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🪷 श्रीमद्भगवद्गीता

मूल श्लोक, अन्वय, सरल हिन्दी अनुवाद एवं विस्तृत भावार्थ सहित

अध्याय १७ — श्रद्धात्रयविभागयोग

२८ श्लोक · प्रत्येक पर अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ

📌 तीन प्रकार की श्रद्धा; सात्त्विक-राजस-तामस आहार, यज्ञ, तप और दान; ॐ तत्सत्।
१७.१ अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — (हे) कृष्ण! ये शास्त्रविधिम् उत्सृज्य श्रद्धया अन्विताः (सन्तः) यजन्ते, तेषां निष्ठा तु का? सत्त्वम् आहो रजः तमः?
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्रविधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त हुए देवादिकों का पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी?
भावार्थ
सत्रहवाँ अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' कहलाता है। सोलहवें अध्याय के अन्त में भगवान् ने कहा कि शास्त्रविधि छोड़कर मनमाना आचरण करने वाला सिद्धि नहीं पाता। अर्जुन एक सूक्ष्म प्रश्न पूछते हैं — उनका क्या, जो शास्त्र-विधि तो नहीं जानते, पर 'श्रद्धा' से पूजा करते हैं? साधारण लोग, जो शास्त्र नहीं पढ़ सकते, पर हृदय से श्रद्धा रखते हैं — उनकी निष्ठा सात्त्विक है, राजसी या तामसी? यह बहुत व्यावहारिक और करुणामय प्रश्न है।
१७.२ श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — देहिनां सा स्वभावजा श्रद्धा सात्त्विकी राजसी तामसी च एव इति त्रिविधा भवति; तां शृणु।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी — ऐसे तीनों प्रकार की ही होती है; उसको तू मुझसे सुन।
भावार्थ
भगवान् बताते हैं कि श्रद्धा 'स्वभावजा' — स्वभाव से उत्पन्न — होती है, और वह तीन प्रकार की है — सात्त्विक, राजस और तामस। अर्थात् श्रद्धा स्वयं में अच्छी या बुरी नहीं; उसका स्वरूप व्यक्ति के स्वभाव पर निर्भर करता है। जिसका स्वभाव सात्त्विक है, उसकी श्रद्धा भी सात्त्विक होगी। इसलिये केवल श्रद्धा होना पर्याप्त नहीं; श्रद्धा किसमें और कैसी है, यह महत्वपूर्ण है।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ ३ ॥
अन्वय
(हे) भारत! सर्वस्य श्रद्धा सत्त्वानुरूपा भवति; अयं पुरुषः श्रद्धामयः; यः यच्छ्रद्धः, सः एव सः।
हिन्दी अनुवाद
हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है।
भावार्थ
यह गीता का अत्यन्त गहरा श्लोक है — 'श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः' — मनुष्य श्रद्धामय है; जिसकी जैसी श्रद्धा, वह वैसा ही है। हम जिसमें विश्वास करते हैं, वही हम बन जाते हैं। जो धन में श्रद्धा रखता है, वह धन का दास बन जाता है; जो सत्य में श्रद्धा रखता है, वह सत्यनिष्ठ बनता है; जो भगवान् में श्रद्धा रखता है, वह भगवान् जैसा बनता है। हमारी श्रद्धा ही हमारी पहचान है। इसलिये श्रद्धा का सही चुनाव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय है।
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ ४ ॥
अन्वय
सात्त्विकाः देवान् यजन्ते, राजसाः यक्षरक्षांसि (यजन्ते), अन्ये तामसाः जनाः प्रेतान् भूतगणान् च यजन्ते।
हिन्दी अनुवाद
सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं।
भावार्थ
श्रद्धा की पहचान का एक तरीका — उपासना का पात्र। सात्त्विक लोग 'देवताओं' (प्रकाश, ज्ञान और कल्याण की शक्तियों) की पूजा करते हैं; राजस लोग 'यक्ष-राक्षसों' (धन और शक्ति के प्रतीक) की; और तामस लोग 'प्रेत-भूतों' (अन्धकार और भय की शक्तियों) की। हम जिसकी उपासना करते हैं, वह हमारे स्वभाव को प्रकट करता है। आधुनिक सन्दर्भ में — कोई ज्ञान और सेवा को पूजता है, कोई धन और सत्ता को, और कोई नशे और अन्धविश्वास को।
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः। दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥
अन्वय
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ये जनाः अशास्त्रविहितं घोरं तपः तप्यन्ते —
हिन्दी अनुवाद
जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल मन-कल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं —
भावार्थ
भगवान् एक प्रकार के गलत तप की चर्चा करते हैं — 'अशास्त्रविहित घोर तप' — शास्त्र के विरुद्ध, भयंकर तपस्या, जैसे शरीर को अत्यधिक कष्ट देना, कीलों पर लेटना, लम्बे समय तक भूखे रहना। ऐसे तप करने वाले 'दम्भ' और 'अहंकार' से युक्त होते हैं, और 'काम, राग और बल' के अभिमान से प्रेरित होते हैं। उनका उद्देश्य आत्म-शुद्धि नहीं, बल्कि दिखावा, प्रसिद्धि या शक्ति पाना होता है। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥
अन्वय
(ते) अचेतसः शरीरस्थं भूतग्रामं, अन्तःशरीरस्थं मां च एव कर्षयन्तः (सन्ति); तान् आसुरनिश्चयान् विद्धि।
हिन्दी अनुवाद
जो शरीर रूप से स्थित भूत-समुदाय को और अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं, उन अज्ञानियों को तू आसुर-स्वभाव वाले जान।
भावार्थ
ऐसे तपस्वी 'अचेतस' — विवेकहीन — होते हैं; वे शरीर में स्थित 'भूतग्राम' (पंचभूतों से बना शरीर) को और शरीर के भीतर स्थित भगवान् को भी 'कर्षयन्तः' — कष्ट देते हैं। शरीर भगवान् का मन्दिर है; उसे व्यर्थ कष्ट देना भगवान् को कष्ट देना है। भगवान् ऐसे लोगों को 'आसुरनिश्चय' — आसुरी निश्चय वाले — कहते हैं। गीता अति-तपस्या का समर्थन नहीं करती; छठे अध्याय में भी संतुलित जीवन (युक्ताहारविहार) पर बल दिया गया था।
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥ ७ ॥
अन्वय
सर्वस्य प्रियः आहारः अपि तु त्रिविधः भवति; तथा यज्ञः तपः दानं (च त्रिविधम्); तेषाम् इमं भेदं शृणु।
हिन्दी अनुवाद
भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस पृथक्-पृथक् भेद को तू मुझसे सुन।
भावार्थ
अब भगवान् बताते हैं कि गुणों के अनुसार चार चीज़ें तीन-तीन प्रकार की होती हैं — 'आहार' (भोजन), 'यज्ञ', 'तप' और 'दान'। भोजन को पहले रखा गया है, क्योंकि 'जैसा अन्न, वैसा मन' — भोजन का हमारे स्वभाव पर गहरा प्रभाव पड़ता है। और व्यक्ति को जो भोजन 'प्रिय' लगता है, वह उसके स्वभाव का संकेत है। यह भारतीय आहार-विज्ञान का आधार है।
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः। रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥ ८ ॥
अन्वय
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः रस्याः स्निग्धाः स्थिराः हृद्याः आहाराः सात्त्विकप्रियाः।
हिन्दी अनुवाद
आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय — ऐसे आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।
भावार्थ
सात्त्विक भोजन के लक्षण — यह 'आयु' (दीर्घायु), 'सत्त्व' (बुद्धि की शुद्धता), 'बल', 'आरोग्य', 'सुख' और 'प्रीति' (प्रसन्नता) को बढ़ाता है। यह 'रस्य' (रसीला, स्वादिष्ट), 'स्निग्ध' (उचित मात्रा में घी-तेल युक्त), 'स्थिर' (जिसका प्रभाव देर तक रहे, पौष्टिक) और 'हृद्य' (हृदय को प्रिय, देखने में सुन्दर) होता है। फल, सब्ज़ियाँ, अनाज, दूध, मेवे — ये सात्त्विक भोजन के उदाहरण हैं। आधुनिक पोषण-विज्ञान भी ऐसे ही संतुलित, ताज़े भोजन की सलाह देता है।
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः। आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥
अन्वय
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः दुःखशोकामयप्रदाः आहाराः राजसस्य इष्टाः।
हिन्दी अनुवाद
कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।
भावार्थ
राजस भोजन के लक्षण — 'कटु' (कड़वा), 'अम्ल' (बहुत खट्टा), 'लवण' (बहुत नमकीन), 'अत्युष्ण' (बहुत गर्म), 'तीक्ष्ण' (बहुत तीखा, मिर्च-मसालेदार), 'रूक्ष' (रूखा) और 'विदाही' (जलन पैदा करने वाला)। ऐसा भोजन 'दुःख, शोक और रोग' देता है। ध्यान दें — इन स्वादों में कोई बुराई नहीं, समस्या 'अति' की है। अत्यधिक मसालेदार, नमकीन, तला हुआ भोजन उत्तेजना, बेचैनी और रोग बढ़ाता है — जो रजोगुण के लक्षण हैं।
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥
अन्वय
यत् यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च, उच्छिष्टम् अपि च अमेध्यं भोजनं (तत्) तामसप्रियम्।
हिन्दी अनुवाद
जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है।
भावार्थ
तामस भोजन के लक्षण — 'यातयाम' (बहुत पहले पका हुआ, ठण्डा), 'गतरस' (जिसका रस निकल गया हो), 'पूति' (दुर्गन्धयुक्त, सड़ा), 'पर्युषित' (बासी), 'उच्छिष्ट' (जूठा) और 'अमेध्य' (अपवित्र — जैसे मांस, मदिरा)। ऐसा भोजन जड़ता, आलस्य और अज्ञान बढ़ाता है। आज के सन्दर्भ में — बहुत पुराना, अति-प्रसंस्कृत, रासायनिक, बासी भोजन तामसिक है। भोजन का हमारे शरीर ही नहीं, मन पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है।
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥
अन्वय
अफलाकाङ्क्षिभिः 'यष्टव्यम् एव' इति मनः समाधाय यः विधिदृष्टः यज्ञः इज्यते, सः सात्त्विकः।
हिन्दी अनुवाद
जो शास्त्रविधि से नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है — इस प्रकार मन को समाधान करके, फल न चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है।
भावार्थ
सात्त्विक यज्ञ के तीन लक्षण — 'अफलाकांक्षी' (फल की इच्छा के बिना), 'विधिदृष्ट' (शास्त्र-विधि के अनुसार) और 'यष्टव्यमेव' (यह करना ही कर्तव्य है — इस भाव से)। यहाँ 'यज्ञ' का अर्थ केवल अग्नि में आहुति नहीं, बल्कि कोई भी धार्मिक या परोपकारी कार्य है। जब हम कर्तव्य समझकर, बिना किसी प्रतिफल की आशा के, सही विधि से कोई शुभ कार्य करते हैं, तो वह सात्त्विक यज्ञ है।
अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥
अन्वय
तु (हे) भरतश्रेष्ठ! फलम् अभिसन्धाय दम्भार्थम् अपि च एव यत् इज्यते, तं यज्ञं राजसं विद्धि।
हिन्दी अनुवाद
परन्तु हे अर्जुन! केवल दम्भाचरण के लिये अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान।
भावार्थ
राजस यज्ञ — जो 'फलमभिसन्धाय' (फल को लक्ष्य करके) या 'दम्भार्थम्' (दिखावे के लिये) किया जाता है। जैसे कोई बड़ा धार्मिक आयोजन करे — मीडिया में प्रचार के लिये, या राजनीतिक लाभ के लिये, या व्यापार में वृद्धि की कामना से। कर्म बाहर से एक जैसा हो सकता है, पर भाव से वह सात्त्विक या राजस बनता है। ईश्वर कर्म नहीं, भाव देखते हैं।
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥
अन्वय
विधिहीनम्, असृष्टान्नं, मन्त्रहीनम्, अदक्षिणं, श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।
हिन्दी अनुवाद
शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किये जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।
भावार्थ
तामस यज्ञ के पाँच लक्षण — 'विधिहीन' (बिना सही विधि के), 'असृष्टान्न' (जिसमें अन्नदान न हो), 'मन्त्रहीन' (बिना मन्त्रों के), 'अदक्षिण' (बिना दक्षिणा के — कार्य करने वालों को उचित पारिश्रमिक न देना) और 'श्रद्धाविरहित' (बिना श्रद्धा के)। ऐसा यज्ञ केवल औपचारिकता या अन्धविश्वास से किया जाता है। 'अदक्षिण' विशेष ध्यान देने योग्य है — जो लोग सेवा करते हैं, उन्हें उचित प्रतिफल न देना तामसिक है।
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥
अन्वय
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं, शौचम्, आर्जवं, ब्रह्मचर्यम्, अहिंसा च शारीरं तपः उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा — यह शरीर-सम्बन्धी तप कहा जाता है।
भावार्थ
अब भगवान् तप के तीन प्रकार बताते हैं — शारीरिक, वाचिक और मानसिक। 'शारीरिक तप' — देवताओं, ब्राह्मणों (ज्ञानियों), गुरुओं और प्राज्ञों (बुद्धिमानों) का सम्मान; 'शौच' (शरीर की स्वच्छता); 'आर्जव' (व्यवहार में सरलता); 'ब्रह्मचर्य' (इन्द्रिय-संयम) और 'अहिंसा'। ध्यान दें — यहाँ तप का अर्थ शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि शरीर से सद्गुणों का आचरण करना है। यह सकारात्मक तप है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥
अन्वय
यत् अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियहितं च वाक्यं, स्वाध्यायाभ्यसनं च एव — (तत्) वाङ्मयं तपः उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है — वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।
भावार्थ
वाणी का तप — यह गीता का अत्यन्त व्यावहारिक श्लोक है। ऐसे वचन बोलना जो 'अनुद्वेगकर' (किसी को व्याकुल न करें), 'सत्य', 'प्रिय' (मधुर) और 'हित' (कल्याणकारी) हों। चारों गुण एक साथ होने चाहिये — सत्य पर कटु नहीं, प्रिय पर असत्य नहीं, और सबसे बढ़कर हितकारी। साथ ही 'स्वाध्याय' (शास्त्रों का पाठ, नाम-जप)। मनुस्मृति भी कहती है — 'सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्'। वाणी का संयम सबसे कठिन और सबसे प्रभावी तप है।
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥
अन्वय
मनःप्रसादः, सौम्यत्वं, मौनम्, आत्मविनिग्रहः, भावसंशुद्धिः — इति एतत् मानसं तपः उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भली-भाँति पवित्रता — इस प्रकार यह मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है।
भावार्थ
मन का तप — 'मनःप्रसाद' (मन की प्रसन्नता, निर्मलता), 'सौम्यत्व' (सौम्यता, कोमल स्वभाव), 'मौन' (मन का मौन, अनावश्यक विचारों का अभाव), 'आत्मविनिग्रह' (आत्म-संयम) और 'भावसंशुद्धि' (भावनाओं की शुद्धता)। यह सबसे सूक्ष्म तप है। प्रसन्न रहना भी तप है! क्योंकि परिस्थितियों के बावजूद मन को प्रसन्न रखना साधना माँगता है। शरीर, वाणी और मन — तीनों का तप मिलकर सम्पूर्ण व्यक्तित्व को शुद्ध करता है।
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः। अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥
अन्वय
अफलाकाङ्क्षिभिः युक्तैः नरैः परया श्रद्धया तप्तं तत् त्रिविधं तपः सात्त्विकं परिचक्षते।
हिन्दी अनुवाद
फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किये हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्त्विक कहते हैं।
भावार्थ
यह त्रिविध तप (शरीर, वाणी, मन का) जब 'अफलाकांक्षी' (फल की इच्छा रहित) 'युक्त' (योगी, समत्व में स्थित) लोगों द्वारा 'परम श्रद्धा' से किया जाता है, तो वह सात्त्विक है। फिर से वही सूत्र — कर्म की श्रेष्ठता उसके भाव पर निर्भर है। जब तप किसी लाभ के लिये नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि और भगवान् की प्रसन्नता के लिये हो, तो वह सात्त्विक है।
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्। क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८ ॥
अन्वय
यत् तपः सत्कारमानपूजार्थं दम्भेन च एव क्रियते, तत् इह चलम् अध्रुवं राजसं प्रोक्तम्।
हिन्दी अनुवाद
जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिये तथा अन्य किसी स्वार्थ के लिये भी स्वभाव से या पाखण्ड से किया जाता है, वह अनिश्चित एवं क्षणिक फल वाला तप यहाँ राजस कहा गया है।
भावार्थ
राजस तप — जो 'सत्कार' (सम्मान), 'मान' (प्रतिष्ठा) और 'पूजा' (लोगों द्वारा पूजे जाने) के लिये, या 'दम्भ' (दिखावे) से किया जाता है। ऐसा तप 'चल' (अस्थिर) और 'अध्रुव' (क्षणिक) है — उसका फल टिकता नहीं। जैसे कोई व्रत या उपवास इसलिये करे कि लोग उसे धार्मिक समझें। जब तप का उद्देश्य प्रशंसा पाना हो, तो प्रशंसा मिलते ही उसका फल समाप्त हो जाता है।
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥
अन्वय
यत् तपः मूढग्राहेण आत्मनः पीडया, परस्य उत्सादनार्थं वा क्रियते, तत् तामसम् उदाहृतम्।
हिन्दी अनुवाद
जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिये किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है।
भावार्थ
तामस तप — जो 'मूढग्राह' (मूर्खतापूर्ण हठ) से, 'आत्मनः पीडया' (अपने को कष्ट देकर) या 'परस्य उत्सादनार्थम्' (दूसरे का विनाश करने के लिये) किया जाता है। उदाहरण — किसी शत्रु को हानि पहुँचाने के लिये तान्त्रिक अनुष्ठान, या हठपूर्वक भूख हड़ताल करके किसी को बाध्य करना। ऐसा तप अन्धकार और विनाश लाता है। तप की शक्ति का दुरुपयोग सबसे निकृष्ट है।
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ॥
अन्वय
'दातव्यम्' इति यत् दानं देशे काले पात्रे च अनुपकारिणे दीयते, तत् दानं सात्त्विकं स्मृतम्।
हिन्दी अनुवाद
दान देना ही कर्तव्य है — ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल और पात्र के प्राप्त होने पर उपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।
भावार्थ
सात्त्विक दान के लक्षण — 'दातव्यम्' (देना कर्तव्य है — इस भाव से), 'अनुपकारिणे' (जिससे बदले में कोई उपकार की आशा न हो), और 'देश, काल, पात्र' का विचार करके — सही स्थान पर, सही समय पर, सही व्यक्ति को। 'पात्र' का विचार बहुत महत्वपूर्ण है — दान उसे मिले जिसे सचमुच आवश्यकता है और जो उसका सदुपयोग करेगा। अन्धाधुन्ध दान भी उचित नहीं। सही दान विवेक और करुणा दोनों माँगता है।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥
अन्वय
यत् तु प्रत्युपकारार्थं, फलम् उद्दिश्य वा पुनः, परिक्लिष्टं च दीयते, तत् दानं राजसं स्मृतम्।
हिन्दी अनुवाद
और जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को दृष्टि में रखकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।
भावार्थ
राजस दान — जो 'प्रत्युपकारार्थ' (बदले में कुछ पाने के लिये), 'फलमुद्दिश्य' (किसी फल की आशा से — जैसे पुण्य, स्वर्ग, प्रसिद्धि) या 'परिक्लिष्ट' (अनिच्छा से, कष्टपूर्वक, मन मारकर) दिया जाता है। जैसे कोई दान दे और उसका प्रचार करवाये, या इस आशा से दे कि बदले में व्यापार में लाभ होगा। ऐसे दान में स्वार्थ छिपा है, इसलिये उसका पूर्ण फल नहीं मिलता।
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते। असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
अन्वय
यत् दानम् अदेशकाले अपात्रेभ्यः च असत्कृतम् अवज्ञातं दीयते, तत् तामसम् उदाहृतम्।
हिन्दी अनुवाद
जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-काल में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।
भावार्थ
तामस दान — जो 'अदेशकाल' (गलत स्थान और समय पर), 'अपात्र' (अयोग्य व्यक्ति — जो उसका दुरुपयोग करे) को, 'असत्कृत' (बिना सम्मान के) और 'अवज्ञात' (तिरस्कार के साथ) दिया जाता है। जैसे किसी भिखारी को अपमानित करके फेंककर पैसे देना, या किसी नशेड़ी को पैसे देना जो उससे नशा करेगा। दान में देने वाले का भाव और लेने वाले का सम्मान दोनों महत्वपूर्ण हैं। अपमान के साथ दिया गया दान दान नहीं, अपराध है।
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥
अन्वय
'ॐ तत् सत्' इति ब्रह्मणः त्रिविधः निर्देशः स्मृतः; तेन पुरा ब्राह्मणाः वेदाः च यज्ञाः च विहिताः।
हिन्दी अनुवाद
ॐ, तत्, सत् — ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का नाम कहा है; उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गये।
भावार्थ
अब भगवान् ब्रह्म के तीन नाम बताते हैं — 'ॐ', 'तत्' और 'सत्'। इन्हीं से सृष्टि के आरम्भ में ब्राह्मण (ज्ञानी), वेद और यज्ञ रचे गये। ये तीन शब्द हर शुभ कर्म को पवित्र और पूर्ण करने वाले हैं। सात्त्विक, राजस, तामस — किसी भी कर्म में जो कमी रह जाये, वह इन नामों के स्मरण से पूरी होती है। इसीलिये भारतीय परम्परा में हर कार्य 'ॐ' से आरम्भ और 'ॐ तत्सत्' से समाप्त होता है।
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः। प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥
अन्वय
तस्मात् ब्रह्मवादिनां विधानोक्ताः यज्ञदानतपःक्रियाः सततम् 'ओम्' इति उदाहृत्य प्रवर्तन्ते।
हिन्दी अनुवाद
इसलिये वेद-मन्त्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्रविधि से नियत यज्ञ, दान और तप रूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस परमात्मा के नाम को उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं।
भावार्थ
'ॐ' का प्रयोग — ब्रह्मवादी (वेद के ज्ञाता) यज्ञ, दान और तप की सब क्रियाएँ 'ॐ' का उच्चारण करके आरम्भ करते हैं। 'ॐ' परमात्मा का सबसे पवित्र नाम है; उससे आरम्भ करने का अर्थ है कि कार्य भगवान् को समर्पित करके शुरू किया जा रहा है। जैसे कोई यात्रा आरम्भ करने से पहले भगवान् का स्मरण करे। यह हर कार्य को आध्यात्मिक बना देता है।
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥ २५ ॥
अन्वय
मोक्षकाङ्क्षिभिः 'तत्' इति (उच्चार्य) फलम् अनभिसन्धाय विविधाः यज्ञतपःक्रियाः दानक्रियाः च क्रियन्ते।
हिन्दी अनुवाद
'तत्' अर्थात् 'तत्' नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है — इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार के यज्ञ, तप रूप क्रियाएँ तथा दान रूप क्रियाएँ कल्याण की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं।
भावार्थ
'तत्' का प्रयोग — 'तत्' का अर्थ है 'वह' — परमात्मा। मोक्ष चाहने वाले 'तत्' का स्मरण करके, 'फलमनभिसन्धाय' — फल की इच्छा छोड़कर — यज्ञ, तप और दान करते हैं। 'तत्' कहने का भाव है — 'यह सब उसका है, मेरा नहीं; मैं केवल माध्यम हूँ।' यह निष्काम कर्म का सार है। जब हम कहते हैं 'तत्', तो कर्म और उसका फल दोनों भगवान् को अर्पित हो जाते हैं।
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते। प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! सद्भावे साधुभावे च 'सत्' इति एतत् प्रयुज्यते; तथा प्रशस्ते कर्मणि सच्छब्दः युज्यते।
हिन्दी अनुवाद
'सत्' — इस प्रकार यह परमात्मा का नाम सत्यभाव में और श्रेष्ठभाव में प्रयोग किया जाता है, तथा हे पार्थ! उत्तम कर्म में भी 'सत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है।
भावार्थ
'सत्' का प्रयोग — 'सत्' शब्द तीन अर्थों में प्रयुक्त होता है: 'सद्भाव' (अस्तित्व, सत्यता — जो सचमुच है), 'साधुभाव' (श्रेष्ठता, अच्छाई) और 'प्रशस्त कर्म' (उत्तम कार्य)। इसीलिये हम 'सत्य', 'सज्जन', 'सत्कर्म', 'सत्संग' जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। परमात्मा 'सत्' है — एकमात्र वास्तविक सत्ता; और जो कुछ अच्छा और सच्चा है, वह उसी का प्रतिबिम्ब है।
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते। कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥ २७ ॥
अन्वय
यज्ञे तपसि दाने च (या) स्थितिः, (सा) च 'सत्' इति उच्यते; तदर्थीयं कर्म च एव 'सत्' इति एव अभिधीयते।
हिन्दी अनुवाद
तथा यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, वह भी 'सत्' — इस प्रकार कही जाती है और उस परमात्मा के लिये किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक 'सत्' — ऐसे कहा जाता है।
भावार्थ
यज्ञ, तप और दान में 'स्थिति' — दृढ़ निष्ठा — को भी 'सत्' कहते हैं। और 'तदर्थीय कर्म' — भगवान् के लिये किया गया कोई भी कर्म — 'सत्' कहलाता है। इसका अर्थ है कि साधारण से साधारण कर्म भी, यदि भगवान् के लिये किया जाये, तो 'सत्' — पवित्र और सार्थक — बन जाता है। झाड़ू लगाना भी, यदि भगवान् की सेवा के भाव से हो, तो सत्कर्म है।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ २८ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! अश्रद्धया यत् हुतं, दत्तं, तपः तप्तं, कृतं च, (तत्) 'असत्' इति उच्यते; तत् न च प्रेत्य, नो इह (फलति)।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है — वह समस्त 'असत्' — इस प्रकार कहा जाता है; इसलिये वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही।
भावार्थ
सत्रहवें अध्याय का समापन श्रद्धा के महत्व से होता है — जो कुछ भी 'अश्रद्धया' — बिना श्रद्धा के — किया जाये, चाहे हवन हो, दान हो, तप हो या कोई और शुभ कर्म, वह 'असत्' है — व्यर्थ है। वह न इस लोक में फल देता है, न परलोक में। श्रद्धा ही कर्म का प्राण है। बिना श्रद्धा के किया गया कर्म बिना आत्मा के शरीर जैसा है। इस अध्याय का आरम्भ भी श्रद्धा से हुआ और अन्त भी श्रद्धा से। यह अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' कहलाता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥

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