श्रीभगवान् बोले — आदिपुरुष परमेश्वर रूप मूल वाले और ब्रह्मा रूप मुख्य शाखा वाले जिस संसार रूप पीपल के वृक्ष को अविनाशी कहते हैं, तथा वेद जिसके पत्ते कहे गये हैं — उस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष मूलसहित तत्त्व से जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है।
भावार्थ
पन्द्रहवाँ अध्याय 'पुरुषोत्तमयोग' कहलाता है और इसे गीता का सार माना जाता है; कई परम्पराओं में इसे भोजन से पहले पढ़ा जाता है। भगवान् संसार को एक उल्टे पीपल के वृक्ष के रूप में वर्णित करते हैं — 'ऊर्ध्वमूल' (जड़ ऊपर — परमात्मा में) और 'अधःशाख' (शाखाएँ नीचे — संसार में फैली हुई)। यह उपमा कठोपनिषद् से ली गई है। वेद इसके 'पत्ते' हैं — जैसे पत्ते वृक्ष की रक्षा करते हैं और उसे सुन्दर बनाते हैं, वैसे ही वेद संसार को धर्म से पोषित करते हैं। 'अश्वत्थ' का अर्थ है — 'जो कल तक न रहे', अर्थात् क्षणभंगुर; फिर भी प्रवाह रूप से 'अव्यय' — सदा चलता रहने वाला।
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा
गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि
कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥
अन्वय
तस्य गुणप्रवृद्धाः विषयप्रवालाः शाखाः अधः च ऊर्ध्वं (च) प्रसृताः; मनुष्यलोके च कर्मानुबन्धीनि मूलानि अधः अनुसन्ततानि।
हिन्दी अनुवाद
उस संसार-वृक्ष की तीनों गुणों रूप जल के द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय-भोग रूप कोंपलों वाली देव, मनुष्य और तिर्यक् आदि योनि रूप शाखाएँ नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं तथा मनुष्य लोक में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली अहंता-ममता और वासना रूप जड़ें भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रही हैं।
भावार्थ
वृक्ष का विस्तृत वर्णन — इसकी शाखाएँ (विभिन्न योनियाँ — देवता, मनुष्य, पशु) ऊपर और नीचे फैली हैं; ये 'गुणप्रवृद्ध' — तीन गुणों रूपी जल से सींची और बढ़ी — हैं; और इनकी कोंपलें 'विषय' — इन्द्रियों के भोग — हैं। साथ ही, इस वृक्ष की कुछ जड़ें नीचे — मनुष्य लोक में — भी फैली हैं, जो 'कर्मानुबन्धी' — कर्मों से बाँधने वाली — हैं। ये वासनाएँ और आसक्तियाँ हैं, जो मनुष्य को बार-बार कर्म में बाँधती हैं। मनुष्य लोक को विशेष रूप से इसलिये कहा, क्योंकि यहीं नये कर्म बनते हैं।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते
नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल-
मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥ ३ ॥
अन्वय
अस्य रूपं इह तथा न उपलभ्यते, न अन्तः, न च आदिः, न च सम्प्रतिष्ठा; एनं सुविरूढमूलम् अश्वत्थं दृढेन असङ्गशस्त्रेण छित्त्वा —
हिन्दी अनुवाद
इस संसार-वृक्ष का स्वरूप जैसा कहा है, वैसा यहाँ विचारकाल में नहीं पाया जाता; क्योंकि न तो इसका आदि है, न अन्त है तथा न इसकी अच्छी प्रकार से स्थिति ही है। इसलिये इस अहंता, ममता और वासना रूप अति दृढ़ मूलों वाले संसार रूप पीपल के वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूप शस्त्र द्वारा काटकर —
भावार्थ
इस संसार-वृक्ष का वास्तविक रूप दिखाई नहीं देता — न इसका 'आदि' (आरम्भ) मिलता है, न 'अन्त', न 'सम्प्रतिष्ठा' (स्थायी आधार)। यह स्वप्न जैसा है — जब तक उसमें हैं, वास्तविक लगता है, पर विचार करने पर उसका कोई ठोस आधार नहीं मिलता। इस 'सुविरूढमूल' — गहरी जड़ों वाले — वृक्ष को काटने का साधन है 'दृढ़ असंगशस्त्र' — अनासक्ति रूपी मज़बूत कुल्हाड़ी। आसक्ति ही इस वृक्ष की जड़ है; अनासक्ति से वह कटता है। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।
उसके पश्चात् उस परमपद रूप परमेश्वर को भली-भाँति खोजना चाहिये, जिसमें गये हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते; और जिस परमेश्वर से इस पुरातन संसार-वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष नारायण के मैं शरण हूँ — इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वर का मनन और निदिध्यासन करना चाहिये।
भावार्थ
वृक्ष को काटने के बाद क्या करना है — 'तत्पदं परिमार्गितव्यम्' — उस परम पद की खोज करनी है, जहाँ जाकर कोई लौटता नहीं। और उसके लिये भाव होना चाहिये — 'तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये' — मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ, जिससे यह पुरातन संसार-प्रवृत्ति फैली है। यह शरणागति का भाव है। केवल त्याग पर्याप्त नहीं; त्याग के बाद परमात्मा की ओर मुड़ना आवश्यक है। खाली स्थान को परमात्मा से भरना है।
जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं — वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परमपद को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
उस परम पद तक पहुँचने वालों के लक्षण — 'निर्मानमोह' (मान और मोह से रहित), 'जितसंगदोष' (आसक्ति के दोष को जीतने वाले), 'अध्यात्मनित्य' (आत्मज्ञान में सदा स्थित), 'विनिवृत्तकाम' (कामनाओं से मुक्त), 'सुख-दुःख के द्वन्द्वों से विमुक्त' और 'अमूढ' (मोह रहित, ज्ञानी)। ये गुण कोई जन्म से नहीं लाता; ये साधना से विकसित होते हैं। जो इन्हें अपनाता है, वह 'अव्यय पद' — अविनाशी धाम — को पाता है।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ६ ॥
अन्वय
तत् सूर्यः न भासयते, न शशाङ्कः, न पावकः; यत् गत्वा (जनाः) न निवर्तन्ते, तत् मम परमं धाम।
हिन्दी अनुवाद
जिस परमपद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते, उस स्वयं प्रकाश परमपद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही; वही मेरा परम धाम है।
भावार्थ
भगवान् अपने परम धाम का वर्णन करते हैं — उसे सूर्य, चन्द्रमा या अग्नि प्रकाशित नहीं करते। क्यों? क्योंकि वह स्वयं-प्रकाश है; बल्कि सूर्य, चन्द्र और अग्नि को प्रकाश उसी से मिलता है। कठोपनिषद् कहता है — 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति'। जहाँ जाकर कोई लौटता नहीं, वह भगवान् का परम धाम है। यह कोई भौतिक स्थान नहीं, बल्कि शुद्ध चेतना की अवस्था है।
इस देह में यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है और वही इन प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षण करता है।
भावार्थ
यह अत्यन्त महत्वपूर्ण श्लोक है — 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः' — जीवात्मा भगवान् का ही सनातन अंश है। जैसे समुद्र की एक बूँद में समुद्र के सब गुण होते हैं, या जैसे सूर्य की एक किरण में सूर्य का प्रकाश। हम भगवान् से अलग नहीं, उन्हीं के अंश हैं। यह जीवात्मा प्रकृति में स्थित मन और पाँच इन्द्रियों को 'कर्षति' — खींचता है, अपनी ओर आकर्षित करता है, उन्हें संचालित करता है। मनुष्य की गरिमा इसी में है कि वह दिव्य का अंश है।
वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादि का स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इन मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है, उसमें जाता है।
भावार्थ
मृत्यु और पुनर्जन्म की प्रक्रिया एक सुन्दर उपमा से — जैसे वायु फूलों से सुगन्ध लेकर दूसरे स्थान पर ले जाती है, वैसे ही जीवात्मा एक शरीर छोड़ते समय मन और इन्द्रियों (सूक्ष्म शरीर) को साथ लेकर दूसरे शरीर में जाती है। वायु फूल को नहीं ले जाती, केवल सुगन्ध; वैसे ही आत्मा स्थूल शरीर को नहीं, केवल सूक्ष्म संस्कारों को ले जाती है। इसीलिये हमारे विचार, इच्छाएँ और संस्कार अगले जन्म तक साथ जाते हैं।
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९ ॥
अन्वय
अयं श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणम् एव च मनः च अधिष्ठाय विषयान् उपसेवते।
हिन्दी अनुवाद
यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके — अर्थात् इन सबके सहारे से ही — विषयों का सेवन करता है।
भावार्थ
जीवात्मा नये शरीर में कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन को 'अधिष्ठाय' — आधार बनाकर — विषयों का भोग करता है। ये छह उसके साधन हैं — शब्द सुनने, रूप देखने, स्पर्श करने, स्वाद लेने, सूँघने और सोचने के। आत्मा स्वयं भोग नहीं करती, बल्कि इन साधनों के माध्यम से अनुभव करती है। जैसे कोई व्यक्ति खिड़कियों से बाहर का दृश्य देखता है — खिड़कियाँ इन्द्रियाँ हैं, देखने वाला आत्मा।
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥
अन्वय
उत्क्रामन्तं स्थितं वा अपि भुञ्जानं वा गुणान्वितं (जीवात्मानं) विमूढाः न अनुपश्यन्ति; ज्ञानचक्षुषः पश्यन्ति।
हिन्दी अनुवाद
शरीर को छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को अथवा विषयों को भोगते हुए को इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानीजन नहीं जानते, केवल ज्ञान रूप नेत्रों वाले विवेकशील ज्ञानी ही तत्त्व से जानते हैं।
भावार्थ
आत्मा तीन अवस्थाओं में है — 'उत्क्रामन्त' (शरीर छोड़ते हुए), 'स्थित' (शरीर में रहते हुए) और 'भुञ्जान' (विषयों का भोग करते हुए) — पर 'विमूढ़' (अज्ञानी) इसे किसी भी अवस्था में नहीं देख पाते। केवल 'ज्ञानचक्षु' — ज्ञान की आँख वाले — इसे देखते हैं। अज्ञानी केवल शरीर देखता है; मृत्यु को शरीर का अन्त समझता है। ज्ञानी देखता है कि आत्मा शरीर में आती है, रहती है और चली जाती है — शरीर केवल वस्त्र है।
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥
अन्वय
यतन्तः योगिनः च एनम् आत्मनि अवस्थितं पश्यन्ति; अकृतात्मानः अचेतसः (च) यतन्तः अपि एनं न पश्यन्ति।
हिन्दी अनुवाद
यत्न करने वाले योगीजन भी अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को तत्त्व से जानते हैं; किन्तु जिन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं जानते।
भावार्थ
प्रयत्नशील योगी अपने भीतर आत्मा को देखते हैं। पर 'अकृतात्मा' — जिन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया — और 'अचेतस' — विवेकहीन — लोग प्रयत्न करके भी नहीं देख पाते। यह एक महत्वपूर्ण सत्य है — केवल प्रयत्न पर्याप्त नहीं; मन की शुद्धि भी आवश्यक है। जैसे मैले दर्पण में कितना भी देखो, चेहरा स्पष्ट नहीं दिखेगा। पहले दर्पण साफ़ करना होगा — कर्मयोग और भक्ति से।
सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है — उसको तू मेरा ही तेज जान।
भावार्थ
यहाँ से भगवान् बताते हैं कि वे संसार में कैसे कार्य करते हैं। सूर्य का जो तेज सारे जगत् को प्रकाशित करता है, चन्द्रमा की जो शीतल ज्योति है, और अग्नि का जो प्रकाश है — वह सब भगवान् का ही तेज है। जब हम सूर्योदय देखें, चाँदनी में बैठें या दीपक जलायें, तो उसमें भगवान् का प्रकाश देखें। यह दृष्टि साधारण अनुभवों को दिव्य बना देती है।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥
अन्वय
अहं गाम् आविश्य च ओजसा भूतानि धारयामि; रसात्मकः सोमः भूत्वा च सर्वाः ओषधीः पुष्णामि।
हिन्दी अनुवाद
और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ और रसस्वरूप अर्थात् अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण ओषधियों को अर्थात् वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ।
भावार्थ
भगवान् पृथ्वी में प्रवेश करके अपने 'ओज' — शक्ति — से सब प्राणियों को धारण करते हैं। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण-शक्ति, जो सबको टिकाये रखती है, वह भगवान् की ही शक्ति है। और 'रसात्मक सोम' — रस से भरा चन्द्रमा — बनकर सब वनस्पतियों को पोषित करते हैं। प्राचीन मान्यता है कि चन्द्रमा की किरणें वनस्पतियों में रस और औषधीय गुण भरती हैं। जो अन्न हम खाते हैं, उसमें भगवान् की ही पोषण-शक्ति है।
मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर अग्नि रूप होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।
भावार्थ
यह श्लोक भोजन से पहले प्रार्थना के रूप में बोला जाता है। भगवान् 'वैश्वानर' — जठराग्नि, पाचन-अग्नि — बनकर सब प्राणियों के शरीर में रहते हैं और प्राण-अपान के साथ मिलकर 'चतुर्विध अन्न' — चार प्रकार के भोजन (भक्ष्य — चबाने योग्य, भोज्य — निगलने योग्य, लेह्य — चाटने योग्य, चोष्य — चूसने योग्य) — को पचाते हैं। हमारा भोजन पचाना भी भगवान् की ही क्रिया है। इसलिये भोजन को यज्ञ मानकर, कृतज्ञता से ग्रहण करना चाहिये।
अहं च सर्वस्य हृदि सन्निविष्टः; मत्तः स्मृतिः ज्ञानम् अपोहनं च (भवति); सर्वैः वेदैः च अहम् एव वेद्यः; वेदान्तकृत् वेदवित् च अहम् एव।
हिन्दी अनुवाद
मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय का नाश) होता है; और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ तथा वेदान्त का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ।
भावार्थ
यह श्लोक भगवान् की सर्वव्यापकता का चरम है — 'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः' — मैं सबके हृदय में स्थित हूँ। हमारी 'स्मृति' (याद रखने की शक्ति), 'ज्ञान' (समझने की शक्ति) और 'अपोहन' (भूलने और संशय दूर करने की शक्ति) — सब भगवान् से हैं। भूलना भी एक वरदान है — यदि हम सब कुछ याद रखें, तो दुःखों का बोझ असहनीय हो जाये। सब वेदों का 'वेद्य' — जानने योग्य लक्ष्य — भगवान् ही हैं; वे ही 'वेदान्तकृत्' (वेदान्त के रचयिता) और 'वेदवित्' (वेदों के ज्ञाता) हैं।
इस संसार में नाशवान् और अविनाशी भी — ये दो प्रकार के पुरुष हैं। इनमें सम्पूर्ण भूत-प्राणियों के शरीर तो नाशवान् और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है।
भावार्थ
अब भगवान् 'पुरुषोत्तम' का सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं। संसार में दो पुरुष हैं — 'क्षर' (नाशवान्) और 'अक्षर' (अविनाशी)। सब प्राणियों के शरीर 'क्षर' हैं — जन्म लेते और मरते हैं। 'कूटस्थ' — अविकारी जीवात्मा — 'अक्षर' है, जो शरीरों के बदलने पर भी नहीं बदलता। 'कूटस्थ' का अर्थ है लोहार की निहाई — जिस पर कितना भी हथौड़ा चले, वह नहीं बदलती। पर इन दोनों से परे एक तीसरा पुरुष भी है।
इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है, एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा — इस प्रकार कहा गया है।
भावार्थ
क्षर और अक्षर से परे 'उत्तम पुरुष' है — 'परमात्मा', 'अव्यय' (अविनाशी), 'ईश्वर' (स्वामी)। वह तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका 'बिभर्ति' — पालन करता है। क्षर (प्रकृति) और अक्षर (जीवात्मा) दोनों उसी के अधीन हैं। यह गीता का विशिष्ट दर्शन है — केवल प्रकृति और पुरुष (सांख्य की तरह) नहीं, बल्कि दोनों के ऊपर एक परम पुरुष, जो दोनों का स्वामी और आधार है।
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८ ॥
अन्वय
यस्मात् अहं क्षरम् अतीतः, अक्षरात् अपि च उत्तमः, अतः (अहं) लोके वेदे च पुरुषोत्तमः (इति) प्रथितः अस्मि।
हिन्दी अनुवाद
क्योंकि मैं नाशवान् जड़वर्ग — क्षेत्र — से तो सर्वथा अतीत हूँ और अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूँ, इसलिये लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ।
भावार्थ
भगवान् स्वयं को 'पुरुषोत्तम' — पुरुषों में उत्तम — घोषित करते हैं, क्योंकि वे 'क्षर' (नाशवान् प्रकृति) से 'अतीत' (परे) हैं और 'अक्षर' (अविनाशी जीवात्मा) से भी 'उत्तम' (श्रेष्ठ) हैं। लोक और वेद दोनों में वे इसी नाम से प्रसिद्ध हैं। जीवात्मा भगवान् का अंश है, पर अंश पूर्ण के बराबर नहीं; बूँद समुद्र का अंश है, पर समुद्र नहीं। इसीलिये जीव भगवान् की शरण लेता है।
हे भारत! जो ज्ञानी पुरुष मुझको इस प्रकार तत्त्व से पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरन्तर मुझ वासुदेव परमेश्वर को ही भजता है।
भावार्थ
जो 'असम्मूढ़' — मोहरहित — होकर भगवान् को पुरुषोत्तम के रूप में जानता है, वह 'सर्ववित्' — सब कुछ जानने वाला — है। क्योंकि जिसने सबके मूल को जान लिया, उसने सब कुछ जान लिया। और ऐसा व्यक्ति 'सर्वभावेन' — सम्पूर्ण हृदय से, हर भाव से — भगवान् को भजता है। सच्चा ज्ञान स्वाभाविक रूप से भक्ति में परिणत होता है। जो भगवान् को सचमुच जान लेता है, वह उनसे प्रेम किये बिना नहीं रह सकता।
हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह अति रहस्ययुक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया; इसको तत्त्व से जानकर मनुष्य ज्ञानवान् और कृतार्थ हो जाता है।
भावार्थ
पन्द्रहवें अध्याय का समापन — भगवान् इसे 'गुह्यतम शास्त्र' — सबसे गोपनीय शास्त्र — कहते हैं। केवल बीस श्लोकों में सम्पूर्ण वेदान्त का सार है — संसार का स्वरूप, उससे मुक्ति का उपाय, जीव का स्वरूप, और पुरुषोत्तम का ज्ञान। इसे जानकर मनुष्य 'बुद्धिमान्' और 'कृतकृत्य' — जिसके सब कर्तव्य पूरे हो गये — हो जाता है। उसे और कुछ करना या पाना शेष नहीं रहता। यह अध्याय 'पुरुषोत्तमयोग' कहलाता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥
ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।