✍️ CD Sharma · 📅 19 Sep 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ Ekadashi Vrat, 26 Ekadashi List, Ekadashi Niyam, Ekadashi Paran Vidhi, Vrat Katha, Sanatan Dharma, Hindu Fasting Rules
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हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक सामान्य वर्ष में कुल चौबीस एकादशियां होती हैं, किंतु जिस वर्ष अधिकमास (मलमास/पुरुषोत्तम मास) आता है, उस वर्ष इनकी संख्या बढ़कर छब्बीस (षड्विंशत्) हो जाती है।
(पश्चिम देश प्रसिद्ध नाना पुराणोक्त षड्विंशत्येकादशी नामानि)
संख्याविशेषः । एगार इति भाषा । यथा महाभारते (६/१६/२१) — “एकादशी धार्त्तराष्ट्री कौरवाणां महाचमूः” ।।
एकादशी व्रत का संकल्प लेने वाले व्रती को दशमी तिथि से ही शास्त्रीय मर्यादाओं का पालन करना चाहिए:
धर्मसिंधु के अनुसार एकादशी दो प्रकार की होती है — विद्धा और शुद्धा।
एकादशीसमं किञ्चित् पावनं न च विद्यते । स्वर्गमोक्षप्रदा ह्येषा राज्यपुत्त्रप्रदायिनी ॥ एकादशीव्रतं भक्त्या यः करोति नरः सदा । स विष्णुलोकं व्रजति याति विष्णोः सरूपताम् ॥ (तत्त्वसागरे)
शुक्ले वा यदि वा कृष्णे विष्णुपूजनतत्परः । एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि ॥ (भविष्य पुराण)
दशम्येकादशी यत्र तत्र नोपवसेद्बुधः । अपत्यानि विनश्यन्ति विष्णुलोकं न गच्छति ॥ (वशिष्ठ स्मृति)
शास्त्रों में चार तिथिजन्य और चार नक्षत्रजन्य कुल आठ महाद्वादशियों का वर्णन है, जो समस्त पापों का हरण करने वाली हैं:
उन्मीलनी वञ्जुली च त्रिस्पृशा पक्षवर्द्धिनी । जया च विजया चैव जयन्ती पापनाशिनी ॥ (ब्रह्मवैवर्त पुराण)
दशमीदिनमारभ्य करिष्येऽहं व्रतं तव । त्रिदिनं देवदेवेश निर्विघ्नं कुरु केशव ॥
अष्टौ तान्य व्रतघ्नानि आपो मूलं फलं पयः । हविर्ब्राह्मणकाम्या च गुरोर्वचनमौषधम् ॥ (स्कंद पुराण) (जल, कंदमूल, फल, दूध, घृत, ब्राह्मण की इच्छा, गुरु का वचन और औषधि।)
एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरे ऽहनि । भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥
देवदेव हृषीकेश संसारार्णवतारक । उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम् ॥
नमो नमस्ते गोविन्द बुधश्रवणसंज्ञक ॥ अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वसौख्यप्रदो भव । भुक्तिमुक्तिप्रदश्चैव लोकानां सुखदायकः ॥
अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः । श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते । त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तमिदं भवेत् ॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे । हिरण्याक्षप्राणघातिन् त्रैलोक्ये मंगलं कुरु ॥ (साधारण भाषा में "उठो देवा, बैठो देवा" कहकर भगवान को जगाया जाता है।) इस दिन रात्रि में तुलसी विवाह, दीपदान और संकीर्तन का अनंत पुण्य है।
कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भव । संसारार्णवमग्नानां प्रसीद पुरुषोत्तम ॥ नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु महापुरुष पूर्वज ॥ गृहाणार्घ्यं मया दत्तं लक्ष्म्या सह जगत्पते ॥
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