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श्रीसत्यनारायण व्रतकथा: सम्पूर्ण ५ अध्याय मूल संस्कृत श्लोक एवं सरल हिन्दी अर्थ सहित | cdsharma.in

✍️ CD Sharma · 📅 19 Sep 2026 · ⏱️ 1 मिनट का पठन · 🏷️ Shri Satyanarayan Vrat Katha, Satyanarayan Katha in Hindi, Satyanarayan Shlok with Meaning, Skanda Purana Revakhanda, Satyanarayan Puja Vidhi, श्रीसत्यनारायण व्रतकथा, सत्यनारायण कथा श्लोक अर्थ सहित, स्कन्द पुराण रेवाखण्ड, सत्यनारायण पूजा विधि, cdsharma.in

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श्रीसत्यनारायण व्रतकथा: सम्पूर्ण ५ अध्याय मूल संस्कृत श्लोक एवं सरल हिन्दी अर्थ सहित | cdsharma.in

॥श्रीसत्यनारायण व्रतकथा॥

(स्कन्दपुराणान्तर्गत रेवाखण्ड)

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथ कथा प्रारम्भः

अथ प्रथमोऽध्यायः (पहला अध्याय)

श्रीव्यास उवाच । एकदा नैमिषारण्ये ऋषयः शौनकादयः । पप्रच्छुर्मुनयः सर्वे सूतं पौराणिकं खलु ॥ १॥

ऋषय ऊचुः । व्रतेन तपसा किं वा प्राप्यते वाञ्छितं फलम् । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामः कथयस्व महामुने ॥ २॥

हिन्दी अर्थ: श्री व्यास जी बोले—एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि समस्त ऋषियों एवं मुनियों ने पुराणों के वेत्ता श्री सूत जी महाराज से आदरपूर्वक पूछा—हे महामुने! किस व्रत अथवा तप के प्रभाव से मनुष्य को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है? हम सब यह विस्तारपूर्वक सुनना चाहते हैं, कृपा करके कहें।

सूत उवाच । नारदेनैव सम्पृष्टो भगवान् कमलापतिः । सुरर्षये यथैवाह तच्छृणुध्वं समाहिताः ॥ ३॥

एकदा नारदो योगी परानुग्रहकाङ्क्षया । पर्यटन् विविधान् लोकान् मर्त्यलोकमुपागतः ॥ ४॥

ततोदृष्ट्वा जनान्सर्वान् नानाक्लेशसमन्वितान् । नानायोनिसमुत्पन्नान् क्लिश्यमानान् स्वकर्मभिः ॥ ५॥

केनोपायेन चैतेषां दुःखनाशो भवेद् ध्रुवम् । इति सञ्चिन्त्य मनसा विष्णुलोकं गतस्तदा ॥ ६॥

हिन्दी अर्थ: सूत जी बोले—यही प्रश्न एक बार देवर्षि नारद जी ने कमलापति भगवान श्रीविष्णु से किया था। भगवान ने देवर्षि से जो कुछ कहा, उसे आप सब एकाग्रचित्त होकर सुनें। एक समय योगिराज नारद जी लोक-कल्याण की भावना से विभिन्न लोकों में विचरण करते हुए मृत्युलोक (पृथ्वीलोक) पर पधारे। वहाँ उन्होंने अनेक योनियों में उत्पन्न समस्त मनुष्यों को अपने-अपने पूर्व संचित कर्मों के कारण भाँति-भाँति के क्लेशों और दुःखों से पीड़ित देखा। "किस उपाय से इन सभी प्राणियों के दुःखों का निश्चित रूप से निवारण हो सकता है?"—मन में ऐसा विचार करके वे विष्णुलोक (वैकुण्ठ) पहुँचे।

तत्र नारायणं देवं शुक्लवर्णं चतुर्भुजम् । शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म-वनमाला-विभूषितम् ॥ ७॥

दृष्ट्वा तं देवदेवेशं स्तोतुं समुपचक्रमे । नारद उवाच । नमो वाङ्गमनसातीतरूपायानन्तशक्तये । आदिमध्यान्तहीनाय निर्गुणाय गुणात्मने ॥ ८॥

सर्वेषामादिभूताय भक्तानामार्तिनाशिने । श्रुत्वा स्तोत्रं ततो विष्णुर्नारदं प्रत्यभाषत ॥ ९॥

हिन्दी अर्थ: वहाँ उन्होंने शुक्ल वर्ण, चतुर्भुज, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए हुए तथा वनमाला से सुशोभित देवदेवेश भगवान श्रीनारायण के दर्शन किए। जगदीश्वर को देखकर नारद जी स्तुति करने लगे—हे वाणी और मन की पहुँच से परे स्वरूप वाले, अनन्त शक्तिसम्पन्न, आदि-मध्य-अन्त से रहित, निर्गुण होते हुए भी सत्व आदि गुणों के आश्रय, सृष्टि के मूल कारण तथा भक्तों के समस्त संकटों को हरने वाले परमेश्वर! आपको बारंबार नमस्कार है। नारद जी द्वारा की गई स्तुति सुनकर भगवान विष्णु ने उनसे कहा।

श्रीभगवानुवाच । किमर्थमागतोऽसि त्वं किं ते मनसि वर्तते । कथयस्व महाभाग तत्सर्वं कथयामि ते ॥ १०॥

नारद उवाच । मर्त्यलोके जनाः सर्वे नानाक्लेशसमन्विताः । नानायोनिसमुत्पन्नाः पच्यन्ते पापकर्मभिः ॥ ११॥

तत्कथं शमयेन्नाथ लघूपायेन तद्वद । श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं कृपास्ति यदि ते मयि ॥ १२॥

हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान बोले—हे महाभाग! आपका यहाँ आगमन किस प्रयोजन से हुआ है? आपके मन में क्या इच्छा है? वह सब निःसंकोच कहिए, मैं अवश्य समाधान करूँगा। नारद जी ने निवेदन किया—हे नाथ! मृत्युलोक में अपने पापकर्मों के फल स्वरूप विभिन्न योनियों में जन्मे सभी मनुष्य अनेक प्रकार के क्लेशों से संतप्त हो रहे हैं। हे प्रभो! यदि मुझ पर आपकी कृपा है, तो कोई ऐसा सरल और छोटा उपाय बतलाइए, जिससे इन सभी के दुःखों का तत्काल निवारण हो सके।

श्रीभगवानुवाच । साधु पृष्टं त्वया वत्स लोकानुग्रहकाङ्क्षया । यत्कृत्वा मुच्यते मोहात् तच्छृणुष्व वदामि ते ॥ १३॥

व्रतमस्ति महत्पुण्यं स्वर्गे मर्त्ये च दुर्लभम् । तव स्नेहान्मया वत्स प्रकाशः क्रियतेऽधुना ॥ १४॥

सत्यनारायणस्यैव व्रतं सम्यग्विधानतः । कृत्वा सद्यः सुखं भुक्त्वा परत्र मोक्षमाप्नुयात् । तच्छ्रुत्वा भगवद्वाक्यं नारदो मुनिरब्रवीत् ॥ १५॥

हिन्दी अर्थ: श्रीभगवान बोले—हे वत्स! संसार के कल्याण की कामना से तुमने अत्यंत सुंदर प्रश्न किया है। जिस व्रत के अनुष्ठान से मनुष्य सांसारिक मोह-माया के बंधनों से मुक्त हो जाता है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो। स्वर्ग और पृथ्वी दोनों लोकों में दुर्लभ एक परम पुण्यप्रद व्रत है, जो तुम्हारे प्रति स्नेहवश मैं आज प्रकट कर रहा हूँ। वह है 'श्रीसत्यनारायण व्रत'। इसका विधिपूर्वक अनुष्ठान करने से मनुष्य इस लोक में शीघ्र ही समस्त सुखों का भोग करता है और परलोक में परम मोक्ष को प्राप्त होता है। भगवान के ऐसे वचन सुनकर देवर्षि नारद ने पुनः पूछा।

नारद उवाच । किं फलं किं विधानं च कृतं केनैव तद् व्रतम् । तत्सर्वं विस्तराद् ब्रूहि कदा कार्यं व्रतं प्रभो ॥ १६॥

श्रीभगवानुवाच । दुःखशोकादिशमनं धनधान्यप्रवर्धनम् ॥ १७॥

सौभाग्यसन्ततिकरं सर्वत्र विजयप्रदम् । यस्मिन् कस्मिन् दिने मर्त्यो भक्तिश्रद्धासमन्वितः ॥ १८॥

सत्यनारायणं देवं यजेच्चैव निशामुखे । ब्राह्मणैर्बान्धवैश्चैव सहितो धर्मतत्परः ॥ १९॥

हिन्दी अर्थ: नारद जी बोले—हे प्रभो! इस व्रत का क्या फल है? इसका क्या विधान है? पूर्वकाल में इसे किसने किया था? तथा यह व्रत कब किया जाना चाहिए? यह सब मुझे विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें। श्रीभगवान बोले—यह व्रत समस्त दुःख और शोक का नाश करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला, सौभाग्य एवं संतान प्रदान करने वाला तथा सर्वत्र विजय दिलाने वाला है। मनुष्य किसी भी दिन (पूर्णिमा, संक्रांति, एकादशी अथवा अपनी सुविधा अनुसार किसी भी शुभ दिन) भक्ति और श्रद्धा से युक्त होकर प्रदोष काल (संध्या समय) में धर्मपरायण होकर ब्राह्मणों तथा बंधु-बांधवों के साथ भगवान श्रीसत्यनारायण का विधिपूर्वक पूजन करे।

नैवेद्यं भक्तितो दद्यात् सपादं भक्ष्यमुत्तमम् । रम्भाफलं घृतं क्षीरं गोधूमस्य च चूर्णकम् ॥ २०॥

अभावे शालिचूर्णं वा शर्करा वा गुडस्तथा । सपादं सर्वभक्ष्याणि चैकीकृत्य निवेदयेत् ॥ २१॥

विप्राय दक्षिणां दद्यात् कथां श्रुत्वा जनैः सह । ततश्च बन्धुभिः सार्धं विप्रांश्च प्रतिभोजयेत् ॥ २२॥

प्रसादं भक्षयेद् भक्त्या नृत्यगीतादिकं चरेत् । ततश्च स्वगृहं गच्छेत् सत्यनारायणं स्मरन् ॥ २३॥

एवं कृते मनुष्याणां वाञ्छासिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् । विशेषतः कलियुगे लघूपायोऽस्ति भूतले ॥ २४॥

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे श्रीसत्यनारायण व्रतकथायां प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥

हिन्दी अर्थ: भगवान को भक्तिपूर्वक सवाया (सपाद - जैसे सवा पाव, सवा सेर आदि) उत्तम नैवेद्य अर्पित करे। नैवेद्य में केला, शुद्ध घी, दूध, गेहूँ का आटा (गेहूँ के आटे के अभाव में चावल का आटा) तथा शर्करा (चीनी) अथवा गुड़—इन सबको सवाया अनुपात में मिलाकर प्रसाद तैयार करे और भगवान को निवेदित करे। उपस्थित जनसमूह के साथ बैठकर कथा श्रवण करे, पूजा संपन्न कर ब्राह्मण को दक्षिणा दे। तत्पश्चात बंधु-बांधवों सहित ब्राह्मणों को भोजन कराए। स्वयं भी भक्तिभाव से प्रसाद ग्रहण करे, रात्रि में भगवान के नाम का संकीर्तन, नृत्य-गान आदि मंगल उत्सव करे और भगवान सत्यनारायण का स्मरण करता हुआ अपने घर जाए। ऐसा करने से मनुष्यों की सभी मनोकामनाएं निश्चित रूप से सिद्ध होती हैं। विशेष रूप से कलियुग में पृथ्वी पर कष्टों से मुक्ति का यह सबसे सरल उपाय है।

अथ द्वितीयोऽध्यायः (दूसरा अध्याय)

सूत उवाच । अथान्यत् सम्प्रवक्ष्यामि कृतं येन पुरा द्विजाः । कश्चित् काशीपुरे रम्ये ह्यासीद्विप्रोऽतिनिर्धनः ॥ १॥

क्षुत्तृड्भ्यां व्याकुलो भूत्वा नित्यं बभ्राम भूतले । दुःखितं ब्राह्मणं दृष्ट्वा भगवान् ब्राह्मणप्रियः ॥ २॥

वृद्धब्राह्मणरूपस्तं पप्रच्छ द्विजमादरात् । किमर्थं भ्रमसे विप्र महीं नित्यं सुदुःखितः । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि कथ्यतां द्विजसत्तम ॥ ३॥

हिन्दी अर्थ: सूत जी बोले—हे विप्रगण! अब मैं आगे की कथा कहता हूँ कि पूर्वकाल में इस व्रत को किसने किया था। प्राचीन काल में रमणीय काशीपुरी में एक अत्यंत दरिद्र ब्राह्मण रहता था। वह भूख-प्यास से व्याकुल होकर प्रतिदिन पृथ्वी पर भिक्षाटन के लिए भटकता रहता था। उस दीन-दुखी विप्र को देखकर ब्राह्मणों से अगाध प्रेम करने वाले भगवान श्रीविष्णु ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और आदरपूर्वक उस द्विज से पूछा—हे विप्रवर! आप नित्य अत्यंत दुखी होकर इस पृथ्वी पर क्यों भटकते हैं? हे द्विजश्रेष्ठ! मैं यह सब सुनना चाहता हूँ, कृपा कर बताइए।

ब्राह्मण उवाच । ब्राह्मणोऽतिदरिद्रोऽहं भिक्षार्थं वै भ्रमे महीम् ॥ ४॥

उपायं यदि जानासि कृपया कथय प्रभो । वृद्धब्राह्मण उवाच । सत्यनारायणो विष्णुर्वाञ्छितार्थफलप्रदः ॥ ५॥

तस्य त्वं पूजनं विप्र कुरुष्व व्रतमुत्तमम् । यत्कृत्वा सर्वदुःखेभ्यो मुक्तो भवति मानवः ॥ ६॥

विधानं च व्रतस्यापि विप्रायाभाष्य यत्नतः । सत्यनारायणो वृद्धस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ७॥

हिन्दी अर्थ: निर्धन ब्राह्मण ने कहा—हे प्रभो! मैं एक अत्यंत दरिद्र ब्राह्मण हूँ और उदर-पोषण के लिए भिक्षा माँगने हेतु दर-दर भटकता रहता हूँ। यदि आप मेरी इस दरिद्रता को दूर करने का कोई उपाय जानते हों, तो कृपया बताइए। वृद्ध ब्राह्मण रूपी भगवान ने कहा—भगवान श्रीसत्यनारायण ही सर्वसमर्थ श्रीविष्णु हैं, जो मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। हे विप्र! तुम उनका यह उत्तम व्रत एवं पूजन करो, जिसके करने से मनुष्य समस्त दुःखों से मुक्त हो जाता है। उस विप्र को व्रत का सम्पूर्ण विधान समझाकर वे वृद्ध ब्राह्मण वहीं अंतर्ध्यान हो गए।

तद् व्रतं सङ्करिष्यामि यदुक्तं ब्राह्मणेन वै । इति सञ्चिन्त्य विप्रोऽसौ रात्रौ निद्रां न लब्धवान् ॥ ८॥

ततः प्रातः समुत्थाय सत्यनारायणव्रतम् । करिष्य इति सङ्कल्प्य भिक्षार्थमगमद् द्विजः ॥ ९॥

तस्मिन्नेव दिने विप्रः प्रचुरं द्रव्यमाप्तवान् । तेनैव बन्धुभिः सार्धं सत्यस्य व्रतमाचरत् ॥ १०॥

सर्वदुःखविनिर्मुक्तः सर्वसम्पत्समन्वितः । बभूव स द्विजश्रेष्ठो व्रतस्यास्य प्रभावतः ॥ ११॥

ततः प्रभृति कालं च मासि मासि व्रतं कृतम् । एवं नारायणस्येदं व्रतं कृत्वा द्विजोत्तमः ॥ १२॥

सर्वपापविनिर्मुक्तो दुर्लभं मोक्षमाप्तवान् । व्रतमस्य यदा विप्र पृथिव्यां सङ्करिष्यति ॥ १३॥

तदैव सर्वदुःखं तु मनुजस्य विनश्यति । एवं नारायणेनोक्तं नारदाय महात्मने ॥ १४॥

मया तत्कथितं विप्राः किमन्यत् कथयामि वः । ऋषय ऊचुः । तस्माद् विप्राच्छ्रुतं केन पृथिव्यां चरितं मुने । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामः श्रद्धाऽस्माकं प्रजायते ॥ १५॥

हिन्दी अर्थ: ब्राह्मण ने मन ही मन विचार किया कि वृद्ध विप्र ने जिस व्रत का उपदेश दिया है, मैं उसे अवश्य करूँगा। इसी विचार में उसे रातभर नींद नहीं आई। प्रातःकाल उठकर उसने सत्यनारायण व्रत करने का दृढ संकल्प लिया और भिक्षाटन के लिए निकला। भगवान की कृपा से उस दिन उस ब्राह्मण को प्रचुर धन प्राप्त हुआ। उसने उसी धन से अपने बंधु-बांधवों के साथ श्रीसत्यनारायण का विधिवत व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह द्विजश्रेष्ठ सभी दुःखों से मुक्त होकर समस्त संपत्तियों से संपन्न हो गया। इसके बाद से वह प्रति मास यह व्रत करने लगा। इस प्रकार नारायण के इस पावन व्रत को करके वह समस्त पापों से मुक्त हुआ और दुर्लभ मोक्ष को प्राप्त हुआ। जब भी कोई मनुष्य पृथ्वी पर यह व्रत करता है, उसी क्षण उसके सारे कष्ट नष्ट हो जाते हैं। सूत जी बोले—हे मुनियों! भगवान नारायण ने जैसा महात्मा नारद को बताया था, वैसा मैंने आपसे कहा; अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ऋषियों ने पूछा—हे मुने! उस ब्राह्मण से इस पावन चरित्र को सुनकर पृथ्वी पर और किसने यह व्रत किया? हम सब यह सुनना चाहते हैं, हमारे मन में इसके प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा उत्पन्न हो रही है।

सूत उवाच । श‍ृणुध्वं मुनयः सर्वे व्रतं येन कृतं भुवि । एकदा स द्विजवरो यथाविभवविस्तरैः ॥ १६॥

बन्धुभिः स्वजनैः सार्धं व्रतं कर्तुं समुद्यतः । एतस्मिन्नन्तरे काले काष्ठक्रेता समागमत् ॥ १७॥

बहिः काष्ठं च संस्थाप्य विप्रस्य गृहमाययौ । तृष्णया पीडितात्मा च दृष्ट्वा विप्रं कृतं व्रतम् ॥ १८॥

प्रणिपत्य द्विजं प्राह किमिदं क्रियते त्वया । कृते किं फलमाप्नोति विस्तराद् वद मे प्रभो ॥ १९॥

विप्र उवाच । सत्यनारायणस्येदं व्रतं सर्वेप्सितप्रदम् । तस्य प्रसादान्मे सर्वं धनधान्यादिकं महत् ॥ २०॥

हिन्दी अर्थ: सूत जी बोले—हे मुनियो! पृथ्वी पर जिन-जिन लोगों ने यह व्रत किया, उनका इतिहास सुनो। एक समय वह श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने वैभव और सामर्थ्य के अनुसार अपने बंधु-बांधवों के साथ इस व्रत को करने की तैयारी कर रहा था। उसी समय एक लकड़हारा सूखी लकड़ियाँ बेचने वहाँ आया। उसने लकड़ियों का गट्ठर बाहर रख दिया और प्यास से व्याकुल होकर ब्राह्मण के घर में प्रवेश किया। ब्राह्मण को व्रत में लीन देखकर उसने प्रणाम किया और पूछा—हे प्रभो! आप यह क्या कर रहे हैं? इसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है? मुझे विस्तार से बताइए। विप्र ने कहा—यह समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाला भगवान श्रीसत्यनारायण का व्रत है। इन्हीं की कृपा से मुझे यह विपुल धन-धान्य और सुख-संपत्ति प्राप्त हुई है।

तस्मादेतद् व्रतं ज्ञात्वा काष्ठक्रेताऽतिहर्षितः । पपौ जलं प्रसादं च भुक्त्वा स नगरं ययौ ॥ २१॥

सत्यनारायणं देवं मनसा इत्यचिन्तयत् । काष्ठं विक्रयतो ग्रामे प्राप्यते चाद्य यद् धनम् ॥ २२॥

तेनैव सत्यदेवस्य करिष्ये व्रतमुत्तमम् । इति सञ्चिन्त्य मनसा काष्ठं धृत्वा तु मस्तके ॥ २३॥

जगाम नगरे रम्ये धनिनां यत्र संस्थितिः । तद्दिने काष्ठमूल्यं च द्विगुणं प्राप्तवानसौ ॥ २४॥

ततः प्रसन्नहृदयः सुपक्वं कदलीफलम् । शर्कराघृतदुग्धं च गोधूमस्य च चूर्णकम् ॥ २५॥

कृत्वैकत्र सपादं च गृहीत्वा स्वगृहं ययौ । ततो बन्धून् समाहूय चकार विधिना व्रतम् ॥ २६॥

तद् व्रतस्य प्रभावेण धनपुत्रान्वितोऽभवत् । इहलोके सुखं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं ययौ ॥ २७॥

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे श्रीसत्यनारायण व्रतकथायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥

हिन्दी अर्थ: ब्राह्मण से इस व्रत की महिमा जानकर लकड़हारा अत्यंत हर्षित हुआ। उसने जल पिया, भगवान का प्रसाद ग्रहण किया और नगर की ओर चल दिया। उसने मन ही मन भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए यह संकल्प किया—"आज नगर में लकड़ियाँ बेचने से मुझे जो भी धन प्राप्त होगा, उसी से मैं सत्यदेव का उत्तम व्रत करूँगा।" ऐसा विचार कर उसने लकड़ियों का गट्ठर सिर पर उठाया और नगर के उस भाग में गया जहाँ धनी लोग रहते थे। उस दिन भगवान की कृपा से उसे लकड़ियों का दोगुना मूल्य प्राप्त हुआ। तब प्रसन्नचित्त होकर उसने पके हुए केले, चीनी, घी, दूध और गेहूँ का आटा—सब सवाया मात्रा में खरीदा और अपने घर आया। उसने अपने बंधु-बांधवों को आमंत्रित कर विधिपूर्वक सत्यनारायण देव का व्रत किया। इस व्रत के दिव्य प्रभाव से वह धन-धान्य तथा पुत्र-पौत्रों से संपन्न हो गया, इस लोक में दीर्घकाल तक सुख भोगकर अंत में सत्यलोक (वैकुण्ठ) को प्राप्त हुआ।

अथ तृतीयोऽध्यायः (तीसरा अध्याय)

सूत उवाच । पुनरग्रे प्रवक्ष्यामि श‍ृणुध्वं मुनिसत्तमाः । पुरा चोल्कामुखो नाम नृपश्चासीन्महामतिः ॥ १॥

जितेन्द्रियः सत्यवादी ययौ देवालयं प्रति । दिने दिने धनं दत्त्वा द्विजान् सन्तोषयत् सुधीः ॥ २॥

भार्या तस्य प्रमुग्धा च सरोजवदना सती । भद्रशीलानदीतीरे सत्यस्य व्रतमाचरत् ॥ ३॥

एतस्मिन्नन्तरे तत्र साधुरेकः समागतः । वाणिज्यार्थं बहुधनैरनेकैः परिपूरितः ॥ ४॥

नावं संस्थाप्य तत्तीरे जगाम नृपतिं प्रति । दृष्ट्वा स व्रतिनं भूपं प्रपच्छ विनयान्वितः ॥ ५॥

हिन्दी अर्थ: सूत जी बोले—हे श्रेष्ठ मुनियों! अब आगे की कथा कहता हूँ, सुनिए। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक अत्यंत बुद्धिमान, जितेन्द्रिय और सत्यवादी राजा राज्य करता था। वह प्रतिदिन देवालय जाकर विद्वान ब्राह्मणों को धन देकर संतुष्ट करता था। उसकी धर्मपत्नी कमल के समान मुख वाली परम सुंदरी और सती-साध्वी थी। एक दिन वह राजा अपनी पत्नी के साथ भद्रशीला नदी के तट पर श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत कर रहा था। उसी समय 'साधु' नाम का एक वैश्य व्यापार के लिए विपुल धन-सामग्रियों से भरी हुई अपनी नौका लेकर वहाँ आया। उसने नौका को नदी किनारे बाँध दिया और राजा के पास पहुँचा। राजा को भक्तिभाव से व्रत करते देखकर उसने अत्यंत विनयपूर्वक पूछा।

साधुरुवाच । किमिदं कुरुषे राजन् भक्तियुक्तेन चेतसा । प्रकाशं कुरु तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि साम्प्रतम् ॥ ६॥

राजोवाच । पूजनं क्रियते साधो विष्णोरतुलतेजसः । व्रतं च स्वजनैः सार्धं पुत्राद्यावाप्तिकाम्यया ॥ ७॥

भूपस्य वचनं श्रुत्वा साधुः प्रोवाच सादरम् । सर्वं कथय मे राजन् करिष्येऽहं तवोदितम् ॥ ८॥

ममापि सन्ततिर्नास्ति ह्येतस्माज्जायते ध्रुवम् । ततो निवृत्त्य वाणिज्यात् सानन्दो गृहमागतः ॥ ९॥

भार्यायै कथितं सर्वं व्रतं सन्ततिदायकम् । तदा व्रतं करिष्यामि यदा मे सन्ततिर्भवेत् ॥ १०॥

इति लीलावतीं प्राह पत्नीं साधुः स सत्तमः ।

हिन्दी अर्थ: साधु वैश्य ने कहा—हे राजन्! आप एकाग्रचित्त होकर यह क्या कर रहे हैं? कृपा कर मुझे बताइए, मैं इसे जानना चाहता हूँ। राजा ने उत्तर दिया—हे साधु! मैं अपने परिजनों के साथ अतुलनीय तेजस्वी भगवान श्रीविष्णु का यह व्रत और पूजन पुत्र आदि संतति की प्राप्ति की कामना से कर रहा हूँ। राजा के वचन सुनकर साधु ने आदरपूर्वक कहा—हे राजन्! मुझे इसका सम्पूर्ण विधान बताइए, मैं भी आपके बताए अनुसार यह व्रत अवश्य करूँगा; क्योंकि मेरी भी कोई संतान नहीं है, विश्वास है कि इससे मुझे संतान की प्राप्ति अवश्य होगी। इसके पश्चात वह व्यापार समाप्त कर आनंदपूर्वक अपने घर लौटा। उसने अपनी पतिव्रता पत्नी लीलावती को संतान देने वाले इस पावन व्रत की बात बताई और कहा—"जब मुझे संतान की प्राप्ति होगी, तब मैं यह व्रत करूँगा।"

एकस्मिन् दिवसे तस्य भार्या लीलावती सती ॥ ११॥

भर्तृयुक्तानन्दचित्ताऽभवद् धर्मपरायणा । गर्भिणी साऽभवत् तस्य भार्या सत्यप्रसादतः ॥ १२॥

दशमे मासि वै तस्याः कन्यारत्नमजायत । दिने दिने सा ववृधे शुक्लपक्षे यथा शशी ॥ १३॥

नाम्ना कलावती चेति तन्नामकरणं कृतम् । ततो लीलावती प्राह स्वामिनं मधुरं वचः ॥ १४॥

न करोषि किमर्थं वै पुरा सङ्कल्पितं व्रतम् । साधुरुवाच । विवाहसमये त्वस्याः करिष्यामि व्रतं प्रिये ॥ १५॥

इति भार्यां समाश्वास्य जगाम नगरं प्रति ।

हिन्दी अर्थ: कुछ समय बाद सत्यदेव की कृपा से उसकी धर्मपरायणा पत्नी लीलावती गर्भवती हुई। दसवें महीने में उसने एक अत्यंत सुंदर कन्यारत्न को जन्म दिया। वह कन्या शुक्लपक्ष के चंद्रमा की भाँति दिनों-दिन बढ़ने लगी। उसका नाम 'कलावती' रखा गया। तब लीलावती ने अपने पति से मधुर वाणी में स्मरण कराया—"स्वामिन्! आपने पहले जो व्रत करने का संकल्प लिया था, उसे अब क्यों नहीं करते?" साधु ने कहा—"हे प्रिये! इसके विवाह के समय मैं यह व्रत अवश्य करूँगा।" अपनी पत्नी को ऐसा आश्वासन देकर वह व्यापार हेतु दूसरे नगर चला गया।

ततः कलावती कन्या ववृधे पितृवेश्मनि ॥ १६॥

दृष्ट्वा कन्यां ततः साधुर्नगरे सखिभिः सह । मन्त्रयित्वा द्रुतं दूतं प्रेषयामास धर्मवित् ॥ १७॥

विवाहार्थं च कन्याया वरं श्रेष्ठं विचारय । तेनाज्ञप्तश्च दूतोऽसौ काञ्चनं नगरं ययौ ॥ १८॥

तस्मादेकं वणिक्पुत्रं समादायागतो हि सः । दृष्ट्वा तु सुन्दरं बालं वणिक्पुत्रं गुणान्वितम् ॥ १९॥

ज्ञातिभिर्बन्धुभिः सार्धं परितुष्टेन चेतसा । दत्तवान् साधुपुत्राय कन्यां विधिविधानतः ॥ २०॥

ततोऽभाग्यवशात् तेन विस्मृतं व्रतमुत्तमम् । विवाहसमये तस्यास्तेन रुष्टोऽभवत् प्रभुः ॥ २१॥

हिन्दी अर्थ: कन्या कलावती पिता के घर में बड़ी होने लगी। जब वह विवाह योग्य हुई, तो साधु ने नगर में मित्रों के साथ परामर्श कर शीघ्र ही एक दूत को बुलाया और आदेश दिया—"मेरी कन्या के विवाह के लिए कोई सुयोग्य वर खोजकर लाओ।" साधु की आज्ञा पाकर वह दूत कांचन नगर पहुँचा और वहाँ से एक सुयोग्य, सुंदर और गुणवान वणिक-पुत्र को लेकर आया। उस श्रेष्ठ बालक को देखकर साधु ने अपने बंधु-बांधवों के साथ प्रसन्न मन से विधिपूर्वक अपनी कन्या कलावती का विवाह उस वणिक-पुत्र के साथ कर दिया। किंतु दुर्भाग्यवश विवाह के समय भी साधु ने सत्यनारायण के व्रत को भुला दिया। उसकी इस भूल और प्रतिज्ञा-भंग से भगवान सत्यनारायण उस पर रुष्ट हो गए।

ततः कालेन नियतो निजकर्मविशारदः । वाणिज्यार्थं ततः शीघ्रं जामातृसहितो वणिक् ॥ २२॥

रत्नसारपुरे रम्ये गत्वा सिन्धुसमीपतः । वाणिज्यमकरोत् साधुर्जामात्रा श्रीमता सह ॥ २३॥

तौ गतौ नगरे रम्ये चन्द्रकेतोर्नृपस्य च । एतस्मिन्नेव काले तु सत्यनारायणः प्रभुः ॥ २४॥

भ्रष्टप्रतिज्ञमालोक्य शापं तस्मै प्रदत्तवान् । दारुणं कठिनं चास्य महद् दुःखं भविष्यति ॥ २५॥

एकस्मिन् दिवसे राज्ञो धनमादाय तस्करः । तत्रैव चागतश्चौरो वणिजौ यत्र संस्थितौ ॥ २६॥

तत्पश्चाद् धावकान् दूतान् दृष्ट्वा भीतेन चेतसा । धनं संस्थाप्य तत्रैव स तु शीघ्रमलक्षितः ॥ २७॥

हिन्दी अर्थ: कुछ समय बाद व्यापार कर्म में निपुण वह साधु वैश्य अपने दामाद के साथ व्यापार के लिए समुद्र तट पर स्थित सुंदर रत्नसारपुर नगर (राजा चंद्रकेतु की राजधानी) में पहुँचा और दामाद सहित व्यापार करने लगा। उधर भगवान सत्यनारायण ने उसे प्रतिज्ञा से भ्रष्ट देखकर शाप दे दिया कि "इसे अत्यंत कठिन और दारुण दुःख प्राप्त होगा।" एक दिन एक चोर राजा चंद्रकेतु का खजाना चुराकर भागा। राजा के दूतों को अपने पीछे दौड़ते देख भयभीत होकर चोर ने वह सारा धन वहीं रख दिया जहाँ दोनों वैश्य ठहरे हुए थे, और स्वयं छिपकर भाग निकला।

ततो दूताः समायाता यत्रास्ते सज्जनो वणिक् । दृष्ट्वा नृपधनं तत्र बद्ध्वाऽऽनीतौ वणिक्सुतौ ॥ २८॥

हर्षेण धावमानाश्च प्रोचुर्नृपसमीपतः । तस्करौ द्वौ समानीतौ विलोक्याज्ञापय प्रभो ॥ २९॥

राज्ञाऽऽज्ञप्तास्ततः शीघ्रं दृढं बद्ध्वा तु तावुभौ । स्थापितौ द्वौ महादुर्गे कारागारेऽविचारतः ॥ ३०॥

मायया सत्यदेवस्य न श्रुतं कैस्तयोर्वचः । अतस्तयोर्धनं राज्ञा गृहीतं चन्द्रकेतुना ॥ ३१॥

हिन्दी अर्थ: जब राजा के दूत वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने साधु वणिक के पास राजा का सारा धन पड़ा देखा। उन्होंने तुरंत दोनों (ससुर-दामाद) को रस्सियों से बाँध लिया और प्रसन्नतापूर्वक राजा के सामने प्रस्तुत करते हुए कहा—"प्रभो! हम दोनों चोरों को पकड़ लाए हैं, आप देखकर आज्ञा दीजिए।" राजा चंद्रकेतु ने बिना किसी विचार-विमर्श के तुरंत आज्ञा दी कि दोनों को कठोर कारागार में डाल दिया जाए। भगवान सत्यदेव की माया से किसी ने भी उन दोनों की कोई सफाई नहीं सुनी और राजा ने उनका सारा व्यापारिक धन भी जब्त कर लिया।

तच्छापाच्च तयोर्गेहे भार्या चैवातिदुःखिता । चौरेणापहृतं सर्वं गृहे यच्च स्थितं धनम् ॥ ३२॥

आधिव्याधिसमायुक्ता क्षुत्पिपासातिदुःखिता । अन्नचिन्तापरा भूत्वा बभ्राम च गृहे गृहे । कलावती तु कन्यापि बभ्राम प्रतिवासरम् ॥ ३३॥

एकस्मिन् दिवसे याता क्षुधार्ता द्विजमन्दिरम् । गत्वाऽपश्यद् व्रतं तत्र सत्यनारायणस्य च ॥ ३४॥

उपविश्य कथां श्रुत्वा वरं प्रार्थितवत्यपि । प्रसादभक्षणं कृत्वा ययौ रात्रौ गृहं प्रति ॥ ३५॥

हिन्दी अर्थ: सत्यदेव के शाप के कारण उनके घर पर भी भारी विपत्ति आ गई। चोरों ने साधु के घर का सारा धन चुरा लिया। उसकी पत्नी लीलावती और कन्या कलावती शारीरिक व मानसिक व्याधियों तथा भूख-प्यास से अत्यंत व्याकुल होकर अन्न की चिंता में दर-दर भटकने लगीं। एक दिन भूख से तड़पती हुई कलावती एक ब्राह्मण के घर पहुँची। वहाँ उसने भगवान श्रीसत्यनारायण का व्रत और पूजन होते देखा। उसने बैठकर पूरी कथा सुनी, अपने पिता और पति की कुशलता की प्रार्थना की, प्रसाद ग्रहण किया और रात को घर लौटी।

माता कलावतीं कन्यां कथयामास प्रेमतः । पुत्रि रात्रौ स्थिता कुत्र किं ते मनसि वर्तते ॥ ३६॥

कन्या कलावती प्राह मातरं प्रति सत्वरम् । द्विजालये व्रतं मातर्दृष्टं वाञ्छितसिद्धिदम् ॥ ३७॥

तच्छ्रुत्वा कन्यकावाक्यं व्रतं कर्तुं समुद्यता । सा मुदा तु वणिग्भार्या सत्यनारायणस्य च ॥ ३८॥

व्रतं चक्रे सैव साध्वी बन्धुभिः स्वजनैः सह । भर्तृजामातरौ क्षिप्रमागच्छेतां स्वमाश्रमम् ॥ ३९॥

अपराधं च मे भर्तुर्जामातुः क्षन्तुमर्हसि । व्रतेनानेन तुष्टोऽसौ सत्यनारायणः पुनः ॥ ४०॥

दर्शयामास स्वप्नं हि चन्द्रकेतुं नृपोत्तमम् । बन्दिनौ मोचय प्रातर्वणिजौ नृपसत्तम ॥ ४१॥

देयं धनं च तत्सर्वं गृहीतं यत् त्वयाऽधुना । नो चेत् त्वां नाशयिष्यामि सराज्यधनपुत्रकम् ॥ ४२॥

एवमाभाष्य राजानं ध्यानगम्योऽभवत् प्रभुः ।

हिन्दी अर्थ: माता लीलावती ने प्रेमपूर्वक पूछा—"हे पुत्री! तू इतनी रात तक कहाँ थी? तेरे मन में क्या है?" कन्या कलावती ने कहा—"हे माता! मैंने एक ब्राह्मण के घर में मनोवांछित फल देने वाला श्रीसत्यनारायण का व्रत देखा है।" कन्या की बात सुनकर लीलावती अत्यंत प्रसन्न हुई और उसने तुरंत अपने बंधु-बांधवों को बुलाकर श्रीसत्यनारायण का व्रत किया। उसने प्रार्थना की—"हे सत्यदेव! मेरे पति और दामाद शीघ्र घर लौट आएं तथा उनका जो भी अपराध हो, उसे आप क्षमा करें।" इस व्रत से भगवान सत्यनारायण अत्यंत संतुष्ट हुए और उन्होंने राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा—"हे राजन्! तुमने जिन दो वणिकों को कारागार में बंद कर रखा है, उन्हें प्रातःकाल मुक्त कर दो और उनका जो भी धन तुमने छीना है, वह लौटा दो। यदि ऐसा नहीं करोगे, तो मैं तुम्हारे राज्य, धन और पुत्र सहित तुम्हारा सर्वनाश कर दूँगा।" ऐसा कहकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए।

ततः प्रभातसमये राजा च स्वजनैः सह ॥ ४३॥

उपविश्य सभामध्ये प्राह स्वप्नं जनं प्रति । बद्धौ महाजनौ शीघ्रं मोचय द्वौ वणिक्सुतौ ॥ ४४॥

इति राज्ञो वचः श्रुत्वा मोचयित्वा महाजनौ । समानीय नृपस्याग्रे प्राहुस्ते विनयान्विताः ॥ ४५॥

आनीतौ द्वौ वणिक्पुत्रौ मुक्तौ निगडबन्धनात् । ततो महाजनौ नत्वा चन्द्रकेतुं नृपोत्तमम् ॥ ४६॥

स्मरन्तौ पूर्ववृत्तान्तं नोचतुर्भयविह्वलौ । राजा वणिक्सुतौ वीक्ष्य वचः प्रोवाच सादरम् ॥ ४७॥

दैवात् प्राप्तं महद्दुःखमिदानीं नास्ति वै भयम् । तदा निगडसन्त्यागं क्षौरकर्माद्यकारयत् ॥ ४८॥

वस्त्रालङ्कारकं दत्त्वा परितोष्य नृपश्च तौ । पुरस्कृत्य वणिक्पुत्रौ वचसाऽतोषयद् भृशम् ॥ ४९॥

पुरानीतं तु यद् द्रव्यं द्विगुणीकृत्य दत्तवान् । प्रोवाच च ततो राजा गच्छ साधो निजाश्रमम् ॥ ५०॥

राजानं प्रणिपत्याह गन्तव्यं त्वत्प्रसादतः । इत्युक्त्वा तौ महावैश्यौ जग्मतुः स्वगृहं प्रति ॥ ५१॥

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे श्रीसत्यनारायण व्रतकथायां तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥

हिन्दी अर्थ: प्रातःकाल राजा ने राजसभा में मंत्रियों और परिजनों को अपना स्वप्न सुनाया और आज्ञा दी कि दोनों वणिकों को कारागार से मुक्त किया जाए। सैनिकों ने दोनों को बेड़ियों से मुक्त कर राजा के सम्मुख उपस्थित किया। वे दोनों भयभीत होकर राजा को प्रणाम कर खड़े रहे। राजा ने सादर कहा—"दैवयोग से आपको यह महान कष्ट प्राप्त हुआ, अब आपको कोई भय नहीं है।" राजा ने उनके बाल आदि कटवाकर शुद्ध करवाया, नवीन वस्त्र और आभूषण देकर उनका सम्मान किया, और उनका जो धन छीना गया था, उससे दोगुना धन उन्हें वापस लौटा दिया। राजा ने आदरपूर्वक कहा—"हे साधु! अब आप सानंद अपने घर जाएँ।" राजा को प्रणाम करके दोनों वैश्य अपने घर की यात्रा पर निकल पड़े।

अथ चतुर्थोऽध्यायः (चौथा अध्याय)

सूत उवाच । यात्रां तु कृतवान् साधुर्मङ्गलायनपूर्विकाम् । ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा तदा तु नगरं ययौ ॥ १॥

कियद् दूरे गते साधौ सत्यनारायणः प्रभुः । जिज्ञासां कृतवान् साधौ किमस्ति तव नौस्थितम् ॥ २॥

ततो महाजनौ मत्तौ हेलया च प्रहस्य वै । कथं पृच्छसि भो दण्डिन् मुद्रां नेतुं किमिच्छसि ॥ ३॥

लतापत्रादिकं चैव वर्तते तरणौ मम । निष्ठुरं च वचः श्रुत्वा सत्यं भवतु ते वचः ॥ ४॥

एवमुक्त्वा गतः शीघ्रं दण्डी तस्य समीपतः । कियद् दूरे ततो गत्वा स्थितः सिन्धुसमीपतः ॥ ५॥

हिन्दी अर्थ: सूत जी बोले—साधु वैश्य ने मंगलाचरण कर ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर अपनी नौका से प्रस्थान किया। जब नौका कुछ दूर आगे बढ़ी, तब भगवान सत्यनारायण ने एक दंडी सन्यासी का वेष धारण कर उसकी परीक्षा लेने हेतु पूछा—"हे साधु! तुम्हारी इस नौका में क्या भरा है?" धन के मद में चूर साधु ने उपहासपूर्वक हँसते हुए कहा—"हे दंडी! आप यह क्यों पूछ रहे हैं? क्या आप मुझसे धन लेना चाहते हैं? मेरी नौका में तो केवल लताएँ और सूखे पत्ते भरे हैं।" साधु के ऐसे कठोर और असत्य वचन सुनकर दंडी रूपी भगवान ने कहा—"तुम्हारा वचन सत्य हो जाए!" इतना कहकर वे वहाँ से कुछ दूर जाकर समुद्र तट पर बैठ गए।

गते दण्डिनि साधुश्च कृतनित्यक्रियस्तदा । उत्थितां तरणीं दृष्ट्वा विस्मयं परमं ययौ ॥ ६॥

दृष्ट्वा लतादिकं चैव मूर्च्छितो न्यपतद् भुवि । लब्धसंज्ञो वणिक्पुत्रस्ततश्चिन्तान्वितोऽभवत् ॥ ७॥

तदा तु दुहितुः कान्तो वचनं चेदमब्रवीत् । किमर्थं क्रियते शोकः शापो दत्तश्च दण्डिना ॥ ८॥

शक्यते तेन सर्वं हि कर्तुं चात्र न संशयः । अतस्तच्छरणं यामो वाञ्छितार्थो भविष्यति ॥ ९॥

जामातुर्वचनं श्रुत्वा तत्सकाशं गतस्तदा । दृष्ट्वा च दण्डिनं भक्त्या नत्वा प्रोवाच सादरम् ॥ १०॥

क्षमस्व चापराधं मे यदुक्तं तव सन्निधौ । एवं पुनः पुनर्नत्वा महाशोकाकुलोऽभवत् ॥ ११॥

हिन्दी अर्थ: दंडी के चले जाने पर जब साधु ने नित्यक्रिया पूर्ण कर नौका को जल में अत्यधिक ऊँचा उठा देखा, तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। नौका में जाकर देखा तो वास्तव में वहाँ केवल पत्ते और लताएँ ही भरी थीं। यह देखकर वह मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। होश में आने पर वह अत्यंत विलाप करने लगा। तब उसके दामाद ने कहा—"आप शोक क्यों करते हैं? यह उस दंडी सन्यासी का ही शाप है। वे जो चाहें कर सकते हैं, इसमें कोई संशय नहीं। अतः हमें उन्हीं की शरण में चलना चाहिए, वे ही हमारी मनोकामना पूर्ण करेंगे।" दामाद की बात सुनकर साधु समुद्र तट पर बैठे उस दंडी के पास पहुँचा और भक्तिपूर्वक साष्टांग प्रणाम कर रोते हुए बोला—"हे स्वामिन्! मैंने आपके सम्मुख जो भी धृष्टता की और असत्य कहा, मेरे उस अपराध को क्षमा करें।"

प्रोवाच वचनं दण्डी विलपन्तं विलोक्य च । मा रोदीः श‍ृणु मद्वाक्यं मम पूजाबहिर्मुखः ॥ १२॥

ममाज्ञया च दुर्बुद्धे लब्धं दुःखं मुहुर्मुहुः । तच्छ्रुत्वा भगवद्वाक्यं स्तुतिं कर्तुं समुद्यतः ॥ १३॥

साधुरुवाच । त्वन्मायामोहिताः सर्वे ब्रह्माद्यास्त्रिदिवौकसः । न जानन्ति गुणान् रूपं तवाश्चर्यमिदं प्रभो ॥ १४॥

मूढोऽहं त्वां कथं जाने मोहितस्तव मायया । प्रसीद पूजयिष्यामि यथाविभवविस्तरैः ॥ १५॥

पुरा वित्तं च तत् सर्वं त्राहि मां शरणागतम् । श्रुत्वा भक्तियुतं वाक्यं परितुष्टो जनार्दनः ॥ १६॥

वरं च वाञ्छितं दत्त्वा तत्रैवान्तर्दधे हरिः । ततो नावं समारुह्य दृष्ट्वा वित्तप्रपूरिताम् ॥ १७॥

कृपया सत्यदेवस्य सफलं वाञ्छितं मम । इत्युक्त्वा स्वजनैः सार्धं पूजां कृत्वा यथाविधि ॥ १८॥

हर्षेण चाभवत् पूर्णः सत्यदेवप्रसादतः । नावं संयोज्य यत्नेन स्वदेशगमनं कृतम् ॥ १९॥

हिन्दी अर्थ: साधु को विलाप करते देखकर दंडी ने कहा—"रोओ मत, मेरी बात सुनो। हे दुर्बुद्धे! मेरी पूजा से विमुख होने के कारण ही तुम्हें मेरी आज्ञा से बारंबार यह दुःख भोगना पड़ा है।" भगवान के ऐसे वचन सुनकर साधु उनकी स्तुति करने लगा—"हे प्रभो! आपकी माया से मोहित होकर ब्रह्मा आदि समस्त देवता भी आपके वास्तविक रूप और गुणों को नहीं जान पाते, फिर मैं अज्ञानी मनुष्य आपकी माया से मोहित होकर आपको कैसे जान सकता हूँ? आप मुझ पर प्रसन्न हों। मैं अपने सामर्थ्य के अनुसार आपका पूजन करूँगा। मेरी रक्षा कीजिए और मेरी नौका को पुनः धन से भर दीजिए।" साधु की भक्तिपूर्ण स्तुति सुनकर भगवान जनार्दन संतुष्ट हुए, इच्छित वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए। साधु ने जब नौका पर आकर देखा, तो वह पुनः रत्नों और धन से भरी हुई थी। उसने कहा—"सत्यदेव की कृपा से मेरा मनोरथ सिद्ध हुआ।" उसने विधिपूर्वक पूजन किया और प्रसन्नतापूर्वक अपने देश की ओर नौका बढ़ा दी।

साधुर्जामातरं प्राह पश्य रत्नपुरीं मम । दूतं च प्रेषयामास निजवित्तस्य रक्षकम् ॥ २०॥

ततोऽसौ नगरं गत्वा साधुभार्यां विलोक्य च । प्रोवाच वाञ्छितं वाक्यं नत्वा बद्धाञ्जलिस्तदा ॥ २१॥

निकटे नगरस्यैव जामात्रा सहितो वणिक् । आगतो बन्धुवर्गैश्च वित्तैश्च बहुभिर्युतः ॥ २२॥

श्रुत्वा दूतमुखाद्वाक्यं महाहर्षवती सती । सत्यपूजां ततः कृत्वा प्रोवाच तनुजां प्रति ॥ २३॥

व्रजामि शीघ्रमागच्छ साधुसन्दर्शनाय च । इति मातृवचः श्रुत्वा व्रतं कृत्वा समाप्य च ॥ २४॥

प्रसादं च परित्यज्य गता साऽपि पतिं प्रति । तेन रुष्टः सत्यदेवो भर्तारं तरणिं तथा ॥ २५॥

संहृत्य च धनैः सार्धं जले तस्यावमज्जयत् । ततः कलावती कन्या न विलोक्य निजं पतिम् ॥ २६॥

शोकेन महता तत्र रुदन्ती चापतद् भुवि । दृष्ट्वा तथाविधां नावं कन्यां च बहुदुःखिताम् ॥ २७॥

भीतेन मनसा साधुः किमाश्चर्यमिदं भवेत् । चिन्त्यमानाश्च ते सर्वे बभूवुस्तरिवाहकाः ॥ २८॥

हिन्दी अर्थ: अपने नगर के निकट पहुँचकर साधु ने दामाद से कहा—"देखो, हमारी रत्नपुरी दिखाई दे रही है।" उसने अपने घर समाचार देने के लिए एक दूत भेजा। दूत ने साधु के घर जाकर हाथ जोड़कर लीलावती से कहा—"आपके पति अपने दामाद और प्रचुर धन-संपत्ति के साथ नगर के समीप पहुँच गए हैं।" यह सुनकर लीलावती अत्यंत हर्षित हुई। उसने शीघ्रता से सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और अपनी पुत्री कलावती से कहा—"मैं अपने पति के दर्शन के लिए जा रही हूँ, तुम भी पूजन समाप्त कर शीघ्र आओ।" माता के वचन सुनकर कलावती ने व्रत तो पूर्ण किया, किंतु पति-दर्शन की अत्यधिक उत्सुकता में भगवान के प्रसाद की उपेक्षा कर उसे बिना ग्रहण किए ही तट की ओर दौड़ पड़ी। प्रसाद की अवहेलना से भगवान सत्यदेव रुष्ट हो गए और उन्होंने दामाद तथा उसकी धन से भरी नौका को जल में डुबो दिया। तट पर पहुँचकर कलावती ने जब अपने पति को नहीं देखा, तो वह महान शोक से रोती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। नौका को डूबा हुआ और कन्या को विलाप करते देख साधु अत्यंत भयभीत हुआ और नाविक भी विस्मय में पड़ गए।

ततो लीलावती कन्यां दृष्ट्वा सा विह्वलाऽभवत् । विललापातिदुःखेन भर्तारं चेदमब्रवीत् ॥ २९॥

इदानीं नौकया सार्धं कथं सोऽभूदलक्षितः । न जाने कस्य देवस्य हेलया चैव सा हृता ॥ ३०॥

सत्यदेवस्य माहात्म्यं ज्ञातुं वा केन शक्यते । इत्युक्त्वा विललापैव ततश्च स्वजनैः सह ॥ ३१॥

ततो लीलावती कन्यां क्रोडे कृत्वा रुरोद ह । ततः कलावती कन्या नष्टे स्वामिनि दुःखिता ॥ ३२॥

गृहीत्वा पादुके तस्यानुगन्तुं च मनो दधे । कन्यायाश्चरितं दृष्ट्वा सभार्यः सज्जनो वणिक् ॥ ३३॥

अतिशोकेन सन्तप्तश्चिन्तयामास धर्मवित् । हृतं वा सत्यदेवेन भ्रान्तोऽहं सत्यमायया ॥ ३४॥

सत्यपूजां करिष्यामि यथाविभवविस्तरैः । इति सर्वान् समाहूय कथयित्वा मनोरथम् ॥ ३५॥

नत्वा च दण्डवद् भूमौ सत्यदेवं पुनः पुनः । ततस्तुष्टः सत्यदेवो दीनानां परिपालकः ॥ ३६॥

जगाद वचनं चैनं कृपया भक्तवत्सलः । त्यक्त्वा प्रसादं ते कन्या पतिं द्रष्टुं समागता ॥ ३७॥

अतोऽदृष्टोऽभवत्तस्याः कन्यकायाः पतिर्ध्रुवम् । गृहं गत्वा प्रसादं च भुक्त्वा साऽऽयाति चेत्पुनः ॥ ३८॥

लब्धभर्त्री सुता साधो भविष्यति न संशयः । कन्यका तादृशं वाक्यं श्रुत्वा गगनमण्डलात् ॥ ३९॥

क्षिप्रं तदा गृहं गत्वा प्रसादं च बुभोज सा । पश्चात् सा पुनरागत्य ददर्श स्वजनं पतिम् ॥ ४०॥

हिन्दी अर्थ: लीलावती अपनी पुत्री को इस दशा में देखकर विह्वल होकर रोने लगी और अपने पति से बोली—"अभी तो सब कुछ ठीक था, अचानक नौका सहित दामाद कैसे अदृश्य हो गए? न जाने किस देवता के कोप से ऐसा हुआ!" पति के वियोग में शोकमग्न कलावती अपने पति की पादुकाएँ लेकर उनके साथ सती होने का निश्चय करने लगी। कन्या का ऐसा विलाप देखकर साधु वैश्य पत्नी सहित अत्यंत शोकाकुल हो गया। उसने विचार किया कि "यह अवश्य ही भगवान सत्यनारायण की लीला है।" उसने सबको एकत्र कर संकल्प किया—"मैं अपने सामर्थ्य के अनुसार पुनः भगवान सत्यनारायण का पूजन करूँगा।" ऐसा कहकर उसने भूमि पर दंडवत प्रणाम किया। तब दीनों के रक्षक भक्तवत्सल भगवान सत्यदेव ने आकाशवाणी के माध्यम से कहा—"हे साधु! तुम्हारी कन्या मेरा प्रसाद छोड़कर अपने पति को देखने चली आई, इसी कारण उसका पति अदृश्य हुआ है। यदि वह घर जाकर मेरा प्रसाद श्रद्धापूर्वक खाकर पुनः लौटे, तो उसे उसका पति अवश्य प्राप्त होगा।" आकाशवाणी सुनकर कलावती ने तुरंत घर जाकर प्रसाद ग्रहण किया और लौटकर देखा तो उसका पति और नौका सकुशल उपस्थित थे।

ततः कलावती कन्या जगाद पितरं प्रति । इदानीं च गृहं याहि विलम्बं कुरुषे कथम् ॥ ४१॥

तच्छ्रुत्वा कन्यकावाक्यं सन्तुष्टोऽभूद्वणिक्सुतः । पूजनं सत्यदेवस्य कृत्वा विधिविधानतः ॥ ४२॥

धनैर्बन्धुगणैः सार्धं जगाम निजमन्दिरम् । पौर्णमास्यां च सङ्क्रान्तौ कृतवान् सत्यस्य पूजनम् ॥ ४३॥

इहलोके सुखं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं ययौ ॥ ४४॥

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे श्रीसत्यनारायण व्रतकथायां चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥

हिन्दी अर्थ: कलावती ने अपने पिता से कहा—"अब आप विलंब क्यों कर रहे हैं? सानंद घर चलिए।" कन्या के ऐसे वचन सुनकर साधु वैश्य अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने तट पर ही विधि-विधान से सत्यनारायण भगवान का पुनः पूजन किया और दामाद, परिजनों तथा प्रचुर धन के साथ अपने गृह में प्रवेश किया। इसके पश्चात वह साधु प्रत्येक पूर्णिमा और संक्रांति को नियमपूर्वक भगवान सत्यनारायण का व्रत-पूजन करने लगा। वह इस लोक में समस्त सुखों का उपभोग कर अंत में सत्यलोक को प्राप्त हुआ।

अथ पञ्चमोऽध्यायः (पाँचवाँ अध्याय)

सूत उवाच । अथान्यच्च प्रवक्ष्यामि श‍ृणुध्वं मुनिसत्तमाः । आसीत् तुङ्गध्वजो राजा प्रजापालनतत्परः ॥ १॥

प्रसादं सत्यदेवस्य त्यक्त्वा दुःखमवाप सः । एकदा स वनं गत्वा हत्वा बहुविधान् पशून् ॥ २॥

आगत्य वटमूलं च दृष्ट्वा सत्यस्य पूजनम् । गोपाः कुर्वन्ति सन्तुष्टा भक्तियुक्ताः सबान्धवाः ॥ ३॥

राजा दृष्ट्वा तु दर्पेण न गतो न ननाम सः । ततो गोपगणाः सर्वे प्रसादं नृपसन्निधौ ॥ ४॥

संस्थाप्य पुनरागत्य भुक्तवन्तः सर्वे यथेप्सितम् । ततः प्रसादं सन्त्यज्य राजा दुःखमवाप सः ॥ ५॥

तस्य पुत्रशतं नष्टं धनधान्यादिकं च यत् । सत्यदेवेन तत्सर्वं नाशितं मम निश्चितम् ॥ ६॥

हिन्दी अर्थ: सूत जी बोले—हे मुनिश्रेष्ठों! अब एक अन्य कथा कहता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनें। प्राचीन काल में प्रजा का पालन करने वाला 'तुंगध्वज' नाम का एक राजा हुआ। उसने भगवान सत्यदेव के प्रसाद का अनादर करके भारी दुःख उठाया। एक बार वह राजा वन में शिकार खेलने गया और अनेक पशुओं का वध किया। वन में उसने एक विशाल वट वृक्ष के नीचे देखा कि ग्वाले अपने बंधु-बांधवों सहित अत्यंत भक्तिभाव से भगवान सत्यनारायण का पूजन कर रहे हैं। राजा ने यह सब देखा, किंतु राजमद और अहंकार के कारण वह न तो वहाँ गया और न ही उसने भगवान को प्रणाम किया। ग्वालों ने भक्तिपूर्वक राजा के समीप जाकर आदर से प्रसाद रख दिया और स्वयं वापस आकर संतुष्ट होकर प्रसाद पाया। किंतु राजा ने अहंकारवश उस प्रसाद को वहीं छोड़ दिया और ग्रहण नहीं किया। इस अपराध के कारण राजा पर घोर विपत्ति टूट पड़ी। उसके सौ पुत्र मृत्यु को प्राप्त हो गए और उसका संपूर्ण धन-धान्य नष्ट हो गया। तब राजा को चेत हुआ कि "निश्चित ही भगवान सत्यनारायण के प्रसाद का त्याग करने के कारण ही मेरा सर्वनाश हुआ है।"

अतस्तत्रैव गच्छामि यत्र देवस्य पूजनम् । मनसा तु विनिश्चित्य ययौ गोपालसन्निधौ ॥ ७॥

ततोऽसौ सत्यदेवस्य पूजां गोपगणैः सह । भक्तिश्रद्धान्वितो भूत्वा चकार विधिना नृपः ॥ ८॥

सत्यदेवप्रसादेन धनपुत्रान्वितोऽभवत् । इहलोके सुखं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं ययौ ॥ ९॥

हिन्दी अर्थ: राजा ने मन में निश्चय किया—"मुझे उसी स्थान पर जाना चाहिए जहाँ सत्यदेव का पूजन हुआ था।" ऐसा विचार कर वह तुरंत ग्वालों के पास पहुँचा। वहाँ जाकर राजा ने अत्यंत श्रद्धा और विनय से युक्त होकर उन गोप-बालकों के साथ भगवान सत्यनारायण की विधिपूर्वक पूजा की। भगवान सत्यदेव की कृपा से राजा के सभी मृत पुत्र पुनः जीवित हो गए और उसका नष्ट हुआ राज्य व धन-वैभव पुनः प्राप्त हो गया। राजा इस लोक में दीर्घकाल तक सुख भोगकर अंत में वैकुण्ठ धाम को गया।

य इदं कुरुते सत्यव्रतं परमदुर्लभम् । श‍ृणोति च कथां पुण्यां भक्तियुक्तः फलप्रदाम् ॥ १०॥

धनधान्यादिकं तस्य भवेत् सत्यप्रसादतः । दरिद्रो लभते वित्तं बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ ११॥

भीतो भयात् प्रमुच्येत सत्यमेव न संशयः । ईप्सितं च फलं भुक्त्वा चान्ते सत्यपुरं व्रजेत् ॥ १२॥

इति वः कथितं विप्राः सत्यनारायणव्रतम् । यत् कृत्वा सर्वदुःखेभ्यो मुक्तो भवति मानवः ॥ १३॥

विशेषतः कलियुगे सत्यपूजा फलप्रदा । केचित् कालं वदिष्यन्ति सत्यमीशं तमेव च ॥ १४॥

सत्यनारायणं केचित् सत्यदेवं तथापरे । नानारूपधरो भूत्वा सर्वेषामीप्सितप्रदम् ॥ १५॥

भविष्यति कलौ सत्यव्रतरूपी सनातनः । श्रीविष्णुना धृतं रूपं सर्वेषामीप्सितप्रदम् ॥ १६॥

य इदं पठते नित्यं श‍ृणोति मुनिसत्तमाः । तस्य नश्यन्ति पापानि सत्यदेवप्रसादतः ॥ १७॥

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य इस परम दुर्लभ श्रीसत्यनारायण व्रत का पालन करता है अथवा इस पुण्यदायिनी कथा को भक्तिभाव से श्रवण करता है, भगवान सत्यनारायण की कृपा से उसके घर में धन-धान्य की कभी कमी नहीं होती। दरिद्र व्यक्ति धनवान हो जाता है, बंदी बंधनों से मुक्त हो जाता है, भयभीत व्यक्ति निर्भय हो जाता है—यह पूर्णतः सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं। वह अपनी समस्त मनोकामनाओं का उपभोग कर अंत में सत्यलोक जाता है। हे विप्रगण! इस प्रकार मैंने आपको यह व्रत बतलाया, जिसे करने से मनुष्य सभी दुःखों से छूट जाता है। विशेष रूप से कलियुग में यह पूजा त्वरित फल देने वाली है। संसार में कोई उन्हें 'काल', कोई 'सत्य', कोई 'ईश्वर', कोई 'सत्यनारायण' और कोई 'सत्यदेव' कहते हैं। भगवान श्रीविष्णु ही अनेक रूप धारण कर कलियुग में सत्यव्रतरूप से भक्तों को मनोवांछित फल देने वाले हैं। जो मनुष्य इस कथा का नित्य पाठ या श्रवण करता है, उसके समस्त पाप भगवान सत्यदेव की कृपा से भस्म हो जाते हैं।

व्रतं यैस्तु कृतं पूर्वं सत्यनारायणस्य च । तेषां त्वपरजन्मानि कथयामि मुनीश्वराः ॥ १८॥

शतानन्दो महाप्राज्ञः सुदामा ब्राह्मणो ह्यभूत् । तस्मिञ्जन्मनि श्रीकृष्णं ध्यात्वा मोक्षमवाप ह ॥ १९॥

काष्ठभारवहो भिल्लो गुहराजो बभूव ह । तस्मिञ्जन्मनि श्रीरामं सेव्य मोक्षं जगाम वै ॥ २०॥

उल्कामुखो महाराजो नृपो दशरथोऽभवत् । श्रीरङ्गनाथं सम्पूज्य श्रीवैकुण्ठं तदाऽगमत् ॥ २१॥

धार्मिकः सत्यसन्धश्च साधुर्मोरध्वजोऽभवत् । देहार्धं क्रकचैश्छित्त्वा दत्त्वा मोक्षमवाप ह ॥ २२॥

तुङ्गध्वजो महाराजः स्वायम्भुवोऽभवत् किल । सर्वान् भागवतान् कृत्वा श्रीवैकुण्ठं तदाऽगमत् ॥ २३॥

भूत्वा गोपाश्च ते सर्वे व्रजमण्डलवासिनः । निहत्य राक्षसान् सर्वान् गोलोकं तु तदा ययुः ॥ २४॥

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे श्रीसत्यनारायण व्रतकथायां पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५॥

हिन्दी अर्थ: हे मुनीश्वरों! पूर्वकाल में जिन-जिन महानुभावों ने भगवान सत्यनारायण का यह व्रत किया था, उनके अगले जन्मों की कथा भी सुनिए—

  • जो ज्ञानी शतानन्द नामक दरिद्र ब्राह्मण थे, वे द्वापर युग में सुदामा ब्राह्मण बने और भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति कर मोक्ष को प्राप्त हुए।
  • वह निर्धन काष्ठ-विक्रेता (लकड़हारा) त्रेतायुग में निषादराज गुह हुए और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की सेवा करके परम गति को प्राप्त हुए।
  • महाराज उल्कामुख त्रेता में राजा दशरथ हुए, जिन्होंने भगवान श्रीरंगनाथ (विष्णु) की पूजा की और श्रीराम के पिता बनकर वैकुण्ठ को प्राप्त हुए।
  • वह प्रतिज्ञा-भ्रष्ट साधु वैश्य अगले जन्म में परम धर्मात्मा राजा मयूरध्वज (मोरध्वज) हुए, जिन्होंने भगवान के लिए आरे से अपना आधा शरीर काटकर दान दे दिया और मोक्ष प्राप्त किया।
  • महाराज तुंगध्वज अगले जन्म में स्वायम्भुव मनु हुए और संपूर्ण प्रजा को भगवद्-भक्ति में लगाकर वैकुण्ठ सिधारे।
  • तथा वे समस्त वनवासी गोप-बालक द्वापर में गोकुल के ग्वाल-बाल बने और भगवान श्रीकृष्ण के साथ रहकर असुरों का संहार देखते हुए अंत में नित्य गोलोक धाम को प्राप्त हुए।

॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे श्रीसत्यनारायण व्रतकथा सम्पूर्णा ॥ ॥ श्रीसत्यनारायण भगवान की जय ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

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