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🪷 श्रीमद्भगवद्गीता

मूल श्लोक, अन्वय, सरल हिन्दी अनुवाद एवं विस्तृत भावार्थ सहित

अध्याय १८ — मोक्षसंन्यासयोग

७८ श्लोक · प्रत्येक पर अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ

📌 त्याग और संन्यास; गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति, सुख; स्वधर्म; शरणागति (सर्वधर्मान्परित्यज्य)।
१८.१ अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — (हे) महाबाहो! (हे) हृषीकेश! (हे) केशिनिषूदन! संन्यासस्य त्यागस्य च तत्त्वं पृथक् वेदितुम् इच्छामि।
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — हे महाबाहो! हे अन्तर्यामिन्! हे वासुदेव! मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ।
भावार्थ
अठारहवाँ अध्याय 'मोक्षसंन्यासयोग' कहलाता है — गीता का सबसे लम्बा और उपसंहारात्मक अध्याय, जिसमें पूरी गीता का सार है। अर्जुन 'संन्यास' और 'त्याग' का अन्तर जानना चाहते हैं। गीता में दोनों शब्दों का बार-बार प्रयोग हुआ है; क्या ये एक ही हैं या अलग? अर्जुन भगवान् को 'केशिनिषूदन' — केशी राक्षस का वध करने वाले — कहते हैं, मानो कह रहे हों कि जैसे आपने उस राक्षस को मारा, वैसे ही मेरे संशय रूपी राक्षस को भी मारिये।
१८.२ श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — कवयः काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं विदुः; विचक्षणाः सर्वकर्मफलत्यागं त्यागं प्राहुः।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — कितने ही पण्डितजन तो काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास समझते हैं तथा दूसरे विचारकुशल पुरुष सब कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं।
भावार्थ
भगवान् दोनों की परिभाषा देते हैं — 'संन्यास' का अर्थ है 'काम्य कर्मों' (इच्छा-पूर्ति के लिये किये जाने वाले कर्म — जैसे पुत्र-प्राप्ति, धन-प्राप्ति के यज्ञ) का त्याग। 'त्याग' का अर्थ है 'सब कर्मों के फल' का त्याग — कर्म करना, पर फल की इच्छा छोड़ना। संन्यास में कुछ कर्मों को ही छोड़ा जाता है, त्याग में कर्म जारी रहते हैं पर आसक्ति छूट जाती है। गीता 'त्याग' पर अधिक बल देती है, क्योंकि यह सबके लिये व्यावहारिक है।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३ ॥
अन्वय
एके मनीषिणः 'कर्म दोषवत् (अतः) त्याज्यम्' इति प्राहुः; अपरे च 'यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम्' इति (प्राहुः)।
हिन्दी अनुवाद
कई एक विद्वान् ऐसा कहते हैं कि कर्ममात्र दोषयुक्त हैं, इसलिये त्यागने के योग्य हैं; और दूसरे विद्वान् यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप रूप कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं।
भावार्थ
भगवान् दो विरोधी मतों का उल्लेख करते हैं। कुछ विद्वान् (जैसे सांख्य दर्शन के अनुयायी) कहते हैं कि सब कर्म दोषयुक्त हैं — हर कर्म में कुछ न कुछ हिंसा या बन्धन है — इसलिये सब कर्म छोड़ देने चाहिये। दूसरे (जैसे मीमांसक) कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप जैसे कर्म कभी नहीं छोड़ने चाहिये। यह भारतीय दर्शन की एक पुरानी बहस है। भगवान् अब अपना निर्णय देंगे।
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम। त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥ ४ ॥
अन्वय
(हे) भरतसत्तम! तत्र त्यागे मे निश्चयं शृणु; हि (हे) पुरुषव्याघ्र! त्यागः त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः।
हिन्दी अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन! संन्यास और त्याग — इन दोनों में से पहले त्याग के विषय में तू मेरा निश्चय सुन; क्योंकि त्याग सात्त्विक, राजस और तामस भेद से तीन प्रकार का कहा गया है।
भावार्थ
भगवान् कहते हैं — 'मेरा निश्चय सुनो।' यह भगवान् का अपना निर्णायक मत है, अन्य विद्वानों के मतों से ऊपर। और त्याग भी तीन प्रकार का है — सात्त्विक, राजस और तामस। अर्थात् त्याग भी गुणों के अनुसार अच्छा या बुरा हो सकता है। केवल कुछ छोड़ देना ही श्रेष्ठता नहीं; किस भाव से छोड़ा गया, यह महत्वपूर्ण है।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ ५ ॥
अन्वय
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं, तत् कार्यम् एव; हि यज्ञः दानं तपः च एव मनीषिणां पावनानि (सन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
यज्ञ, दान और तप रूप कर्म त्याग करने के योग्य नहीं है, बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य है; क्योंकि यज्ञ, दान और तप — ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान् पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं।
भावार्थ
भगवान् का निश्चय — यज्ञ, दान और तप को कभी नहीं छोड़ना चाहिये; ये 'कार्य' — अवश्य करने योग्य — हैं। क्यों? क्योंकि ये 'पावन' हैं — बुद्धिमानों को भी पवित्र करते हैं। यज्ञ (सेवा और समर्पण) अहंकार को, दान लोभ को, और तप आलस्य और भोग-वासना को दूर करता है। ज्ञानी भी इन्हें छोड़ने के बजाय करते रहें, क्योंकि ये मन की शुद्धि बनाये रखते हैं और समाज के लिये आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! तु एतानि अपि कर्माणि सङ्गं फलानि च त्यक्त्वा कर्तव्यानि इति मे निश्चितम् उत्तमं मतम्।
हिन्दी अनुवाद
इसलिये हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तप रूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिये — यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।
भावार्थ
पर इन कर्मों को कैसे करना है? 'सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च' — आसक्ति और फल दोनों को छोड़कर। यही भगवान् का 'निश्चित उत्तम मत' है। यह पूरी गीता का सार है — कर्म मत छोड़ो, कर्म की आसक्ति और फल की इच्छा छोड़ो। दोनों विरोधी मतों का यह सुन्दर समन्वय है — कर्म करो (मीमांसकों की तरह), पर बन्धन से मुक्त रहो (सांख्य की तरह)।
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते। मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥
अन्वय
तु नियतस्य कर्मणः संन्यासः न उपपद्यते; मोहात् तस्य परित्यागः तामसः परिकीर्तितः।
हिन्दी अनुवाद
निषिद्ध और काम्य कर्मों का तो स्वरूप से त्याग करना उचित ही है; परन्तु नियत कर्म का स्वरूप से त्याग करना उचित नहीं है। इसलिये मोह के कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया है।
भावार्थ
अब तीन प्रकार के त्याग — पहला, 'तामस त्याग'। 'नियत कर्म' — अपने कर्तव्य कर्म — को 'मोह' (अज्ञान, भ्रम) के कारण छोड़ देना तामस त्याग है। जैसे कोई आलस्य या गलत समझ के कारण अपना कर्तव्य छोड़ दे — माता-पिता की सेवा, परिवार का पालन, अपना व्यवसाय — और कहे कि मैं त्यागी हूँ। यह त्याग नहीं, पलायन है। अर्जुन का युद्ध छोड़ना भी ऐसा ही होता।
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्। स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८ ॥
अन्वय
यत् कर्म 'दुःखम्' इति एव कायक्लेशभयात् त्यजेत्, सः राजसं त्यागं कृत्वा त्यागफलं न एव लभेत्।
हिन्दी अनुवाद
जो कुछ कर्म है, वह सब दुःख रूप ही है — ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य कर्मों का त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को किसी प्रकार भी नहीं पाता।
भावार्थ
दूसरा, 'राजस त्याग' — कर्म को 'दुःखमय' समझकर, 'कायक्लेशभय' — शारीरिक कष्ट के डर से — छोड़ देना। जैसे कोई कहे, 'यह काम बहुत कठिन है, मैं नहीं करूँगा।' ऐसा त्याग करने वाले को 'त्याग का फल' (शान्ति, मुक्ति) नहीं मिलता, क्योंकि उसका त्याग सुविधा के लिये है, आध्यात्मिक उन्नति के लिये नहीं। कठिनाई से भागना त्याग नहीं, कायरता है।
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन। सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥ ९ ॥
अन्वय
(हे) अर्जुन! 'कार्यम्' इति एव यत् नियतं कर्म सङ्गं फलं च एव त्यक्त्वा क्रियते, सः त्यागः सात्त्विकः मतः।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है — इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है — वही सात्त्विक त्याग माना गया है।
भावार्थ
तीसरा, 'सात्त्विक त्याग' — जो 'नियत कर्म' (कर्तव्य) को 'कार्यमित्येव' — यह करना ही चाहिये, इस भाव से — 'संग और फल' का त्याग करके करता है, उसका त्याग सात्त्विक है। ध्यान दें — सात्त्विक त्याग में कर्म छूटता नहीं; केवल आसक्ति और फल छूटते हैं। यही सच्चा त्याग है। बाहर से कर्म जारी है, भीतर से त्याग पूर्ण है। जैसे माँ बच्चे की सेवा करती है — कर्तव्य समझकर, बिना कोई बदला चाहे।
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते। त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥
अन्वय
सत्त्वसमाविष्टः मेधावी छिन्नसंशयः त्यागी अकुशलं कर्म न द्वेष्टि, कुशले (कर्मणि) न अनुषज्जते।
हिन्दी अनुवाद
जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता — वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान् और सच्चा त्यागी है।
भावार्थ
सच्चे त्यागी की पहचान — वह 'अकुशल कर्म' (अप्रिय, कठिन कार्य) से द्वेष नहीं करता और 'कुशल कर्म' (प्रिय, सुखद कार्य) में आसक्त नहीं होता। उसके लिये सब कर्म समान हैं — सब कर्तव्य हैं। वह 'सत्त्वसमाविष्ट' (सत्त्वगुण से भरा), 'मेधावी' (बुद्धिमान्) और 'छिन्नसंशय' (संशय रहित) है। अधिकांश लोग प्रिय कार्य उत्साह से और अप्रिय कार्य अनिच्छा से करते हैं; त्यागी दोनों को समान भाव से करता है।
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः। यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥
अन्वय
हि देहभृता कर्माणि अशेषतः त्यक्तुं न शक्यम्; यः तु कर्मफलत्यागी, सः त्यागी इति अभिधीयते।
हिन्दी अनुवाद
क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग किया जाना शक्य नहीं है; इसलिये जो कर्मफल का त्यागी है, वही त्यागी है — यह कहा जाता है।
भावार्थ
भगवान् एक व्यावहारिक सत्य बताते हैं — 'न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः' — शरीरधारी के लिये सब कर्मों का पूर्ण त्याग सम्भव ही नहीं। साँस लेना, खाना, सोना, चलना — ये भी कर्म हैं। इसलिये सच्चा त्यागी वह है जो 'कर्मफलत्यागी' है — कर्म करता है, पर फल की इच्छा छोड़ देता है। यह परिभाषा त्याग को सबके लिये सुलभ बना देती है — गृहस्थ भी त्यागी हो सकता है।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥
अन्वय
अनिष्टम् इष्टं मिश्रं च (इति) त्रिविधं कर्मणः फलम् अत्यागिनां प्रेत्य भवति; तु संन्यासिनां क्वचित् न (भवति)।
हिन्दी अनुवाद
कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ — ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात् अवश्य होता है; किन्तु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल किसी काल में भी नहीं होता।
भावार्थ
कर्मफल तीन प्रकार का होता है — 'अनिष्ट' (बुरा — नरक, निम्न योनि), 'इष्ट' (अच्छा — स्वर्ग, देवयोनि) और 'मिश्र' (मिला-जुला — मनुष्य योनि)। जो फल का त्याग नहीं करते, उन्हें मृत्यु के बाद ये फल भोगने पड़ते हैं। पर जो 'संन्यासी' — फल के त्यागी — हैं, उन्हें कोई फल नहीं भोगना पड़ता, क्योंकि उन्होंने फल पर अपना दावा ही छोड़ दिया। इसलिये वे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे। सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥
अन्वय
(हे) महाबाहो! सर्वकर्मणां सिद्धये कृतान्ते सांख्ये प्रोक्तानि एतानि पञ्च कारणानि मे निबोध।
हिन्दी अनुवाद
हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के ये पाँच हेतु कर्मों का अन्त करने के लिये उपाय बतलाने वाले सांख्यशास्त्र में कहे गये हैं, उनको तू मुझसे भली-भाँति जान।
भावार्थ
अब भगवान् कर्म के विश्लेषण की ओर बढ़ते हैं — हर कर्म के पाँच कारण होते हैं, जो सांख्य दर्शन में बताये गये हैं। यह समझना इसलिये आवश्यक है कि हम अपने को अकेला कर्ता मानते हैं, जबकि वास्तव में कर्म अनेक कारणों के मेल से होता है। यह समझ कर्तापन के अहंकार को तोड़ती है।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥ १४ ॥
अन्वय
अधिष्ठानं, तथा कर्ता, पृथग्विधं करणं च, विविधाः पृथक् चेष्टाः च, अत्र पञ्चमं दैवं च एव।
हिन्दी अनुवाद
इस विषय में अर्थात् कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव है।
भावार्थ
कर्म के पाँच कारण — 'अधिष्ठान' (आधार — शरीर), 'कर्ता' (करने वाला — अहंकार युक्त जीव), 'करण' (साधन — इन्द्रियाँ और मन), 'चेष्टा' (विविध प्रयास — प्राण की क्रियाएँ) और 'दैव' (भाग्य, ईश्वरीय विधान, अदृष्ट शक्ति)। कोई भी कार्य इन पाँचों के मेल से ही होता है। 'दैव' विशेष ध्यान देने योग्य है — हम कितना भी प्रयास करें, परिणाम पर अदृश्य शक्तियों का भी प्रभाव होता है। यह समझ हमें विनम्र बनाती है।
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः। न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥
अन्वय
नरः शरीरवाङ्मनोभिः न्याय्यं वा विपरीतं वा यत् कर्म प्रारभते, तस्य एते पञ्च हेतवः।
हिन्दी अनुवाद
मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है — उसके ये पाँचों कारण हैं।
भावार्थ
मनुष्य शरीर, वाणी और मन से जो भी कर्म करता है — चाहे 'न्याय्य' (उचित, धर्मानुकूल) हो या 'विपरीत' (अनुचित) — उसके ये पाँच कारण होते हैं। यह सिद्धान्त हर कर्म पर लागू होता है। इसका अर्थ यह है कि कोई भी कर्म केवल एक व्यक्ति का नहीं; अनेक शक्तियाँ उसमें सहायक होती हैं। फिर भी व्यक्ति अपने 'कर्तापन' के भाव के कारण उसका फल भोगता है।
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥
अन्वय
तत्र एवं सति तु यः अकृतबुद्धित्वात् केवलम् आत्मानं कर्तारं पश्यति, सः दुर्मतिः न पश्यति।
हिन्दी अनुवाद
परन्तु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि होने के कारण उस विषय में यानी कर्मों के होने में केवल शुद्ध स्वरूप आत्मा को कर्ता समझता है, वह मलिन बुद्धि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता।
भावार्थ
ऐसी स्थिति में जो व्यक्ति 'अकृतबुद्धि' — अपरिपक्व बुद्धि — के कारण 'केवल' अपने को (शुद्ध आत्मा को) कर्ता मानता है, वह 'दुर्मति' है और 'न पश्यति' — सत्य को नहीं देखता। आत्मा तो अकर्ता है; कर्म पाँच कारणों से होते हैं। 'मैंने किया' — यह भाव अज्ञान है। जो यह समझ लेता है कि 'मैं केवल एक माध्यम हूँ', वह कर्तापन के बोझ से मुक्त हो जाता है।
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १७ ॥
अन्वय
यस्य अहङ्कृतः भावः न (अस्ति), यस्य बुद्धिः न लिप्यते, सः इमान् लोकान् हत्वा अपि न हन्ति, न निबध्यते।
हिन्दी अनुवाद
जिस पुरुष के अन्तःकरण में 'मैं कर्ता हूँ' — ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मारता है और न पाप से बँधता है।
भावार्थ
यह अत्यन्त गहरा और साहसिक श्लोक है। जिसमें 'अहंकृत भाव' — 'मैं कर्ता हूँ' का भाव — नहीं है, और जिसकी बुद्धि 'लिप्त' नहीं होती, वह 'इन सब लोकों को मारकर भी न मारता है, न बँधता है'। इसका अर्थ हिंसा का समर्थन नहीं! इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति पूर्ण रूप से अहंकार-रहित होकर, भगवान् के उपकरण के रूप में, धर्म के लिये कर्म करता है, उसे कर्म का बन्धन नहीं लगता। जैसे न्यायाधीश अपराधी को दण्ड देता है, पर वह हत्यारा नहीं कहलाता। अर्जुन के लिये यह विशेष सन्देश है।
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना। करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥ १८ ॥
अन्वय
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता (इति) त्रिविधा कर्मचोदना; करणं कर्म कर्ता इति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः।
हिन्दी अनुवाद
ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय — ये तीनों प्रकार की कर्म-प्रेरणा हैं; और कर्ता, करण तथा क्रिया — ये तीनों प्रकार का कर्म-संग्रह है।
भावार्थ
कर्म की प्रेरणा और कर्म के संग्रह का विश्लेषण — 'कर्मचोदना' (कर्म की प्रेरणा) के तीन अंग हैं: 'ज्ञान' (जानना), 'ज्ञेय' (जो जाना जाता है) और 'परिज्ञाता' (जानने वाला)। पहले हम किसी वस्तु को जानते हैं, फिर उसके प्रति इच्छा होती है, फिर कर्म। 'कर्मसंग्रह' (कर्म के आधार) के तीन अंग हैं: 'करण' (साधन), 'कर्म' (क्रिया) और 'कर्ता' (करने वाला)। यह कर्म का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है।
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः। प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९ ॥
अन्वय
गुणसङ्ख्याने ज्ञानं कर्म च कर्ता च गुणभेदतः त्रिधा एव प्रोच्यते; तानि अपि यथावत् शृणु।
हिन्दी अनुवाद
गुणों की संख्या करने वाले शास्त्र में ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही कहे गये हैं; उनको भी तू मुझसे भली-भाँति सुन।
भावार्थ
अब भगवान् बताते हैं कि 'ज्ञान', 'कर्म' और 'कर्ता' — तीनों गुणों के अनुसार तीन-तीन प्रकार के होते हैं। 'गुणसंख्यान' — सांख्य दर्शन — में यह वर्णन है। सत्रहवें अध्याय में श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप और दान के तीन प्रकार बताये गये थे; अब ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के तीन प्रकार बताये जायेंगे। यह जीवन के हर पहलू को गुणों की कसौटी पर कसने का तरीका है।
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते। अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ २० ॥
अन्वय
येन सर्वभूतेषु एकम् अव्ययं भावं, विभक्तेषु अविभक्तम् ईक्षते, तत् ज्ञानं सात्त्विकं विद्धि।
हिन्दी अनुवाद
जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक्-पृथक् सब भूतों में एक अविनाशी परमात्म-भाव को विभाग रहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान।
भावार्थ
सात्त्विक ज्ञान — वह जिससे सब प्राणियों में 'एक अव्यय भाव' — एक अविनाशी सत्ता — दिखती है; 'विभक्तेषु अविभक्तम्' — बँटे हुओं में अविभाजित एकता। यह विविधता में एकता की दृष्टि है। जैसे अनेक घड़ों में एक ही आकाश, अनेक लहरों में एक ही समुद्र। यह ज्ञान प्रेम, करुणा और समता को जन्म देता है। सबसे ऊँचा ज्ञान वह है जो हमें सबसे जोड़ता है।
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्। वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥
अन्वय
यत् तु ज्ञानं पृथक्त्वेन सर्वेषु भूतेषु पृथग्विधान् नानाभावान् वेत्ति, तत् ज्ञानं राजसं विद्धि।
हिन्दी अनुवाद
किन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान।
भावार्थ
राजस ज्ञान — वह जो सब प्राणियों को 'पृथक्' — अलग-अलग — देखता है, केवल भेद देखता है। 'मैं' और 'तुम' अलग, 'मेरा' और 'तेरा' अलग; जाति, धर्म, देश के भेद। यह ज्ञान प्रतिस्पर्धा, स्वार्थ और संघर्ष को जन्म देता है। आधुनिक विज्ञान का बहुत-सा ज्ञान इसी प्रकार का है — वस्तुओं को तोड़कर, अलग करके समझना; यह उपयोगी है, पर अधूरा। सम्पूर्णता की दृष्टि इसमें नहीं।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्। अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
अन्वय
यत् तु एकस्मिन् कार्ये कृत्स्नवत् सक्तम्, अहैतुकम्, अतत्त्वार्थवत्, अल्पं च (ज्ञानम्), तत् तामसम् उदाहृतम्।
हिन्दी अनुवाद
परन्तु जो ज्ञान एक कार्य रूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्ति वाला, तात्त्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है — वह तामस कहा गया है।
भावार्थ
तामस ज्ञान — जो 'एक कार्य' (जैसे शरीर, या एक विचार, एक मत) को ही 'कृत्स्नवत्' — सम्पूर्ण सत्य — मानकर उसमें आसक्त रहता है; जो 'अहैतुक' (तर्कहीन), 'अतत्त्वार्थवत्' (सत्य से रहित) और 'अल्प' (संकीर्ण) है। जैसे कोई मान ले कि शरीर ही सब कुछ है, या केवल मेरा मत सही है, बाकी सब गलत। यह कट्टरता और अन्धविश्वास का ज्ञान है, जो सबसे निम्न है।
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥
अन्वय
यत् कर्म नियतं सङ्गरहितम् अफलप्रेप्सुना अरागद्वेषतः कृतं, तत् सात्त्विकम् उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया गया हो — वह सात्त्विक कहा जाता है।
भावार्थ
सात्त्विक कर्म — 'नियत' (कर्तव्य रूप, शास्त्रानुकूल), 'संगरहित' (आसक्ति रहित), 'अफलप्रेप्सु' (फल की इच्छा न रखने वाले द्वारा) और 'अरागद्वेष' (बिना राग-द्वेष के) किया गया। यह कर्मयोग का आदर्श कर्म है। जब कर्म कर्तव्य समझकर, बिना किसी व्यक्तिगत लाभ या हानि की भावना के, शान्त मन से किया जाता है, तो वह सात्त्विक होता है।
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः। क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥
अन्वय
यत् तु कर्म कामेप्सुना साहङ्कारेण वा पुनः बहुलायासं क्रियते, तत् राजसम् उदाहृतम्।
हिन्दी अनुवाद
परन्तु जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है।
भावार्थ
राजस कर्म — जो 'कामेप्सु' (भोग की इच्छा वाले) या 'साहंकार' (अहंकार युक्त) व्यक्ति द्वारा 'बहुलायास' — बहुत परिश्रम और तनाव के साथ — किया जाता है। राजसी व्यक्ति बहुत मेहनत करता है, पर उसके पीछे इच्छा और अहंकार है — 'मुझे यह पाना है', 'लोग मुझे बड़ा मानें'। इसलिये उसका कर्म तनावपूर्ण और थका देने वाला होता है। सात्त्विक व्यक्ति भी परिश्रम करता है, पर सहजता और शान्ति से।
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्। मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥
अन्वय
यत् कर्म अनुबन्धं क्षयं हिंसां पौरुषं च अनपेक्ष्य मोहात् आरभ्यते, तत् तामसम् उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।
भावार्थ
तामस कर्म — जो 'मोह' (अज्ञान) से, बिना सोचे-विचारे आरम्भ किया जाता है; जिसमें 'अनुबन्ध' (परिणाम), 'क्षय' (हानि — धन, समय, स्वास्थ्य की), 'हिंसा' (दूसरों को कष्ट) और 'पौरुष' (अपनी क्षमता) का विचार नहीं किया जाता। जैसे कोई क्रोध में आकर कुछ कर दे, या नशे में गाड़ी चलाये, या बिना योजना के कोई बड़ा काम शुरू कर दे। विवेकहीन कर्म विनाशकारी होता है।
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः। सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥
अन्वय
मुक्तसङ्गः अनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः कर्ता सात्त्विकः उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष-शोकादि विकारों से रहित है — वह सात्त्विक कहा जाता है।
भावार्थ
सात्त्विक कर्ता — 'मुक्तसंग' (आसक्ति से मुक्त), 'अनहंवादी' (अहंकार की बातें न करने वाला — 'मैंने यह किया, मैंने वह किया' न कहने वाला), 'धृति और उत्साह से युक्त' (धैर्य और उत्साह दोनों से भरा) और 'सिद्धि-असिद्धि में निर्विकार' (सफलता-असफलता में अविचलित)। 'धृति' और 'उत्साह' का मेल अद्भुत है — केवल उत्साह जल्दी ठण्डा पड़ जाता है, केवल धैर्य निष्क्रियता बन सकता है; दोनों मिलकर स्थायी सफलता देते हैं।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः। हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥
अन्वय
रागी, कर्मफलप्रेप्सुः, लुब्धः, हिंसात्मकः, अशुचिः, हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः।
हिन्दी अनुवाद
जो कर्ता आसक्ति से युक्त, कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाव वाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है — वह राजस कहा गया है।
भावार्थ
राजस कर्ता — 'रागी' (आसक्त), 'कर्मफलप्रेप्सु' (फल का इच्छुक), 'लुब्ध' (लोभी), 'हिंसात्मक' (दूसरों को कष्ट देने वाला — प्रतिस्पर्धा में दूसरों को कुचलने वाला), 'अशुचि' (अपवित्र आचरण वाला) और 'हर्षशोकान्वित' (सफलता में अति हर्षित, असफलता में अति दुःखी)। ऐसा व्यक्ति भावनाओं के झूले पर झूलता रहता है। आधुनिक व्यावसायिक संसार में यह स्वभाव बहुत आम है।
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः। विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥
अन्वय
अयुक्तः, प्राकृतः, स्तब्धः, शठः, नैष्कृतिकः, अलसः, विषादी, दीर्घसूत्री च कर्ता तामसः उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित, घमण्डी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री है — वह तामस कहा जाता है।
भावार्थ
तामस कर्ता — 'अयुक्त' (असंयमी, अव्यवस्थित), 'प्राकृत' (असंस्कृत, गँवार), 'स्तब्ध' (अकड़ा हुआ, अहंकारी), 'शठ' (धूर्त, धोखेबाज़), 'नैष्कृतिक' (दूसरों की आजीविका नष्ट करने वाला, या दूसरों का अपमान करने वाला), 'अलस' (आलसी), 'विषादी' (सदा उदास रहने वाला) और 'दीर्घसूत्री' (टालमटोल करने वाला — जो काम एक दिन में हो सकता है, उसे महीनों खींचने वाला)। 'दीर्घसूत्रता' — टालमटोल — एक बहुत सामान्य तामसिक दोष है।
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु। प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥ २९ ॥
अन्वय
(हे) धनञ्जय! बुद्धेः धृतेः च एव गुणतः त्रिविधं भेदम् अशेषेण पृथक्त्वेन प्रोच्यमानं शृणु।
हिन्दी अनुवाद
हे धनञ्जय! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णता से विभागपूर्वक कहा जाने वाला सुन।
भावार्थ
अब भगवान् 'बुद्धि' (निर्णय की शक्ति) और 'धृति' (धारण की शक्ति, धैर्य) के तीन प्रकार बतायेंगे। ये दोनों अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं — बुद्धि बताती है कि क्या सही है, और धृति उस पर टिके रहने की शक्ति देती है। सही निर्णय और उस पर दृढ़ता — दोनों मिलकर सफल जीवन बनाते हैं।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! या (बुद्धिः) प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च, कार्याकार्ये, भयाभये, बन्धं मोक्षं च वेत्ति, सा बुद्धिः सात्त्विकी।
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बन्धन और मोक्ष को यथार्थ जानती है — वह बुद्धि सात्त्विकी है।
भावार्थ
सात्त्विक बुद्धि — जो चार जोड़ों को सही-सही जानती है: 'प्रवृत्ति-निवृत्ति' (कब कर्म करना, कब रुकना), 'कार्य-अकार्य' (क्या करना, क्या नहीं), 'भय-अभय' (किससे डरना, किससे नहीं) और 'बन्ध-मोक्ष' (क्या बाँधता है, क्या मुक्त करता है)। यह विवेक की बुद्धि है। ऐसी बुद्धि वाला व्यक्ति जीवन के हर मोड़ पर सही निर्णय ले सकता है। यह बुद्धि साधना और शास्त्र-अध्ययन से विकसित होती है।
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! यया धर्मम् अधर्मं च, कार्यं च अकार्यम् एव च अयथावत् प्रजानाति, सा बुद्धिः राजसी।
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।
भावार्थ
राजस बुद्धि — जो धर्म-अधर्म और कर्तव्य-अकर्तव्य को 'अयथावत्' — ठीक-ठीक नहीं — जानती। यह पूरी तरह गलत नहीं, पर भ्रमित है। इच्छाओं और स्वार्थ के कारण उसका निर्णय धुँधला हो जाता है। जैसे कोई जानता तो है कि झूठ बोलना गलत है, पर स्वार्थ के लिये उसे उचित ठहरा लेता है। राजस बुद्धि सुविधा के अनुसार नियम बदलती है।
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता। सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! तमसा आवृता या (बुद्धिः) अधर्मं धर्मम् इति मन्यते, सर्वार्थान् च विपरीतान् (मन्यते), सा बुद्धिः तामसी।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी 'यह धर्म है' — ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य सम्पूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है।
भावार्थ
तामस बुद्धि — 'तमसा आवृता' (अन्धकार से ढकी), जो 'अधर्म को धर्म' मानती है और 'सब बातों को उल्टा' देखती है। यह सबसे खतरनाक बुद्धि है — जहाँ गलत को सही और सही को गलत माना जाता है। आतंकवादी हिंसा को धर्म मानता है, भ्रष्टाचारी रिश्वत को अपना अधिकार मानता है। ऐसी बुद्धि वाले व्यक्ति को समझाना भी कठिन है, क्योंकि उसकी सोचने की दिशा ही उल्टी है।
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! यया अव्यभिचारिण्या धृत्या योगेन मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः धारयते, सा धृतिः सात्त्विकी।
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारणशक्ति से मनुष्य ध्यानयोग के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है।
भावार्थ
सात्त्विक धृति — वह 'अव्यभिचारिणी' (अटल, न डगमगाने वाली) धारण-शक्ति, जो 'योग' के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को नियन्त्रित रखती है। यह आत्म-अनुशासन की शक्ति है — जो मन को भटकने नहीं देती, इन्द्रियों को विषयों में दौड़ने नहीं देती, और लक्ष्य पर स्थिर रखती है। यह धृति साधना से विकसित होती है और सब सफलताओं का आधार है।
यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ अर्जुन! यया धृत्या तु प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी (सन्) धर्मकामार्थान् धारयते, सा धृतिः राजसी।
हिन्दी अनुवाद
परन्तु हे पृथापुत्र अर्जुन! फल की इच्छा वाला मनुष्य जिस धारणशक्ति के द्वारा अत्यन्त आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारणशक्ति राजसी है।
भावार्थ
राजस धृति — जिससे व्यक्ति 'प्रसंग से' (आसक्ति से) और 'फलाकांक्षी' (फल की इच्छा से) होकर 'धर्म, अर्थ और काम' — तीन पुरुषार्थों — को धारण करता है। ध्यान दें कि मोक्ष (चौथा पुरुषार्थ) यहाँ नहीं है। राजसी व्यक्ति धर्म भी करता है, पर फल के लिये; धन भी कमाता है, पर भोग के लिये। उसकी दृढ़ता सांसारिक लक्ष्यों तक सीमित है। वह परिश्रमी और दृढ़ हो सकता है, पर उसका लक्ष्य सीमित है।
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! यया दुर्मेधाः स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदम् एव च न विमुञ्चति, सा धृतिः तामसी।
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! दुष्ट बुद्धि वाला मनुष्य जिस धारणशक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता और दुःख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता अर्थात् धारण किये रहता है — वह धारणशक्ति तामसी है।
भावार्थ
तामस धृति — वह हठ जिससे 'दुर्मेधा' (मूर्ख) व्यक्ति 'स्वप्न' (अधिक नींद, आलस्य), 'भय', 'शोक', 'विषाद' (उदासी) और 'मद' (नशा, उन्माद) को नहीं छोड़ता। यह नकारात्मक दृढ़ता है — बुरी आदतों से चिपके रहना। जैसे कोई जानता है कि नशा बुरा है, फिर भी उसे नहीं छोड़ता; या पुराने दुःख को बार-बार याद करके उदास रहता है। यह दृढ़ता नहीं, जड़ता है।
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ ३६ ॥
अन्वय
(हे) भरतर्षभ! इदानीं तु त्रिविधं सुखं मे शृणु, यत्र (साधकः) अभ्यासात् रमते, दुःखान्तं च निगच्छति।
हिन्दी अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अन्त को प्राप्त हो जाता है —
भावार्थ
अब भगवान् 'सुख' के तीन प्रकार बताते हैं — यह सबसे महत्वपूर्ण विषय है, क्योंकि हर प्राणी सुख ही चाहता है। सच्चा सुख वह है जिसमें व्यक्ति 'अभ्यास से' रमता है — अर्थात् जो तुरन्त नहीं, धीरे-धीरे अभ्यास से मिलता है — और जिससे 'दुःख का अन्त' होता है। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥
अन्वय
यत् तत् अग्रे विषम् इव, परिणामे अमृतोपमम्, आत्मबुद्धिप्रसादजं, तत् सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम्।
हिन्दी अनुवाद
जो ऐसा सुख है, वह आरम्भकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है; इसलिये वह परमात्म-विषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है।
भावार्थ
सात्त्विक सुख — 'अग्रे विषमिव' (आरम्भ में विष जैसा) पर 'परिणामे अमृतोपमम्' (अन्त में अमृत जैसा)। यह 'आत्मबुद्धिप्रसादज' — आत्मा और बुद्धि की निर्मलता से उत्पन्न — है। जैसे सुबह जल्दी उठना, व्यायाम करना, पढ़ाई करना, ध्यान करना — आरम्भ में कठिन लगता है, पर इसका परिणाम स्वास्थ्य, ज्ञान और शान्ति है। जैसे कड़वी दवा, जो रोग ठीक करती है। सच्चा सुख अनुशासन से मिलता है।
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्। परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥
अन्वय
यत् विषयेन्द्रियसंयोगात् (जायते), तत् अग्रे अमृतोपमं, परिणामे विषम् इव, तत् सुखं राजसं स्मृतम्।
हिन्दी अनुवाद
जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है, वह पहले भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य है; इसलिये वह सुख राजस कहा गया है।
भावार्थ
राजस सुख — सात्त्विक का ठीक उल्टा: 'अग्रे अमृतोपमम्' (आरम्भ में अमृत जैसा) पर 'परिणामे विषमिव' (अन्त में विष जैसा)। यह 'विषय और इन्द्रियों के संयोग' से उत्पन्न होता है। जैसे स्वादिष्ट पर अस्वास्थ्यकर भोजन, नशा, अत्यधिक मनोरंजन, अनैतिक भोग — तुरन्त सुख देते हैं, पर बाद में रोग, पछतावा और दुःख। आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति इसी राजस सुख पर आधारित है। बुद्धिमान् व्यक्ति परिणाम देखकर चुनाव करता है।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः। निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥
अन्वय
यत् सुखम् अग्रे च अनुबन्धे च आत्मनः मोहनं, निद्रालस्यप्रमादोत्थं, तत् तामसम् उदाहृतम्।
हिन्दी अनुवाद
जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है।
भावार्थ
तामस सुख — जो 'आरम्भ में भी और परिणाम में भी' आत्मा को 'मोहित' करता है — भ्रम में डालता है। यह 'निद्रा, आलस्य और प्रमाद' से उत्पन्न होता है। जैसे दिन भर सोते रहना, कुछ न करना, व्यर्थ समय बर्बाद करना, नशे में डूबे रहना। इसमें न आरम्भ में सच्चा सुख है, न अन्त में — केवल एक जड़ता का भ्रम। यह सबसे निम्न प्रकार का 'सुख' है, जो वास्तव में सुख नहीं, सुख का भ्रम है।
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥
अन्वय
पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः तत् सत्त्वं न अस्ति, यत् एभिः प्रकृतिजैः त्रिभिः गुणैः मुक्तं स्यात्।
हिन्दी अनुवाद
पृथ्वी में या आकाश में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो।
भावार्थ
भगवान् गुणों के विवेचन का निष्कर्ष देते हैं — पृथ्वी पर, स्वर्ग में, या देवताओं में भी कोई ऐसा प्राणी नहीं जो इन तीन गुणों से मुक्त हो। सारी सृष्टि गुणों से बनी है। देवता भी गुणों के प्रभाव में हैं। इसलिये गुणों को समझना और उनसे ऊपर उठना हर प्राणी के लिये आवश्यक है। केवल भगवान् और गुणातीत ज्ञानी ही इनसे परे हैं।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥
अन्वय
(हे) परन्तप! ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च कर्माणि स्वभावप्रभवैः गुणैः प्रविभक्तानि।
हिन्दी अनुवाद
हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किये गये हैं।
भावार्थ
अब भगवान् चार वर्णों के कर्मों का वर्णन करते हैं, और स्पष्ट करते हैं कि ये 'स्वभावप्रभव गुणों' — स्वभाव से उत्पन्न गुणों — के आधार पर विभाजित हैं, जन्म के आधार पर नहीं। यह चौथे अध्याय (4.13) की बात की पुष्टि है। समाज में हर व्यक्ति अपने स्वभाव और योग्यता के अनुसार योगदान देता है — कोई ज्ञान से, कोई रक्षा से, कोई व्यापार से, कोई सेवा से। सब मिलकर समाज को पूर्ण बनाते हैं।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ ४२ ॥
अन्वय
शमः, दमः, तपः, शौचं, क्षान्तिः, आर्जवम् एव च, ज्ञानं, विज्ञानम्, आस्तिक्यं (च) — (इदं) स्वभावजं ब्रह्मकर्म।
हिन्दी अनुवाद
अन्तःकरण का निग्रह करना, इन्द्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिये कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इन्द्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना — ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।
भावार्थ
ब्राह्मण के स्वाभाविक गुण-कर्म — 'शम' (मन की शान्ति), 'दम' (इन्द्रिय-संयम), 'तप', 'शौच' (पवित्रता), 'क्षान्ति' (क्षमा), 'आर्जव' (सरलता), 'ज्ञान', 'विज्ञान' (अनुभव) और 'आस्तिक्य' (ईश्वर और शास्त्र में श्रद्धा)। ध्यान दें — ये सब गुण हैं, अधिकार नहीं। जिसमें ये गुण हैं, वही सच्चा ब्राह्मण है, चाहे किसी भी कुल में जन्मा हो। ये सत्त्वगुण-प्रधान स्वभाव के लक्षण हैं।
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥
अन्वय
शौर्यं, तेजः, धृतिः, दाक्ष्यं, युद्धे च अपि अपलायनं, दानम्, ईश्वरभावः च — (इदं) स्वभावजं क्षात्रं कर्म।
हिन्दी अनुवाद
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव — ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।
भावार्थ
क्षत्रिय के स्वाभाविक गुण-कर्म — 'शौर्य' (वीरता), 'तेज' (प्रभाव), 'धृति' (धैर्य), 'दाक्ष्य' (कुशलता), 'युद्ध में अपलायन' (युद्ध से न भागना), 'दान' और 'ईश्वरभाव' (नेतृत्व, शासन करने की क्षमता)। अर्जुन क्षत्रिय हैं; ये गुण उनके स्वभाव में हैं। युद्ध से भागना उनके स्वभाव के विरुद्ध होता। ये रजोगुण-प्रधान, सत्त्व-युक्त स्वभाव के लक्षण हैं। आज के सन्दर्भ में — सैनिक, पुलिस, प्रशासक, नेता इस स्वभाव के हैं।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥
अन्वय
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं स्वभावजं वैश्यकर्म; परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्य अपि स्वभावजम्।
हिन्दी अनुवाद
खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार — ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं; तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है।
भावार्थ
वैश्य के स्वाभाविक कर्म — 'कृषि' (खेती), 'गौरक्ष्य' (पशुपालन) और 'वाणिज्य' (व्यापार); और शूद्र का स्वाभाविक कर्म — 'परिचर्या' (सेवा)। ध्यान देने योग्य है कि भगवान् किसी कर्म को ऊँचा या नीचा नहीं कहते — सब 'स्वभावज' (स्वाभाविक) हैं। सेवा का कर्म भी उतना ही पवित्र है जितना ज्ञान का। समाज में किसान, व्यापारी और सेवा करने वाले — सब अनिवार्य हैं। अगले श्लोक बताते हैं कि हर कर्म से सिद्धि मिल सकती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ ४५ ॥
अन्वय
स्वे स्वे कर्मणि अभिरतः नरः संसिद्धिं लभते; स्वकर्मनिरतः यथा सिद्धिं विन्दति, तत् शृणु।
हिन्दी अनुवाद
अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन।
भावार्थ
यह अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त है — 'स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः' — अपने-अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि पाता है। मुक्ति के लिये संन्यास लेना या कर्म बदलना आवश्यक नहीं। किसान खेती करते हुए, व्यापारी व्यापार करते हुए, सैनिक रक्षा करते हुए, और सेवक सेवा करते हुए — सब मुक्ति पा सकते हैं। कैसे? अगला श्लोक बताता है।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ ४६ ॥
अन्वय
यतः भूतानां प्रवृत्तिः, येन इदं सर्वं ततं, तं स्वकर्मणा अभ्यर्च्य मानवः सिद्धिं विन्दति।
हिन्दी अनुवाद
जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
भावार्थ
यह गीता के सबसे सुन्दर श्लोकों में से एक है — 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः' — अपने कर्म से भगवान् की पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है। जिस भगवान् से सब प्राणी उत्पन्न हुए और जो सबमें व्याप्त हैं, उनकी पूजा फूल और धूप से ही नहीं, अपने कर्तव्य-कर्म से भी होती है। किसान का हल चलाना, शिक्षक का पढ़ाना, डॉक्टर का इलाज करना, माँ का भोजन बनाना — सब पूजा है, यदि भगवान् को अर्पित हो। कर्म ही पूजा है।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥
अन्वय
स्वनुष्ठितात् परधर्मात् विगुणः स्वधर्मः श्रेयान्; स्वभावनियतं कर्म कुर्वन् (नरः) किल्बिषं न आप्नोति।
हिन्दी अनुवाद
अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है; क्योंकि स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता।
भावार्थ
यह श्लोक तीसरे अध्याय (3.35) की पुनरावृत्ति है — 'श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः' — दूसरे का धर्म अच्छी तरह निभाने से अपना धर्म, भले ही कमियों के साथ, श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करने से पाप नहीं लगता। जब कोई अपने स्वभाव के विपरीत कार्य करता है — केवल प्रतिष्ठा या धन के लिये — तो वह न उसमें सफल होता है, न सुखी। अपनी प्रकृति को पहचानो और उसके अनुसार कर्म करो।
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! सदोषम् अपि सहजं कर्म न त्यजेत्; हि सर्वारम्भाः धूमेन अग्निः इव दोषेण आवृताः।
हिन्दी अनुवाद
अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिये; क्योंकि धुएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं।
भावार्थ
भगवान् एक यथार्थवादी बात कहते हैं — कोई भी कर्म पूर्ण रूप से दोषरहित नहीं है। 'धूमेनाग्निरिवावृताः' — जैसे अग्नि के साथ धुआँ अवश्य होता है, वैसे ही हर कर्म में कुछ न कुछ दोष होता है। किसान के हल से कीड़े मरते हैं, व्यापारी को कभी-कभी कठोर होना पड़ता है, सैनिक को हिंसा करनी पड़ती है। इसलिये कमियों के कारण अपना 'सहज कर्म' — स्वाभाविक कर्तव्य — नहीं छोड़ना चाहिये। पूर्णता की प्रतीक्षा में कर्म न छोड़ो।
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥
अन्वय
सर्वत्र असक्तबुद्धिः जितात्मा विगतस्पृहः (नरः) संन्यासेन परमां नैष्कर्म्यसिद्धिम् अधिगच्छति।
हिन्दी अनुवाद
सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धि वाला, स्पृहारहित और जीते हुए अन्तःकरण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है।
भावार्थ
अब भगवान् ज्ञानमार्ग से सिद्धि की बात करते हैं — जो 'असक्तबुद्धि' (सब जगह अनासक्त बुद्धि वाला), 'जितात्मा' (मन को जीतने वाला) और 'विगतस्पृह' (इच्छाओं से मुक्त) है, वह 'संन्यास' — सच्चे त्याग — से 'परम नैष्कर्म्यसिद्धि' को प्राप्त होता है। 'नैष्कर्म्य' का अर्थ कर्म का अभाव नहीं, बल्कि कर्म करते हुए भी कर्म-बन्धन से मुक्ति है। यह कर्मयोग की पराकाष्ठा है।
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥ ५० ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! सिद्धिं प्राप्तः (नरः) यथा ब्रह्म आप्नोति, तथा, या ज्ञानस्य परा निष्ठा, (ताम्) समासेन एव मे निबोध।
हिन्दी अनुवाद
जो कि ज्ञानयोग की परा निष्ठा है, उस नैष्कर्म्य सिद्धि को जिस प्रकार से प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है, उस प्रकार को हे कुन्तीपुत्र! तू संक्षेप में ही मुझसे समझ।
भावार्थ
भगवान् बताने वाले हैं कि सिद्धि प्राप्त व्यक्ति ब्रह्म को कैसे प्राप्त करता है — यह 'ज्ञान की परा निष्ठा' — ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था — है। अगले कुछ श्लोकों (51–55) में भगवान् ब्रह्म-प्राप्ति की साधना का संक्षिप्त पर सम्पूर्ण वर्णन करेंगे, जो गीता के ध्यान, ज्ञान और भक्ति — तीनों मार्गों का सार है।
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च। शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥
अन्वय
विशुद्धया बुद्ध्या युक्तः, धृत्या आत्मानं नियम्य च, शब्दादीन् विषयान् त्यक्त्वा, रागद्वेषौ व्युदस्य च —
हिन्दी अनुवाद
विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हल्का, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग करके एकान्त और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्त्विक धारणशक्ति के द्वारा अन्तःकरण और इन्द्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके —
भावार्थ
ब्रह्म-प्राप्ति की साधना — 'विशुद्ध बुद्धि' (सात्त्विक, निर्मल बुद्धि), 'धृति से आत्म-संयम' (सात्त्विक धृति से मन और इन्द्रियों पर नियन्त्रण), 'शब्दादि विषयों का त्याग' (इन्द्रियों के भोगों में अनासक्ति) और 'राग-द्वेष का त्याग'। ये चारों मिलकर मन को शुद्ध और शान्त करते हैं। यह वाक्य अगले दो श्लोकों में जारी रहता है।
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥
अन्वय
विविक्तसेवी, लघ्वाशी, यतवाक्कायमानसः, नित्यं ध्यानयोगपरः, वैराग्यं समुपाश्रितः —
हिन्दी अनुवाद
एकान्त का सेवन करने वाला, अल्पाहारी, मन, वाणी और शरीर को वश में रखने वाला, निरन्तर ध्यानयोग के परायण और दृढ़ वैराग्य का भली-भाँति आश्रय लेने वाला —
भावार्थ
साधना जारी है — 'विविक्तसेवी' (एकान्त में रहने वाला), 'लघ्वाशी' (हल्का, कम भोजन करने वाला), 'यतवाक्कायमानस' (वाणी, शरीर और मन को संयमित रखने वाला), 'नित्य ध्यानयोगपर' (सदा ध्यान में लगा) और 'वैराग्य समुपाश्रित' (वैराग्य का आश्रय लेने वाला)। ये छठे अध्याय की ध्यान-साधना के ही सूत्र हैं। हल्का भोजन मन को हल्का और सजग रखता है; एकान्त ध्यान में सहायक है।
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्। विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥
अन्वय
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहं (च) विमुच्य निर्ममः शान्तः (पुरुषः) ब्रह्मभूयाय कल्पते।
हिन्दी अनुवाद
अहंकार, बल, घमण्ड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरन्तर ध्यानयोग के परायण रहने वाला, ममतारहित और शान्तियुक्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्न भाव से स्थित होने का पात्र होता है।
भावार्थ
और त्याग — 'अहंकार', 'बल' (बल का अभिमान), 'दर्प' (घमण्ड), 'काम', 'क्रोध' और 'परिग्रह' (संग्रह की प्रवृत्ति) — इन छह को छोड़कर, 'निर्मम' (ममता रहित) और 'शान्त' होकर व्यक्ति 'ब्रह्मभूय' — ब्रह्म होने — के योग्य बनता है। ये छह दोष सोलहवें अध्याय के आसुरी गुणों से मेल खाते हैं। आसुरी गुणों का त्याग ही ब्रह्म-प्राप्ति का द्वार है।
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥
अन्वय
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति, न काङ्क्षति; सर्वेषु भूतेषु समः (सन्) परां मद्भक्तिं लभते।
हिन्दी अनुवाद
फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मन वाला योगी न तो किसी के लिये शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है; ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला योगी मेरी पराभक्ति को प्राप्त हो जाता है।
भावार्थ
यह गीता का अत्यन्त महत्वपूर्ण श्लोक है। ब्रह्मभूत (ब्रह्म में स्थित) व्यक्ति 'प्रसन्नात्मा' (सदा प्रसन्न) होता है; वह 'न शोचति' (शोक नहीं करता) और 'न काङ्क्षति' (कामना नहीं करता); वह सब प्राणियों में सम होता है। और फिर — आश्चर्यजनक बात — वह 'परां मद्भक्तिं लभते' — भगवान् की परा भक्ति को प्राप्त होता है! अर्थात् ज्ञान की पराकाष्ठा के बाद भी भक्ति है। ब्रह्मज्ञान भक्ति का अन्त नहीं, बल्कि सर्वोच्च भक्ति का आरम्भ है। यह गीता का अद्भुत समन्वय है।
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥
अन्वय
(सः) भक्त्या माम् अभिजानाति — यावान् यः च अस्मि तत्त्वतः; ततः मां तत्त्वतः ज्ञात्वा तदनन्तरं विशते।
हिन्दी अनुवाद
उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्व से जान लेता है; तथा उस भक्ति से मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है।
भावार्थ
परा भक्ति का फल — 'भक्त्या मामभिजानाति' — भक्ति से वह भगवान् को जानता है — 'यावान्' (वे कितने हैं — उनकी अनन्तता) और 'यः' (वे कौन हैं — उनका स्वरूप) — 'तत्त्वतः' (यथार्थ रूप में)। और जानकर 'विशते' — उनमें प्रवेश कर जाता है, एक हो जाता है। ज्ञान से भक्ति, भक्ति से पूर्ण ज्ञान, और पूर्ण ज्ञान से भगवान् में प्रवेश — यह साधना का सम्पूर्ण चक्र है। भक्ति ही भगवान् को सचमुच जानने का साधन है।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥
अन्वय
मद्व्यपाश्रयः सर्वकर्माणि अपि सदा कुर्वाणः मत्प्रसादात् शाश्वतम् अव्ययं पदम् अवाप्नोति।
हिन्दी अनुवाद
मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो सम्पूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है।
भावार्थ
अब भक्तियुक्त कर्मयोग की बात — जो 'मद्व्यपाश्रय' (भगवान् का आश्रय लेने वाला) है, वह 'सर्वकर्माणि सदा कुर्वाणः' — सब कर्म सदा करते हुए भी — 'मत्प्रसादात्' — भगवान् की कृपा से — शाश्वत, अविनाशी पद को प्राप्त होता है। ध्यान दें — ज्ञानमार्ग में एकान्त, ध्यान, वैराग्य की आवश्यकता थी; भक्तियुक्त कर्मयोग में सब कर्म करते हुए भी, केवल भगवान् के आश्रय से, वही पद मिलता है। 'मत्प्रसादात्' — भगवान् की कृपा — यही भक्ति मार्ग की विशेषता है।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥
अन्वय
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः (सन्) बुद्धियोगम् उपाश्रित्य सततं मच्चित्तः भव।
हिन्दी अनुवाद
सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके तथा समबुद्धि रूप योग को अवलम्बन करके मेरे परायण और निरन्तर मुझमें चित्त वाला हो।
भावार्थ
भगवान् अर्जुन को सीधा निर्देश देते हैं — 'चेतसा' (मन से) सब कर्म भगवान् को अर्पित करो, 'मत्पर' (भगवान् को परम लक्ष्य मानो), 'बुद्धियोग' (समत्व बुद्धि) का आश्रय लो, और 'सततं मच्चित्तः भव' — निरन्तर भगवान् में चित्त लगाओ। यह पूरी गीता के उपदेश का व्यावहारिक सार है — कर्म करो, भगवान् को अर्पित करो, समता रखो, और मन भगवान् में लगाओ।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥ ५८ ॥
अन्वय
मच्चित्तः (त्वं) मत्प्रसादात् सर्वदुर्गाणि तरिष्यसि; अथ चेत् त्वम् अहङ्कारात् न श्रोष्यसि, (तर्हि) विनङ्क्ष्यसि।
हिन्दी अनुवाद
उपर्युक्त प्रकार से मुझमें चित्त वाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जायेगा; और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जायेगा अर्थात् परमार्थ से भ्रष्ट हो जायेगा।
भावार्थ
भगवान् दो विकल्प सामने रखते हैं — यदि भगवान् में चित्त लगाओगे, तो 'मत्प्रसादात् सर्वदुर्गाणि तरिष्यसि' — मेरी कृपा से सब कठिनाइयों को पार कर जाओगे। पर यदि 'अहंकार' के कारण मेरी बात नहीं सुनोगे, तो 'विनङ्क्ष्यसि' — नष्ट हो जाओगे। यह कठोर नहीं, बल्कि प्रेमपूर्ण चेतावनी है — जैसे माता-पिता बच्चे को आग के पास जाने से रोकते हैं। अहंकार ही सबसे बड़ा शत्रु है, जो भगवान् की कृपा को रोकता है।
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे। मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥
अन्वय
यत् अहङ्कारम् आश्रित्य 'न योत्स्ये' इति मन्यसे, ते एषः व्यवसायः मिथ्या; प्रकृतिः त्वां नियोक्ष्यति।
हिन्दी अनुवाद
जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा', तेरा यह निश्चय मिथ्या है; क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबरदस्ती युद्ध में लगा देगा।
भावार्थ
भगवान् अर्जुन के मूल निर्णय पर आते हैं — 'न योत्स्ये' (मैं युद्ध नहीं करूँगा) — यह अर्जुन ने पहले और दूसरे अध्याय में कहा था। भगवान् कहते हैं कि यह निर्णय 'अहंकार' से है और 'मिथ्या' है। क्योंकि 'प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति' — तुम्हारा क्षत्रिय स्वभाव तुम्हें युद्ध में खींच ही लेगा। जब अपमान होगा, जब अन्याय देखोगे, तो तुम्हारा स्वभाव तुम्हें चुप नहीं बैठने देगा। स्वभाव के विरुद्ध जाना सम्भव नहीं।
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा। कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! स्वेन स्वभावजेन कर्मणा निबद्धः (त्वं) मोहात् यत् कर्तुं न इच्छसि, तत् अवशः अपि करिष्यसि।
हिन्दी अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा।
भावार्थ
भगवान् और स्पष्ट करते हैं — अपने 'स्वभावज कर्म' से बँधे होने के कारण, जो काम तुम 'मोह' से नहीं करना चाहते, वह 'अवशः' — विवश होकर — भी करोगे। तो फिर क्यों न इसे स्वेच्छा से, सही भाव से, भगवान् को अर्पित करके करो? विवशता में किया गया कर्म बाँधता है; समर्पण में किया गया कर्म मुक्त करता है। यही चुनाव हमारे हाथ में है — कर्म तो होगा, पर किस भाव से?
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥
अन्वय
(हे) अर्जुन! ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे तिष्ठति, यन्त्रारूढानि सर्वभूतानि मायया भ्रामयन्।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! शरीर रूप यन्त्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है।
भावार्थ
यह अत्यन्त गहरा श्लोक है — 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति' — ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित है। और वह सब प्राणियों को, जो 'यन्त्रारूढ़' — शरीर रूपी यन्त्र पर सवार — हैं, अपनी माया से 'भ्रामयन्' — घुमा रहा है। जैसे कठपुतली का खेल — कठपुतलियाँ नाचती हैं, पर डोर कठपुतली-वाले के हाथ में है। यह समझ अहंकार को तोड़ती है और समर्पण का भाव जगाती है।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥
अन्वय
(हे) भारत! सर्वभावेन तम् एव शरणं गच्छ; तत्प्रसादात् परां शान्तिं शाश्वतं स्थानं (च) प्राप्स्यसि।
हिन्दी अनुवाद
हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शान्ति को तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।
भावार्थ
जब ईश्वर ही सबके हृदय में बैठकर सबको चला रहा है, तो उपाय क्या है? 'तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन' — सम्पूर्ण भाव से उसी की शरण में जाओ। 'तत्प्रसादात्' — उसकी कृपा से — 'परा शान्ति' और 'शाश्वत स्थान' मिलेगा। यह शरणागति का आह्वान है। कठपुतली यदि कठपुतली-वाले से प्रेम करे और उसकी इच्छा के अनुसार नाचे, तो नृत्य सुन्दर होता है। ईश्वर की इच्छा में अपनी इच्छा को मिला देना ही परम शान्ति है।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥
अन्वय
इति गुह्यात् गुह्यतरं ज्ञानं मया ते आख्यातम्; एतत् अशेषेण विमृश्य यथा इच्छसि तथा कुरु।
हिन्दी अनुवाद
इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुझसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भली-भाँति विचारकर, जैसे चाहता है वैसे ही कर।
भावार्थ
यह गीता का एक अत्यन्त विलक्षण श्लोक है। सारा उपदेश देने के बाद भगवान् कहते हैं — 'विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु' — इस पर पूरी तरह विचार करो, और फिर जैसा चाहो वैसा करो। भगवान् अर्जुन पर कोई निर्णय थोपते नहीं! वे मनुष्य की स्वतन्त्र इच्छा और विवेक का सम्मान करते हैं। सच्चा गुरु शिष्य को सोचने की स्वतन्त्रता देता है। यह गीता की महानता है — वह आदेश नहीं, ज्ञान देती है, और निर्णय व्यक्ति पर छोड़ती है।
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥
अन्वय
सर्वगुह्यतमं मे परमं वचः भूयः शृणु; (त्वं) मे दृढम् इष्टः असि इति ततः ते हितं वक्ष्यामि।
हिन्दी अनुवाद
सम्पूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा।
भावार्थ
पर भगवान् का प्रेम उन्हें चुप नहीं रहने देता। वे कहते हैं — 'एक और बात सुनो, जो सबसे गोपनीय है — सर्वगुह्यतम।' क्यों बता रहे हैं? 'इष्टोऽसि मे दृढम्' — क्योंकि तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो। गीता में 'गुह्य' (9वाँ अध्याय), 'गुह्यतर' (18.63) और अब 'सर्वगुह्यतम' — क्रमशः गहरे रहस्य। यह अन्तिम और सबसे गहरा रहस्य अगले दो श्लोकों में है, जिन्हें 'चरम श्लोक' कहा जाता है।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥
अन्वय
(त्वं) मन्मनाः भव, मद्भक्तः (भव), मद्याजी (भव), मां नमस्कुरु; (त्वं) माम् एव एष्यसि; ते सत्यं प्रतिजाने, (यतः त्वं) मे प्रियः असि।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! तू मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा — यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है।
भावार्थ
यह श्लोक नौवें अध्याय के अन्तिम श्लोक (9.34) की पुनरावृत्ति है, पर एक महत्वपूर्ण जोड़ के साथ — 'सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे' — मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो। चार सूत्र — मन भगवान् में, भक्ति, पूजा, और नमस्कार। और इनका फल — भगवान् की प्राप्ति, जिसकी भगवान् स्वयं प्रतिज्ञा करते हैं। भगवान् की प्रतिज्ञा कभी झूठी नहीं होती। यह हर भक्त के लिये सबसे बड़ा आश्वासन है।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥
अन्वय
सर्वधर्मान् परित्यज्य माम् एकं शरणं व्रज; अहं त्वा सर्वपापेभ्यः मोक्षयिष्यामि; मा शुचः।
हिन्दी अनुवाद
सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।
भावार्थ
यह गीता का 'चरम श्लोक' — सर्वोच्च और अन्तिम उपदेश — है। 'सर्वधर्मान्परित्यज्य' — सब धर्मों (कर्तव्यों, साधनों, उपायों) की चिन्ता छोड़कर; 'मामेकं शरणं व्रज' — केवल मेरी शरण में आ जाओ। 'अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि' — मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा; 'मा शुचः' — शोक मत करो। इसका अर्थ कर्तव्य छोड़ना नहीं, बल्कि यह भरोसा है कि सब साधनों के ऊपर भगवान् की कृपा है। जब मनुष्य अपने प्रयत्नों का अहंकार छोड़कर पूर्ण रूप से भगवान् पर निर्भर हो जाता है, तो भगवान् स्वयं उसका भार उठाते हैं। गीता का आरम्भ अर्जुन के शोक से हुआ था; अन्त 'मा शुचः' — शोक मत करो — से होता है।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥
अन्वय
इदं ते न अतपस्काय, न अभक्ताय कदाचन, न च अशुश्रूषवे वाच्यम्, न च यः माम् अभ्यसूयति (तस्मै वाच्यम्)।
हिन्दी अनुवाद
तुझे यह गीता रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिये, न भक्तिरहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिये; तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिये।
भावार्थ
भगवान् बताते हैं कि यह ज्ञान किसे नहीं देना चाहिये — 'अतपस्क' (जिसमें तप, संयम नहीं), 'अभक्त' (जिसमें भक्ति नहीं), 'अशुश्रूषु' (जो सुनना नहीं चाहता, जिसमें जिज्ञासा नहीं) और जो भगवान् में 'असूया' (दोष-दृष्टि, ईर्ष्या) रखता है। यह भेदभाव नहीं, बल्कि पात्रता का प्रश्न है — जैसे बीज उपजाऊ भूमि में ही बोया जाता है, पत्थर पर नहीं। अपात्र को दिया गया ज्ञान व्यर्थ जाता है या उसका दुरुपयोग होता है।
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥
अन्वय
यः मयि परां भक्तिं कृत्वा इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेषु अभिधास्यति, (सः) असंशयः माम् एव एष्यति।
हिन्दी अनुवाद
जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा — इसमें कोई सन्देह नहीं है।
भावार्थ
अब गीता-प्रचार का फल — जो भगवान् में परा भक्ति रखकर इस परम रहस्य को भगवान् के भक्तों में कहेगा (उन्हें समझायेगा), वह निःसन्देह भगवान् को प्राप्त होगा। गीता का ज्ञान बाँटना सबसे बड़ी सेवा है। जो दूसरों को इस प्रकाश तक पहुँचाता है, उसे स्वयं परम प्रकाश मिलता है। पर शर्त है — 'भक्तिं मयि परां कृत्वा' — स्वयं भक्ति से भरे हृदय से, और 'मद्भक्तेषु' — योग्य, जिज्ञासु लोगों में।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः। भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥
अन्वय
मनुष्येषु तस्मात् मे प्रियकृत्तमः कश्चित् न च (अस्ति); भुवि तस्मात् अन्यः मे प्रियतरः न च भविता।
हिन्दी अनुवाद
उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है; तथा पृथ्वी भर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं।
भावार्थ
भगवान् गीता का प्रचार करने वाले के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करते हैं — मनुष्यों में उससे बढ़कर भगवान् का प्रिय कार्य करने वाला कोई नहीं, और पृथ्वी पर उससे अधिक प्रिय कोई नहीं होगा। यह इसलिये कि गीता का ज्ञान लोगों को दुःख से मुक्ति दिलाता है — और दूसरों को दुःख से मुक्त करना भगवान् का सबसे प्रिय कार्य है। जो भगवान् का कार्य करता है, वह भगवान् का सबसे प्रिय होता है।
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः। ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥
अन्वय
यः च आवयोः इमं धर्म्यं संवादम् अध्येष्यते, तेन ज्ञानयज्ञेन अहम् इष्टः स्याम् इति मे मतिः।
हिन्दी अनुवाद
जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा — ऐसा मेरा मत है।
भावार्थ
जो प्रचार नहीं कर सकता, उसके लिये भी फल है — जो भगवान् और अर्जुन के इस 'धर्म्य संवाद' का 'अध्ययन' करेगा (पाठ करेगा, पढ़ेगा), उसके द्वारा भगवान् 'ज्ञानयज्ञ' से पूजित होंगे। गीता का पाठ स्वयं में एक यज्ञ है — ज्ञानयज्ञ, जिसे चौथे अध्याय में सबसे श्रेष्ठ यज्ञ बताया गया था। इसीलिये लाखों लोग प्रतिदिन गीता का पाठ करते हैं। पाठ करना भी पूजा है।
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥
अन्वय
यः नरः श्रद्धावान् अनसूयः च (सन्) शृणुयात् अपि, सः अपि मुक्तः (सन्) पुण्यकर्मणां शुभान् लोकान् प्राप्नुयात्।
हिन्दी अनुवाद
जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा।
भावार्थ
और जो पढ़ भी नहीं सकता, उसके लिये — जो 'श्रद्धावान्' और 'अनसूय' (दोष-दृष्टि रहित) होकर केवल 'सुनता' भी है, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्यात्माओं के शुभ लोकों को प्राप्त होता है। भगवान् की करुणा देखिये — प्रचार करने वाले, पढ़ने वाले और सुनने वाले — तीनों के लिये फल है। केवल श्रद्धा और दोष-दृष्टि का अभाव आवश्यक है। गीता का ज्ञान सबके लिये सुलभ है।
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा। कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥ ७२ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! कच्चित् त्वया एकाग्रेण चेतसा एतत् श्रुतम्? (हे) धनञ्जय! कच्चित् ते अज्ञानसम्मोहः प्रनष्टः?
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! क्या इस गीताशास्त्र को तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया? और हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?
भावार्थ
उपदेश के अन्त में भगवान् एक आदर्श गुरु की तरह पूछते हैं — 'क्या तुमने एकाग्र चित्त से सुना? क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हुआ?' भगवान् यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनका उपदेश सफल हुआ। अच्छा शिक्षक केवल पढ़ाता नहीं, यह भी देखता है कि विद्यार्थी ने समझा या नहीं। यह प्रश्न हर गीता-पाठक से भी है — क्या हमने एकाग्रता से पढ़ा? क्या हमारा मोह दूर हुआ?
१८.७३ अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — (हे) अच्युत! त्वत्प्रसादात् मोहः नष्टः, मया स्मृतिः लब्धा; (अहं) गतसन्देहः स्थितः अस्मि; तव वचनं करिष्ये।
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है; अब मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।
भावार्थ
अर्जुन का उत्तर गीता की सफलता का प्रमाण है — 'नष्टो मोहः' (मोह नष्ट हो गया), 'स्मृतिर्लब्धा' (स्मृति — अपने वास्तविक स्वरूप और कर्तव्य का बोध — मिल गई), 'त्वत्प्रसादात्' (आपकी कृपा से), 'स्थितोऽस्मि गतसन्देहः' (संशय रहित होकर स्थित हूँ), 'करिष्ये वचनं तव' (आपकी आज्ञा का पालन करूँगा)। पहले अध्याय में जो अर्जुन काँपते हुए, आँसू बहाते हुए धनुष छोड़ बैठे थे, वही अब दृढ़ और स्पष्ट हैं। यह मोह से ज्ञान, भय से साहस, और संशय से निश्चय की यात्रा है।
१८.७४ सञ्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः। संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥
अन्वय
सञ्जयः उवाच — इति अहं वासुदेवस्य महात्मनः पार्थस्य च इमम् अद्भुतं रोमहर्षणं संवादम् अश्रौषम्।
हिन्दी अनुवाद
सञ्जय बोले — इस प्रकार मैंने श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत रहस्ययुक्त, रोमांचकारक संवाद को सुना।
भावार्थ
अब सञ्जय, जो धृतराष्ट्र को यह सब सुना रहे थे, अपना अनुभव बताते हैं। उन्होंने वासुदेव और 'महात्मा' अर्जुन का यह 'अद्भुत' और 'रोमहर्षण' — रोमांचित करने वाला — संवाद सुना। सञ्जय अर्जुन को 'महात्मा' कहते हैं, क्योंकि जो भगवान् के ज्ञान का पात्र बना, वह सचमुच महान् आत्मा है। गीता का संवाद सुनकर सञ्जय के भी रोंगटे खड़े हो गये।
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्। योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५ ॥
अन्वय
व्यासप्रसादात् अहम् एतत् परं गुह्यं योगं साक्षात् स्वयं कथयतः योगेश्वरात् कृष्णात् श्रुतवान्।
हिन्दी अनुवाद
श्री व्यासजी की कृपा से दिव्य दृष्टि पाकर मैंने इस परम गोपनीय योग को अर्जुन के प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना है।
भावार्थ
सञ्जय कृतज्ञता से कहते हैं कि 'व्यासप्रसादात्' — महर्षि व्यास की कृपा से (जिन्होंने उन्हें दिव्य दृष्टि दी) — उन्होंने यह परम गोपनीय योग 'साक्षात्' — प्रत्यक्ष — स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुख से सुना। यह गुरु-कृपा का महत्व दर्शाता है। व्यास की कृपा के बिना सञ्जय यह नहीं सुन पाते; और व्यास की कृपा से ही यह गीता हम तक पहुँची। हमें भी गुरु-परम्परा के प्रति कृतज्ञ होना चाहिये।
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्। केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥
अन्वय
(हे) राजन्! केशवार्जुनयोः इमम् अद्भुतं पुण्यं संवादं संस्मृत्य संस्मृत्य (अहं) मुहुः मुहुः हृष्यामि च।
हिन्दी अनुवाद
हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस रहस्ययुक्त, कल्याणकारक और अद्भुत संवाद को पुनः-पुनः स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
भावार्थ
सञ्जय कहते हैं — 'संस्मृत्य संस्मृत्य' — बार-बार याद करके, 'हृष्यामि च मुहुर्मुहुः' — मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ। यह संवाद 'पुण्य' — पवित्र करने वाला — और 'अद्भुत' है। गीता एक बार पढ़ने की पुस्तक नहीं; इसे बार-बार स्मरण करने से हर बार नया आनन्द, नया अर्थ मिलता है। जितनी बार पढ़ो, उतनी गहराई मिलती है।
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७ ॥
अन्वय
(हे) राजन्! हरेः तत् च अत्यद्भुतं रूपं संस्मृत्य संस्मृत्य मे महान् विस्मयः (भवति), (अहं) पुनः पुनः हृष्यामि च।
हिन्दी अनुवाद
हे राजन्! श्रीहरि के उस अत्यन्त विलक्षण रूप को भी पुनः-पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान् आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ।
भावार्थ
सञ्जय विशेष रूप से भगवान् के 'अत्यद्भुत रूप' — विश्वरूप — को याद करते हैं, जो उन्होंने भी दिव्य दृष्टि से देखा था। उसे याद करके उन्हें 'महान् विस्मय' होता है और बार-बार हर्ष होता है। वाणी (संवाद) और रूप (दर्शन) — दोनों का स्मरण आनन्ददायक है। भगवान् की कथा सुनना और उनके रूप का ध्यान करना — दोनों भक्ति के अंग हैं।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥
अन्वय
यत्र योगेश्वरः कृष्णः, यत्र धनुर्धरः पार्थः, तत्र श्रीः, विजयः, भूतिः, ध्रुवा नीतिः (च अस्ति) — (इति) मम मतिः।
हिन्दी अनुवाद
हे राजन्! जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन है, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है — ऐसा मेरा मत है।
भावार्थ
गीता का अन्तिम श्लोक एक अमर सन्देश है — जहाँ 'योगेश्वर कृष्ण' (ईश्वरीय ज्ञान और कृपा) हैं और जहाँ 'धनुर्धर पार्थ' (मानवीय पुरुषार्थ और कर्म) है, वहाँ 'श्री' (समृद्धि), 'विजय', 'भूति' (ऐश्वर्य, उन्नति) और 'ध्रुव नीति' (अटल न्याय) निश्चित है। यह ईश्वर-कृपा और मानव-प्रयास के मेल का सूत्र है। केवल भगवान् पर निर्भर रहकर हाथ पर हाथ धरे बैठना पर्याप्त नहीं, और केवल अपने बल पर अहंकार करना भी नहीं। दोनों का मेल ही सफलता है। सञ्जय धृतराष्ट्र को यह संकेत भी दे रहे हैं कि पाण्डवों की विजय निश्चित है। यह अध्याय 'मोक्षसंन्यासयोग' कहलाता है, और इसी के साथ श्रीमद्भगवद्गीता का समापन होता है। ॐ तत्सत्।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यासयोगो नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥

ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।
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