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ब्रह्मकृत स्वधा स्तोत्रम् अर्थ सहित | cdsharma.in

✍️ CD Sharma · 📅 29 Sep 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ स्वधा स्तोत्रम्, Swadha Stotram, स्वधा स्तोत्र हिन्दी अर्थ सहित, Swadha Stotram Meaning in Hindi, पितृ तृप्ति स्तोत्र, Pitru Dosh Nivaran Stotram, श्राद्ध स्तोत्र, Shraddha Stotram, ब्रह्मवैवर्त पुराण, Brahmavaivarta Purana

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ब्रह्मकृत स्वधा स्तोत्रम् अर्थ सहित | cdsharma.in

॥स्वधास्तोत्रम्॥

(मूल श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद)

ब्रह्मोवाच – (ब्रह्मा जी बोले –)

स्वधोच्चारणमात्रेण तीर्थस्नायी भवेन्नरः।

मुच्यते सर्वपापेभ्यो वाजपेयफलं लभेत्।।१।।

हिन्दी अर्थ: केवल 'स्वधा' शब्द का उच्चारण करने मात्र से मनुष्य सभी तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त कर लेता है। वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है तथा उसे वाजपेय यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है।

स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं यदि वारत्रयं स्मरेत्।

श्राद्धस्य फलमाप्नोति कालस्य तर्पणस्य च।।२।।

हिन्दी अर्थ: यदि कोई मनुष्य 'स्वधा, स्वधा, स्वधा'—इस प्रकार तीन बार स्मरण करता है, तो उसे श्राद्ध, उचित काल और तर्पण का संपूर्ण फल प्राप्त हो जाता है।

श्राद्धकाले स्वधास्तोत्रं यः शृणोति समाहितः। लभेच्छ्राद्धशतानां च पुण्यमेव न संशयः।।३।।

हिन्दी अर्थ: जो व्यक्ति श्राद्ध के समय एकाग्रचित्त होकर इस स्वधास्तोत्र का श्रवण करता है, उसे सैकड़ों श्राद्ध करने का पुण्य-फल प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।

प्रियां विनीतां स लभेत्साध्वीं पुत्रं गुणान्वितम्।।४।। हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य तीनों संध्याओं (प्रातः, मध्याह्न और सायं) में 'स्वधा, स्वधा, स्वधा' का पाठ करता है, उसे प्रिय, विनीत व पतिव्रता पत्नी तथा समस्त सद्गुणों से युक्त पुत्र की प्राप्ति होती है।

पितॄणां प्राणतुल्या त्वं द्विजजीवनरूपिणी। श्राद्धाधिष्ठातृदेवी च श्राद्धादीनां फलप्रदा।।५।।

हिन्दी अर्थ: हे देवी! तुम पितरों के प्राणों के समान प्रिय हो, ब्राह्मणों का जीवन-स्वरूप हो, श्राद्ध कर्म की अधिष्ठात्री देवी हो तथा श्राद्ध आदि सत्कर्मों का संपूर्ण फल प्रदान करने वाली हो।

बहिर्गच्छ मन्मनसः पितॄणां तृप्तिहेतवे।

सम्प्रीतये द्विजातीनां गृहिणां वृद्धिहेतवे।।६।।

हिन्दी अर्थ: अतः हे देवी! पितरों की तृप्ति के लिए, द्विजों (ब्राह्मणों) की प्रसन्नता के लिए तथा गृहस्थों के कल्याण एवं वंश-वृद्धि के निमित्त तुम मेरे मन से बाहर प्रकट हो जाओ।

नित्या त्वं नित्यस्वरूपासि गुणरूपासि सुव्रते। आविर्भावस्तिरोभावः सृष्टौ च प्रलये तव।।७।।

हिन्दी अर्थ: हे सुव्रते! तुम नित्य हो, नित्य-स्वरूपा तथा समस्त दिव्य गुणों की साक्षात मूर्ति हो। सृष्टि के समय तुम्हारा प्राकट्य (आविर्भाव) होता है और प्रलयकाल में तुम्हारा तिरोभाव (विलीन होना) होता है।

ॐ स्वस्तिश्च नमः स्वाहा स्वधा त्वं दक्षिणा तथा। निरूपिताश्चतुर्वेदे षट् प्रशस्ताश्च कर्मिणाम्।।८।।

हिन्दी अर्थ: ॐ, स्वस्ति, नमः, स्वाहा, स्वधा और दक्षिणा—चारों वेदों में कर्मकांडी मनुष्यों के लिए ये छः शब्द अत्यंत प्रशस्त और कल्याणकारी कहे गए हैं, उन षट् रूपों में तुम ही स्थित हो।

पुरासीस्त्वं स्वधागोपी गोलोके राधिका सखी।

धृतोरसि स्वधात्मानं कृतं तेन स्वधा स्मृता।।९।।

हिन्दी अर्थ: प्राचीन काल में तुम गोलोक में 'स्वधा' नाम की गोपी थीं और श्रीराधा की सखी थीं। भगवान द्वारा अपने वक्षःस्थल पर धारण करने तथा स्वयं में लीन कर लेने के कारण तुम 'स्वधा' नाम से प्रसिद्ध हुईं।

इत्येवमुक्त्वा स ब्रह्मा ब्रह्मलोके च संसदि।

तस्थौ च सहसा सद्यः स्वधा साविर्बभूव ह।।१०।।

हिन्दी अर्थ: ब्रह्मलोक की सभा में ब्रह्मा जी इस प्रकार स्तुति करके जब मौन हुए, तब सहसा उनके सम्मुख साक्षात भगवती स्वधा प्रकट हो गईं।

तदा पितृभ्यः प्रददौ तामेव कमलाननाम्।

तां सम्प्राप्य ययुस्ते च पितरश्च प्रहर्षिताः।।११।।

हिन्दी अर्थ: तब ब्रह्मा जी ने उन कमलमुखी देवी स्वधा को पितरों को समर्पित कर दिया। उन्हें पाकर सभी पितर परम तृप्त एवं हर्षित होकर अपने-अपने लोक को चले गए।

स्वधास्तोत्रमिदं पुण्यं यः शृणोति समाहितः।

स स्नातः सर्वतीर्थेषु वेदपाठफलं लभेत्।।१२।।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस पावन स्वधास्तोत्र का श्रवण या पाठ करता है, वह समस्त तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त करता है और उसे वेदों के स्वाध्याय का संपूर्ण फल मिलता है।

।। इति श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणे प्रकृतिखण्डे ब्रह्मकृतं स्वधास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

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