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🪷 श्रीमद्भगवद्गीता

मूल श्लोक, अन्वय, सरल हिन्दी अनुवाद एवं विस्तृत भावार्थ सहित

अध्याय १४ — गुणत्रयविभागयोग

२७ श्लोक · प्रत्येक पर अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ

📌 सत्त्व, रज और तम — तीन गुणों का स्वरूप, बन्धन और फल; गुणातीत के लक्षण।
१४.१ श्रीभगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्। यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ १ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — ज्ञानानाम् उत्तमं परं ज्ञानं भूयः प्रवक्ष्यामि, यत् ज्ञात्वा सर्वे मुनयः इतः परां सिद्धिं गताः।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — ज्ञानों में भी अतिउत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं।
भावार्थ
चौदहवाँ अध्याय 'गुणत्रयविभागयोग' कहलाता है, जिसमें प्रकृति के तीन गुणों — सत्त्व, रज और तम — का विस्तृत विवेचन है। भगवान् इसे 'ज्ञानानामुत्तमम्' — सब ज्ञानों में श्रेष्ठ — कहते हैं। इसे जानकर अनेक मुनियों ने परम सिद्धि पाई। तीन गुणों का ज्ञान इतना महत्वपूर्ण इसलिये है कि ये ही हमारे स्वभाव, व्यवहार, भोजन, विचार और बन्धन के मूल कारण हैं। इन्हें समझकर ही इनसे ऊपर उठा जा सकता है।
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः। सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥
अन्वय
इदं ज्ञानम् उपाश्रित्य मम साधर्म्यम् आगताः (जनाः) सर्गे अपि न उपजायन्ते, प्रलये च न व्यथन्ति।
हिन्दी अनुवाद
इस ज्ञान को आश्रय करके अर्थात् धारण करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलय काल में भी व्याकुल नहीं होते।
भावार्थ
इस ज्ञान का फल — 'मम साधर्म्यम्' — भगवान् के समान स्वभाव, उनके समान धर्म — को प्राप्त होना। ऐसे लोग न सृष्टि के समय जन्म लेते हैं, न प्रलय के समय व्यथित होते हैं। अर्थात् वे जन्म-मृत्यु के चक्र से और ब्रह्माण्ड के सृष्टि-प्रलय चक्र से भी मुक्त हो जाते हैं। यह परम मुक्ति की अवस्था है।
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्। संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३ ॥
अन्वय
(हे) भारत! महत् ब्रह्म मम योनिः, तस्मिन् अहं गर्भं दधामि; ततः सर्वभूतानां सम्भवः भवति।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! मेरी महत्-ब्रह्म रूप मूल प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात् गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन समुदाय रूप गर्भ को स्थापन करता हूँ; उस जड़-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति होती है।
भावार्थ
भगवान् सृष्टि का रहस्य एक गहरी उपमा से बताते हैं — 'महद्ब्रह्म' (मूल प्रकृति) उनकी 'योनि' (गर्भ) है, और वे उसमें 'गर्भ' (चेतना का बीज) स्थापित करते हैं। इसी से सब प्राणी उत्पन्न होते हैं। यह माता-पिता की उपमा है — प्रकृति माता है, भगवान् पिता। सृष्टि भगवान् और उनकी प्रकृति का दिव्य संयोग है। हर जीव में दोनों का अंश है — शरीर प्रकृति से, चेतना भगवान् से।
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! सर्वयोनिषु याः मूर्तयः सम्भवन्ति, तासां महत् ब्रह्म योनिः, अहं बीजप्रदः पिता।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात् शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, प्रकृति तो उन सबकी गर्भधारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ।
भावार्थ
यह श्लोक विश्व-बन्धुत्व का आधार है। चौरासी लाख योनियों में जितने भी प्राणी हैं — मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, वनस्पति — सबकी माता एक ही प्रकृति है और पिता एक ही भगवान्। 'अहं बीजप्रदः पिता' — मैं बीज देने वाला पिता हूँ। इसका अर्थ है कि सब प्राणी एक ही परिवार के सदस्य हैं — भाई-बहन। इस दृष्टि से किसी प्राणी से घृणा या उसकी हिंसा अपने ही परिवार के सदस्य के प्रति अन्याय है।
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥
अन्वय
(हे) महाबाहो! सत्त्वं रजः तमः इति प्रकृतिसम्भवाः गुणाः देहे अव्ययं देहिनं निबध्नन्ति।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण — ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं।
भावार्थ
अब मुख्य विषय — तीन गुण: 'सत्त्व' (शुद्धता, प्रकाश, ज्ञान), 'रज' (क्रियाशीलता, इच्छा, गति) और 'तम' (जड़ता, अन्धकार, आलस्य)। ये तीनों प्रकृति से उत्पन्न हैं और 'अव्यय' — अविनाशी — आत्मा को शरीर में बाँधते हैं। ध्यान दें — सत्त्व भी बाँधता है! आत्मा स्वभाव से मुक्त है, पर गुणों के प्रभाव में आकर वह स्वयं को शरीर समझ लेती है। ये गुण जैसे तीन रस्सियाँ हैं, जिनसे जीव बँधा है।
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्। सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ ६ ॥
अन्वय
(हे) अनघ! तत्र निर्मलत्वात् प्रकाशकम् अनामयं सत्त्वं सुखसङ्गेन ज्ञानसङ्गेन च बध्नाति।
हिन्दी अनुवाद
हे निष्पाप! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकाररहित है; वह सुख के सम्बन्ध से और ज्ञान के सम्बन्ध से अर्थात् उसके अभिमान से बाँधता है।
भावार्थ
सत्त्वगुण का स्वरूप — 'निर्मल' (शुद्ध), 'प्रकाशक' (ज्ञान का प्रकाश देने वाला) और 'अनामय' (विकार और रोग से रहित)। यह सबसे श्रेष्ठ गुण है। फिर भी यह बाँधता है — 'सुखसंग' (सुख की आसक्ति) और 'ज्ञानसंग' (ज्ञान के अभिमान) से। सात्त्विक व्यक्ति को शान्ति और ज्ञान का सुख मिलता है, पर वह उस सुख से चिपक जाता है, या 'मैं ज्ञानी हूँ' का अहंकार आ जाता है। सत्त्व सोने की ज़ंजीर है — सुन्दर, पर फिर भी ज़ंजीर।
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्। तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥ ७ ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! रजः रागात्मकं तृष्णासङ्गसमुद्भवं विद्धि; तत् देहिनं कर्मसङ्गेन निबध्नाति।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! रागरूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जान; वह इस जीवात्मा को कर्मों और उनके फल के सम्बन्ध से बाँधता है।
भावार्थ
रजोगुण का स्वरूप — 'रागात्मक' (राग, आकर्षण, लालसा का स्वरूप) और 'तृष्णासंगसमुद्भव' (तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न)। यह 'कर्मसंग' — कर्म की आसक्ति — से बाँधता है। राजसी व्यक्ति निरन्तर कुछ करते रहना चाहता है — अधिक धन, अधिक पद, अधिक भोग। वह कभी सन्तुष्ट नहीं होता, और इसी दौड़ में बँधा रहता है। आधुनिक समाज की बेचैनी, प्रतिस्पर्धा और तनाव रजोगुण के प्रभाव हैं।
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्। प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८ ॥
अन्वय
(हे) भारत! तु तमः अज्ञानजं सर्वदेहिनां मोहनं विद्धि; तत् प्रमादालस्यनिद्राभिः निबध्नाति।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान; वह इस जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा बाँधता है।
भावार्थ
तमोगुण का स्वरूप — 'अज्ञानज' (अज्ञान से उत्पन्न) और 'मोहन' (सबको मोहित करने वाला)। यह तीन तरह से बाँधता है — 'प्रमाद' (असावधानी, कर्तव्य की उपेक्षा, व्यर्थ के कार्य), 'आलस्य' (कर्म न करने की प्रवृत्ति) और 'निद्रा' (अधिक सोना, मानसिक जड़ता)। तामसी व्यक्ति न सही सोचता है, न सही करता है। यह सबसे निम्न गुण है। नशा, अत्यधिक मनोरंजन, टालमटोल — ये सब तमोगुण के लक्षण हैं।
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत। ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥ ९ ॥
अन्वय
(हे) भारत! सत्त्वं सुखे सञ्जयति, रजः कर्मणि (सञ्जयति), तमः तु ज्ञानम् आवृत्य प्रमादे सञ्जयति उत।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढककर प्रमाद में भी लगाता है।
भावार्थ
तीनों गुणों का सारांश — सत्त्व 'सुख' में लगाता है, रज 'कर्म' में, और तम 'ज्ञान को ढककर प्रमाद' में। यह एक सरल कसौटी है अपने भीतर के प्रधान गुण को पहचानने की। जब मन शान्त और प्रसन्न हो — सत्त्व; जब बेचैन होकर कुछ करने को उत्सुक हो — रज; जब सुस्त, भ्रमित और कुछ न करने को इच्छुक हो — तम। हर व्यक्ति में तीनों होते हैं, पर अनुपात अलग-अलग।
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत। रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १० ॥
अन्वय
(हे) भारत! रजः तमः च अभिभूय सत्त्वं भवति; सत्त्वं तमः च एव (अभिभूय) रजः (भवति); तथा सत्त्वं रजः (च अभिभूय) तमः (भवति)।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण होता है, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण होता है, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण होता है अर्थात् बढ़ता है।
भावार्थ
तीनों गुण निरन्तर एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते रहते हैं। कभी सत्त्व बाकी दोनों को दबाकर प्रबल होता है, कभी रज, कभी तम। यह दिन भर में भी बदलता रहता है — सुबह सत्त्व अधिक, दोपहर रज, रात तम। हमारा भोजन, संगति, वातावरण और विचार इन गुणों के संतुलन को प्रभावित करते हैं। साधक का प्रयास होता है कि सत्त्व को बढ़ाये, जिससे रज और तम दबें। यह समझ आत्म-निरीक्षण का शक्तिशाली साधन है।
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते। ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥
अन्वय
यदा अस्मिन् देहे सर्वद्वारेषु प्रकाशः ज्ञानम् उपजायते, तदा सत्त्वं विवृद्धम् इति उत विद्यात्।
हिन्दी अनुवाद
जिस समय इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेकशक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा है।
भावार्थ
सत्त्वगुण के बढ़ने की पहचान — शरीर के 'सब द्वारों' (इन्द्रियों) में 'प्रकाश' और 'ज्ञान' उत्पन्न होना। आँखें स्पष्ट देखती हैं, कान ध्यान से सुनते हैं, मन स्पष्ट सोचता है, बुद्धि सही निर्णय लेती है। एक ताज़गी, हल्कापन और स्पष्टता का अनुभव होता है। जब ऐसा अनुभव हो, तो समझना चाहिये कि सत्त्व प्रबल है — यह ध्यान, अध्ययन और शुभ कार्यों के लिये उत्तम समय है।
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥
अन्वय
(हे) भरतर्षभ! रजसि विवृद्धे (सति) लोभः, प्रवृत्तिः, कर्मणाम् आरम्भः, अशमः, स्पृहा — एतानि जायन्ते।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, स्वार्थबुद्धि से कर्मों का सकाम भाव से आरम्भ, अशान्ति और विषय-भोगों की लालसा — ये सब उत्पन्न होते हैं।
भावार्थ
रजोगुण के बढ़ने के लक्षण — 'लोभ' (अधिक पाने की इच्छा), 'प्रवृत्ति' (निरन्तर गतिविधि), 'कर्मों का आरम्भ' (नये-नये उद्यम शुरू करना), 'अशम' (मन की अशान्ति, बेचैनी) और 'स्पृहा' (लालसा)। राजसी अवस्था में व्यक्ति चैन से बैठ नहीं सकता; उसे लगता है कि कुछ और करना, कुछ और पाना है। यह ऊर्जा उपयोगी भी हो सकती है, यदि उसे सही दिशा में लगाया जाये।
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥
अन्वय
(हे) कुरुनन्दन! तमसि विवृद्धे (सति) अप्रकाशः, अप्रवृत्तिः च, प्रमादः, मोहः एव च — एतानि जायन्ते।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इन्द्रियों में अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मों में अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात् व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि अन्तःकरण की मोहिनी वृत्तियाँ — ये सब ही उत्पन्न होते हैं।
भावार्थ
तमोगुण के बढ़ने के लक्षण — 'अप्रकाश' (अन्धकार, मन में धुँधलापन), 'अप्रवृत्ति' (कुछ करने की इच्छा न होना), 'प्रमाद' (लापरवाही, व्यर्थ के कार्य) और 'मोह' (भ्रम, गलत समझ)। ये रजोगुण के लगभग विपरीत हैं — जहाँ रज में अति-सक्रियता है, वहाँ तम में निष्क्रियता। जब ऐसी अवस्था हो, तो उससे निकलने के लिये कुछ सक्रिय करना चाहिये — व्यायाम, सेवा, सत्संग।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्। तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥
अन्वय
यदा तु देहभृत् सत्त्वे प्रवृद्धे (सति) प्रलयं याति, तदा (सः) उत्तमविदाम् अमलान् लोकान् प्रतिपद्यते।
हिन्दी अनुवाद
जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है।
भावार्थ
मृत्यु के समय जो गुण प्रबल होता है, वही अगली गति निर्धारित करता है। जो सत्त्वगुण की प्रबलता में मरता है, वह 'उत्तमविदां अमलान् लोकान्' — उत्तम ज्ञानियों के निर्मल लोकों — को प्राप्त होता है। यह आठवें अध्याय के 'अन्तकाल स्मरण' सिद्धान्त से जुड़ा है। मृत्यु के समय की मनःस्थिति जीवन भर के अभ्यास का परिणाम होती है; इसलिये जीवन भर सत्त्व बढ़ाने का प्रयास करना चाहिये।
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते। तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥
अन्वय
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते; तथा तमसि प्रलीनः मूढयोनिषु जायते।
हिन्दी अनुवाद
रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है; तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़ योनियों में उत्पन्न होता है।
भावार्थ
रजोगुण की प्रबलता में मरने वाला 'कर्मसंगी' — कर्मों में आसक्त — मनुष्यों में जन्म लेता है, अर्थात् फिर से मनुष्य बनता है, पर कर्म और भोग की दौड़ में। और तमोगुण की प्रबलता में मरने वाला 'मूढ़योनि' — पशु, कीट आदि — में जन्म लेता है। यह कर्म-सिद्धान्त का कठोर पक्ष है। मनुष्य जन्म अमूल्य है; इसे तमोगुण में नष्ट नहीं करना चाहिये।
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्। रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥
अन्वय
सुकृतस्य कर्मणः फलं सात्त्विकं निर्मलम् आहुः; रजसः तु फलं दुःखं, तमसः फलम् अज्ञानम् (आहुः)।
हिन्दी अनुवाद
श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है; राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है।
भावार्थ
तीनों गुणों के कर्मों के फल — सात्त्विक (शुभ) कर्म का फल 'निर्मल' — शुद्ध सुख, ज्ञान और शान्ति; राजस कर्म का फल 'दुःख' — क्योंकि उसमें लोभ और आसक्ति है, जो अन्ततः निराशा देती है; तामस कर्म का फल 'अज्ञान' — और अधिक भ्रम और अन्धकार। ध्यान दें कि राजस कर्म का फल दुःख है, भले ही आरम्भ में वह सुख जैसा लगे। जैसे अधिक धन कमाने की दौड़ अन्ततः तनाव और रोग देती है।
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥
अन्वय
सत्त्वात् ज्ञानं सञ्जायते, रजसः लोभः एव च, तमसः प्रमादमोहौ भवतः, अज्ञानम् एव च।
हिन्दी अनुवाद
सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से निःसन्देह लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं और अज्ञान भी होता है।
भावार्थ
तीनों गुणों से क्या उत्पन्न होता है — सत्त्व से 'ज्ञान', रज से 'लोभ', और तम से 'प्रमाद', 'मोह' और 'अज्ञान'। यह एक कारण-कार्य सम्बन्ध है। यदि हम ज्ञान चाहते हैं, तो सत्त्व बढ़ायें; यदि हममें लोभ है, तो समझें कि रज प्रबल है; यदि भ्रम और आलस्य है, तो तम। यह आत्म-निदान का सरल साधन है — लक्षण देखकर कारण पहचानो और उपचार करो।
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥
अन्वय
सत्त्वस्थाः ऊर्ध्वं गच्छन्ति, राजसाः मध्ये तिष्ठन्ति, जघन्यगुणवृत्तिस्थाः तामसाः अधः गच्छन्ति।
हिन्दी अनुवाद
सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं, रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात् मनुष्य लोक में ही रहते हैं और तमोगुण के कार्य रूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात् कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
तीनों गुणों की दिशाएँ — सात्त्विक 'ऊर्ध्व' (ऊपर — उच्च लोकों की ओर), राजस 'मध्य' (बीच में — मनुष्य लोक में) और तामस 'अधः' (नीचे — निम्न योनियों की ओर) जाते हैं। यह केवल मृत्यु के बाद की बात नहीं; इसी जीवन में भी सात्त्विक व्यक्ति आध्यात्मिक और नैतिक रूप से ऊपर उठता है, राजसी वहीं घूमता रहता है, और तामसी नीचे गिरता है। हमारे गुण ही हमारी दिशा तय करते हैं।
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥
अन्वय
यदा द्रष्टा गुणेभ्यः अन्यं कर्तारं न अनुपश्यति, गुणेभ्यः च परं वेत्ति, सः मद्भावम् अधिगच्छति।
हिन्दी अनुवाद
जिस समय द्रष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यन्त परे सच्चिदानन्दघन स्वरूप मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस समय वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
भावार्थ
गुणों से मुक्ति का उपाय — जब 'द्रष्टा' (साक्षी आत्मा) यह देखता है कि सब कर्म गुणों के द्वारा ही हो रहे हैं, गुणों के अतिरिक्त कोई कर्ता नहीं; और साथ ही अपने को गुणों से 'पर' — परे — जानता है, तब वह 'मद्भाव' — भगवान् के स्वरूप — को प्राप्त होता है। यह साक्षी-भाव की पराकाष्ठा है। गुण अपना कार्य करते हैं, आत्मा केवल देखती है। जब यह बोध दृढ़ हो जाता है, तो गुण बाँधना बन्द कर देते हैं।
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्। जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥
अन्वय
देही देहसमुद्भवान् एतान् त्रीन् गुणान् अतीत्य जन्ममृत्युजरादुःखैः विमुक्तः (सन्) अमृतम् अश्नुते।
हिन्दी अनुवाद
यह पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारण रूप इन तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है।
भावार्थ
तीनों गुणों को 'अतीत्य' — पार करके — देही (आत्मा) जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुःखों से मुक्त होकर 'अमृत' — अमरत्व — प्राप्त करता है। गुण 'देहसमुद्भव' — शरीर के कारण — हैं; अर्थात् शरीर इन्हीं गुणों से बना है। जब कोई गुणों से ऊपर उठ जाता है, तो वह शरीर से भी ऊपर उठ जाता है, और शरीर के दुःख उसे नहीं छूते। यह 'गुणातीत' अवस्था है, जिसके लक्षण आगे बताये जायेंगे।
१४.२१ अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो। किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — (हे) प्रभो! एतान् त्रीन् गुणान् अतीतः (पुरुषः) कैः लिङ्गैः (युक्तः) भवति? किमाचारः (भवति)? च एतान् त्रीन् गुणान् कथम् अतिवर्तते?
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन-किन लक्षणों से युक्त होता है और किस प्रकार के आचरणों वाला होता है; तथा हे प्रभो! मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है?
भावार्थ
अर्जुन तीन व्यावहारिक प्रश्न पूछते हैं — गुणातीत व्यक्ति के 'लक्षण' क्या हैं (उसे कैसे पहचानें)? उसका 'आचरण' कैसा होता है (वह कैसे जीता है)? और गुणों को 'पार करने का उपाय' क्या है? यह दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञ के बारे में पूछे गये प्रश्न जैसा ही है। अर्जुन सिद्धान्त से आगे बढ़कर व्यावहारिक जीवन में उसका रूप देखना चाहते हैं।
१४.२२ श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव। न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — (हे) पाण्डव! (यः) प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहम् एव च सम्प्रवृत्तानि न द्वेष्टि, निवृत्तानि (च) न काङ्क्षति —
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — हे अर्जुन! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्य रूप प्रकाश को और रजोगुण के कार्य रूप प्रवृत्ति को तथा तमोगुण के कार्य रूप मोह को भी न तो प्रवृत्त होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है —
भावार्थ
गुणातीत का पहला लक्षण — वह तीनों गुणों के कार्यों — 'प्रकाश' (सत्त्व), 'प्रवृत्ति' (रज) और 'मोह' (तम) — के आने पर उनसे 'द्वेष' नहीं करता, और जाने पर उनकी 'आकांक्षा' नहीं करता। अर्थात् वह गुणों के आने-जाने को निर्लिप्त भाव से देखता है, जैसे आकाश बादलों के आने-जाने को देखता है। उसे न सत्त्व का मोह है, न तम से घृणा। यह वाक्य अगले श्लोकों में जारी है।
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते। गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३ ॥
अन्वय
यः उदासीनवत् आसीनः गुणैः न विचाल्यते, 'गुणाः वर्तन्ते' इति एव (मत्वा) यः अवतिष्ठति, न इङ्गते —
हिन्दी अनुवाद
जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और गुण ही गुणों में बरतते हैं — ऐसा समझता हुआ जो सच्चिदानन्दघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहता है एवं उस स्थिति से कभी विचलित नहीं होता —
भावार्थ
गुणातीत 'उदासीनवत्' — उदासीन (तटस्थ) की तरह — बैठा रहता है; गुण उसे 'विचलित' नहीं कर सकते। वह जानता है — 'गुणा वर्तन्ते' — गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, मेरा उनसे कोई लेना-देना नहीं। इसलिये वह अपने स्वरूप में 'अवतिष्ठति' — स्थिर रहता है और 'न इङ्गते' — डगमगाता नहीं। जैसे सिनेमा का पर्दा फ़िल्म के दृश्यों से प्रभावित नहीं होता — चाहे आग दिखे या बाढ़।
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः। तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४ ॥
अन्वय
(यः) समदुःखसुखः, स्वस्थः, समलोष्टाश्मकाञ्चनः, तुल्यप्रियाप्रियः, धीरः, तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः —
हिन्दी अनुवाद
जो निरन्तर आत्मभाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निन्दा-स्तुति में भी समान भाव वाला है —
भावार्थ
गुणातीत के और लक्षण — 'समदुःखसुख' (सुख-दुःख में सम), 'स्वस्थ' (अपने स्वरूप में स्थित — 'स्व' में 'स्थ'; यही सच्चे स्वास्थ्य का अर्थ है), 'समलोष्टाश्मकाञ्चन' (मिट्टी, पत्थर और सोने में समान), 'तुल्यप्रियाप्रिय' (प्रिय-अप्रिय में समान), 'धीर' (धैर्यवान्) और 'तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति' (अपनी निन्दा और प्रशंसा में समान)। 'स्वस्थ' शब्द का यह आध्यात्मिक अर्थ अत्यन्त सुन्दर है — सच्चा स्वस्थ वह है जो अपने आत्म-स्वरूप में स्थित है।
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः। सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५ ॥
अन्वय
(यः) मानापमानयोः तुल्यः, मित्रारिपक्षयोः तुल्यः, सर्वारम्भपरित्यागी (च), सः गुणातीतः उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है — वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है।
भावार्थ
अन्तिम लक्षण — 'मानापमान में तुल्य', 'मित्र और शत्रु के पक्ष में तुल्य' और 'सर्वारम्भपरित्यागी' (स्वार्थ से प्रेरित सब उद्यमों का त्यागी)। 'स गुणातीत उच्यते' — ऐसा व्यक्ति गुणातीत कहलाता है। ध्यान दें कि ये लक्षण बारहवें अध्याय के भक्त के लक्षणों और दूसरे अध्याय के स्थितप्रज्ञ के लक्षणों से बहुत मिलते हैं। भक्त, ज्ञानी और योगी — तीनों की चरम अवस्था एक ही है।
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥
अन्वय
यः च माम् अव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते, सः एतान् गुणान् समतीत्य ब्रह्मभूयाय कल्पते।
हिन्दी अनुवाद
और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मुझको निरन्तर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भली-भाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिये योग्य बन जाता है।
भावार्थ
अर्जुन के तीसरे प्रश्न — 'गुणों को पार करने का उपाय क्या है?' — का उत्तर: 'अव्यभिचारी भक्तियोग' — अटल, एकनिष्ठ भक्ति। जो भगवान् की ऐसी भक्ति करता है, वह तीनों गुणों को पार करके 'ब्रह्मभूय' — ब्रह्म होने — के योग्य बन जाता है। सातवें अध्याय (7.14) में भी कहा था — जो भगवान् की शरण लेते हैं, वे माया को पार कर जाते हैं। गुणों की माया को पार करने का सबसे सरल उपाय भक्ति है।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥
अन्वय
हि अहं ब्रह्मणः, अमृतस्य अव्ययस्य च, शाश्वतस्य धर्मस्य च, ऐकान्तिकस्य सुखस्य च प्रतिष्ठा (अस्मि)।
हिन्दी अनुवाद
क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय मैं हूँ।
भावार्थ
चौदहवें अध्याय का समापन — भगवान् कहते हैं कि वे 'ब्रह्म' की, 'अमृत' (अमरत्व) की, 'अव्यय' (अविनाशी) की, 'शाश्वत धर्म' की और 'ऐकान्तिक सुख' (परम, अखण्ड आनन्द) की 'प्रतिष्ठा' — आधार — हैं। अर्थात् निर्गुण ब्रह्म भी भगवान् में ही प्रतिष्ठित है। इसीलिये भगवान् की भक्ति करने वाला ब्रह्म को प्राप्त होता है — क्योंकि ब्रह्म भगवान् का ही स्वरूप है। सगुण और निर्गुण का यह समन्वय गीता की विशेषता है। यह अध्याय 'गुणत्रयविभागयोग' कहलाता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥

ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।
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