरस्वती, चरण पखारत सारी॥ जय वैष्णवी माता॥

त्रिकूट पर्वत ऊपर, पिण्डी रूप धरे। भैरव का वध करके, जग के काज सरे॥ जय वैष्णवी माता॥

पान, सुपारी, ध्वजा, नारियल, भेंट चढ़े भारी। हलुआ-पूरी का भोग, खात महतारी॥ जय वैष्णवी माता॥

अंधे को आंखें देत, कोढ़िन को काया। बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥ जय वैष्णवी माता॥

जो जन ध्यान लगावे, मन-वांछित फल पावे। कहे भक्त तव दासा, जनम मरण मिट जावे॥ जय वैष्णवी माता॥

१९. माँ गंगा जी की आरती

ॐ जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता। जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥ ॐ जय गंगे माता॥

चन्द्र सी जोत तुम्हारी, जल निर्मल आता। शरण पड़े जो तेरी, सो तर जाता॥ ॐ जय गंगे माता॥

शिव की जटा से निकलीं, भागीरथ लाते। सगर-पुत्र सब तारे, सुर-नर यश गाते॥ ॐ जय गंगे माता॥

हरिद्वार और काशी, तट पर तीरथ भारी। प्रयाग-राज में संगम, महिमा विस्तारी॥ ॐ जय गंगे माता॥

अस्थि फूल जब परसत, पावन तन होई। यम की फाँसी छूटत, नरक न यम जोई॥ ॐ जय गंगे माता॥

आरती मात तुम्हारी, जो नर-नारी गावे। पाप-ताप सब छूटत, विष्णु-लोक पावे॥ ॐ जय गंगे माता॥

२०. माँ तुलसी जी की आरती

जय जय तुलसी माता, सब जग की सुखदाता। सब योगिन की माता, सब भक्तन की त्राता॥ जय जय तुलसी माता॥

अच्युत-प्रिया सुरेखा, हरि-हृदय विलासिनी। वृन्दावन की रानी, राधा-उर-वासिनी॥ जय जय तुलसी माता॥

पत्र-मंजरी अर्पण, शालिग्राम सुहावै। कोटि-यज्ञ का फल प्रभु, छिन में पा जावै॥ जय जय तुलसी माता॥

गंगा-जल संग आवहु, प्रभु को भोग लगावै। बिन तुलसी हरि-भोजन, कबहूँ नहिं भावै॥ जय जय तुलसी माता॥

रोग-दोष-ताप-नाशिनी, पावन सुर-तरु रूपा। द्वार तिहारे दीप जले, मिटे तिमिर अनूपा॥ जय जय तुलसी माता॥

तुलसी महारानी की आरती, जो जन प्रेम से गावै। कृष्ण-कृपा की छाया, सो निसदिन पावै॥ जय जय तुलसी माता॥

२१. श्री राधारानी जी की आरती

आरती श्री वृषभानुसुता की, मंजुल मूर्ति मोहन मीता की॥

गौर-अंग पीतांबर सोहे, नूपुर धुनि त्रिभुवन मन मोहे। मृदु मुसुकानि नयन रस-भोरी, जय श्यामा जय राधे गोरी॥ आरती श्री वृषभानुसुता की...

कस्तूरी चन्दन उर राजै, नथनी ललित नासिका भ्राजै। अलकन की छबि लटपट प्यारी, बलिहारी ब्रज की सुकुमारी॥ आरती श्री वृषभानुसुता की...

रास-विलासिनी प्रेम-स्वरूपा, नित्य निकुंज की रूप-अनूपा। कृष्ण-प्राण-सर्वस्व सुहावै, नारद मुनि जेहि वंदन धावै॥ आरती श्री वृषभानुसुता की...

जो जन राधे-आरती गावै, कृष्ण-प्रेम-रस निर्मल पावै। कहत दास यह युगल-उपासना, मिट जावै भव-बन्धन-वासना॥ आरती श्री वृषभानुसुता की...

२२. जगज्जननी माँ सीता जी की आरती

आरती श्री जनक दुलारी की, सीता जी रघुवर प्यारी की॥

जनक-सुता अवधेश-वधूटी, पावन-प्रेम-पुनीत-प्रसूती। मिथिलेश-नन्दिनी राजत नीकी, छवि-धाम रघुपति के जी की॥ आरती श्री जनक दुलारी की...

कनक-कलेवर भूषण साजे, सिय-मुख देखि चन्द्रमा लाजे। राम-वाम-दिशि शोभित माता, सकल जगत की जीवन-दाता॥ आरती श्री जनक दुलारी की...

सती-शिरोमणि धीर-धुरन्धर, पातिव्रत-धर्म-धुर-सुन्दर। अनसूया-आशीष-सुहाई, सुर-नर-मुनि-वन्दित रघुराई॥ आरती श्री जनक दुलारी की...

जो जन सीता-आरती गावै, राम-भक्ति अविरल सो पावै। सकल अमंगल दूर नसावै, अंत काल वैकुण्ठ सिधावै॥ आरती श्री जनक दुलारी की...

२३. भगवान श्री नृसिंह देव की आरती

ॐ जय नरसिंह हरे, प्रभु जय नरसिंह हरे। स्तंभ फाड़ प्रभु प्रकटे, जन के ताप हरे॥ ॐ जय नरसिंह हरे॥

अद्भुत रूप सलोना, नर-केहरि साजा। दीनबंधु सुखदाता, भक्तन के राजा॥ ॐ जय नरसिंह हरे॥

नख से उदर विदार्यो, हिरण्यकशिपु मारा। देव-दनुज भय-भंजन, असुर-दल संहारा॥ ॐ जय नरसिंह हरे॥

प्रह्लाद-प्रतिपालक, करुणा के सिन्धु। अग्नि-खम्भ शीतल कियो, जग के सुख-बन्धु॥ ॐ जय नरसिंह हरे॥

गरजत गगन मण्डल, भय थर-थर कांपे। जो जन शरण तुम्हारी, संकट नहिं व्यापे॥ ॐ जय नरसिंह हरे॥

आरती जो नरसिंह की, मन वच क्रम गावे। शत्रु-भय सब छूटै, परम पद पावे॥ ॐ जय नरसिंह हरे॥

२४. माँ संतोषी माता की आरती

जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता। अपने सेवक जन की, सुख-संपति दाता॥ जय संतोषी माता॥

सुंदर चीर सुनहरी, माँ धारण कीन्हे। हीरा पन्ना दमके, मुकुट शीश दीन्हे॥ जय संतोषी माता॥

घंटा ताल मृदंगा, बाजत सहनाई। भक्त जनों के द्वारे, आनंद ऋतु आई॥ जय संतोषी माता॥

गुड़ और चना परम प्रिय, तामस परिहारी। खट्टे फल का वर्जन, नियम कृपा भारी॥ जय संतोषी माता॥

शुक्रवार व्रत साधे, कथा सुने नर-नारी। संतति संपति पावे, मिटे दरिद्र भारी॥ जय संतोषी माता॥

जो जन ध्यान लगावे, शरण तिहारी आवे। मनवांछित फल पाकर, सुख से दिन गावे॥ जय संतोषी माता॥

२५. भगवान श्री सूर्यनारायण जी की आरती

जय कश्यप-नन्दन, ॐ जय अदिति-नन्दन। त्रिभुवन-महिमा-मंडित, भक्त-हृदय-चन्दन॥ ॐ जय कश्यप-नन्दन॥

सप्त-अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी। दुःख-हारी, सुख-कारी, मानस-मल-हारी॥ ॐ जय कश्यप-नन्दन॥

अरुण सारथी आगे, किरण-प्रभा फैले। नभ-मंडल आलोकित, तम का बल ढीले॥ ॐ जय कश्यप-नन्दन॥

कमल-पुष्प कर शोभित, तेज महा भारी। वेद-ऋचाएं गातीं, महिमा तव सारी॥ ॐ जय कश्यप-नन्दन॥

नेत्र-रोग हरता तुम, जीवन-रस-दाता। सृष्टि के आधारक, जग के अन्नदाता॥ ॐ जय कश्यप-नन्दन॥

आरती जो नर गावे, सूर्य-कृपा पावे। आयु-आरोग्य-सुयश का, अनुपम वर पावे॥ ॐ जय कश्यप-नन्दन॥

२६. भगवान चित्रगुप्त जी की आरती

ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामी जय चित्रगुप्त हरे। भक्त जनों के संशय, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय चित्रगुप्त हरे॥

ब्रह्मा की काया से, प्रगट भए देवा। लेखनी-मसिभाजन कर, सुर-नर करें सेवा॥ ॐ जय चित्रगुप्त हरे॥

कर्म-अकर्म का लेखा, धर्म-अधर्म विचारा। न्याय-अदालत राजे, प्रभुवर गुण-गारा॥ ॐ जय चित्रगुप्त हरे॥

यम-सभा के सचिव, सब जग के ज्ञाता। पुण्यवान को मुक्ति, पापी फल-दाता॥ ॐ जय चित्रगुप्त हरे॥

दवा-कलम कर शोभित, निर्मल चित्त स्वामी। शरणागत प्रतिपालक, अंतर के यामी॥ ॐ जय चित्रगुप्त हरे॥

आरती चित्रगुप्त जी की, जो कोई जन गावे। यम-यातना न देखे, धर्म-लोक पावे॥ ॐ जय चित्रगुप्त हरे॥

२७. धनाध्यक्ष श्री कुबेर देव जी की आरती

ॐ जय यक्ष कुबेरा, स्वामी जय यक्ष कुबेरा। शिव-सखा जग-पालक, संकट हरो मेरा॥ ॐ जय यक्ष कुबेरा॥

अलकापुरी के राजा, उत्तर-दिशि स्वामी। नव-निधियों के नायक, वैभव-अनुगामी॥ ॐ जय यक्ष कुबेरा॥

किन्नर-यक्ष-समन्वित, गदा-पात्र धारी। पुष्पक-यान विराजत, महिमा अति भारी॥ ॐ जय यक्ष कुबेरा॥

शिव-तप कीन्हा भारी, धनपति पद पायो। माता पार्वती ने, नयन-वरष चायो॥ ॐ जय यक्ष कुबेरा॥

अक्षय कोष तिहारे, कभी न रीता होई। जो जन ध्यावे तुमको, दुखी रहे न कोई॥ ॐ जय यक्ष कुबेरा॥

आरती कुबेर देव की, जो नर-नारी गावे। अष्ट-सिद्धि-नवनिधि का, घर में वास बनावे॥ ॐ जय यक्ष कुबेरा॥

२८. देवसेनापति भगवान श्री कार्तिकेय जी की आरती

जय जय सुरनायक, जन-सुखदायक, कार्तिकेय स्वामी। शिव-उमा के नन्दन, षडानन, अंतर्यामी॥ जय जय सुरनायक...

मयूर-वाहन सोहे, शक्ति-अस्त्र हाथा। तारकासुर-मर्दन, देवों के त्राता॥ जय जय सुरनायक...

छह मुख तेज विराजे, बाल-सुलभ रूपा। क्रौञ्च-शैल-विदारक, महिमा अति अनूपा॥ जय जय सुरनायक...

स्कन्द-प्रभो दयाला, असुर-दल-संहारी। ऋषि-मुनि वन्दन करते, जय-जय त्रिपुरारी॥ जय जय सुरनायक...

जो जन कार्तिकेय की, आरती नित गावे। शौर्य, विजय और तेजस, सहजहिं सो पावे॥ जय जय सुरनायक...

२९. भगवान धन्वन्तरि जी की आरती

ॐ जय धन्वन्तरि देवा, स्वामी जय धन्वन्तरि देवा। जरा-रोग-निवारक, सुर-नर-मुनि-सेवा॥ ॐ जय धन्वन्तरि देवा॥

क्षीर-सिन्धु से प्रगटे, हाथ सुधा-कुम्भा। अमृत-वितरण कीन्हा, दूर करी दम्भा॥ ॐ जय धन्वन्तरि देवा॥

शंख, चक्र, जलौका, औषधि कर धारी। दिव्य-कांति-मय मूरति, त्रिभुवन-हितकारी॥ ॐ जय धन्वन्तरि देवा॥

आयुर्वेद-विधाता, स्वास्थ्य-प्रदाता तुम। अकाल-मृत्यु-निवारक, व्याधि-विनाशन तुम॥ ॐ जय धन्वन्तरि देवा॥

कार्तिक-कृष्ण-त्रयोदशी, जो जन वंदन कीन्ह। काया-कंचन पाई, सब सुख प्रभु दीन्ह॥ ॐ जय धन्वन्तरि देवा॥

आरती धन्वन्तरि की, जो नर-नारी गावे। दीर्घायु-आरोग्य का, अनुपम फल पावे॥ ॐ जय धन्वन्तरि देवा॥

३०. माँ अन्नपूर्णा जी की आरती

बारम्बार प्रणाम, मैया बारम्बार प्रणाम। जो सुलझावे सब जग के, उलझे बिगड़े काम॥ बारम्बार प्रणाम...

काशी की महारानी, भिक्षा शिव दीन्ही। सकल चराचर जग की, तूने तृप्ति कीन्ही॥ बारम्बार प्रणाम...

स्वर्ण-पात्र कर सोहे, रत्न-जड़ित झारी। अन्न-धन्य से भरती, तू सबकी थारी॥ बारम्बार प्रणाम...

ऋद्धि-सिद्धि की दात्री, कल्याणी माता। जो ध्यावे सो पावे, तू भाग्य-विधाता॥ बारम्बार प्रणाम...

क्षुधा-व्याधि सब हरती, तू करुणामयी अम्बा। दीन-हीन के घर में, बन जाती अवलम्बा॥ बारम्बार प्रणाम...

माँ अन्नपूर्णा की आरती, जो कोई नित गावे। अन्न-वस्त्र की कमी न, जीवन में आवे॥ बारम्बार प्रणाम...

३१. माँ शीतला माता की आरती

जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता। आदि-ज्योति कल्याणी, भक्तन सुखदाता॥ जय शीतला माता॥

गर्दभ-वाहन सोहे, कर में झाड़ू-सूप। कलश-शीत-जल धारे, पावन निर्मल रूप॥ जय शीतला माता॥

ज्वर-विस्फोटक हरती, ताप-शमन करती। शीतल अमृत बरसे, विपदा सब हरती॥ जय शीतला माता॥

बासी अन्न निवेद्य, शीतलता पावे। नेत्र-रोग कट जाते, जो शरने आवे॥ जय शीतला माता॥

चैत्र-मास की अष्टमी, मेला जो भरता। पुत्र-पौत्र-सुख पावे, संकट सब टलता॥ जय शीतला माता॥

आरती जो शीतला की, प्रेम सहित गावे। काया कंचन होवे, रोग निकट नहिं आवे॥ जय शीतला माता॥

३२. भगवान श्री परशुराम जी की आरती

ॐ जय परशुधारी, प्रभु जय परशुधारी। रेणुका-नन्दन प्रभुवर, जय मुनि-आभारी॥ ॐ जय परशुधारी॥

जमदग्नि के सुत प्यारे, पितृ-आज्ञा-पालक। अक्षय-तेज-समन्वित, जग के प्रतिपालक॥ ॐ जय परशुधारी॥

परशु हाथ में सोहे, धनुष-बाण धारे। सहस्रबाहु-मद-हारी, दुष्ट-नृपति मारे॥ ॐ जय परशुधारी॥

इक्कीस बार धरा से, क्षत्रिय-मद खोया। कश्यप को महि दान दई, धर्म-बीज बोया॥ ॐ जय परशुधारी॥

महेन्द्र-पर्वत वासी, चिरंजीवी स्वामी। ब्राह्मण-कुल-रक्षक प्रभु, त्रिभुवन-गामी॥ ॐ जय परशुधारी॥

आरती जो परशुराम की, नियम सहित गावे। शौर्य, ज्ञान और विजय, जीवन में पावे॥ ॐ जय परशुधारी॥

३३. भगवान श्री जगन्नाथ जी की आरती

जय जगन्नाथ हरे, प्रभु जय जगन्नाथ हरे। नीलांचल-शिरोमणि, भक्तन ताप हरे॥ जय जगन्नाथ हरे॥

सुभद्रा-बलभद्र संग, रत्न-सिंहासन। दारु-ब्रह्म-तन धारी, करुणामय लोचन॥ जय जगन्नाथ हरे॥

रथ-यात्रा जब निकले, जन-गण उमड़ पड़े। नंदिघोष रथ साजे, सुर-नर द्वारे खड़े॥ जय जगन्नाथ हरे॥

पतित-पावन महाप्रभु, छप्पन-भोग लगे। महाप्रसाद जो पावे, सोए भाग्य जगे॥ जय जगन्नाथ हरे॥

बांकी चितवन प्यारी, जग-जीवन-त्राता। कलयुग के प्रत्यक्ष हरि, मुक्ति के दाता॥ जय जगन्नाथ हरे॥

आरती जगन्नाथ की, जो कोई जन गावे। भव-बन्धन कट जावे, श्रीहरि-पद पावे॥ जय जगन्नाथ हरे॥

३४. पुण्यतोया माँ नर्मदा जी की आरती

ॐ जय नर्मदा माता, मैया जय नर्मदा माता। रेवा-रूप अनूपा, सब जग सुखदाता॥ ॐ जय नर्मदा माता॥

अमरकण्टक से निकलीं, मेकल-सुता प्यारी। कल-कल नाद सुनावे, महिमा विस्तारी॥ ॐ जय नर्मदा माता॥

कंकड़ सब शंकर हैं, दर्शन अघ-हारी। तट पर ऋषि-मुनि बैठे, जपते त्रिपुरारी॥ ॐ जय नर्मदा माता॥

उलटि धार भी बहे, अद्भुत प्रभु-लीला। जल-स्पर्श से पावन, होवे मन-ढीला॥ ॐ जय नर्मदा माता॥

परिक्रमा जो करते, श्रद्धा-भाव धरे। पितर तरें कुल-सहित, भव-सागर उतरे॥ ॐ जय नर्मदा माता॥

आरती नर्मदा मैया की, जो नर-नारी गावे। अन्त-काल वैकुण्ठ में, पावन पद पावे॥ ॐ जय नर्मदा माता॥

३५. माँ विन्ध्येश्वरी जी की आरती

सुनु मेरी देवी परबतवासिनी, कोई न जाने तेरा भेद भवानी। सब पर कृपा तू करती माता, त्रिभुवन-तारिणी जग-कल्याणी॥

विन्ध्याचल पर्वत पर मंदिर, मणियुक्त छत्र शीश पर राजै। सिंह-सवारी करती अम्बा, बाजत शंख मृदंग झांझै॥ सुनु मेरी देवी परबतवासिनी...

महिषासुर-मर्दिनी कल्याणी, रक्तबीज का रक्त पिया। देव-मुनि सब शरण पुकारे, निर्भय-दान सबन को दिया॥ सुनु मेरी देवी परबतवासिनी...

त्रिकोण-यंत्र में वास तिहारा, लक्ष्मी, काली, सरस्वती रूपा। जो जन आवे विन्ध्य-शिखर पर, पावे भक्ति-मुक्ति अनूपा॥ सुनु मेरी देवी परबतवासिनी...

जो जन ध्यान धरे निसवासर, संकट उसका दूर बहावे। कहत 'छत्रधर' दास तुम्हारा, जन्म-मरण का कष्ट मिटावे॥ सुनु मेरी देवी परबतवासिनी...

३६. सृष्टिकर्ता भगवान श्री ब्रह्मा जी की आरती

पितु मातु सहायक स्वामी सखा, तुम ही एक नाथ हमारे हो। जिनके कछु और अधार नहीं, तिनके तुम ही रखवारे हो॥

प्रतिपाल करो सब जीवजंतन को, सब के दुख-दारिद टारत हो। चतुरानन हंस-सवारी भली, कमंडलु पुस्तक धारत हो॥ पितु मातु सहायक स्वामी सखा...

सृष्टि-विधाता ज्ञान के दाता, सत्य सनातन रूप प्रभो। ऋषि-मुनि सुर नर ध्यावत निसदिन, जग के आदि स्वरूप विभो॥ पितु मातु सहायक स्वामी सखा...

पुष्कर-तीर्थ विराजे ब्रह्मा, भक्त जनों के काज सरे। आरती जो ब्रह्मा जी की गावे, ताके सकल कलेश हरे॥ पितु मातु सहायक स्वामी सखा...

३७. श्री रामायण जी की पावन आरती

आरती श्रीरामायन जी की। कीरति कलित ललित सिय पी की॥

गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बालमीक बिग्यान बिसारद। सूक सनकादिक सेष सुसारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥ आरती श्रीरामायन जी की...

गावत संतत संभु भवानी। अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी। ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी। कागभुसुंडि गरुड़ के ही की॥ आरती श्रीरामायन जी की...

कलिमल हरनि बिषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की। दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मातु सब बिधि तुलसी की॥ आरती श्रीरामायन जी की...

३८. श्रीमद्भागवत भगवान की आरती

आरती बाल कृष्ण की कीजै, अपनो जनम सुफल करि लीजै॥ श्री भागवत भगवान की है आरती, पापियों को पाप से है तारती॥

ये अमर ग्रंथ, ये मुक्ति पंथ, ये पंचम वेद निराला। नव ज्योति जगाने वाला; हरि नाम यही, हरि धाम यही, यही जग के मंगल की आरती॥ श्री भागवत भगवान की है आरती...

ये शान्ति गीत, पावन पुनीत, पापों को मिटाने वाला। हरि दर्श कराने वाला; यह सुखकरणी, यह दुखहरणी, श्रीमधुसूदन की आरती॥ श्री भागवत भगवान की है आरती...

मधुर बोल, जग फंद खोल, सन्मार्ग बताने वाला। बिगड़ी को बनाने वाला; श्रीराम यही, घनश्याम यही, प्रभु की महिमा की आरती॥ श्री भागवत भगवान की है आरती...

३९. श्री गोवर्धन महाराज की आरती

तेरे माथे मुकुट विराज रह्यौ, तोपे सोहे री चुनरी लाल लाल। गोवर्धन महाराज, ओ महाराज, तेरे माथे मुकुट विराज रह्यौ॥

तोपे पान चढ़े तोपे फूल चढ़े, तोपे चढ़े दूध की धार धार। गोवर्धन महाराज, ओ महाराज, तेरे माथे मुकुट विराज रह्यौ॥

तेरी सात कोस की परिकम्मा, अरु मानसी गंगा ताल ताल। गोवर्धन महाराज, ओ महाराज, तेरे माथे मुकुट विराज रह्यौ॥

राधा-कुण्ड श्याम-कुण्ड सोहे, मुखारबिन्द पै गुलाल लाल। गोवर्धन महाराज, ओ महाराज, तेरे माथे मुकुट विराज रह्यौ॥

जो नर तोरी पूजा करहिं, तिनके कटत कलेश काल काल। गोवर्धन महाराज, ओ महाराज, तेरे माथे मुकुट विराज रह्यौ॥

४०. श्री युगल किशोर जी की आरती

आरती युगल किशोर की कीजै, तन-मन-धन न्योछावर कीजै॥

गौर श्याम मुख निरखन लीजै, हरि का रूप नयन भरि पीजै। रवि-शशि कोटि-बदन छबि छीजै, ऐसी रूप-रासि कहँ लीजै॥ आरती युगल किशोर की कीजै...

सिर मुर-मुकुट कुंडल झलकावै, लकुटि पीत-पट चन्द्रावै। मुरली अधर मधुर सुर गावै, राधा-रमन कहि चित्त लुभावै॥ आरती युगल किशोर की कीजै...

कंचन-थाल कपूर की बाती, आरती करत सकल ब्रज-थाती। युगल चरण पर मन बलिहारी, दासोदास शरण बलिहारी॥ आरती युगल किशोर की कीजै...

४१. भगवान श्री बद्रीनाथ जी की आरती

पवन मंद सुगंध शीतल, हेम मंदिर शोभितम्। निकट गंगा बहत निर्मल, श्रीबद्रीनाथ विश्वम्भरम्॥

शेष नेत्र फिरे निसदिन, ध्यावत नारद शारदा। छत्र चामर धूप दीप, आरती कर शंभु देवा॥ पवन मंद सुगंध शीतल...

कोटि तीरथ बसत चरणन, सुलभ दर्शन पापनाशनम्। अलकनंदा तट विराजे, मुक्ति-दाता नारायणम्॥ पवन मंद सुगंध शीतल...

आरती बद्रीनाथ जी की, जो पढ़े मन शुद्ध से। पाप-ताप समूल नाशे, मुक्ति पावे यत्न से॥ पवन मंद सुगंध शीतल...

४२. भगवान श्री केदारनाथ जी की आरती

जय केदार उदार शंकर, मस्तक मुकुट सुशोभितम्। भाल चंद्र विशाल लोचन, नाग-हार विभूषितम्॥

कंठ सोहत रुंड-माला, जटा निर्मल गंग-धार। बाघम्बर तन भस्म लेपन, नंदी वाहन सुखकार॥ जय केदार उदार शंकर...

मंदाकिनी तट शोभित स्वामी, केदार-खंड विराजते। अगम-निगम सब महिमा गावे, भक्त-संकट भंजते॥ जय केदार उदार शंकर...

आरती जो केदार की, प्रेम सहित नित्य गावे। भूत-बाधा दूर भागे, अंत शिव-पद पावे॥ जय केदार उदार शंकर...

४३. भगवान श्री महाकालेश्वर जी की आरती

जय महाकाल कालों के काल, क्षिप्रा तट पर वास तुम्हारा। उज्जयिनी के राजा स्वामी, कोटि-सूर्य सम तेज उज्यारा॥

भाल पर भस्म त्रिपुंड विराजे, कंठ हलाहल धार कियो। नागेंद्र हार भुजंग लपेटे, भक्त जनों का काज कियो॥ जय महाकाल कालों के काल...

भस्म-आरती भोर में होती, डम-डम डमरू बाजत भारी। भूत-पिशाच निकट नहिं आवें, भय नाशे त्रिपुरारी॥ जय महाकाल कालों के काल...

आरती महाकाल की गावे, अकाल मृत्यु से सो छूटे। सुख-सम्पत्ति वैराग्य मिले, भव-बंधन का फंदा टूटे॥ जय महाकाल कालों के काल...

४४. ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ जी की आरती

जय सोमनाथ सुरनायक, जय जय सुखदाता। प्रथम ज्योतिर्लिंग देवा, त्रिभुवन-ख्याता॥

चंद्र-कलंक मिटायो प्रभु जी, सागर तट राजो। अमृत-मय जल धार बहे, शंख-नाद बाजो॥ जय सोमनाथ सुरनायक...

पार्वती सँग शोभित स्वामी, नंदी पर आसन। दर्शन से अघ कटत हैं, मिटत जन्म-त्रासन॥ जय सोमनाथ सुरनायक...

आरती जो सोमनाथ की, प्रभाते जो गावे। सोम-समान कांति पाकर, शिव-सायुज्य पावे॥ जय सोमनाथ सुरनायक...

४५. ज्योतिर्लिंग श्री ओंकारेश्वर जी की आरती

ॐ जय ओंकारा, प्रभु जय ओंकारा। नर्मदा-मध्य विराजे, ज्योतिर्लिंग उज्यारा॥ ॐ जय ओंकारा...

मांधाता शैल सुहावन, ॐकार आकृति धारे। ममलेश्वर संग विराजे, पातक-मल वारे॥ ॐ जय ओंकारा...

पंचामृत अभिषेक होत नित, बिल्व-पत्र छाए। सुर-गंधर्व आरती गावत, मंगल-यश छाए॥ ॐ जय ओंकारा...

जो जन ओंकारेश्वर आवे, नर्मदा-स्नान करे। ताके जीवन के सब कष्ट, शिव हरण करे॥ ॐ जय ओंकारा...

४६. ज्योतिर्लिंग श्री त्र्यंबकेश्वर जी की आरती

जय त्र्यंबक देवा, प्रभु जय त्र्यंबक देवा। ब्रह्मा-विष्णु-महेश रूप, सुर करें सेवा॥ जय त्र्यंबक देवा...

गौतमी-तट पर प्रकटे, पावन गंगा-धारी। गौतम ऋषि की तपस्या, पूरी की त्रिपुरारी॥ जय त्र्यंबक देवा...

कुण्डली-नाग-विभूषित, त्रि-नेत्र विशाला। कुशवर्त तीर्थ-महिमा, त्रिभुवन उजियाला॥ जय त्र्यंबक देवा...

कालसर्प-दोष नाशे, पितृ-ऋण हारे। जो त्र्यंबक-आरती गावे, सो सब कुल तारे॥ जय त्र्यंबक देवा...

४७. ज्योतिर्लिंग श्री काशी विश्वनाथ जी की आरती

जय विश्वनाथ दयाल शम्भो, काशी-पति त्रिपुरारि। मणिकर्णिका तट राजते, मस्तक जटा-विस्तारि॥

अन्नपूर्णा संग विराजे, मुक्ति-धाम के दाता। तारक-मंत्र सुनावही, हर-हर बम-बम गाता॥ जय विश्वनाथ दयाल शम्भो...

गंगा-धार बहे पावन, ज्ञान-वापी सुख-धाम। दर्शन मात्र से छूटत हैं, यम-फाँसी के काम॥ जय विश्वनाथ दयाल शम्भो...

आरती काशी-नाथ की, जो जन नित्य गावे। अन्त समय में मुक्ति मिले, शिव-सालोक्य पावे॥ जय विश्वनाथ दयाल शम्भो...

४८. ज्योतिर्लिंग श्री वैद्यनाथ जी की आरती

जय वैद्यनाथ कृपालु देवा, रावण-पूजित स्वामी। संजीवनी-जल धार बरसे, अन्तर के यामी॥

रोग-दोष-निवारक स्वामी, शिव-गंगा तट वासी। कामना-लिंग मनोहर, दर्शन पातक-नाशी॥ जय वैद्यनाथ कृपालु देवा...

कांवड़-धार चढ़े जल निर्मल, बोलत बम-बम भोला। मनोकामना पूरण करते, भरते झोली-झोला॥ जय वैद्यनाथ कृपालु देवा...

आरती जो बैजनाथ की, श्रद्धा सहित गावे। काया कंचन हो जावे, परम शांति पावे॥ जय वैद्यनाथ कृपालु देवा...

४९. ज्योतिर्लिंग श्री रामेश्वरम जी की आरती

जय रामेश्वर देवा, प्रभु जय रामेश्वर देवा। श्रीराम-प्रतिष्ठित लिंगा, सुर-नर करें सेवा॥

धनुषकोटि तट पावन, सागर-संगम साजे। सेतुबन्ध-अधिपति शिव, त्रिभुवन यश गाजे॥ जय रामेश्वर देवा...

इक्कीस कुण्ड स्नान महा, पातक-मल-हारी। ब्रह्महत्या-दोष मिटायो, जय जय अविकारी॥ जय रामेश्वर देवा...

आरती रामेश्वर की, जो जन नित गावे। राम-भक्ति संग शिव-कृपा, सहजहिं सो पावे॥ जय रामेश्वर देवा...

५०. भगवान श्री वेंकटेश्वर (तिरुपति बालाजी) की आरती

जय वेंकटेशा, नमो तिरुपति वासा। शेष-शैल-शिरोमणि, पूरण कर आसा॥

शंख-चक्र कर शोभित, पद्मावती-नाथा। कलि-मल-भंजन स्वामी, सब जग के त्राता॥ जय वेंकटेशा...

सुवर्ण-विमान विराजे, दिव्य कांति न्यारी। लड्डू-प्रसाद महातम, त्रिभुवन हितकारी॥ जय वेंकटेशा...

आरती जो बालाजी की, प्रेम सहित गावे। अचल सम्पत्ति पावे, संकट नहिं आवे॥ जय वेंकटेशा...

५१. भगवान श्रीनाथ जी की आरती

जय श्रीनाथ दयाल मुरारी, नाथद्वारा वासी। उठाए गोवर्धन गिरिधारी, ब्रज-जन-सुख-रासी॥

कमल-नयन अति सुंदर, अधरन मुरली साजे। सात स्वरूप मनोहर, झांझ-पखावज बाजे॥ जय श्रीनाथ दयाल मुरारी...

अंग-अंग शृंगार सुहावे, हीरे-मोती दमके। वल्लभ-कुल-आनंद-कंद, मुख-छवि भाल चमके॥ जय श्रीनाथ दयाल मुरारी...

आरती जो श्रीनाथ की, नियम से नित गावे। अष्टछाप-रस-भक्ति को, सहजहिं सो पावे॥ जय श्रीनाथ दयाल मुरारी...

५२. भगवान श्री विट्ठल (पांडुरंग) की आरती

युगे अठ्ठावीस विटेवरी उभा, वामांगी रखुमाई दिसे दिव्य शोभा। पुंडलिकाचे भेटी परब्रह्म आले, चंद्रभागेमाजी स्नान जे जाहले॥ जय देव जय देव जय पांडुरंगा, रखुमाईवल्लभा राहीच्या वल्लभा पावे जिवलगा॥

तुळसी माळा गळा कर ठेवूनि कटी, कासे पीतांबर कस्तुरी लल्लाटी। देव सुरवर नित्य येती भेटी, गरुड हनुमंत पुढे उभे राहती॥ जय देव जय देव जय पांडुरंगा...

धन्य वेणुनाद अनुक्षेत्र पावन, सुवर्ण कमळे शोभती चरणी अर्पण। तुका म्हणे माझे हेचि सुख थोर, विठ्ठल देखिला सर्व सुखाचे सार॥ जय देव जय देव जय पांडुरंगा...

५३. भगवान श्री दत्तात्रेय जी की आरती

त्रिगुणात्मक त्रिमूर्ति दत्त हा जाणा, त्रिगुणी अवतार त्रैलोक्य-राणा। अत्रि-अनसूया-सुत, ब्रह्मा-विष्णु-शिवा। चार श्वान संग सोहे, कामधेनु जीवा॥ जय देव जय देव जय श्री गुरुदत्ता, आरती ओवालूं सद्गुरु चित्ता॥

औदुंबर-तरु-वासी, भिक्षा-पात्र धारी। गिरनार-शिखर-राजत, सिद्धन-सुखकारी॥ जय देव जय देव जय श्री गुरुदत्ता...

आरती जो दत्तात्रेय की, एकाग्र मन गावे। सकल सिद्धियाँ पाकर, आवागमन नशावे॥ जय देव जय देव जय श्री गुरुदत्ता...

५४. भगवान श्री विश्वकर्मा जी की आरती

जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, सकल सृष्टि-शिल्पी। गज-वाहन कर सोहे, गज-दण्ड विकल्पी॥

स्वर्ण-लंका द्वारका, स्वर्ग-भवन साजे। यंत्र-शस्त्र के दाता, त्रिभुवन यश गाजे॥ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु...

शिल्प-शास्त्र-प्रणेता, भुवन-सुत सुखकारी। सकल कला के ज्ञाता, सुर-नर उपकारी॥ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु...

आरती विश्वकर्मा की, जो कोई जन गावे। व्यापार और शिल्प में, रिद्धि-सिद्धि पावे॥ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु...

५५. भगवान श्री वराह देव की आरती

जय जय वराह हरि, भूधर असुरारी। प्रलय-पयोधि-उद्धारक, महिमा अति भारी॥

हिरण्याक्ष असुर संहारे, दंष्ट्रा पर पृथ्वी लीन्ही। वेद-ऋचा सब रक्षा कीन्ही, अभय-दान दीन्ही॥ जय जय वराह हरि...

विशालकाय दिव्य रूप, करुणा-मय त्राता। यज्ञ-वराह कहलाए, जग के सुखदाता॥ जय जय वराह हरि...

आरती जो वराह जी की, नियम सहित गावे। भूमि-भवन-सुख पावे, संकट नहिं आवे॥ जय जय वराह हरि...

५६. भगवान श्री वामन देव की आरती

जय वामन रूपा, प्रभु जय वामन रूपा। कश्यप-अदिति-नन्दन, महिमा अति अनूपा॥ जय वामन रूपा...

छत्र कमण्डलु हाथ धरे, बटुक ब्रह्मचारी। राजा बलि के यज्ञ में, पधारे सुखकारी॥ जय वामन रूपा...

तीन डग भूमि मांगी, नापी त्रिभुवन सारी। बलि को पाताल पठायो, कृपा करी भारी॥ जय वामन रूपा...

आरती वामन देव की, जो नर नित गावे। अहंकार मिट जावे, प्रभु-भक्ति पावे॥ जय वामन रूपा...

५७. भगवान श्री मत्स्य देव की आरती

जय मत्स्य अवतारी, प्रभु जय मत्स्य अवतारी। प्रलय-सिन्धु से नाव उबारी, वेदों के त्राता॥

हयग्रीव असुर संहारे, ज्ञान-प्रदीप कियो। सत्यव्रत मुनि संग लए, भव-भय हर लियो॥ जय मत्स्य अवतारी...

मीन रूप अति पावन, जल-विहार स्वामी। प्रथम अवतार मनोहर, जग-अन्तर्यामी॥ जय मत्स्य अवतारी...

आरती जो मत्स्य प्रभु की, प्रेम सहित गावे। विपदा-सिन्धु से तरकर, परम धाम पावे॥ जय मत्स्य अवतारी...

५८. भगवान श्री कूर्म देव की आरती

जय कूर्म स्वरूपा, प्रभु जय कूर्म स्वरूपा। मन्दराचल धारक स्वामी, लीला अति अनूपा॥

समुद्र-मंथन बेला, पीठ पे पर्वत राख्यो। चौदह रत्न प्रगट भए, अमृत सुर चाख्यो॥ जय कूर्म स्वरूपा...

धैर्य-धुरन्धर देवा, कच्छप-तन धारी। देव-दनुज भय-हारी, जय जय श्री हरि॥ जय कूर्म स्वरूपा...

आरती जो कूर्म देव की, श्रद्धा से गावे। जीवन में स्थिरता आवे, मोक्ष सहज पावे॥ जय कूर्म स्वरूपा...

५९. भगवान श्री बलराम जी की आरती

आरती कीजै हलधर वीर की। रोहिणी-नन्दन श्याम-सखा की॥

कंधे सोहे हल और मूसल, बल के भारी धाता। रेवती-रमन जग-हितकारी, भक्तन के सुखदाता॥ आरती कीजै हलधर वीर की...

शेष-अंश अवतारी प्रगटे, ब्रज-भूमि के त्राता। धनुष-यज्ञ में कंस-दल, पल में संहर्ता॥ आरती कीजै हलधर वीर की...

आरती हलधर जी की, जो नर-नारी गावे। बल-बुद्धि-तेज पावे, भय निकट न आवे॥ आरती कीजै हलधर वीर की...

६०. भगवान श्री कल्कि देव की आरती

जय कल्कि दयाला, प्रभु जय कल्कि दयाला। कलि-मल-दलन प्रगट होगे, खड्ग-धार कृपाला॥

देवदत्त हय-वाहन, श्वेत-अश्व सोहे। म्लेच्छ-दल संहारक, त्रिभुवन मन मोहे॥ जय कल्कि दयाला...

सत्ययुग की स्थापना, धर्म-पुनरुद्धारक। सम्भल-ग्राम-समुद्भव, जन-हित-प्रतिपालक॥ जय कल्कि दयाला...

आरती कल्कि देव की, जो गावे नर धीरा। कलि के दोष न व्यापें, मिटे सकल पीरा॥ जय कल्कि दयाला...

६१. जगज्जननी माँ पार्वती जी की आरती

जय पार्वती माता, मैया जय पार्वती माता। ब्रह्म सनातन देवी, शुभ-फल की दाता॥ जय पार्वती माता॥

हिमगिरि-राज दुलारी, शिव-मन-उल्लासा। गणपति-कार्तिकेय माता, पूरण कर आसा॥ जय पार्वती माता॥

सिंह-सवारी सोहे, त्रिशूल-डमरू धारे। महिषासुर आदि दानव, पल में संहारे॥ जय पार्वती माता॥

अखंड सुहाग प्रदायिनि, जो ध्यावे सो पावे। रिद्धि-सिद्धि भंडार भरे, सब दुख मिट जावे॥ जय पार्वती माता॥

आरती पार्वती मैया की, जो जन नित गावे। सदा सुहागन रहवे, सुख-वैभव पावे॥ जय पार्वती माता॥

६२. माँ बगलामुखी (पीताम्बरा) जी की आरती

जय जय श्री बगलामुखी माता, पीताम्बर धारी। शत्रु-बुद्धि-विनाशिनी, जय जय कल्याणी॥

पीत-वसन पीत-भूषण, पीत-पुष्प माला। मुद्गर कर में सोहे, रूप महा विशाला॥ जय जय श्री बगलामुखी...

जिह्वा खींच असुर की, मुद्गर से मारे। भक्त जनों पर दया करी, संकट सब टारे॥ जय जय श्री बगलामुखी...

वाद-विवाद विजयिनी, स्तम्भन-शक्ति-रूपा। जो जन शरण तुम्हारी, पावे पद अनूपा॥ जय जय श्री बगलामुखी...

आरती बगलामुखी की, जो नर नित गावे। शत्रु-भय सब नाशे, विजय सदा पावे॥ जय जय श्री बगलामुखी...

६३. माँ चामुण्डा देवी की आरती

जय चामुण्डा माता, मैया जय चामुण्डा माता। चण्ड-मुण्ड संहारिणी, त्रिभुवन सुखदाता॥ जय चामुण्डा माता॥

अट्टहास मुख करतीं, खड्ग-खप्पर सोहे। रक्तबीज का रक्त पियो, सुर-मुनि मन मोहे॥ जय चामुण्डा माता॥

व्याघ्र-चर्म परिधाना, नरमुंडों की माला। दुष्ट-दलन कल्याणी, रूप महा विकराला॥ जय चामुण्डा माता॥

आरती चामुण्डा की, जो जन नित गावे। भूत-प्रेत भय छूटे, परम अभय पावे॥ जय चामुण्डा माता॥

६४. माँ ललिता त्रिपुर सुन्दरी जी की आरती

जय त्रिपुर सुन्दरी माता, श्री ललिता अम्बा। षोडशी राज-राजेश्वरी, जग की अवलम्बा॥

श्रीचक्र-निवासिनी, कामेश्वर-संगी। इक्षु-धनुष शर-पाशांकुश, धारत बहुरंगी॥ जय त्रिपुर सुन्दरी माता...

करुणा-रस की सागर, मुक्ति-भुक्ति दात्री। भण्डासुर संहारिणी, पावन सुर-धात्री॥ जय त्रिपुर सुन्दरी माता...

आरती ललिता देवी की, जो नर-नारी गावे। सकल मनोरथ पूरण, दिव्य कृपा पावे॥ जय त्रिपुर सुन्दरी माता...

६५. भगवती माँ तारा देवी की आरती

जय जय तारा माता, मैया तारिणि कल्याणी। भव-सागर से तारत, महा-विद्या मानी॥

नील-वर्ण तन सोहे, खड्ग-खप्पर हाथा। अक्षोभ्य-शिरो-धारिणी, जग की सुखदाता॥ जय जय तारा माता...

उग्र-तपस्या-तुष्टा, श्मशान-वासिनी अम्बा। दीन-हीन बालक की, बन जाती अवलम्बा॥ जय जय तारा माता...

आरती तारा मैया की, जो श्रद्धा से गावे। अकाल-मृत्यु मिट जावे, परम ज्ञान पावे॥ जय जय तारा माता...

६६. शक्तिपीठ माँ कामाख्या देवी की आरती

जय कामाख्या माता, मैया जय कामाख्या माता। नीलाचल पर वास तिहारा, त्रिभुवन विख्याता॥ जय कामाख्या माता॥

योनि-पीठ कल्याणी, महामाया रूपा। काम-रूप की देवी, महिमा अति अनूपा॥ जय कामाख्या माता॥

सर्व-मनोरथ-पूरक, रक्त-वस्त्र सोहे। दर्शन मात्र से मैया, भव-बन्धन खोहे॥ जय कामाख्या माता॥

आरती कामाख्या की, जो कोई जन गावे। तन्त्र-मन्त्र-सिद्धि पाकर, सब संकट नसावे॥ जय कामाख्या माता॥

६७. माँ शाकम्भरी देवी की आरती

जय शाकम्भरी माता, मैया जय शाकम्भरी माता। अन्न-शाक की दात्री, जग-जीवन-त्राता॥ जय शाकम्भरी माता॥

सौ नेत्रों से रोई, जब सुखा अकाल पड़ा। शाक-कन्द-फल देकर, जन-कल्याण बड़ा॥ जय शाकम्भरी माता॥

दुर्गमासुर-संहारिणी, दुर्गा-रूप धरी। भक्तन की अरजी पर, सब विपदा हरी॥ जय शाकम्भरी माता॥

आरती शाकम्भरी की, जो नर-नारी गावे। धन-धान्य की कमी न, जीवन में आवे॥ जय शाकम्भरी माता॥

६८. माँ कालिन्दी (यमुना जी) की आरती

ॐ जय यमुना माता, मैया जय यमुना माता। सूर्य-सुता कल्याणी, पातक-मल-त्राता॥ ॐ जय यमुना माता॥

श्याम-वरण जल सोहे, मन्द-मन्द धावे। मथुरा-गोकुल-तट पर, लीला-रस पावे॥ ॐ जय यमुना माता॥

यम की भगिनी तुम हो, यम-त्रास निवारति। स्नान करे जो कोई, ताकी पीरा टारति॥ ॐ जय यमुना माता॥

आरती यमुना जी की, जो कोई नर गावे। कृष्ण-कृपा की छाया, सो निसदिन पावे॥ ॐ जय यमुना माता॥

६९. पुण्यसलिला माँ सरयू जी की आरती

जय जय सरयू माता, पावन जल धारा। अवधपुरी तट बहतीं, प्रभु-लीला-पारा॥ जय जय सरयू माता...

मानसरोवर निकसी, वशिष्ठ ऋषि लाए। श्रीराम लखन सीता, तट पर हरषाए॥ जय जय सरयू माता...

जल-मज्जन से पातक, सब कट जाते हैं। सुर-मुनि-गन्धर्व तुम्हारे, नित गुण गाते हैं॥ जय जय सरयू माता...

आरती सरयू मैया की, जो कोई जन गावे। अवध-धाम की भक्ति, सहजहिं सो पावे॥ जय जय सरयू माता...

७०. सुरभि माँ गोमाता की आरती

आरती श्री गौ मैया की, कलि-मल-हरणी की। सकल देव-निवासिनी, भव-भय-तरणी की॥

सब तीरथ तन में बसें, सुरभित पय-धारा। गोबर में लक्ष्मी बसें, गौ-मूत्र गंगा-धारा॥ आरती श्री गौ मैया की...

ग्रास प्रथम जो देवे, ताके संकट कटते। कोटि-यज्ञ का फल पावे, पाप-ताप हटते॥ आरती श्री गौ मैया की...

आरती गौ माता की, जो नर-नारी गावे। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, चारों फल पावे॥ आरती श्री गौ मैया की...

७१. श्री नवग्रह देवता मंडल की आरती

ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी, भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्रः शनि-राहु-केतवः, कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥

आरती नवग्रह की कीजै, शांत सकल कष्टन को लीजै। सूर्य-चन्द्र-भौम-बुध-गुरु, शुक्र-शनि-राहु-केतु सुखकारी॥ आरती नवग्रह की कीजै...

ग्रह-पीड़ा जब जन पर आवे, पूजा-पाठ से शान्ति पावे। अनुकूल होएं नवो ग्रह, घर में मंगल छावे॥ आरती नवग्रह की कीजै...

७२. सद्गुरुदेव भगवान की आरती

जय गुरुदेव अमल अविनाशी, ज्ञान-प्रकाशक घट-घट वासी। अज्ञान-तिमिर सब दूर कियो, दिव्य-ज्ञान का दीप दियो॥

गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु देवा, गुरु महेश्वर की कीजै सेवा। साक्षात् परब्रह्म स्वरूप, महिमा अमित अनूप॥ जय गुरुदेव अमल अविनाशी...

चरण-कमल में शीश नवाऊं, भव-सागर से मुक्ति पाऊं। आरती गुरुदेव की गावे, सो नर परम पद पावे॥ जय गुरुदेव अमल अविनाशी...

७३. भगवान श्री अय्यप्पा स्वामी की आरती

स्वामी शरणम् अय्यप्पा, जय मणिकंठ दयाला। पंपा-तीर विहारी, मोहे सब जग-बाला॥

हरि-हर-पुत्र प्रतापी, महिषी-मद-हारी। शबरी-शैल विराजे, जय जय त्रिपुरारी॥ स्वामी शरणम् अय्यप्पा...

अठारह सीढ़ी पावन, जो जन चढ़कर आवे। इरुमुडी शीश उठाए, सब संताप नशावे॥ स्वामी शरणम् अय्यप्पा...

आरती अय्यप्पा की, जो कोई जन गावे। धर्म-शास्ता कृपा से, भव-सिंधु तर जावे॥ स्वामी शरणम् अय्यप्पा...

७४. भगवान श्री अमरनाथ (बर्फानी बाबा) की आरती

जय अमरनाथ हिमानी, गुफा-वास त्रिपुरारी। हिम-लिंग स्वरूप अनूपा, पार्वती सुखकारी॥

कबूतर-युगल विराजे, अमर-कथा उपदेशी। पहलगाम-बलताल पथ, जय जय अवधेशी॥ जय अमरनाथ हिमानी...

श्रद्धा से जो पहुँचे, चन्दनवाड़ी द्वारे। बर्फानी बाबा शम्भू, सबके काज संवारे॥ जय अमरनाथ हिमानी...

आरती अमरनाथ की, जो जन नित्य गावे। अमरत्व ज्ञान पाकर, शिव-लोक सिधावे॥ जय अमरनाथ हिमानी...

७५. भगवान श्री द्वारकाधीश जी की आरती

जय द्वारकाधीश मुरारी, जय जय यदुराई। गोमती-तट पर मंदिर, स्वर्ण-ध्वजा लहराई॥

पंच-नद संगम पावन, रुक्मिणी-उर-हारी। सोलह सहस्र रानियन के, स्वामी गिरधारी॥ जय द्वारकाधीश मुरारी...

छप्पन सीढ़ी चढ़कर, जो जन द्वारे आवे। कलयुग के भव-सागर से, मुक्ति सो पावे॥ जय द्वारकाधीश मुरारी...

आरती द्वारकानाथ की, जो नर-नारी गावे। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, चारों फल पावे॥ जय द्वारकाधीश मुरारी...

७६. भगवान श्री बटुक भैरव जी की आरती

जय बटुक भैरव देवा, बाल-रूप धर आए। आनंद-भैरव स्वामी, सुर-नर शीश नवाए॥

डमरू त्रिशूल हाथ में, श्वान संग डोले। भक्त जनों के रक्षक, जय-जय हर बोले॥ जय बटुक भैरव देवा...

लड्डू-पेड़े का भोग, प्रेम सहित पावे। दृष्टि-दोष सब नाशे, संकट नहिं आवे॥ जय बटुक भैरव देवा...

आरती बटुक नाथ की, जो कोई नित गावे। सर्व-विघ्न कट जावे, सुख-संपति पावे॥ जय बटुक भैरव देवा...

७७. श्री पंचमुखी हनुमान जी की आरती

जय पंचानन वीरा, अति बलवान कपीसा। वानर-नरहरि-गरुड़, वराह-अश्व-ईशा॥

पंच-दिशा रक्षा कीन्ही, पाताल-दलन कीन्हा। अहिरावण संहारी, अभय-दान दीन्हा॥ जय पंचानन वीरा...

उज्ज्वल तेज विराजे, दस भुज अस्त्र संवारे। सकल दुष्ट-दल-गंजन, जन के काज सुधारे॥ जय पंचानन वीरा...

आरती पंचमुखी की, जो नर-नारी गावे। ग्रह-बाधा सब भागे, परम विजय सो पावे॥ जय पंचानन वीरा...

७८. श्री लक्ष्मण जी (शेषावतार) की आरती

आरती कीजै लखन लला की, राम-प्रेम-रस-भरे विधा की॥

उर्मिला-कन्त वीर रण-धीरा, शेषावतार हरे भव-पीरा। मेघनाद संहारक स्वामी, राम-काज हित अनुगामी॥ आरती कीजै लखन लला की...

चौदह वर्ष अखंड तप कीन्हा, निद्रा तज प्रभु-सेवा दीन्हा। धनुष-बाण कर शोभित भारी, जय जय लक्ष्मण हितकारी॥ आरती कीजै लखन लला की...

जो जन लखन-आरती गावै, राम-कृपा सो सहजहिं पावै॥

७९. श्री भरत जी की आरती

आरती कीजै भरत पुनीता, राम-चरण-अनुरागी जीता॥

नन्दिग्राम में तप को कीन्हा, चरण-पादुका शासन दीन्हा। त्याग-तपस्या की प्रतिमूर्ती, सकल मनोरथ पावन पूर्ती॥ आरती कीजै भरत पुनीता...

भ्रातृ-प्रेम जग-वन्दित पावन, सुर-मुनि-मानस-मोद-बढ़ावन। कौशल्या-सुत के अनुरागी, जय जय भरत महा-बड़भागी॥ आरती कीजै भरत पुनीता...

भरत-आरती जो जन गावे, निष्काम-प्रेम-भक्ति सो पावे॥

८०. श्री शत्रुघ्न जी की आरती

आरती शत्रुहन्ता वीर की, लवणासुर-मद-हारी धीर की॥

राम-आज्ञा-पालक व्रत-धारी, मथुरा-पुरी बसाई न्यारी। सुमित्रा-सुत पावन चरित्रा, भव-भय-तारक परम पवित्रा॥ आरती शत्रुहन्ता वीर की...

मौन-तपस्या रूप विराजे, राम-भक्त-सेवा मन साजे। दुष्ट-दलन पातक-मल-हारी, जय शत्रुघ्न विजय-विस्तारी॥ आरती शत्रुहन्ता वीर की...

जो जन शत्रुघ्न-यश गावे, शत्रु-शमन सब सुख सो पावे॥

८१. श्री गरुड़ देव जी की आरती

जय गरुड़ महाबलवन्ता, विष्णुरथ भगवन्ता। पक्ष-पवन से कांपे, नाग-वृन्द अनन्ता॥

अमृत-हरण प्रतापी, कश्यप-विनता-नन्दन। हरि-वाहन सुखदाता, प्रभु-पद-रज-वन्दन॥ जय गरुड़ महाबलवन्ता...

सुपर्ण-पंख की आभा, नभ-मण्डल दमकावे। सर्प-दोष मिट जावे, जो शरणागत आवे॥ जय गरुड़ महाबलवन्ता...

आरती गरुड़ देव की, जो कोई जन गावे। विष-भय दूर नशावे, विष्णु-धाम सो पावे॥ जय गरुड़ महाबलवन्ता...

८२. श्री नंदीश्वर (नंदी जी) की आरती

जय नंदीश्वर देवा, शिव-वाहन सुखकारी। शिलाद-पुत्र तपस्वी, महिमा अति भारी॥

शृंगी-भृंगी नायक, शिव-गण-अग्रगण्या। श्रवण-वचन जो पहुंचे, शिव-कृपा भई धन्या॥ जय नंदीश्वर देवा...

धवल-वर्ण अति सोहे, घंटी-कण्ठ विराजे। महादेव के द्वारे, सदा प्रतिष्ठा साजे॥ जय नंदीश्वर देवा...

आरती नंदीश्वर की, जो नर-नारी गावे। शिव-दर्शन की सिद्धि, सहजहिं सो पावे॥ जय नंदीश्वर देवा...

८३. नवग्रह मण्डल: श्री मंगल देव की आरती

जय भौम दयाला, जय जय अंगारका। रक्त-वर्ण तन सोहे, भूमि-सुत तारका॥

मेष-वृश्चिक के स्वामी, ऋण-हर्ता सुखदाता। शक्ति-अस्त्र कर सोहे, मंगल के त्राता॥ जय भौम दयाला...

मूंगा-रत्न विभूषित, दक्षिण दिशि के स्वामी। ज्वाला-तेज-समन्वित, जग के अन्तर्यामी॥ जय भौम दयाला...

आरती जो मंगल की, नियम सहित गावे। कर्ज-रोग मिट जावे, भूमि-लाभ सो पावे॥ जय भौम दयाला...

८४. नवग्रह मण्डल: श्री बुध देव की आरती

जय बुध ग्रह देवा, चन्द्र-सुत ज्ञानी। हरित-वर्ण तन राजत, पुस्तक-कर-दानी॥

सिंह-सवारी सोहे, बुद्धि-विवेक बढ़ावे। मिथुन-कन्या के स्वामी, व्यापार बढ़ावे॥ जय बुध ग्रह देवा..पन्ना-रत्न विराजत, वाणी के वरदाता। विद्या-सिद्धि प्रदायक, जग के सुखदाता॥ जय बुध ग्रह देवा..आरती बुध देवा की, जो जन नित्य गावे। कुशाग्र बुद्धि पाकर, यश-कीर्ति बढ़ावे॥ जय बुध ग्रह देवा..८५. नवग्रह मण्डल: देवाधिगुरु श्री बृहस्पति की आरती

जय जय देवगुरु देवा, पीताम्बर धारी। वाचस्पति सुखदाता, ज्ञान-प्रभा भारी॥

धनु-मीन के स्वामी, विद्या-बुद्धि प्रदाता। पुखराज कर शोभित, जग के सुखदाता॥ जय जय देवगुरु देवा...

देव-सभा के आचार्य, वेद-मन्त्र-प्रवक्ता। धर्म-नीति के पोषक, शुभ-संस्कार-नियंता॥ जय जय देवगुरु देवा...

आरती गुरुदेवा की, जो कोई जन गावे। संतान-सौभाग्य पावे, ज्ञान परम सो पावे॥ जय जय देवगुरु देवा...

८६. नवग्रह मण्डल: दैत्यगुरु श्री शुक्र देव की आरती

जय भार्गव देवा, जय जय शुक्राचार्य। श्वेत-वर्ण तन सोहे, नीति-शास्त्र-आचार्य॥

वृष-तुला के स्वामी, भौतिक-सुख-दाता। संजीवनी के ज्ञाता, ऐश्वर्य-विधाता॥ जय भार्गव देवा...

हीरा-रत्न विभूषित, श्वेत-अश्व पर साजे। कला-काव्य के प्रेरक, त्रिभुवन यश गाजे॥ जय भार्गव देवा...

आरती जो शुक्र की, शुक्रवार को गावे। वैभव-विलास पावे, दारिद्र्य मिटावे॥ जय भार्गव देवा...

८७. नवग्रह मण्डल: श्री राहु देव की आरती

जय राहु महावीरा, तम-रूप विशाला। सिंहिका-सुत देवा, विकट रूप भाला॥

आकस्मिक फल दाता, कृष्ण-वर्ण धारे। शिव-उपासना कीन्ही, संकट सब टारे॥ जय राहु महावीरा...

गोमेदक-मणि-प्रिय, दक्षिण-पश्चिम वासी। छाया-ग्रह बलवन्ता, कालसर्प-प्रकाशी॥ जय राहु महावीरा...

आरती राहु देव की, जो नर नित गावे। भ्रम-संशय मिट जावे, शान्ति परम सो पावे॥ जय राहु महावीरा...

८८. नवग्रह मण्डल: श्री केतु देव की आरती

जय केतु महाभागा, मोक्ष-मार्ग-प्रदर्शक। ध्वज-आकार विराजत, ज्ञान-ज्योति-वर्धक॥

गणपति-चरण-उपासक, पीड़ा-शमन करते। जो जन वंदन कीन्हों, भव-सिन्धु उतरते॥ जय केतु महाभागा...

लहसुनिया-प्रिय देवा, चित्र-वर्ण सुहावे। अध्यात्म-रस-दाता, मुक्ति-द्वार दिखावे॥ जय केतु महाभागा...

आरती केतु देव की, श्रद्धा से जो गावे। परम पद की प्राप्ति, सहजहिं सो पावे॥ जय केतु महाभागा...

८९. देवराज श्री इन्द्र देव की आरती

जय अमरेश सुरेशा, जय जय सुर-राजा। ऐरावत पर राजत, वज्र-अस्त्र साजा॥

मेघ-वृष्टि के स्वामी, अमरावती-पाला। ऋतुपति देव दयाला, त्रिपुरारी-प्रतिपाला॥ जय अमरेश सुरेशा...

स्वर्ग-सिंहासन सोहे, शची-पति सुखकारी। यज्ञ-भाग-भोक्ता प्रभु, त्रिभुवन-अधिकारी॥ जय अमरेश सुरेशा...

आरती इन्द्र देव की, जो नर-नारी गावे। अन्न-धन की वर्षा से, जीवन सुख पावे॥ जय अमरेश सुरेशा...

९०. श्री वरुण देव (जलाधिपति) की आरती

जय वरुण दयाला, जल-निधि के ईशा। पाश-अस्त्र कर सोहे, पश्चिम के अधीशा॥

मकर-वाहन अति साजे, जीवन-प्राण-प्रदाता। सत्य-धर्म के रक्षक, जग-कल्याण-विधाता॥ जय वरुण दयाला...

नदी-सरोवर-सागर, सब पर राज तिहारा। अमृत-जल बरसाकर, सींचा जग सारा॥ जय वरुण दयाला...

आरती वरुण देव की, जो कोई जन गावे। जल-संकट मिट जावे, शुचिता मन पावे॥ जय वरुण दयाला...

९१. श्री अग्नि देव (पावक) की आरती

जय पावक देवा, जय जय हुतभोजी। सप्त-शिखा मुख सोहे, यज्ञ-हवि-भोजी॥

मेष-सवारी राजत, स्वाहा-स्वधा-संगा। सर्व-शुद्धि के दाता, पावन अति अंगा॥ जय पावक देवा...

देवों तक पहुँचाते, आहुति जो दीनी। सकल जगत में ऊर्जा, प्रगट आपने कीनी॥ जय पावक देवा...

आरती अग्नि देव की, जो नर-नारी गावे। तेज-पुंज तन पावे, पाप-ताप मिटावे॥ जय पावक देवा...

९२. श्री वायु देव (पवन देव) की आरती

जय पवन प्रभूता, जय जय जग-प्राणा। मृग-वाहन गति-शीला, सब घट संचारा॥

हनुमान के ताता, भीम-पिता बलकारी। प्राण-अपान विधाता, महिमा अति भारी॥ जय पवन प्रभूता...

वायु-रूप में रहकर, जीवन सब में भरते। अदृश्य शक्ति होकर, पालन जग का करते॥ जय पवन प्रभूता...

आरती वायु देव की, जो नर नित गावे। आरोग्य-प्राण-शक्ति, जीवन में सो पावे॥ जय पवन प्रभूता...

९३. देवर्षि श्री नारद जी की आरती

जय नारद मुनिवर, वीणा-कर-धारी। नारायण-रस-माते, त्रिभुवन-संचारी॥

भक्ति-सूत्र-प्रणेता, हरि-कीर्तन-गायक। देव-ऋषि-शिरोमणि, जग-मंगल-नायक॥ जय नारद मुनिवर...

सकल लोक में घूमें, प्रभु-लीला-विस्तारी। भक्त जनों के संशय, हरते उपकारी॥ जय नारद मुनिवर...

आरती नारद मुनि की, जो जन नित गावे। अविचल हरि-भक्ति को, सहजहिं सो पावे॥ जय नारद मुनिवर...

९४. श्रीमद्भगवद्गीता जी की आरती

जय भगवद्गीते, मैया जय भगवद्गीते। हरि-मुख-पद्म-विहारी, कलि-मल-भय-भीते॥

कर्म-भक्ति-अरु-ज्ञाना, अमृत बरसावे। अर्जुन-मोह-विनाशक, भव-सिन्धु तिरावे॥ जय भगवद्गीते...

अठारह अध्याय पावन, वेदों का सारा। जीवन-रण में देवे, सन्मार्ग उज्यारा॥ जय भगवद्गीते...

आरती भगवद्गीता की, जो कोई जन गावे। अज्ञान-तिमिर मिट जावे, परम ज्ञान पावे॥ जय भगवद्गीते...

९५. श्री एकादशी माता की आरती

ॐ जय एकादशी माता, मैया जय एकादशी माता। विष्णु-अंग-समुद्भूता, सब पातक-त्राता॥ ॐ जय एकादशी माता॥

मुर-दानव संहारे, देव-अभय कीन्हा। हरि-प्रिय पावन रूपा, मुक्ति-वर दीन्हा॥ ॐ जय एकादशी माता॥

वर्ष मास में छब्बीस, पावन व्रत साजे। जो जन उपवास राखे, वैकुण्ठ में विराजे॥ ॐ जय एकादशी माता॥

आरती एकादशी की, जो नर-नारी गावे। यम की यातना छूटे, श्रीहरि-पद पावे॥ ॐ जय एकादशी माता॥

९६. श्री शालिग्राम भगवान की आरती

जय शालिग्राम शिला, गंडकी-उद्भूता। तुलसी-दल-प्रिय देवा, भव-सिन्धु-तरूता॥

चक्र-चिह्न अति सुंदर, कौस्तुभ-मणि-राजे। कोटि-तीर्थ तन बसते, शंख-नाद बाजे॥ जय शालिग्राम शिला...

चरणामृत जो पावे, ताके अघ कटते। अकाल-मृत्यु का भय नहिं, यम-दूत पलटते॥ जय शालिग्राम शिला...

आरती शालिग्राम की, जो श्रद्धा से गावे। अन्त समय वैकुण्ठ में, पावन धाम सो पावे॥ जय शालिग्राम शिला...

९७. पुण्यतोया माँ गोदावरी जी की आरती

जय गोदावरी माता, दक्षिण की गंगा। त्र्यंबक-शैल से निकली, पावन अति अंगा॥

कुम्भ-पर्व तट लागे, ऋषि-मुनि स्नान करें। दर्शन-मज्जन से सब, भव-सागर निस्तरें॥ जय गोदावरी माता...

गौतम ऋषि की तपस्या, पूरी तुमने कीन्ही। सकल चराचर जग को, पावनता दीन्ही॥ जय गोदावरी माता...

आरती गोदावरी की, जो नर-नारी गावे। पाप-ताप सब नाशे, परम श्रेय सो पावे॥ जय गोदावरी माता...

९८. पापनाशिनी माँ क्षिप्रा जी की आरती

जय क्षिप्रा माता, उज्जयिनी-पावनी। महाकाल-पद-कमल, नित्य पखारनी॥

सोमवती-अमावस्या, मेला भारी लागे। स्नान करे जो कोई, सोए भाग्य जागे॥ जय क्षिप्रा माता...

रामघाट पर अमृत, कुम्भ-पर्व झलके। साधु-संत जन गावत, शिव-भक्ति चमके॥ जय क्षिप्रा माता...

आरती क्षिप्रा मैया की, जो जन नित्य गावे। अकाल-मृत्यु मिट जावे, मोक्ष सहज सो पावे॥ जय क्षिप्रा माता...

९९. श्री सीताराम जी की युगल आरती

आरती श्री जानकी-नाथ की, रघुवर कोमल गात की॥

वाम भाग सोहे जानकी, रूप-सुधा की झांकी। लखन भरत रिपुसूदन सेवत, चामर ढुरत भ्रात की॥ आरती श्री जानकी-नाथ की...

कनक-सिंहासन राजत जोरी, सुर-नर-मुनि मति मोरी। चरण-कमल बलिहारी जाउं, छवि अवधेश-तात की॥ आरती श्री जानकी-नाथ की...

जो जन सीताराम-आरती, प्रेम सहित नित गावे। अवध-धाम का वासी होकर, परम आनंद पावे॥

१००. श्री राधा-कृष्ण की युगल आरती

आरती श्री युगल-छवि कीजै, जनम-मरन भव-भय हर लीजै॥

एक अंग अति गौर सुहावे, एक श्याम-घन बरन लजावे। राधा-कृष्ण एक उर धारे, प्रेम-सुधा रस-सिन्धु अपारे॥ आरती श्री युगल-छवि कीजै...

मोर-मुकुट चन्द्रिका सोहे, नथनी लकुट त्रिभुवन मोहे। मुरली अधर मधुर सुर बाजे, रास-मण्डल ब्रज-भूमि साजे॥ आरती श्री युगल-छवि कीजै...

आरती युगल रूप की गावे, नित्य निकुंज का वास सो पावे॥

१०१. माँ हरितालिका (तीज) / उमा-महेश्वर आरती

जय हरितालिका माता, जय उमा-महेश्वरा। भाद्रपद-शुक्ल-तृतीया, व्रत-तप हर-हिय-धरा॥

गौरी-शंकर की जोड़ी, अखंड सुहाग देवे। जो नारी व्रत साधे, सो सब सुख लेवे॥ जय हरितालिका माता...

बालू के शिवलिंग साजे, पूजन विधि विस्तारी। पार्वती की तपस्या, पूरी की त्रिपुरारी॥ जय हरितालिका माता...

आरती तीज माता की, जो नारी नित गावे। अचल सुहाग पाकर, कुल का मान बढ़ावे॥

१०२. नवदुर्गा: माँ शैलपुत्री जी की आरती

शैलपुत्री माँ बैल असवार, करें देवता जय जयकार। शिव-भार्या शिव-मन-भावनी, जग की पालन-हार॥

प्रथम नवरात्र में पूजा पावे, जो ध्यावे सो सुख पावे। त्रिशूल-कमल कर सोहे, चन्द्रमा शीश ललावे॥ शैलपुत्री माँ बैल असवार...

आरती शैलपुत्री की गावे, रिद्धि-सिद्धि भंडार भरावे॥

१०३. नवदुर्गा: माँ ब्रह्मचारिणी जी की आरती

जय अंबे ब्रह्मचारिणी माता, जाके सिर पर सोहे मुकुट सुहाता। तप-त्याग की देवी अम्बा, तू ही सबकी अवलम्बा॥

कमण्डलु-अक्षमाला हाथा, सुर-नर झुकावे माथा। द्वितीय नवरात्र की देवी, सकल मनोरथ सेवी॥ जय अंबे ब्रह्मचारिणी माता...

जो जन आरती तुम्हारी गावे, संयम-तप का वर पावे॥

१०४. नवदुर्गा: माँ चन्द्रघण्टा जी की आरती

जय माँ चन्द्रघण्टा सुखदाता, पूर्ण कीजो मेरे काम विधाता। चन्द्र-अर्ध माथे पर सोहे, घण्टा-ध्वनि सुर-मुनि मोहे॥

दश भुज अस्त्र-शस्त्र सँवारे, सिंह-सवारी असुर संहारे। तृतीय नवरात्र में पूजा होई, संकट रहे न कोई॥ जय माँ चन्द्रघण्टा सुखदाता...

आरती चन्द्रघण्टा की गावे, परम शांति मन पावे॥

१०५. नवदुर्गा: माँ कूष्माण्डा जी की आरती

कूष्माण्डा जय जग-सुखदानी, अण्ड-ब्रह्माण्ड की तू कल्याणी। चौथे नवरात्र में जो ध्यावे, भव-सागर से तर जावे॥

अष्ट-भुजा सोहे माँ हाथा, अमृत-कलश लियो संगाथा। सूर्य-लोक में वास तिहारा, तेज समूचा जग उज्यारा॥ कूष्माण्डा जय जग-सुखदानी...

आरती कूष्माण्डा की गावे, व्याधि-शोक सब मिटावे॥

१०६. नवदुर्गा: माँ स्कन्दमाता जी की आरती

जय तेरी हो स्कन्दमाता, पांचवां नाम तुम्हारा आता। कार्तिकेय की प्यारी माता, सब जग की तू भाग्य-विधाता॥

कमल-आसन पर बैठी मैया, पार करो मेरी जीवन-नैया। सिंह-सवारी अति सुखकारी, शरण पड़े की विपदा टारी॥ जय तेरी हो स्कन्दमाता...

आरती स्कन्दमाता की गावे, पुत्र-पौत्र-सुख पावे॥

१०७. नवदुर्गा: माँ कात्यायनी जी की आरती

जय जय अम्बे जय कात्यायनी, कात्य-ऋषि की कन्या मानी। छठे नवरात्र में पूजा पावे, महिषासुर-मर्दिनी कहावे॥

स्वर्ण-कांति अति उज्ज्वल काया, चार भुजा वर-मुद्रा छाया। मनोवांछित वर देती माता, जो शरणागत शीश नवाता॥ जय जय अम्बे जय कात्यायनी...

आरती कात्यायनी की गावे, योग्य वर-वधू पावे॥

१०८. नवदुर्गा: माँ सिद्धिदात्री जी की आरती

जय सिद्धिदात्री तू सिद्धि की दाता, तू भक्तों की रक्षक तू दासों की माता। नवम नवरात्र में पूजा होई, अष्ट-सिद्धि पावे नर कोई॥

कमल-विराजित शंख-गदा-धरा, चक्र-पद्म से झोली भरा। शिव ने भी तुमको ध्याया, आधा अंग तुम्हारा पाया॥ जय सिद्धिदात्री तू सिद्धि की दाता...

आरती सिद्धिदात्री की गावे, मोक्ष परम पद पावे॥

आरती समापन, कर्पूर आरती एवं महापुष्पांजलि मंत्र

आरती संपन्न करने के उपरांत पात्र के चारों ओर तीन बार आचमनी से जल घुमाकर भूमि पर छोड़ें, फिर दोनों हाथ जोड़कर स्तुति एवं पुष्पांजलि अर्पित करें:

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम् । सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ॥

सर्वसमर्पण एवं क्षमा-प्रार्थना मंत्र:

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव ॥
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावात् । करोमि यद्यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि ॥
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ ॐ राजाधिराजाय प्रसह्यसाहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे । स मे कामान् कामकामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु । कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः ॥ ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥

॥ इति सम्पूर्ण १०८ वृहद् आरती संग्रह समाप्तम् ॥.


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