✍️ CD Sharma · 📅 19 Sep 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ परा पूजा (Para Puja), आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya), अद्वैत वेदान्त (Advaita Vedanta), निर्गुण उपासना (Nirguna Upasana), सोऽहम् भाव (Soham Bhava), आत्मज्ञान (Self Realization), cdsharma.in
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'परा पूजा' आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अद्वैत वेदान्त का एक अत्यंत गूढ़ स्तोत्र है। सामान्य पूजा बाह्य उपादानों (आवाहन, स्नान, पुष्प, दीप, नैवेद्य आदि षोडशोपचार) द्वारा होती है, परंतु 'परा पूजा' उस उच्चतम स्थिति का बोध कराती है जहाँ साधक और ईश्वर के मध्य का द्वैत समाप्त हो जाता है। जब सर्वत्र वही एक अखंड चैतन्य व्याप्त है, तब बाह्य कर्मकांड किसके लिए और कैसे संभव है—यही इस स्तोत्र का मूल मर्म है।
अखण्डे सच्चिदानन्दे निर्विकल्पैकरूपिणि। स्थितेऽद्वितीयभावेऽस्मिन् कथं पूजा विधीयते॥१॥
अर्थ: जो अखंड, सत्-चित्-आनंद स्वरूप, निर्विकल्प और एकरस है; उस अद्वितीय (अद्वैत) भाव में स्थित हो जाने के बाद बाह्य पूजा कैसे संपन्न की जा सकती है?
पूर्णस्यावाहनं कुत्र सर्वाधारस्य चासनम्।
स्वच्छस्य पाद्यमर्घ्यं तु शुद्धस्याचमनं कुतः॥२॥
अर्थ: जो स्वयं सर्वत्र परिपूर्ण है, उसका आवाहन (बुलाना) कहाँ किया जाए? जो संपूर्ण जगत का आधार है, उसे बैठने के लिए क्या आसन दिया जाए? जो स्वतः स्वच्छ है, उसे चरण प्रक्षालन हेतु पाद्य व अर्घ्य कैसा, और जो नित्य शुद्ध है, उसे आचमन क्या कराया जाए?
निर्मलस्य कुतः स्नानं वस्त्रं विश्वोदरस्य च। निरालम्बस्योपवीतं पुष्पं निर्वासनस्य च॥३॥
अर्थ: जो नित्य निर्मल है, उसे स्नान कराने का क्या औचित्य? जिसके उदर में सम्पूर्ण ब्रह्मांड समाहित है, उसे वस्त्र क्या ओढ़ाया जाए? जो निरालंब (आलंबन-रहित) है, उसे यज्ञोपवीत कैसा, और जो सर्वथा वासना-मुक्त है, उसे गंधयुक्त पुष्प कैसे चढ़ाए जाएँ?
निर्लेपस्य कुतो गन्धः पुष्पं निर्वासनस्य च।
निर्विशेषस्य का भूषा कोऽलङ्कारो निराकृतेः॥४॥
अर्थ: जो सर्वथा निर्लेप और असंग है, उसे चंदन/गंध का लेप कैसे लगाया जाए? जो निर्विशेष (विशेषणों से परे) और निराकार है, उसे कौन-सा आभूषण या अलंकार पहनाया जाए?
निर्गन्धस्य कुतो धूपं स्वप्रकाशस्य दीपकम्।
नित्यतृप्तस्य नैवेद्यं ताम्बूलं च कुतो विभोः॥५॥
अर्थ: जो भौतिक गंध से परे है, उसे धूप क्या दिखाना? जो स्वयं प्रकाशित है और जिसके प्रकाश से सूर्य-चंद्र प्रकाशित होते हैं, उसे दीपक क्या दिखाना? जो नित्य तृप्त है, उसे नैवेद्य और ताम्बूल (पान) कैसे अर्पित किया जाए?
प्रदक्षिणा ह्यनन्तस्य ह्यद्वयस्य कुतो नतिः।
वेदवाक्यैरवेद्यस्य कुतः स्तोत्रं विधीयते॥६॥
अर्थ: जो अनंत और असीम है, उसकी परिक्रमा (प्रदक्षिणा) कैसे संभव है? जहाँ कोई दूसरा है ही नहीं (अद्वैत), वहाँ नमस्कार कौन किसे करे? और जिसे वेद-वाक्य भी केवल 'नेति-नेति' कहकर पूर्णतः वर्णित नहीं कर पाते, उसका शब्दों में स्तोत्र-गान कैसे हो?
स्वयंप्रकाशमानस्य कुतो नीराजनं विभोः।
अन्तर्बहिश्च पूर्णस्य कथमुद्वासनं भवेत्॥७॥
अर्थ: जो स्वयं प्रकाशित परम सत्ता है, उसकी आरती (नीराजन) कैसे उतारी जाए? और जो भीतर व बाहर समान रूप से सदा परिपूर्ण है, उसका विसर्जन (उद्वासन) कैसे किया जा सकता है?
देहो देवालयः प्रोक्तो जीवो देवः सदाशिवः। त्यजेदज्ञाननिर्माल्यं सोऽहंभावेन पूजयेत्॥८॥
अर्थ: यह देह ही देवालय (मंदिर) है और इसमें निवास करने वाला जीवात्मा ही साक्षात सदाशिव है। अज्ञान रूपी बासी पुष्पों (निर्माल्य) को त्यागकर 'सोऽहम्' (वह परमात्मा मैं ही हूँ) के भाव से स्वयं में स्थित शिव की पूजा करनी चाहिए।
एवमेव परा पूजा सर्वावस्थासु सर्वदा।
एकबुद्ध्या तु देवेश विधेया ब्रह्मवित्तमैः॥९॥
अर्थ: श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ताओं द्वारा सभी अवस्थाओं में, सर्वदा, इसी अखंड अद्वैत बुद्धि के साथ की जाने वाली उपासना ही वास्तविक 'परा पूजा' है।
तुभ्यमहमनन्ताय मह्यं तुभ्यं शिवात्मने।
नमो देवाधिदेवाय पराय परमात्मने॥१०॥
अर्थ: मुझमें और आपमें अभिन्न रूप से स्थित उस अनंत शिवात्मा को, देवाधिदेव परब्रह्म परमात्मा को नमन है।
योगी देहाभिमानी स्याद्भोगी कर्मणि तत्परः।
ज्ञानी मोक्षाभिमानी स्यात्तत्त्वज्ञे न त्वभिमानिता॥११॥
अर्थ: योगी को अपने देह/साधना का, भोगी को अपने कर्मों का और ज्ञानी को मोक्ष का अभिमान हो सकता है; परंतु जो वास्तविक 'तत्वज्ञानी' है, वह सभी प्रकार के अभिमान से मुक्त होता है।
किं करोमि क्व गच्छामि किं गृह्णामि त्यजामि किम् ।
आत्मना पूरितं सर्वं महाकल्पाम्बुना सदा॥१२॥
अर्थ: अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, क्या ग्रहण करूँ और किसका त्याग करूँ? जैसे प्रलयकाल के अथाह जल से सब कुछ भर जाता है, वैसे ही यह संपूर्ण चराचर जगत अब केवल आत्मतत्त्व से ही परिपूर्ण दिखाई देता है।
परा पूजा बाह्य विधियों का निषेध नहीं करती, बल्कि साधक को यह दृष्टि देती है कि समस्त कर्मकांडों का अंतिम लक्ष्य अपने भीतर स्थित आत्म-स्वरूप शिव का साक्षात्कार करना है। जब साधक 'सोऽहम्' भाव में प्रतिष्ठित होता है, तब उसका प्रत्येक श्वास और प्रत्येक कर्म ही पूजा बन जाता है।
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