॥ श्लोकानां विश्लेषिका ॥ — पदच्छेद, पदपरिचय, पदार्थ, अन्वय, भावार्थ व व्याकरण
"+" = एक ही लिखित शब्द के भीतर सन्धि-विच्छेद · डैश (-) वाले = समास का पूर्वपद
अर्थ: संरक्षण करना, मुक्त करना
संस्कृत: रक्षणे मोक्षणे च
अंग्रेज़ी: to protect,to release
सम्भावित विश्लेषण (सबसे सम्भावित पहले):
लट् लकार, परस्मैपद (कर्तरि):
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम | जंसति / जंसयति | जंसतः / जंसयतः | जंसन्ति / जंसयन्ति |
| मध्यम | जंसयसि / जंससि | जंसथः / जंसयथः | जंसथ / जंसयथ |
| उत्तम | जंसयामि / जंसामि | जंसयावः / जंसावः | जंसयामः / जंसामः |
दसों लकार (प्रथम पुरुष, एकवचन): लट्: जंसति · लट् (आत्मने.): जंसयते · लिट्: जंसयाञ्चकार · लिट् (आत्मने.): जंसयाञ्चक्रे · लुट्: जंसयिता · लुट् (आत्मने.): जंसयिता · लृट्: जंसयिष्यति · लृट् (आत्मने.): जंसयिष्यते · लोट्: जंसतात् · लोट् (आत्मने.): जंसयताम् · लङ्: अजंसत् · लङ् (आत्मने.): अजंसयत · विधिलिङ्: जंसयेत् · विधिलिङ् (आत्मने.): जंसयेत · आशीर्लिङ्: जंस्यात् · आशीर्लिङ् (आत्मने.): जंसयिषीष्ट · लुङ्: अजंसीत् · लुङ् (आत्मने.): अजजंसत · लृङ्: अजंसयिष्यत् · लृङ् (आत्मने.): अजंसयिष्यत
प्रमुख कृदन्त: ल्युट्: जंसन · ण्वुल्: जंसकः · तृच्: जंसिता · यत्: जंस्यः · ण्यत्: जंस्यः · तव्य: जंसितव्यः · अनीयर्: जंसनीयः · क्त: जंसितः · क्तवतु: जंसितवान् · शतृ: जंसन् · स्य-शतृ: जंसिष्यन् · शानच्: जंसयमानः · क्त्वा: जंसित्वा · ल्यप्: प्रजंस्य · तुमुन्: जंसितुम् · णमुल्: जंसम् · घञ्: जंसः · क्तिन्: जंस्ति · क्वसु: जजंस्वान्
| पदम् | विवरणम् |
|---|---|
| जंसति | जंस् धातु (चुरादिगण, परस्मैपद) — लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन अन्य सम्भावना: जंसत् (नपुं.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: जंस् + शतृ | जंसत् (पुं.) — सप्तमी विभक्ति, एकवचन · कृदन्त: जंस् + शतृ |
जंसति ➤ संरक्षण करना, मुक्त करना
संस्कृत: रक्षणे मोक्षणे च
इस शब्द के प्रातिपदिक अमरकोश की पर्याय-सूची में नहीं मिले (क्रिया, अव्यय, सर्वनाम व नाम प्रायः अमरकोश में नहीं होते)।
इस श्लोक में शब्दों के भीतर कोई सन्धि नहीं पहचानी गई।
कोई समस्त पद नहीं पहचाना गया (या पूरा सामासिक शब्द कोश में सीधे मिल गया)।
कोई कृदन्त पद नहीं पहचाना गया।
कोई तद्धितान्त पद नहीं पहचाना गया।
विश्लेषण-समय: ०.१ सेकण्ड