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🪷 श्रीमद्भगवद्गीता

मूल श्लोक, अन्वय, सरल हिन्दी अनुवाद एवं विस्तृत भावार्थ सहित

अध्याय १२ — भक्तियोग

२० श्लोक · प्रत्येक पर अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ

📌 साकार और निराकार उपासना; साधना के क्रमिक सोपान; भगवान् के प्रिय भक्त के लक्षण।
१२.१ अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — एवं सततयुक्ताः ये भक्ताः त्वां पर्युपासते, ये च अपि अक्षरम् अव्यक्तं (पर्युपासते), तेषां के योगवित्तमाः?
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — जो अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अतिश्रेष्ठ भाव से भजते हैं — उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?
भावार्थ
बारहवाँ अध्याय 'भक्तियोग' कहलाता है — गीता का सबसे छोटा, पर अत्यन्त मधुर अध्याय। ग्यारहवें अध्याय के अन्त में भगवान् ने अनन्य भक्ति की महिमा बताई। अब अर्जुन का प्रश्न है — जो सगुण-साकार भगवान् की भक्ति करते हैं और जो निर्गुण-निराकार अक्षर ब्रह्म की उपासना करते हैं, इन दोनों में श्रेष्ठ कौन है? यह प्रश्न भारतीय दर्शन की एक प्रमुख बहस को छूता है — साकार और निराकार उपासना। भगवान् का उत्तर संतुलित और व्यावहारिक होगा।
१२.२ श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ २ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — ये मयि मनः आवेश्य नित्ययुक्ताः परया श्रद्धया उपेताः (सन्तः) माम् उपासते, ते मे युक्ततमाः मताः।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — मुझमें मन को एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुण रूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं।
भावार्थ
भगवान् का उत्तर — जो मन को भगवान् में 'आवेश्य' — पूरी तरह लगाकर, 'नित्ययुक्त' — निरन्तर जुड़े रहकर, और 'परया श्रद्धया' — परम श्रद्धा से — भगवान् के सगुण रूप की उपासना करते हैं, वे 'युक्ततम' — सर्वश्रेष्ठ योगी — हैं। यह छठे अध्याय के अन्तिम श्लोक की पुष्टि है। भगवान् सगुण भक्ति को श्रेष्ठ इसलिये बताते हैं कि यह सहज और प्रेमपूर्ण है; मन को एक प्रिय रूप पर टिकाना आसान है।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३ ॥
अन्वय
तु ये अक्षरम् अनिर्देश्यम् अव्यक्तं सर्वत्रगम् अचिन्त्यं च कूटस्थम् अचलं ध्रुवं पर्युपासते —
हिन्दी अनुवाद
परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं —
भावार्थ
अब भगवान् निर्गुण उपासकों की बात करते हैं। वे जिस ब्रह्म की उपासना करते हैं, वह 'अक्षर' (अविनाशी), 'अनिर्देश्य' (जिसका वर्णन न हो सके), 'अव्यक्त' (अप्रकट), 'सर्वत्रग' (सर्वव्यापी), 'अचिन्त्य' (मन से परे), 'कूटस्थ' (अविकारी), 'अचल' (स्थिर) और 'ध्रुव' (नित्य) है। ये सब विशेषण बताते हैं कि निर्गुण ब्रह्म को किसी गुण, रूप या विचार से नहीं पकड़ा जा सकता। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः। ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४ ॥
अन्वय
(ते) इन्द्रियग्रामं सन्नियम्य सर्वत्र समबुद्धयः सर्वभूतहिते रताः (सन्तः) माम् एव प्राप्नुवन्ति।
हिन्दी अनुवाद
वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाव वाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
निर्गुण उपासकों के तीन गुण — 'इन्द्रियग्राम संनियम्य' (इन्द्रियों को पूर्ण रूप से वश में करके), 'सर्वत्र समबुद्धि' (सब जगह समान दृष्टि) और 'सर्वभूतहिते रताः' (सब प्राणियों के हित में लगे हुए)। ऐसे उपासक भी 'मामेव प्राप्नुवन्ति' — भगवान् को ही प्राप्त होते हैं। अर्थात् दोनों मार्ग एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं; भगवान् किसी को नकारते नहीं। अन्तर केवल मार्ग की कठिनाई में है, जो अगले श्लोक में बताया गया है।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५ ॥
अन्वय
अव्यक्तासक्तचेतसां तेषां क्लेशः अधिकतरः; हि देहवद्भिः अव्यक्ता गतिः दुःखम् अवाप्यते।
हिन्दी अनुवाद
उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्त वाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है; क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्त विषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है।
भावार्थ
निर्गुण उपासना में 'क्लेश अधिकतर' — अधिक कठिनाई — है। क्यों? क्योंकि 'देहवद्भिः' — शरीरधारी मनुष्य, जो स्वाभाविक रूप से शरीर से अपनी पहचान जोड़ता है — के लिये निराकार का ध्यान करना बहुत कठिन है। मन को कोई आधार चाहिये; जो रूप-रंग-गुण से परे है, उस पर मन कैसे टिके? जैसे शून्य आकाश को लगातार देखते रहना कठिन है, पर एक सुन्दर चित्र को देखना सहज। सगुण भक्ति इसलिये सुगम है।
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः। अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ६ ॥
अन्वय
तु ये मत्पराः (सन्तः) सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य अनन्येन एव योगेन मां ध्यायन्तः उपासते —
हिन्दी अनुवाद
परन्तु जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुण रूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं —
भावार्थ
सगुण भक्तों के लक्षण — 'मत्पराः' (भगवान् को ही परम लक्ष्य मानने वाले), 'सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य' (सब कर्मों को भगवान् को अर्पित करने वाले) और 'अनन्येन योगेन' (अनन्य भाव से ध्यान करने वाले)। वे कर्म नहीं छोड़ते, बल्कि कर्मों को भगवान् को अर्पित करते हैं। यहाँ कर्मयोग और भक्तियोग का सुन्दर मेल है। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्। भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! मयि आवेशितचेतसां तेषाम् अहं नचिरात् मृत्युसंसारसागरात् समुद्धर्ता भवामि।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ।
भावार्थ
ऐसे भक्तों के लिये भगवान् का वचन — 'तेषामहं समुद्धर्ता' — मैं स्वयं उनका उद्धार करता हूँ, और 'नचिरात्' — शीघ्र ही। संसार को 'मृत्युसंसारसागर' — मृत्यु रूपी संसार का समुद्र — कहा गया है, जिसमें प्राणी डूबता-उतराता रहता है। निर्गुण उपासक को अपने प्रयत्न से तैरकर पार जाना होता है; सगुण भक्त को भगवान् स्वयं नाव में बिठाकर पार ले जाते हैं। यही भक्ति मार्ग की सबसे बड़ी विशेषता है — भगवान् की कृपा का सहारा।
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ ८ ॥
अन्वय
मयि एव मनः आधत्स्व, मयि बुद्धिं निवेशय; अतः ऊर्ध्वं (त्वं) मयि एव निवसिष्यसि; (अत्र) संशयः न।
हिन्दी अनुवाद
मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा; इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
भावार्थ
अब भगवान् भक्ति की साधना के क्रमिक स्तर बताते हैं — जो सबसे ऊँचे से आरम्भ होकर सरल की ओर जाते हैं। पहला और सर्वोच्च स्तर — मन और बुद्धि दोनों को भगवान् में लगा दो। मन (भावना) और बुद्धि (विचार) — जब दोनों भगवान् में स्थित हो जायें, तो व्यक्ति स्वयं भगवान् में निवास करने लगता है। 'न संशयः' — इसमें कोई संशय नहीं। पर यदि यह कठिन हो, तो अगला उपाय है।
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्। अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥ ९ ॥
अन्वय
(हे) धनञ्जय! अथ चित्तं मयि स्थिरं समाधातुं न शक्नोषि, ततः अभ्यासयोगेन माम् आप्तुम् इच्छ।
हिन्दी अनुवाद
यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिये समर्थ नहीं है, तो हे अर्जुन! अभ्यास रूप योग के द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिये इच्छा कर।
भावार्थ
दूसरा स्तर — यदि मन को स्थिर रूप से भगवान् में नहीं लगा पाते, तो 'अभ्यासयोग' करो। अर्थात् बार-बार मन को भगवान् में लगाने का प्रयास करो — जप, ध्यान, कीर्तन, पाठ के द्वारा। मन भटकेगा, पर उसे बार-बार वापस लाओ। जैसे कोई नया कौशल सीखने के लिये बार-बार अभ्यास करना पड़ता है। भगवान् की करुणा देखिये — वे हर व्यक्ति की क्षमता के अनुसार मार्ग देते हैं।
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव। मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १० ॥
अन्वय
अभ्यासे अपि असमर्थः असि (चेत्), मत्कर्मपरमः भव; मदर्थं कर्माणि कुर्वन् अपि (त्वं) सिद्धिम् अवाप्स्यसि।
हिन्दी अनुवाद
यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिये कर्म करने के ही परायण हो जा; इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा।
भावार्थ
तीसरा स्तर — यदि अभ्यास भी कठिन लगे, तो 'मत्कर्मपरम' बनो — भगवान् के लिये कर्म करो। पूजा, सेवा, मन्दिर का कार्य, दीन-दुखियों की सहायता, भगवान् के नाम पर कोई भी शुभ कार्य। इससे भी सिद्धि मिलेगी। बहुत-से लोगों के लिये ध्यान में बैठना कठिन है, पर भगवान् के लिये कुछ करना सहज है। कर्म के माध्यम से भी भगवान् तक पहुँचा जा सकता है।
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः। सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥
अन्वय
अथ मद्योगम् आश्रितः (सन्) एतत् अपि कर्तुम् अशक्तः असि, ततः यतात्मवान् (सन्) सर्वकर्मफलत्यागं कुरु।
हिन्दी अनुवाद
यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग कर।
भावार्थ
चौथा और सबसे सरल स्तर — यदि भगवान् के लिये विशेष कर्म करना भी सम्भव न हो, तो अपने सामान्य कर्म करते रहो, पर 'सर्वकर्मफलत्याग' — सब कर्मों के फल की आसक्ति छोड़ दो। अपना कर्तव्य करो — नौकरी, व्यापार, परिवार का पालन — पर फल की चिन्ता भगवान् पर छोड़ दो। यह हर व्यक्ति के लिये सम्भव है। भगवान् ने साधना की सीढ़ी इतनी सरल बना दी कि कोई भी उस पर चढ़ सकता है।
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते। ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥ १२ ॥
अन्वय
हि अभ्यासात् ज्ञानं श्रेयः, ज्ञानात् ध्यानं विशिष्यते, ध्यानात् कर्मफलत्यागः (विशिष्यते), त्यागात् अनन्तरं शान्तिः (भवति)।
हिन्दी अनुवाद
मर्म को न जानकर किये हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से भी सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है।
भावार्थ
यह श्लोक एक आश्चर्यजनक क्रम देता है — अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ, और ध्यान से भी 'कर्मफलत्याग' श्रेष्ठ! पिछले श्लोक में कर्मफलत्याग को सबसे सरल बताया था, अब उसे सबसे श्रेष्ठ कहा जा रहा है। क्यों? क्योंकि 'त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्' — त्याग से तुरन्त शान्ति मिलती है। ध्यान में मन शान्त हो सकता है, पर यदि फल की आसक्ति बनी है, तो ध्यान के बाद फिर अशान्ति। फल का त्याग अशान्ति की जड़ ही काट देता है। सबसे सरल साधन ही सबसे प्रभावी है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥
अन्वय
(यः) सर्वभूतानाम् अद्वेष्टा, मैत्रः, करुणः एव च, निर्ममः, निरहङ्कारः, समदुःखसुखः, क्षमी —
हिन्दी अनुवाद
जो पुरुष सब भूतों में द्वेषभाव से रहित, स्वार्थरहित सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान् है —
भावार्थ
यहाँ से अध्याय के अन्त तक भगवान् अपने प्रिय भक्त के लक्षण बताते हैं — ये श्लोक 'भक्त-लक्षण' के नाम से प्रसिद्ध हैं और दैनिक पाठ के लिये अत्यन्त उपयोगी हैं। पहले लक्षण — 'अद्वेष्टा' (किसी से द्वेष न करने वाला), 'मैत्र' (सबका मित्र), 'करुण' (दयालु), 'निर्मम' (ममता रहित), 'निरहंकार' (अहंकार रहित), 'समदुःखसुख' (सुख-दुःख में सम) और 'क्षमी' (क्षमाशील)। पहले तीन गुणों में एक सुन्दर क्रम है — द्वेष न करना (नकारात्मक का अभाव), मित्रता (सकारात्मक भाव), करुणा (सक्रिय सहायता)।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥
अन्वय
सततं सन्तुष्टः, योगी, यतात्मा, दृढनिश्चयः, मयि अर्पितमनोबुद्धिः यः मद्भक्तः, सः मे प्रियः।
हिन्दी अनुवाद
तथा जो योगी निरन्तर सन्तुष्ट है, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है — वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धि वाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है।
भावार्थ
और लक्षण — 'सततं सन्तुष्ट' (सदा सन्तुष्ट, जो कुछ है उसमें प्रसन्न), 'योगी' (समत्व में स्थित), 'यतात्मा' (आत्मसंयमी), 'दृढ़निश्चय' (अटल निश्चय वाला) और 'मय्यर्पितमनोबुद्धि' (मन और बुद्धि भगवान् को अर्पित)। ऐसा भक्त 'स मे प्रियः' — मुझे प्रिय है। यह वाक्य कई बार दोहराया जायेगा, जो भगवान् के प्रेम की तीव्रता को दर्शाता है। सन्तोष सबसे बड़ा धन है — जिसके पास सन्तोष है, वह सबसे धनी है।
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥
अन्वय
यस्मात् लोकः न उद्विजते, यः च लोकात् न उद्विजते, यः च हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तः, सः मे प्रियः।
हिन्दी अनुवाद
जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता, तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगादि से रहित है — वह भक्त मुझको प्रिय है।
भावार्थ
यह श्लोक एक सुन्दर संतुलन बताता है — 'यस्मान्नोद्विजते लोको' — जिससे संसार को कोई कष्ट न हो; और 'लोकान्नोद्विजते च यः' — जो स्वयं संसार से विचलित न हो। पहला दूसरों के प्रति हमारा व्यवहार है — हम किसी को दुःख न दें; दूसरा हमारी आन्तरिक स्थिरता है — दूसरों के व्यवहार से हम विचलित न हों। साथ ही वह 'हर्ष' (अति प्रसन्नता), 'अमर्ष' (ईर्ष्या), 'भय' और 'उद्वेग' (व्याकुलता) से मुक्त है। ऐसा व्यक्ति समाज के लिये वरदान है।
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः। सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥
अन्वय
अनपेक्षः शुचिः दक्षः उदासीनः गतव्यथः सर्वारम्भपरित्यागी यः मद्भक्तः, सः मे प्रियः।
हिन्दी अनुवाद
जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध, चतुर, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है — वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है।
भावार्थ
और गुण — 'अनपेक्ष' (किसी से कोई अपेक्षा न रखने वाला), 'शुचि' (बाहर-भीतर से पवित्र), 'दक्ष' (कुशल, चतुर — जो अपना कार्य कुशलता से करे), 'उदासीन' (निष्पक्ष, किसी पक्ष में न झुका हुआ), 'गतव्यथ' (व्यथा से मुक्त) और 'सर्वारम्भपरित्यागी' (स्वार्थ से प्रेरित नये-नये उद्यमों को छोड़ने वाला)। 'दक्ष' गुण विशेष ध्यान देने योग्य है — भक्त आलसी या अकुशल नहीं होता; वह अपने कर्म में दक्ष होता है। भक्ति और कार्यकुशलता साथ चलती हैं।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥
अन्वय
यः न हृष्यति, न द्वेष्टि, न शोचति, न काङ्क्षति, शुभाशुभपरित्यागी (च), यः भक्तिमान्, सः मे प्रियः।
हिन्दी अनुवाद
जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है — वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है।
भावार्थ
चार 'न' — 'न हृष्यति' (प्रिय मिलने पर अति हर्षित नहीं होता), 'न द्वेष्टि' (अप्रिय से द्वेष नहीं करता), 'न शोचति' (प्रिय खोने पर शोक नहीं करता), 'न काङ्क्षति' (अप्राप्त की कामना नहीं करता)। ये चार भाव मन को सबसे अधिक विचलित करते हैं; भक्त इनसे मुक्त है। और वह 'शुभाशुभपरित्यागी' है — शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के कर्मों के फल की आसक्ति छोड़ चुका है। उसके सब कर्म भगवान् को अर्पित हैं।
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः। शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ १८ ॥
अन्वय
(यः) शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः समः, शीतोष्णसुखदुःखेषु समः, सङ्गविवर्जितः —
हिन्दी अनुवाद
जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी-गर्मी और सुख-दुःखादि द्वन्द्वों में सम है और आसक्ति से रहित है —
भावार्थ
समता के विभिन्न रूप — शत्रु और मित्र में समान भाव (सामाजिक समता), मान और अपमान में समान (प्रतिष्ठा के प्रति समता), सर्दी-गर्मी में समान (शारीरिक समता) और सुख-दुःख में समान (मानसिक समता)। और वह 'सङ्गविवर्जित' — आसक्ति से रहित — है। शत्रु के प्रति समता सबसे कठिन है; इसका अर्थ यह नहीं कि शत्रु से मित्र जैसा व्यवहार करें, बल्कि यह कि मन में उसके प्रति द्वेष न रखें। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्। अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥
अन्वय
तुल्यनिन्दास्तुतिः, मौनी, येन केनचित् सन्तुष्टः, अनिकेतः, स्थिरमतिः, भक्तिमान् (यः) नरः, (सः) मे प्रियः।
हिन्दी अनुवाद
जो निन्दा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही सन्तुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है — वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान् पुरुष मुझको प्रिय है।
भावार्थ
अन्तिम लक्षण — 'तुल्यनिन्दास्तुति' (निन्दा और प्रशंसा को समान मानने वाला), 'मौनी' (मननशील, कम बोलने वाला), 'येन केनचित् सन्तुष्ट' (जो कुछ मिल जाये, उसी में सन्तुष्ट), 'अनिकेत' (घर के प्रति ममता न रखने वाला) और 'स्थिरमति' (स्थिर बुद्धि वाला)। निन्दा और स्तुति दोनों दूसरों के विचार हैं; वे हमारे वास्तविक स्वरूप को नहीं बदलते। जो इसे समझ लेता है, वह दूसरों की राय का दास नहीं रहता। 'अनिकेत' का अर्थ बेघर होना नहीं, बल्कि घर से आसक्ति न रखना है।
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते। श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥
अन्वय
तु ये श्रद्दधानाः मत्परमाः भक्ताः इदं यथोक्तं धर्म्यामृतं पर्युपासते, ते मे अतीव प्रियाः।
हिन्दी अनुवाद
परन्तु जो श्रद्धायुक्त पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं।
भावार्थ
बारहवें अध्याय का समापन — भगवान् ने जो भक्त के लक्षण बताये, उन्हें 'धर्म्यामृत' — धर्ममय अमृत — कहा गया है। जो श्रद्धालु, भगवान् को परम लक्ष्य मानने वाले भक्त इस अमृत का सेवन करते हैं — अर्थात् इन गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करते हैं — वे भगवान् को 'अतीव प्रिय' — अत्यन्त प्रिय — हैं। ध्यान दें — पहले के श्लोकों में 'प्रिय' कहा, यहाँ 'अतीव प्रिय'। जो इन गुणों को पूरी तरह पा चुके हैं, वे प्रिय हैं; पर जो उन्हें पाने का प्रयास कर रहे हैं, वे और भी प्रिय हैं! यह साधकों के लिये अद्भुत प्रोत्साहन है। यह अध्याय 'भक्तियोग' कहलाता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥

ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।
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