🪷 श्रीमद्भगवद्गीता
मूल श्लोक, अन्वय, सरल हिन्दी अनुवाद एवं विस्तृत भावार्थ सहित
१८ अध्याय · ७०० मूल श्लोक · सभी श्लोकों पर अन्वय, सरल हिन्दी अनुवाद एवं विस्तृत भावार्थ
🌟 प्रसिद्ध श्लोक
📚 अष्टादश अध्याय
४७ श्लोक१. अर्जुनविषादयोगकुरुक्षेत्र में दोनों सेनाओं का वर्णन; स्वजनों को देखकर अर्जुन का शोक, मोह और युद्ध से विमुख होना।
७२ श्लोक२. सांख्ययोगआत्मा की अमरता, स्वधर्म, निष्काम कर्मयोग का सूत्र (कर्मण्येवाधिकारस्ते) और स्थितप्रज्ञ के लक्षण।
४३ श्लोक३. कर्मयोगकर्म क्यों आवश्यक है; यज्ञ-चक्र, लोकसंग्रह, स्वधर्म और काम रूपी शत्रु पर विजय।
४२ श्लोक४. ज्ञानकर्मसंन्यासयोगयोग की परम्परा, अवतार-तत्त्व (यदा यदा हि धर्मस्य), कर्म-अकर्म-विकर्म, यज्ञ के प्रकार और ज्ञान की महिमा।
२९ श्लोक५. कर्मसंन्यासयोगसंन्यास और कर्मयोग की तुलना; जल में कमल-पत्र की भाँति निर्लिप्त कर्म; समदर्शी ज्ञानी।
४७ श्लोक६. आत्मसंयमयोगआत्मोद्धार (उद्धरेदात्मनात्मानम्), ध्यान की विधि, मन का निग्रह — अभ्यास और वैराग्य, योगभ्रष्ट की गति।
३० श्लोक७. ज्ञानविज्ञानयोगभगवान् की परा-अपरा प्रकृति, सर्वत्र भगवद्-विभूति, माया-तरण और चार प्रकार के भक्त।
२८ श्लोक८. अक्षरब्रह्मयोगब्रह्म, अध्यात्म, कर्म आदि की परिभाषा; अन्तकाल का स्मरण; शुक्ल-कृष्ण गति।
३४ श्लोक९. राजविद्याराजगुह्ययोगपरम गोपनीय राजविद्या; अनन्य भक्ति, योगक्षेम का वचन, पत्र-पुष्प-फल-तोय का भाव।
४२ श्लोक१०. विभूतियोगभगवान् की दिव्य विभूतियाँ; चतुःश्लोकी (अहं सर्वस्य प्रभवः); सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ उनका ही अंश।
५५ श्लोक११. विश्वरूपदर्शनयोगअर्जुन को दिव्य दृष्टि और विश्वरूप-दर्शन; कालोऽस्मि; अर्जुन की स्तुति और क्षमा-याचना।
२० श्लोक१२. भक्तियोगसाकार और निराकार उपासना; साधना के क्रमिक सोपान; भगवान् के प्रिय भक्त के लक्षण।
३४ श्लोक१३. क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगक्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा); ज्ञान के बीस लक्षण; ज्ञेय परमात्मा; प्रकृति-पुरुष।
२७ श्लोक१४. गुणत्रयविभागयोगसत्त्व, रज और तम — तीन गुणों का स्वरूप, बन्धन और फल; गुणातीत के लक्षण।
२० श्लोक१५. पुरुषोत्तमयोगउल्टा संसार-वृक्ष (ऊर्ध्वमूल अश्वत्थ); जीव भगवान् का अंश; क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम।
२४ श्लोक१६. दैवासुरसम्पद्विभागयोगदैवी और आसुरी सम्पदा; काम, क्रोध, लोभ — नरक के तीन द्वार; शास्त्र ही प्रमाण।
२८ श्लोक१७. श्रद्धात्रयविभागयोगतीन प्रकार की श्रद्धा; सात्त्विक-राजस-तामस आहार, यज्ञ, तप और दान; ॐ तत्सत्।
७८ श्लोक१८. मोक्षसंन्यासयोगत्याग और संन्यास; गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति, सुख; स्वधर्म; शरणागति (सर्वधर्मान्परित्यज्य)।
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