🕉️ 26 September 2026, Saturday · 05:31:00 AM · CDSHARMA.IN

चाक्षुषोपनिषद् (चाक्षुषी विद्या): नेत्र रोग निवारण एवं दृष्टि रक्षा हेतु सम्पूर्ण पाठ व विधि | cdsharma.in

✍️ CD Sharma · 📅 19 Sep 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ चाक्षुषोपनिषद्, चाक्षुषी विद्या, नेत्र रोग निवारक मंत्र, सूर्य देव मंत्र, कृष्ण यजुर्वेद, दृष्टि दोष निवारण, चाक्षुषी विद्या पाठ, Chakshushopanishad, Chakshushi Vidya, Netra Rog Nivaran Mantra, Surya Upasana, Krishna Yajurveda, Vedic Mantra for Eyes

👁️ 14 बार देखा गया · 🔗 0 बार शेयर हुआ

चाक्षुषोपनिषद् (चाक्षुषी विद्या): नेत्र रोग निवारण एवं दृष्टि रक्षा हेतु सम्पूर्ण पाठ व विधि | cdsharma.in

चाक्षुषोपनिषद् (चाक्षुषी विद्या)

चाक्षुषोपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद की एक अत्यंत सिद्ध और कल्याणकारी विद्या है। इसे 'चाक्षुषी विद्या' अथवा 'चाक्षुष्मती विद्या' भी कहा जाता है। सनातन परंपरा में नेत्र रोगों की निवृत्ति, नेत्र ज्योति की स्थिरता तथा दृष्टि दोषों से मुक्ति के लिए भगवान भुवन भास्कर की आराधना के रूप में इसका नित्य पाठ अचूक फलदायी माना गया है।

विनियोग

हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर निम्नलिखित विनियोग मंत्र का उच्चारण करें और जल भूमि पर छोड़ दें:

ॐ अस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुध्न्य ऋषिर्गायत्री छन्दः सूर्यो देवता चक्षूरोगनिवृत्तये विनियोगः ।

मूल चाक्षुषी विद्या पाठ

ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव । मां पाहि पाहि । त्वरितं चक्षूरोगान् शमय शमय । मम जातरूपं तेजो दर्शय दर्शय । यथा अहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कल्पय । कल्याणं कुरु कुरु । यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि चक्षुःप्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय ।

ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय । ॐ नमः करुणाकराय अमृताय । ॐ नमः सूर्याय । ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नमः । खेचराय नमः । महते नमः । रजसे नमः । तमसे नमः । असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । उष्णो भगवाञ्छुचिरूपः । हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः ।

फलश्रुति

य इमां चाक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति । न तस्य कुले अन्धो भवति । अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति । ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी स्वाहा ।

॥ श्रीकृष्णयजुर्वेदीया चाक्षुषी विद्या सम्पूर्णा ॥

पाठ विधि एवं आवश्यक नियम

  • नित्य समय: प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करें और पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • पाठ क्रम: सूर्यदेव का ध्यान करते हुए प्रतिदिन श्रद्धा और विश्वासपूर्वक इस विद्या का कम से कम एक, तीन या बारह बार पाठ करें।
  • अर्घ्य दान: पाठ समाप्त होने के उपरांत तांबे के लोटे में शुद्ध जल, लाल चंदन, रोली, अक्षत और लाल पुष्प मिलाकर भगवान सूर्यनारायण को भक्तिभाव से अर्घ्य दें तथा नमस्कार करें।
  • आंखों पर जल लगाना: तांबे के पात्र के जल से अपनी दोनों आंखों को हल्के से स्पर्श करना भी अत्यंत शुभ माना गया है।

प्रमुख लाभ

  • श्रद्धापूर्वक नित्य पाठ करने से नेत्रों के सभी प्रकार के विकार, जलन, कम दिखना व अन्य रोग धीरे-धीरे शांत हो जाते हैं।
  • आंखों की प्राकृतिक रोशनी (तेज) स्थिर और दीर्घायु बनी रहती है।
  • मान्यता है कि इस विद्या का नियमित पाठ करने वाले साधक के कुल-वंश में कोई अंधा नहीं होता।


💬 कमेंट (0)

8 - 1 = ?

अभी कोई कमेंट नहीं — सबसे पहले आप लिखें!

📚 संबंधित लेख

← सभी लेख देखें

💬 ज्योतिषीय प्रश्न पूछें