✍️ CD Sharma · 📅 19 Sep 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ हलषष्ठी व्रत कथा, Hal Shashthi Vrat Katha, हरछठ व्रत, ललही छठ, बलराम जयंती, संतान रक्षा व्रत, हलषष्ठी माता की आरती, cdsharma.in
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सनातन धर्म में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हलषष्ठी (जिसे लोकभाषा में हरछठ, ललही छठ, अथवा बलदेव छठ) के रूप में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इसी पावन तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भ्राता और शेषनागावतार भगवान श्री बलराम जी का प्राकट्य हुआ था, जिनका मुख्य आयुध 'हल' और 'मूसल' है।
यह व्रत माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, रक्षा और कुल वृद्धि की मंगलकामना से रखती हैं।
(राजा चन्द्रव्रत एवं राजकुमार के जीवनदान की कथा)
मथुरा के राजा कंस जब अपनी चचेरी बहन देवकी का विवाह संपन्न कराकर उन्हें विदा करने जा रहे थे, तभी आकाशवाणी हुई— "हे कंस! जिस बहन को तू बड़े प्रेम से विदा कर रहा है, उसी का आठवाँ पुत्र तेरी मृत्यु का काल बनेगा।" यह सुनते ही क्रूर कंस ने अपनी बहन और बहनोई वसुदेव को कारागार में डाल दिया तथा एक-एक कर उनके छह नवजात बालकों का वध कर दिया।
जब सातवें गर्भ के आगमन का समय निकट आया, तो देवकी अत्यंत भयभीत और शोकाकुल रहने लगीं। तब देवर्षि नारद जी कारागार में पधारे। देवकी के आर्तनाद को सुनकर नारद जी ने उन्हें हलषष्ठी देवी के व्रत का उपदेश दिया। जब देवकी ने इस व्रत के माहात्म्य और पुरातन इतिहास के विषय में पूछा, तब नारद जी ने प्रथम कथा सुनाई:
प्राचीन काल में आर्यावर्त में चन्द्रव्रत नाम के एक महाप्रतापी और धर्मात्मा राजा हुए। उनका केवल एक ही लाडला पुत्र था। राजा ने प्रजा और राहगीरों की प्यास बुझाने के उद्देश्य से एक विशाल तालाब खुदवाया। परंतु विधाता का ऐसा विधान रहा कि उस तालाब में जल की एक बूंद भी न ठहरी और वह सर्वथा सूख गया। जो भी राहगीर उस सूखे तालाब को देखता, वह राजा को अपशब्द कहता। राजा अत्यंत दुखी हुए कि मेरा धन और धर्म दोनों व्यर्थ हो गए।
उसी रात्रि वरुण देव ने राजा को स्वप्न में दर्शन देकर कहा— "हे राजन! यदि तुम इस तालाब में अपने इकलौते पुत्र की बलि दोगे, तो यह अमृत तुल्य जल से लबालब भर जाएगा।" प्रातः राजा ने भारी मन से राजदरबार में यह बात कही, परंतु स्पष्ट किया कि भले ही मेरा धर्म और धन व्यर्थ चला जाए, मैं अपने प्राणप्रिय पुत्र की बलि कभी नहीं दूंगा।
यह बात हवा की भांति फैलती हुई राजकुमार तक जा पहुंची। राजकुमार ने विचार किया कि यदि मेरे एक जीवन के त्याग से समस्त जगत और प्यासी प्रजा का कल्याण होता है, तो मेरा जीवन सार्थक हो जाएगा। यह सोचकर राजकुमार ने चुपचाप उस सूखे सरोवर के मध्य में जाकर अपने प्राण अर्पित कर दिए। उसी क्षण धरती से अगाध जलधारा फूट पड़ी और सरोवर लबालब भर गया।
इकलौते पुत्र के वियोग में व्याकुल होकर राजा-रानी राजपाट छोड़कर वन की ओर निकल पड़े। वन में राजा ने देखा कि पांच पतिव्रता स्त्रियां किसी दिव्य व्रत का अनुष्ठान कर रही हैं। राजा के पूछने पर उन स्त्रियों ने विधिपूर्वक हलषष्ठी व्रत का माहात्म्य बतलाया। राजा-रानी ने अपने नगर लौटकर पूर्ण श्रद्धा से हलषष्ठी महारानी का उपवास और पूजन किया। व्रत के अलौकिक प्रभाव से उनका मृत राजकुमार सरोवर से दिव्य स्वरूप में जीवित बाहर निकल आया। राजा-रानी ने आनंदपूर्वक पुत्र को गले लगाया और जीवनपर्यंत प्रतिवर्ष हलषष्ठी माता का व्रत करते रहे।
॥ इति श्री हलषष्ठी व्रत कथा प्रथमोऽध्यायः ॥
(मानवती के निष्कपट प्रेम एवं पुत्र रक्षा की कथा)
देवर्षि नारद जी ने देवकी को आगे की महिमा सुनाते हुए दूसरा प्रसंग सुनाया:
अवंतिका (उज्जैन) नगरी में संपत लाल नामक एक संपन्न व्यक्ति रहता था। उसकी दो पत्नियां थीं— बड़ी का नाम रेवती और छोटी का नाम मानवती था। रेवती निसंतान थी, जबकि मानवती के दो अत्यंत सुंदर और गुणवान पुत्र थे। रेवती दिन-रात सौतिया डाह की अग्नि में जलती रहती थी और किसी भी प्रकार उन बालकों का अंत करने की योजना बनाती रहती थी।
एक दिन रेवती ने छलपूर्वक मानवती से कहा— "बहन! आज तुम्हारे मायके से कुछ यात्री आए थे। उन्होंने बताया कि तुम्हारे पूज्य पिता अत्यंत अस्वस्थ हैं और तुम्हें देखने की अभिलाषा रखते हैं। तुम तुरंत मायके जाओ, तुम्हारे लौटने तक तुम्हारे दोनों बालकों की देखरेख मैं अपनी जान देकर भी करूंगी।"
सरल हृदया मानवती सौत के कपट को न समझ सकी और बालकों को रेवती के हाथों सौंपकर मायके चली गई। मानवती के जाते ही पापिनी रेवती ने उन दोनों अबोध बालकों को मार डाला और उनके शवों को घने जंगल में फेंक आई।
उधर जब मानवती मायके पहुंची, तो पिता को पूर्ण स्वस्थ पाकर चकित रह गई। उसने पिता को रेवती की कही बात बताई और शीघ्र घर लौटने की आज्ञा मांगी। तब मानवती की माता ने कहा— "पुत्री! आज हलषष्ठी (ललही छठ) का पावन पर्व है। माताएं आज अपनी संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। अतः आज तू यह व्रत यहीं पूर्ण कर, कल प्रातः अपने घर जाना।"
मानवती ने माता के कथनानुसार पूर्ण निष्ठा से हलषष्ठी देवी का व्रत रखा और आर्तभाव से प्रार्थना की— "हे हलषष्ठी महारानी! मेरे दोनों बालकों पर कभी कोई आंच न आए, आप ही उनकी रक्षक हैं।"
अगले दिन जब वह ससुराल लौट रही थी, तो मार्ग के उसी वन में उसने अपने दोनों पुत्रों को जीवित और हंसते-खेलते देखा। विस्मित होकर जब उसने बच्चों से पूछा, तो बालकों ने कहा— "माँ! तुम्हारे जाने के बाद हमारी दूसरी माँ ने हमें मारकर यहाँ फेंक दिया था, परंतु तभी एक तेजस्वी दिव्य देवी आईं और उन्होंने हम पर अमृत छिड़क कर जीवित कर दिया।"
मानवती समझ गई कि यह सब हलषष्ठी माता के व्रत का ही साक्षात चमत्कार है। वह अश्रु-पूरित नयनों से माता की जय-जयकार करती हुई बालकों को लेकर घर आई। नगर की अन्य स्त्रियों ने जब यह चमत्कार देखा, तो सभी हलषष्ठी व्रत का नियमित अनुष्ठान करने लगीं।
॥ इति श्री हलषष्ठी व्रत कथा द्वितीयोऽध्यायः ॥
(वणिक दंपत्ति और 'पोता' लगाने की दिव्य विधि)
नारद जी ने कहा— हे देवकी! अब इस व्रत के तीसरे अध्याय का श्रवण करो:
दक्षिण देश के एक सुंदर नगर में एक संस्कारी और धर्मात्मा बनिया अपनी पत्नी सहित निवास करता था। दंपत्ति अत्यंत धार्मिक थे, परंतु उनके भाग्य में गहरा संताप था। बनिया की पत्नी जब भी संतान को जन्म देती, वह बालक कुछ ही समय पश्चात काल का ग्रास बन जाता। इस प्रकार एक-एक करके उनके छह पुत्र अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गए।
संतान शोक से जर्जर होकर दोनों पति-पत्नी ने आत्महत्या का विचार किया और वन की ओर चल पड़े। वन में उन्हें एक सिद्ध तपस्वी साधु के दर्शन हुए। बनिया दंपत्ति ने रोते हुए मुनि के चरण पकड़ लिए और अपनी व्यथा कह सुनाई।
दयालु साधु ने समाधिस्थ होकर दिव्य दृष्टि से यमलोक, वरुणलोक और इंद्रलोक में उन बालकों की आत्माओं को खोजा, परंतु वे कहीं न मिले। अंततः मुनि ने ब्रह्मलोक में जाकर उन छहों बालकों को देखा। मुनि ने उनसे कहा— "हे बालकों! तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे वियोग में अपने प्राण त्याग रहे हैं, तुम पुनः उनके गर्भ में जाकर उन्हें सुख क्यों नहीं देते?"
उन दिव्य आत्माओं ने हाथ जोड़कर कहा— "हे मुनिवर! हम पूर्व जन्मों के अपने-अपने कर्मभोग के अनुसार उनके ऋणानुबंध से बंधे थे। अब हम जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो चुके हैं, अतः हम पुनः मृत्युलोक में नहीं लौट सकते।"
तब साधु ने पूछा— "हे पुण्यात्माओं! ऐसा कोई उपाय बताओ जिससे इस वणिक दंपत्ति को दीर्घायु संतान की प्राप्ति हो सके?"
आत्माओं ने बतलाया— "यदि हमारे माता-पिता भाद्रपद कृष्ण षष्ठी को माता हलषष्ठी का विधिवत व्रत रखें, महुआ व तिन्नी के चावल से पूजन करें और व्रतोपरांत जल में भिगोए हुए नए वस्त्र (जिसे 'पोता' कहा जाता है) को अपनी होने वाली संतान के अंगों पर फेरें, तो माता हलषष्ठी की कृपा से उनका बालक अकाल मृत्यु से मुक्त होकर शतायु होगा।"
मुनि ने ध्यान से लौटकर बनिया को यह संपूर्ण विधान समझाया। दंपत्ति ने घर लौटकर हलषष्ठी व्रत का निष्ठापूर्वक पालन किया। माता की अनुकंपा से सेठानी ने पुनः एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। उन्होंने साधु के निर्देशानुसार बालक को 'पोता' लगाया। वह बालक दीर्घायु हुआ और उनका परिवार सुख-समृद्धि से संपन्न हो गया।
॥ इति श्री हलषष्ठी व्रत कथा तृतीयोऽध्यायः ॥
(श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर संवाद, हस्ती राजकुमार एवं उत्तरा-परीक्षित प्रसंग)
महाभारत युद्ध के उपरांत जब दुष्ट अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश को नष्ट करने के उद्देश्य से अभिमन्यु की गर्भवती पत्नी उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र का संधान कर दिया, तब द्रौपदी, सुभद्रा और उत्तरा के करुण विलाप से तीनों लोक कांप उठे।
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से करबद्ध होकर निवेदन किया— "हे जनार्दन! हमारे पाँचों पौत्र मारे गए, अभिमन्यु चला गया और अब उत्तरा के गर्भस्थ शिशु को ब्रह्मास्त्र ने निष्तेज कर दिया है। इस महाशोक से उबरने का कोई दैवीय उपाय बतलाइए।"
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा— "हे राजन! भाद्रपद कृष्ण षष्ठी को किया जाने वाला हलषष्ठी व्रत समस्त अकाल मृत्यु और गर्भ दोषों का संहारक है। इस व्रत के प्रभाव से मृत गर्भ भी पुनः प्राणवान हो जाता है। पूर्वकाल में भी इस व्रत ने असंभव को संभव किया था।"
श्रीकृष्ण ने कथा सुनाई: प्राचीन समय में राजा सुभद्र और उनकी महारानी सुवर्णा का 'हस्ती' नाम का एक अत्यंत लाडला राजकुमार था। एक दिन राजकुमार अपनी धाय माँ के साथ गंगा स्नान के लिए गया। बालक जल में क्रीड़ा कर रहा था कि अचानक एक विशाल ग्राह (मगरमच्छ) उसे गहरे जल में खींचकर ले गया।
भयभीत धाय माँ ने जब राजमहल आकर यह वृत्तांत सुनाया, तो रानी सुवर्णा ने क्रोध के उन्माद में आकर धाय माँ के इकलौते पुत्र को धधकती हुई आग की भट्टी में झोंक दिया। पुत्र शोक से पागल हुई धाय माँ रोती-बिलखती निर्जन वन में एक पुराने शिव मंदिर में जा बैठी। वहां उसने वन के सूखे तृण, महुआ और जल पर रहकर देवाधिदेव शिव, माता पार्वती और कार्तिकेय-गणेश का पूजन आरंभ किया।
उधर नगर में चमत्कार हुआ कि धाय का पुत्र जलती भट्टी से हंसता-खेलता हुआ जीवित बाहर निकल आया। उसी समय संयोगवश महर्षि दुर्वासा राजमहल पधारे। राजा-रानी के पूछने पर दुर्वासा जी ने बताया कि यह धाय माँ द्वारा वन में किए गए अनायास हलषष्ठी व्रत और शिव आराधना का ही अलौकिक फल है।
राजा-रानी दुर्वासा जी के साथ वन में पहुंचे और धाय माँ के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी तथा व्रत का संपूर्ण विधान पूछा। राजा-रानी ने भी उस व्रत को विधिपूर्वक किया। व्रत के प्रभाव से गंगा की लहरों से राजकुमार हस्ती ग्राह के पेट से सकुशल बाहर निकल आया। उसी प्रतापी बालक हस्ती ने आगे चलकर अपनी राजधानी 'हस्तिनापुर' की स्थापना की।
श्रीकृष्ण ने कहा— "हे युधिष्ठिर! वही हलषष्ठी व्रत मेरी माता देवकी ने नारद जी के कहने पर किया था, जिससे हम भाइयों की रक्षा हुई। अब आप उत्तरा से यह व्रत करवाएं।" युधिष्ठिर ने उत्तरा से यह व्रत करवाया, जिसके पुण्य प्रभाव से ब्रह्मास्त्र से दग्ध हुआ उत्तरा का मृत बालक पुनः जीवित हो गया, जो आगे चलकर चक्रवर्ती महाराजा परीक्षित के नाम से विख्यात हुआ।
॥ इति श्री हलषष्ठी कृष्ण युधिष्ठिर संवादे चतुर्थोऽध्यायः ॥
(ग्वालिन का लोभ, असत्य भाषण और प्रायश्चित्त)
हलषष्ठी माता के नियमों की कठोरता और सत्यनिष्ठा को दर्शाने वाला यह पांचवां आख्यान अत्यंत प्रसिद्ध है:
प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी। उसका प्रसव काल अत्यंत सन्निकट था। एक ओर वह प्रसव पीड़ा से छटपटा रही थी, तो दूसरी ओर उसके मन में लोभ समाया हुआ था कि यदि प्रसव हो गया तो उसका एकत्र किया हुआ दूध-दही यूं ही नष्ट हो जाएगा। लोभवश वह मटके सिर पर रखकर दूध बेचने निकल पड़ी।
मार्ग में असह्य पीड़ा होने पर उसने एक झरबेरी (कांटेदार झाड़ी) की ओट में जाकर एक सुंदर बालक को जन्म दिया। ममता को त्यागकर, लोभ के वशीभूत हो वह नवजात शिशु को वहीं जमीन पर लिटाकर दूध बेचने गांव की ओर चली गई।
संयोग से उस दिन हलषष्ठी की तिथि थी। गांव की भोली-भाली माताएं व्रत हेतु केवल भैंस का दूध खोज रही थीं। ग्वालिन ने अधिक धन कमाने के लालच में गाय और भैंस के दूध को मिला दिया और झूठ बोलकर उसे 'केवल भैंस का शुद्ध दूध' कहकर बेच दिया, जिससे कई माताओं का व्रत खंडित होने की स्थिति में आ गया।
उधर, जिस झरबेरी के नीचे बालक पड़ा था, समीप के खेत में एक किसान हल चला रहा था। अचानक उसके बैल बिदक गए और हल का नुकीला फल उस बालक के पेट में जा घुसा, जिससे बालक का पेट फट गया और वह तत्क्षण मर गया। किसान अत्यंत भयभीत और दुखी हुआ। उसने कापते हाथों से उसी झरबेरी के कांटों से उस बच्चे के फटे पेट को सिया और डर के मारे वहां से भाग गया।
जब ग्वालिन दूध बेचकर लौटी, तो बच्चे का क्षत-विक्षत मृत शरीर देखकर उसके होश उड़ गए। उसे समझते देर न लगी कि यह उसके द्वारा धर्म भ्रष्ट करने और स्वार्थ के लिए बोले गए झूठ का ही दंड है। उसने विचार किया कि यदि मैंने अपने पाप को छुपाया तो मेरा वंश कभी नहीं बचेगा।
वह पश्चाताप की अग्नि में जलती हुई उसी क्षण गांव में लौटी। उसने घर-घर जाकर अपनी करतूत बताई और रोते हुए चीख प"माताओं! मैंने धन के लोभ में गाय का दूध मिलाकर आपका धर्म भ्रष्ट किया, जिसकी सजा माता हलषष्ठी ने मेरे बच्चे के प्राण लेकर दी है। कृपा कर मुझे क्षमा कर दो!"
गांव की माताओं ने जब उसका सच्चा पश्चाताप देखा, तो उन्होंने स्वधर्म की रक्षा हेतु उसे हृदय से क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया। ग्वालिन जब रोती हुई पुनः झरबेरी के पास पहुंची, तो उसने देखा कि उसका पुत्र जीवित होकर अंगूठा चूस रहा था और उसके पेट के घाव भर चुके थे। उस दिन से ग्वालिन ने प्रण लिया कि वह जीवन में कभी असत्य भाषण नहीं करेगी।
॥ इति श्री हलषष्ठी व्रत कथा पञ्चमोऽध्यायः ॥
(देवरानी-जेठानी एवं श्वान की कथा)
काशीपुरी में दो देवरानी-जेठानी रहती थीं। देवरानी का नाम तारा और जेठानी का नाम विद्यावती था। अपने नाम के अनुसार तारा उग्र, क्रोधी और संकीर्ण स्वभाव की थी, जबकि विद्यावती अत्यंत दयालु, शांत और धर्मनिष्ठ थी।
एक बार हलषष्ठी के दिन दोनों ने खीर बनाई और ठंडा होने के लिए आंगन में रख दी। तभी दो भूखे कुत्ते वहां आए और खीर खाने लगे। आवाज सुनकर दोनों बाहर निकलीं। विद्यावती ने देखा कि कुत्ता खीर खा रहा है, तो उसने विचार किया कि यह भी ईश्वर का ही भूखा जीव है। उसने जूठी हुई खीर को फेंकने के बजाय बची हुई शेष खीर भी उस भूखे कुत्ते के आगे प्रेमपूर्वक परोस दी।
दूसरी ओर तारा ने क्रोध में आकर दूसरे कुत्ते को लाठी से पीटना आरंभ कर दिया और उसे एक कमरे में बंद कर इतना मारा कि वह अधमरा हो गया। जैसे-तैसे जान बचाकर वह कुत्ता बाहर भागा।
अगले दिन दोनों कुत्ते मिले। विद्यावती की खीर खाने वाले कुत्ते ने कहा— "वह जेठानी अत्यंत दयालु थी, उसने मुझे भरपेट भोजन दिया। भगवान करे अगले जन्म में मैं उसी की कोख से पुत्र बनकर जन्म लूँ ताकि उसकी सेवा कर सकूं।" वहीं तारा की मार से आहत दूसरे कुत्ते ने प्रतिशोध की भावना से कहा— "मैं उस दुष्ट स्त्री की कोख से जन्म लूँगा और बार-बार मरकर उसे पुत्र-शोक का असह्य दुख दूंगा।"
तारा की मार से घायल हुआ वह कुत्ता कुछ दिनों बाद मर गया। अगले वर्ष हलषष्ठी के दिन तारा के गर्भ से एक सुंदर बालक ने जन्म लिया, परंतु विडंबना यह हुई कि ठीक एक वर्ष बाद हलषष्ठी के दिन ही वह बालक मर गया। इस प्रकार तारा ने लगातार पांच पुत्रों को जन्म दिया और प्रत्येक पुत्र ठीक एक वर्ष बाद हलषष्ठी तिथि पर ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता था।
पुत्र-शोक से पागल हुई तारा रोते हुए हलषष्ठी देवी की शरण में गिरी। उसी रात स्वप्न में उस कुत्ते की आत्मा ने प्रकट होकर कहा— "तारा! तूने मुझे बिना अपराध लाठियों से पीटा था। मैं तुझसे बदला लेने के लिए ही तेरा पुत्र बनकर आता था और तुझे रुलाकर चला जाता था।" तारा ने रोते हुए क्षमा की याचना की। तब उस जीव ने कहा— "यदि तू निष्कपट भाव से पश्चाताप कर हलषष्ठी महारानी का विधिवत व्रत रखेगी, तभी तुझे दीर्घायु पुत्र मिलेगा।"
तारा ने अगली हलषष्ठी को पूर्ण श्रद्धा और सत्यनिष्ठा से व्रत किया। माता की कृपा से उसके समस्त पाप धुल गए और उसने एक दीर्घायु पुत्र को जन्म दिया। उधर जेठानी विद्यावती ने भी व्रत के प्रभाव से गुणवान और आज्ञाकारी संतान प्राप्त कर परम सुख भोगा।
॥ इति श्री हलषष्ठी व्रत कथा षष्ठोऽध्यायः सम्पूर्णम् ॥
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला हलषष्ठी (हरछठ / ललही छठ) व्रत माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, आरोग्य और रक्षा के निमित्त रखा जाता है। लोक-परंपरा में प्रचलित इस पावन व्रत कथा को पं. छत्रधर शर्मा ने प्रामाणिक अनुष्टुप् छंदों में संस्कृत श्लोकबद्ध किया है।
यहाँ सम्पूर्ण छह अध्यायों के मूल संस्कृत श्लोक और उनका सरल हिन्दी अर्थ प्रस्तुत है:
(राजा चन्द्रव्रत एवं राजकुमार के जीवनदान की कथा)
मथुरायां नृपः कंसः स्वसारं देवकीं तदा। विवाहानन्तरं प्रीत्या विससर्ज रथे स्थिताम्॥ १॥ अर्थ: मथुरा के राजा कंस विवाह के उपरांत अपनी बहन देवकी को प्रेमपूर्वक रथ में बैठाकर विदा करने जा रहे थे॥ १॥
खे वाणी सञ्चचारोच्चैः कंसं बोधयती द्रुतम्। अस्यास्तवाष्टमो गर्भो हन्ता संभविता ध्रुवम्॥ २॥ अर्थ: उसी समय आकाश में गूंजती हुई आकाशवाणी ने कंस को सावधान करते हुए कहा कि इस देवकी का आठवां गर्भ ही निश्चित रूप से तेरा वध करने वाला होगा॥ २॥
श्रुत्वैवं भयमापन्नो भगिनीं तत्पतिं तथा। कारागारे न्यधात् कंसः षट् सुतांश्च व्यहिंसयत्॥ ३॥ अर्थ: यह सुनकर भयभीत कंस ने अपनी बहन देवकी और बहनोई वसुदेव को कारागार में डाल दिया तथा उनके छह पुत्रों का एक-एक करके वध कर दिया॥ ३॥
सप्तमे समनुप्राप्ते गर्भे शोकसमन्विते। देवर्षिर्नारदस्तत्र समागाद् दुःखहारकः॥ ४॥ अर्थ: जब सातवें गर्भ का समय निकट आया और वे शोक में डूबे थे, तब दुःख हरने वाले देवर्षि नारद जी वहां पधारे॥ ४॥
शोकस्य कारणं ज्ञात्वा देवकीं समुवाच ह। कुरु त्वं हलषष्ठ्याश्च व्रतं सर्वार्थसाधकम्॥ ५॥ अर्थ: उनके दुःख का कारण जानकर नारद जी ने देवकी से कहा कि तुम सभी मनोरथों को सिद्ध करने वाला हलषष्ठी देवी का व्रत करो॥ ५॥
पृष्टो देवक्यथा प्रीत्या व्रतं माहात्म्यमुत्तमम्। नारदः कथयामास पुराणं वृत्तमुत्तमम्॥ ६॥ अर्थ: जब देवकी ने श्रद्धापूर्वक व्रत का माहात्म्य और विधि पूछी, तब नारद जी ने प्राचीन काल की यह उत्तम कथा कहनी प्रारंभ की॥ ६॥
आर्यावर्तेऽभवद् राजा चन्द्रव्रत इति श्रुतः। तस्यैकोऽभूत् सुतो धीमान् प्राणेभ्योऽपि प्रियः सदा॥ ७॥ अर्थ: आर्यावर्त में चन्द्रव्रत नाम के एक प्रतापी राजा थे। उनका एक ही बुद्धिमान पुत्र था, जो उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय था॥ ७॥
पथिकानां हितार्थाय तटाकं स न्यखानयत्। जलहीनं तदभवच्छुष्कं दृष्ट्वा च पान्थकाः॥ ८॥ अर्थ: राजा ने राहगीरों के जल-कल्याण के लिए एक बड़ा तालाब खुदवाया, किंतु वह सूखा ही रह गया। उसे जलहीन देखकर पथिक दुखी होते थे॥ ८॥
निन्दन्ति राजानमुच्चैः श्रुत्वा राजा शुचाकुलः। व्यर्थं मे वित्तधर्मौ चेत्यचिन्तयद् भृशातुरः॥ ९॥ अर्थ: राहगीर राजा की निंदा करने लगे। यह सुनकर राजा अत्यंत दुखी हुआ और सोचने लगा कि मेरा धन और धर्म दोनों ही व्यर्थ चले गए॥ ९॥
निशायां वरुणो देवः स्वप्ने तं नृपमब्रवीत्। सुतस्य बलिदानेन तटाको नीरवान् भवेत्॥ १०॥ अर्थ: उसी रात वरुण देव ने राजा को स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि यदि तुम अपने पुत्र की बलि इस तालाब में दोगे, तो यह जल से भर जाएगा॥ १०॥
प्रातः सभायां नृपतिः स्वप्नं सर्वं न्यवेदयत्। धर्मो मे विलयं यातु न दास्ये सुतबलिं क्वचित्॥ ११॥ अर्थ: प्रातःकाल राजा ने सभा में स्वप्न का सारा वृत्तांत सुनाया और कहा कि मेरा धन और धर्म भले ही नष्ट हो जाए, किंतु मैं अपने पुत्र की बलि कभी नहीं दूंगा॥ ११॥
श्रुत्वैतत् स सुतस्तूर्णं व्यचिन्तयत चेतसि। मम देहेन चेल्लोके तोयं स्यान्मङ्गलं भवेत्॥ १२॥ अर्थ: यह बात जब राजकुमार तक पहुंची तो उसने मन में विचार किया कि यदि मेरे शरीर के उत्सर्ग से तालाब में जल आ जाए और प्रजा का भला हो, तो इससे बड़ा कल्याण क्या होगा॥ १२॥
इति मत्वा तटाके स उपाविशदभीतवत्। तदा तोयेन संपूर्णा सा वापी जलचारिभिः॥ १३॥ अर्थ: ऐसा विचार कर वह निर्भय होकर तालाब में बलि हेतु बैठ गया। बैठते ही वह तालाब लबालब जल और जल-जीवों से परिपूर्ण हो गया॥ १३॥
सुतं मृतं समालोक्य शोकार्तो वनमाययौ। पञ्च नारीः समालोक्य व्रतं कुर्वन्ति चादरात्॥ १४॥ अर्थ: इकलौते पुत्र के बलिदान से शोकाकुल होकर राजा वन में चले गए। वहां उन्होंने पांच स्त्रियों को आदरपूर्वक एक व्रत करते देखा॥ १४॥
पृष्टा राज्ञा तु ता नार्यो हलषष्ठीव्रतं शुभम्। विधिं सर्वं शशंसुस्ताः श्रुत्वा राजा पुरं ययौ॥ १५॥ अर्थ: राजा द्वारा पूछने पर उन स्त्रियों ने हलषष्ठी व्रत का संपूर्ण विधान बताया। उसे सुनकर राजा पुनः अपने नगर लौट आए॥ १५॥
महिष्या सार्धमकरोद् व्रतं तद् भक्तिभावितः। व्रतप्रभावाद् वापीतः स जीवन् समजायत॥ १६॥ अर्थ: राजा ने अपनी रानी के साथ भक्तिभाव से यह हलषष्ठी व्रत किया। व्रत के प्रभाव से वह राजकुमार तालाब से जीवित बाहर निकल आया॥ १६॥
सम्प्राप्य तं सुतं राजा मुमोद सगणस्तदा। प्रकुर्वन्ति व्रतं चेदं हलषष्ठ्याः प्रतिह्यनु॥ १७॥ अर्थ: अपने पुत्र को पुनः पाकर राजा सपरिवार अत्यंत आनंदित हुए और तभी से प्रतिवर्ष हलषष्ठी माता का व्रत नियमपूर्वक करने लगे॥ १७॥
इत्थं षष्ठीव्रतस्यास्य कथां पापहरां शुभाम्। पं. छत्रधरशर्माख्यः कृतवान् श्लोकरूपिणीम्॥ १८॥ अर्थ: इस प्रकार हलषष्ठी व्रत की पापहारिणी और शुभ कथा को पं. छत्रधर शर्मा ने अनुष्टुप् श्लोकों के रूप में रचा है॥ १८॥
॥ इति पं. छत्रधरशर्माकृतायां श्रीहलषष्ठीव्रतकथायां प्रथमोऽध्यायः ॥
(मानवती के निष्कपट प्रेम एवं पुत्र रक्षा की कथा)
नारदः पुनरुवाच देवकीं दुःखनाशिनीम्। शृणु देवि कथां चान्यां षष्ठीव्रतफलप्रदाम्॥ १॥ अर्थ: देवर्षि नारद जी ने देवकी का दुःख दूर करते हुए पुनः कहा कि हे देवि! अब हलषष्ठी व्रत के फल को देने वाली एक और कथा सुनो॥ १॥
अभवत् सम्पदल्लालो नगर्यामवनीतले। अवन्तिकायां भार्ये द्वे रेवती मानवत्यपि॥ २॥ अर्थ: अवंतिका (उज्जैन) नगरी में संपतलाल नाम का एक व्यक्ति रहता था। उसकी दो पत्नियां थीं—एक का नाम रेवती और दूसरी का नाम मानवती था॥ २॥
रेवती सन्ततिहीना मानवत्या द्विसूनवः। सपत्न्यसूयया दग्धा रेवती हन्तुमैच्छत॥ ३॥ अर्थ: रेवती की कोई संतान नहीं थी, जबकि मानवती के दो पुत्र थे। रेवती सौतिया डाह से जलती रहती थी और उन बच्चों को मारने का उपाय खोजती थी॥ ३॥
एकदा मानवतीं सा कपटेन जगाद ह। तव तातः समायातैरध्वगैर्भाषितोऽतुरः॥ ४॥ अर्थ: एक दिन उसने छलपूर्वक मानवती से कहा कि तुम्हारे मायके से आए राहगीरों ने बताया है कि तुम्हारे पिता बहुत बीमार हैं॥ ४॥
त्वां दिदृक्षुरसौ वर्तते गच्छ त्वं पितुर्गृहम्। अहं पालयिष्ये बालौ यावदागमनं तव॥ ५॥ अर्थ: वे तुमसे मिलना चाहते हैं, इसलिए तुम शीघ्र पिता के घर जाओ। तुम्हारे लौटने तक मैं दोनों बालकों की भली-भांति देखभाल करूंगी॥ ५॥
सत्यं मत्वा वचस्तस्याः समर्प्य तनयौ शुभौ। पितुर्गेहं गता साध्वी पितरं सुस्थमीक्षत॥ ६॥ अर्थ: उसकी बात को सत्य मानकर और अपने पुत्रों को सौंपकर मानवती मायके चली गई, किंतु वहां जाकर उसने पिता को पूर्णतः स्वस्थ पाया॥ ६॥
अत्रान्तरे दुराचारा रेवती घोरमानसा। हतं कृत्वा सुतौ तौ द्वौ विपिने संन्यपातयत्॥ ७॥ अर्थ: इधर कुटिल मन वाली रेवती ने अवसर पाकर दोनों बालकों को मार डाला और उन्हें निर्जन वन में फेंक दिया॥ ७॥
मानवती पितुः श्रुत्वा कुशलं गृहमिच्छति। तन्माता तामथोवाच हलषष्ठीदिनं ह्यदः॥ ८॥ अर्थ: मानवती पिता की कुशलता जानकर तुरंत घर लौटना चाहती थी, तब उसकी माता ने कहा कि पुत्री! आज हलषष्ठी व्रत का पावन दिन है॥ ८॥
पुत्रायुष्यमभीप्सन्ती कुरु षष्ठीव्रतं शुभम्। श्वो गमिष्यसि कल्याणि मातुर्वाक्यं तथाकरोत्॥ ९॥ अर्थ: अतः पुत्रों की दीर्घायु की कामना से तुम यह व्रत कर लो और कल अपने घर चली जाना। मानवती ने माता की आज्ञा मानकर व्रत किया॥ ९॥
प्रार्थयामास षष्ठीं सा रक्ष देवि सुतौ मम। अपराह्णे परेऽह्नि सा ययौ स्वभवनं प्रति॥ १०॥ अर्थ: उसने हलषष्ठी माता से प्रार्थना की कि हे देवी! मेरे दोनों बालकों की रक्षा करना और उन्हें दीर्घायु देना। अगले दिन वह अपने घर के लिए चली॥ १०॥
मार्गे ददर्श सा बालौ क्रीडमानौ वने सुखम्। विस्मिता सा सुतौ प्राह कथं यूयमिलातले॥ ११॥ अर्थ: रास्ते में उसी जंगल में उसने अपने दोनों पुत्रों को सुखपूर्वक खेलते देखा। उसने विस्मित होकर पूछा कि तुम दोनों यहां वन में कैसे पहुंचे?॥ ११॥
ऊचतुस्तौ मातरं नो हत्वा क्षिप्तं सपत्न्यया। अन्या नारी समायाता जीवयामास नौ तदा॥ १२॥ अर्थ: बालकों ने बताया कि आपके जाने पर हमारी विमाता रेवती ने हमें मारकर यहां फेंक दिया था, तब एक अन्य देवी (स्त्री) ने आकर हमें पुनः जीवित कर दिया॥ १२॥
मातुः षष्ठ्याः कृपां ज्ञात्वा जयघोषं चकार सा। पुत्रौ गृहीत्वा संप्राप्ता नगरं हर्षसंयुता॥ १३॥ अर्थ: यह सब हलषष्ठी माता की ही कृपा है, यह जानकर उसने माता का जयकार किया और बालकों को लेकर अत्यंत प्रसन्नचित्त अपने घर लौटी॥ १३॥
जीवितौ तौ सुतौ दृष्ट्वा तत्रत्याः सर्वयोषितः। हलषष्ठीव्रतं चक्रुः सन्ततेर्दीर्घजीवने॥ १४॥ अर्थ: उन बालकों को पुनः जीवित देखकर और हलषष्ठी माता की महिमा जानकर नगर की सभी स्त्रियां अपनी संतानों की दीर्घायु हेतु यह व्रत करने लगीं॥ १४॥
इति द्वितीयोध्यायस्य कथां भक्तिसमन्विताम्। पं. छत्रधरशर्माख्यः कृतवान् श्लोकबन्धनैः॥ १५॥ अर्थ: इस प्रकार भक्तिभाव से भरी दूसरे अध्याय की इस पावन कथा को पं. छत्रधर शर्मा ने श्लोकों में निबद्ध किया है॥ १५॥
॥ इति पं. छत्रधरशर्माकृतायां श्रीहलषष्ठीव्रतकथायां द्वितीयोऽध्यायः ॥
(वणिक दम्पती, ब्रह्मलोक गमन एवं 'पोता' विधि का रहस्य)
पुनरेवाह देवर्षिर्देवकीं भक्तवत्सलः। शृणु वृत्तं परं पुण्यं दक्षिणस्यां दिशि स्थितम्॥ १॥ अर्थ: भक्तवत्सल देवर्षि नारद ने देवकी से पुनः कहा कि अब दक्षिण दिशा में घटित एक और परम पावन कथा सुनो॥ १॥
दक्षिणस्यां नगर्यां तु वणिग्भार्यासमन्वितः। सदाचाररतौ शान्तौ धर्ममार्गपरायणौ॥ २॥ अर्थ: दक्षिण के एक सुंदर नगर में एक वैश्य (बनिया) अपनी पत्नी के साथ रहता था। दोनों पति-पत्नी अत्यंत सदाचारी, शांत और धार्मिक स्वभाव के थे॥ २॥
भार्या गर्भं समाधत्ते सूते बालं मृतं ततः। एवं क्रमेण षट् पुत्राः कालधर्ममुपागताः॥ ३॥ अर्थ: वैश्य की पत्नी गर्भवती होती और संतान को जन्म देती, किंतु कुछ समय बाद संतान की मृत्यु हो जाती। इस प्रकार उसके छह पुत्र काल के गाल में समा गए॥ ३॥
शोकाभिभूतौ तौ दम्पती मर्तुकामौ वनं गतौ। दृष्ट्वा मुनिं वने तौ तु निवेद्य दुःखमात्मनः॥ ४॥ अर्थ: घोर शोक से व्याकुल होकर वे दोनों पति-पत्नी प्राण त्यागने के उद्देश्य से वन में चले गए। वहां उन्होंने एक तपस्वी मुनि को देखकर अपना सारा दुःख कह सुनाया॥ ४॥
ध्यानेन मुनिरालोक्य यमशक्रजलेश्वरे। न लब्ध्वा बालकान् सर्वान् ब्रह्मलोकं जगाम ह॥ ५॥ अर्थ: मुनि ने ध्यान लगाकर यम, इंद्र, वरुण आदि लोकों में उन बालकों को खोजा, किंतु जब वे वहां नहीं मिले, तो वे ध्यान में ब्रह्मलोक पहुंचे॥ ५॥
तत्रापश्यत् सुतान् सर्वान् प्रत्यागमनाय च। उवाच मुनिरव्यग्रः पुत्राः प्राहुर्मुनिं प्रति॥ ६॥ अर्थ: वहां उन सभी बालकों को देखकर मुनि ने उनसे माता-पिता के पास लौटने का आग्रह किया। तब उन बालकों की आत्माओं ने मुनि से कहा॥ ६॥
अनेकशो वयं जाताः केषां मातॄः स्मरामहे। गर्भजन्मविमुक्ताः स्मो नैवागच्छामहे वयम्॥ ७॥ अर्थ: हम इससे पूर्व भी अनेक बार जन्म ले चुके हैं, किस-किस माता-पिता को याद रखें? अब हम जन्म-मृत्यु और गर्भ के चक्र से मुक्त हो चुके हैं, अतः वापस नहीं लौटेंगे॥ ७॥
पृष्टवांस्तान् मुनिस्तत्र दीर्घायुष्यस्य साधनम्। ते प्रोचुर्यदि षष्ठीं तु पूजयेतामुभौ मुदा॥ ८॥ अर्थ: तब मुनि ने उनसे बनिए के लिए दीर्घायु संतान की प्राप्ति का उपाय पूछा। उन आत्माओं ने कहा कि यदि वे दोनों दंपती प्रसन्नतापूर्वक हलषष्ठी माता का पूजन करें॥ ८॥
श्रुत्वा कथां व्रतोपेतावार्द्रवस्त्रेण पोतयेत्। बालं तदा सुतस्तस्य दीर्घायुर्भविता ध्रुवम्॥ ९॥ अर्थ: कथा सुनकर व्रत रखें और जन्म के बाद बालक को जल से भीगे वस्त्र (पोता) से स्पर्श कराएं, तो उनका वह पुत्र अवश्य दीर्घायु होगा॥ ९॥
ध्यानादुत्थाय मुनिना कथितं सर्वमादरात्। दम्पती तौ गृहं गत्वा षष्ठीव्रतमथाचरत्॥ १०॥ अर्थ: ध्यान से उठकर मुनि ने आदरपूर्वक सारा विधान बताया। दोनों पति-पत्नी ने घर लौटकर हलषष्ठी का व्रत एवं पूजन किया॥ १०॥
सूतिकाले सुतं लेभे व्रते चार्द्रेण वाससा। मार्जितोऽसौ सुतो दीर्घमायुरैश्वर्यमाप्तवान्॥ ११॥ अर्थ: समयानुसार पत्नी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। मुनि के वचनानुसार भीगे वस्त्र का पोता लगाने से वह बालक दीर्घायु और ऐश्वर्यवान हुआ॥ ११॥
प्रसन्नोऽभूद् वणिग्वर्गः षष्ठ्या देव्याः प्रसादतः। सपुत्रपौत्रसंयुक्तः सुखं लेभे चिरं गृहे॥ १२॥ अर्थ: हलषष्ठी देवी की कृपा से वह वैश्य परिवार अत्यंत प्रसन्न हुआ और पुत्र-पौत्रों से युक्त होकर दीर्घकाल तक सुखपूर्वक रहा॥ १२॥
इत्थं तृतीयोध्यायस्य रम्यां सुफलदां कथाम्। पं. छत्रधरशर्माख्या कृतिरेषा विराजते॥ १३॥ अर्थ: इस प्रकार तीसरे अध्याय की इस मनोरम और सुफल प्रदान करने वाली कथा को पं. छत्रधर शर्मा ने अपनी इस कृति में प्रस्तुत किया है॥ १३॥
॥ इति पं. छत्रधरशर्माकृतायां श्रीहलषष्ठीव्रतकथायां तृतीयोऽध्यायः ॥
(श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर संवाद, हस्तिनापुर स्थापना एवं उत्तरा-परीक्षित आख्यान)
एकदा धर्मराजस्तु श्रीकृष्णं वाक्यमब्रवीत्। अभिमन्युवधात् तप्ता सुभद्रा शोकमूर्च्छिता॥ १॥ अर्थ: एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से कहा कि अभिमन्यु के वध से सुभद्रा अत्यंत शोकाकुल और व्यथित हैं॥ १॥
उत्तरायाश्च गर्भोऽपि दग्धो ब्रह्मास्त्रतेजसा। द्रौपदी पञ्चपुत्राणां शोकेन परिदह्यते॥ २॥ अर्थ: उत्तरा के गर्भ की संतान भी दुष्ट अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र के तेज से दग्ध हो गई है और द्रौपदी भी अपने पांचों पुत्रों के मारे जाने से जल रही है॥ २॥
उपायं वद हे कृष्ण महादुःखोपशान्तये। श्रीकृष्ण उवाच राजेन्द्र शृणु वक्ष्यामि तद् व्रतम्॥ ३॥ अर्थ: हे श्रीकृष्ण! इस महादुःख से उबरने का कोई उपाय बताइए। श्रीकृष्ण ने कहा—हे राजन! सुनिए, मैं उस दुःखहारी व्रत का वर्णन करता हूं॥ ३॥
भाद्रकृष्णा तु या षष्ठी हरगौरीप्रपूजनैः। गणेशगुहसंयुक्तैः सा पुत्रशोकनाशिनी॥ ४॥ अर्थ: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की जो षष्ठी (हलषष्ठी) है, वह शिव-पार्वती, गणेश और कार्तिकेय के पूजन सहित की जाने पर पुत्रशोक का नाश करने वाली है॥ ४॥
उत्तरेदं व्रतं कुर्यान्मृतगर्भोऽपि जीवति। अत्रापि शृणु राजेन्द्र पुरातनमितिहासकम्॥ ५॥ अर्थ: यदि उत्तरा इस व्रत को करे तो उसका निष्प्राण गर्भ भी पुनर्जीवित हो जाएगा। इस विषय में भी हे राजन! एक प्राचीन इतिहास सुनो॥ ५॥
सुभद्रो नाम राजासीत् सुवर्णा तस्य वल्लभा। हस्ती नाम सुतस्तस्य प्राणेभ्योऽपि प्रियः सदा॥ ६॥ अर्थ: प्राचीन काल में सुभद्र नाम के राजा थे और उनकी रानी का नाम सुवर्णा था। उनका हस्ती नाम का एक प्रिय पुत्र था॥ ६॥
धात्र्या सार्धं स गङ्गायां स्नातुं गतो विलासवान्। जले क्रीडन्तमासाद्य ग्राहो निन्येऽध एव तम्॥ ७॥ अर्थ: एक बार वह राजकुमार अपनी धाय माता के साथ गंगा स्नान के लिए गया। वहां जलक्रीड़ा करते समय एक मगरमच्छ उसे खींचकर जल के भीतर ले गया॥ ७॥
श्रुत्वा राज्ञी क्रुधा धात्र्याः सुतं प्रज्वलितानले। न्यक्षिपन्निर्दया भूत्वा धात्री शोकेन निर्ययौ॥ ८॥ अर्थ: यह सुनकर रानी सुवर्णा ने क्रोध में आकर धाय के पुत्र को जलती हुई भट्टी में फेंक दिया। धाय पुत्रशोक से व्याकुल होकर वन को चली गई॥ ८॥
शून्यं देवालयं प्राप्य शिवगौरीगणाधिपान्। अपूजयेत् तृणान् भुक्त्वा महुवाधान्यसंयुतान्॥ ९॥ अर्थ: वन में एक निर्जन देवालय पाकर वह शिव, पार्वती और गणेश जी की पूजा करने लगी तथा सूखा तृण, वन-धान्य और महुआ खाकर रहने लगी॥ ९॥
अत्राभून्महदाश्चर्यं नगरे नृपतेस्तदा। धात्रीपुत्रो वह्निकुण्डाज्जीवन्नेव बहिर्गतः॥ १०॥ अर्थ: इधर नगर में एक बड़ा आश्चर्य हुआ कि धाय का पुत्र उस जलती हुई अग्नि-भट्टी से जीवित और सकुशल बाहर निकल आया॥ १०॥
संप्राप्तो दुर्वासास्तत्र राज्ञे सर्वं शशंस ह। धात्र्याः षष्ठीव्रतस्यैष प्रभावः परमो नृप॥ ११॥ अर्थ: उसी समय वहां दुर्वासा ऋषि आए और उन्होंने राजा को बताया कि राजन! यह सब धाय द्वारा वन में किए गए हलषष्ठी व्रत का ही प्रभाव है॥ ११॥
ऋषिणा सह राजा स वनं गत्वा व्यलोकयत्। धात्रीं पृष्ट्वा व्रतं सर्वं राज्ञी चकार तत् परम्॥ १२॥ अर्थ: ऋषि के साथ राजा-रानी ने वन में जाकर धाय से व्रत का सारा विधान पूछा और फिर रानी सुवर्णा ने भी पूर्ण श्रद्धा से वह व्रत किया॥ १२॥
व्रतप्रभावाद् ग्राहस्य मुखान्मुक्तः समागतः। हस्ती स नृपतेः पुत्रो हस्तिनापुरकारकः॥ १३॥ अर्थ: व्रत के प्रभाव से राजकुमार हस्ती भी मगरमच्छ के मुख से छूटकर जीवित वापस नगर आ गया। आगे चलकर उसी प्रतापी बालक ने हस्तिनापुर बसाया॥ १३॥
एवं श्रुत्वा तु देवक्या कृतं नारायणोऽब्रवीत्। उत्तरा चापि तत्कृत्वा परीक्षितमजीवयत्॥ १४॥ अर्थ: श्रीकृष्ण ने कहा कि नारद जी से सुनकर मेरी माता देवकी ने भी यह व्रत किया था। अब उत्तरा ने भी यह व्रत किया, जिससे उसका मृत गर्भ जीवित हुआ और राजा परीक्षित कहलाया॥ १४॥
कुशकाशव्रतं चेदं कृष्णपार्थसमीरितम्। पं. छत्रधरशर्मेदं कृतवान् श्लोकवैभवैः॥ १५॥ अर्थ: कृष्ण और अर्जुन (युधिष्ठिर) के संवाद वाले इस कुश-पलाश-युक्त हलषष्ठी व्रत को पं. छत्रधर शर्मा ने श्लोक-वैभव के साथ रचा है॥ १५॥
॥ इति पं. छत्रधरशर्माकृतायां श्रीहलषष्ठीव्रतकथायां चतुर्थोऽध्यायः ॥
(दुग्ध-विक्रेत्री ग्वालिन का आख्यान एवं सत्य की महिमा)
पुरातनेऽभवत् काले गोपिका दुग्धविक्रयी। प्रसवः सन्निकट आसीत् सा तु लोभेन मोहिता॥ १॥ अर्थ: प्राचीन काल में एक दूध-दही बेचने वाली ग्वालिन थी। उसका प्रसव-काल अत्यंत निकट था, किंतु वह लोभ के वशीभूत थी॥ १॥
गोरसं विक्रये युक्ता कुम्भानाधाय मूर्धनि। प्रसवव्यथयाक्रान्ता बदरीगुल्ममाश्रिता॥ २॥ अर्थ: प्रसव होने पर दूध-दही नष्ट न हो जाए, यह सोचकर वह घड़े सिर पर रखकर बेचने निकली। मार्ग में असह्य प्रसव पीड़ा होने पर वह झरबेरी की झाड़ी की ओट में गई॥ २॥
तत्र बालं प्रसूयैका विक्रेतुं ग्राममाययौ। गव्यं माहिषमिश्रं च महिषीक्षीरमुच्यते॥ ३॥ अर्थ: वहां उसने बालक को जन्म दिया और उसे वहीं छोड़कर गांव में दूध बेचने चली गई। वहां गाय और भैंस के मिले हुए दूध को केवल भैंस का दूध कहकर बेचने लगी॥ ३॥
हलषष्ठ्यां तथा कृत्वा जनेभ्यो दत्तवत्यसौ। तत्र यत्र शिशुः सुप्तः कर्षको हलमन्वगात्॥ ४॥ अर्थ: हलषष्ठी के पावन दिन उसने गांव के सीधे-सादे लोगों को झूठ बोलकर दूध बेचा। उधर जहां वह बालक पड़ा था, समीप के खेत में एक किसान हल चला रहा था॥ ४॥
त्रस्ता बलीवर्दास्तत्र फालघातेन बालकः। स बालो मृततां प्राप्तः कर्षको दुःखितो भृशम्॥ ५॥ अर्थ: अचानक बैल भड़क उठे और हल का फाल शरीर में धंस जाने से वह बालक मर गया। किसान अत्यंत दुखी और भयभीत हुआ॥ ५॥
कण्टकैर्बदरीवृक्षात् सीवयित्वा गतो द्रुतम्। गोपी दुग्धं विक्रीयैत्य बालं दृष्ट्वा शुचान्विता॥ ६॥ अर्थ: किसान ने धैर्य रखकर झरबेरी के कांटों से बच्चे के पेट को सी दिया और चला गया। ग्वालिन दूध बेचकर लौटी और बालक की यह दशा देखकर शोक से व्याकुल हो गई॥ ६॥
व्यचिन्तयत् स्वपापस्य फलं मे समुपागतम्। धर्माल्लोपेन नारीणां कपटेन कृतं मया॥ ७॥ अर्थ: वह सोचने लगी कि यह सब मेरे पाप का ही फल है। मैंने स्त्रियों के हलषष्ठी व्रत के धर्म को कपटपूर्वक गाय का दूध बेचकर नष्ट किया है॥ ७॥
ग्रामं गत्वा तु सा गोपी स्वदोषं प्रकटीकरोत्। पश्चात्तापेन सन्तप्ता क्षमां प्रार्थितवत्यथ॥ ८॥ अर्थ: उसने गांव लौटकर गली-गली घूमकर अपना अपराध सबको बताया और पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए सबसे क्षमा की भीख मांगी॥ ८॥
नार्यः क्षमां ददुस्तस्यै धर्मरक्षाप्रहर्षिताः। आशीर्वादं ददुः सर्वाः सा गता बदरीं पुनः॥ ९॥ अर्थ: स्त्रियों ने धर्म-रक्षा और उसकी सत्यवादिता पर दया करके उसे क्षमा किया तथा आशीर्वाद दिया। आशीर्वाद पाकर वह पुनः झरबेरी के पास पहुंची॥ ९॥
दृष्ट्वा बालं सजीवं तं विस्मिता हर्षिताभवत्। मिथ्यावादं त्यजन्नित्यं सत्यमेवान्वपालयत्॥ १०॥ अर्थ: वहां अपने पुत्र को जीवित और खेलता देखकर वह आश्चर्यचकित व आनंदित हो गई। उसने झूठ बोलने को ब्रह्महत्या समान जानकर सदा सत्य बोलने का संकल्प लिया॥ १०॥
इति पञ्चमोध्यायस्य गोपीचरितमुत्तमम्। पं. छत्रधरशर्मेयं कृतिः सञ्जीवनी परा॥ ११॥ अर्थ: इस प्रकार पांचवें अध्याय के इस उत्तम गोपी-चरित्र को पं. छत्रधर शर्मा ने संजीवन प्रदान करने वाली इस कृति में रचा है॥ ११॥
॥ इति पं. छत्रधरशर्माकृतायां श्रीहलषष्ठीव्रतकथायां पञ्चमोऽध्यायः ॥
(देवरानी-जेठानी एवं श्वान-प्रतिशोध निवारण कथा)
कांश्यां पुर्यां पुरा चास्तां भ्रातृभार्ये परस्परम्। तारा सा देवरस्यासीद् विद्यावत्यग्रजप्रिया॥ १॥ अर्थ: प्राचीन काल में काशीपुरी में दो देवरानी-जेठानी रहती थीं। देवर की पत्नी का नाम तारा और जेठ की पत्नी का नाम विद्यावती था॥ १॥
तारा स्वभावतः क्रूरा विद्यावत्यतिकोमला। पायसं शीतलीकर्तुमुभाभ्यामङ्गणे कृतम्॥ २॥ अर्थ: तारा स्वभाव से अत्यंत क्रूर और विद्यावती परम दयालु थी। एक दिन दोनों ने खीर बनाकर ठंडी करने के लिए आंगन में रख दी॥ २॥
तदा श्वानौ समायातावाहारं कर्तुमादरात्। विद्यावती दयाशीला स्वावशिष्टमदात् शुने॥ ३॥ अर्थ: तभी दो कुत्ते आकर खीर खाने लगे। दयालु विद्यावती ने अपनी खीर को जूठन जानकर बची हुई शेष खीर भी उस कुत्ते के आगे परोस दी॥ ३॥
तारा तु मन्दिरं रुद्ध्वा ताडयामास चापरम्। कष्टेन स श्वको मुक्तो द्वितीयेऽह्नि समेयतुः॥ ४॥ अर्थ: किंतु तारा ने दूसरे कुत्ते को कमरे में बंद करके लाठियों से बुरी तरह पीटा। वह कुत्ता जैसे-तैसे जान बचाकर भागा। अगले दिन दोनों कुत्ते मिले॥ ४॥
एकः प्राह दयिता सा विद्यावत्याः सुतो भवेत्। अहं भूत्वा सुतो मातुरस्याः सेवां करोम्यहम्॥ ५॥ अर्थ: पहले कुत्ते ने कहा कि विद्यावती अत्यंत दयालु है, ईश्वर करे मैं अगले जन्म में उसका पुत्र बनकर उसकी खूब सेवा करूं॥ ५॥
तारायास्ताडितः प्राह हन्तुं तस्याः सुतो ह्यहम्। स प्रतिशोधमिच्छन् स मृतस्तद्दिनमन्तरे॥ ६॥ अर्थ: तारा द्वारा पीटा गया कुत्ता बोला कि मैं बदला लेने के लिए उसका पुत्र बनूंगा और उसे कष्ट दूंगा। वह कुत्ता तारा की मार के कारण उसी दिन मर गया॥ ६॥
षष्ठीदिने तु ताराया अजायत सुतः शुभः। परे वर्षे षष्ठीतिथौ ममार स पुनस्तथा॥ ७॥ अर्थ: उस दिन हलषष्ठी थी। अगले वर्ष हलषष्ठी के दिन तारा को पुत्र हुआ, किंतु वह ठीक अगले वर्ष हलषष्ठी के ही दिन मर गया॥ ७॥
एवं क्रमेण पञ्चापि पुत्रा जाता मृतास्तथा। तारा शोकाकुला भूत्वा षष्ठीं देवीं समर्चयत्॥ ८॥ अर्थ: इस प्रकार एक-एक करके उसके पांच पुत्र हुए और वे सभी एक वर्ष बाद हलषष्ठी के दिन ही मर गए। तारा शोकाकुल होकर हलषष्ठी माता की प्रार्थना करने लगी॥ ८॥
स्वप्ने श्वा स समागत्य तारां प्रोवाच वैरवान्। प्रतिशोधाय जातस्ते पुत्रो भूत्वा ममार च॥ ९॥ अर्थ: तब स्वप्न में उसी कुत्ते ने आकर तारा से कहा कि मैं तुझसे पूर्वजन्म का प्रतिशोध लेने के लिए ही तेरा पुत्र बनकर आता और मर जाता था॥ ९॥
तारा क्षमापयन्ती तं श्वा तु तामब्रवीद् व्रतम्। हलषष्ठीव्रतं कुर्याः सूनुस्ते दीर्घजीवितः॥ १०॥ अर्थ: जब तारा ने अपने पापों की क्षमा मांगी, तब उस जीव ने कहा कि तुम हलषष्ठी माता का विधिपूर्वक व्रत करो, जिससे तुम्हें दीर्घायु पुत्र प्राप्त होगा॥ १०॥
तथैव साकरोत् तारा षष्ठीं देवीं प्रसाद्य च। दीर्घायुषं सुतं लेभे सुखिता समजायत॥ ११॥ अर्थ: तारा ने स्वप्न के अनुसार हलषष्ठी का व्रत किया और देवी को प्रसन्न कर दीर्घायु पुत्र प्राप्त किया तथा सुखी जीवन जीने लगी॥ ११॥
विद्यावत्यपि तच्चक्रे रूपवन्तं सुतं वरात्। सम्प्राप्य धर्मशीलं सा सुखेन न्यवसत् चिरम्॥ १२॥ अर्थ: विद्यावती ने भी हलषष्ठी व्रत के प्रभाव से सुंदर, सुशील और धर्मपरायण पुत्र प्राप्त किया और सपरिवार आनंदपूर्वक रही॥ १२॥
इत्थं षष्ठमोध्यायस्य कथा पापहरिणी शुभा। पं. छत्रधरशर्माख्या कृतिराचन्द्रतारकम्॥ १३॥ अर्थ: इस प्रकार छठे अध्याय की यह पापहारिणी और मंगलकारी कथा पं. छत्रधर शर्मा की कृति के रूप में चंद्र और तारों के रहने तक सुशोभित रहे॥ १३॥
॥ इति पं. छत्रधरशर्माकृतायां श्रीहलषष्ठीव्रतकथायां षष्ठोऽध्यायः सम्पूर्णम् ॥
जय देवि जय देवि जय देवि हलषष्ठी माई। मनवांछित फलदायिनी, महिमा अधिकाई॥ जय देवि...॥
दिन देवकी पूजा कीन्हीं, कृष्ण हुये आई। सहित उत्तरा द्रौपदी मानी, नष्ट पुत्र पाई॥ जय देवि...॥
व्रत प्रभाव से चन्द्रावत ने, नष्ट पुत्र पायो। मानवती व्रत कीन्हीं, माया संग जायो॥ जय देवि...॥
ग्वालिन गोदधि बेची, महिषी कहि जाई। तब पूजा परभाव भावते, मृतक पुत्र पायो॥ जय देवि...॥
भाव भक्ति के कारण, दासी सुत पाई। वणिक पायो सुत अपनी, पूज्यो हरषाई॥ जय देवि...॥
कहि नारद मुनि पावें, धन-धन संपत्ति न्यारी। भणत व्यास तब आरती, नित मंगलकारी॥ जय देवि...॥
जो माताएं हलषष्ठी के दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य, सत्य और श्रद्धा के साथ इस व्रत का पालन करती हैं तथा इन छहों अध्यायों का श्रवण करती हैं:
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