🕉️ 27 October 2026, Tuesday · 03:45:48 PM · CDSHARMA.IN

🪷 श्रीमद्भगवद्गीता

मूल श्लोक, अन्वय, सरल हिन्दी अनुवाद एवं विस्तृत भावार्थ सहित

अध्याय ४ — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

४२ श्लोक · प्रत्येक पर अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ

📌 योग की परम्परा, अवतार-तत्त्व (यदा यदा हि धर्मस्य), कर्म-अकर्म-विकर्म, यज्ञ के प्रकार और ज्ञान की महिमा।
४.१ श्रीभगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥ १ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — अहम् इमम् अव्ययं योगं विवस्वते प्रोक्तवान्; विवस्वान् मनवे प्राह; मनुः इक्ष्वाकवे अब्रवीत्।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य (विवस्वान्) से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा।
भावार्थ
चौथे अध्याय का आरम्भ इस योग की प्राचीन परम्परा से होता है। भगवान् बताते हैं कि यह ज्ञान नया नहीं, सृष्टि के आरम्भ से चला आ रहा है — पहले सूर्य को, फिर मनु को, फिर इक्ष्वाकु को दिया गया। इक्ष्वाकु सूर्यवंश के आदि राजा थे, जिसमें आगे भगवान् राम का जन्म हुआ। इस परम्परा का उल्लेख यह बताता है कि यह ज्ञान 'अव्यय' — अविनाशी, सनातन — है। राजाओं को यह ज्ञान इसलिये दिया गया कि वे प्रजा का धर्मपूर्वक पालन कर सकें। ज्ञान की शुद्धता गुरु-शिष्य परम्परा से सुरक्षित रहती है।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ २ ॥
अन्वय
(हे) परन्तप! एवं परम्पराप्राप्तम् इमं राजर्षयः विदुः; सः योगः इह महता कालेन नष्टः।
हिन्दी अनुवाद
हे परन्तप! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना; किन्तु वह योग बहुत समय बीत जाने के कारण इस पृथ्वी लोक में लुप्त-प्राय हो गया।
भावार्थ
यह योग 'राजर्षियों' — राजा होते हुए भी ऋषि-तुल्य ज्ञानी — के बीच परम्परा से चला। जनक, अश्वपति जैसे राजर्षि इसके उदाहरण हैं। परन्तु समय के साथ यह परम्परा टूट गई और योग 'नष्ट' — लुप्त-प्राय — हो गया। ज्ञान तभी जीवित रहता है जब उसे योग्य पात्र मिलते रहें; जब लोग भोग-विलास में डूब जाते हैं और ज्ञान की जिज्ञासा नहीं रहती, तो वह धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है। इसीलिये समय-समय पर भगवान् या महापुरुष उसे पुनः प्रकट करते हैं।
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः। भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३ ॥
अन्वय
सः एव अयं पुरातनः योगः अद्य मया ते प्रोक्तः, (यतः त्वं) मे भक्तः सखा च असि इति; हि एतत् उत्तमं रहस्यम्।
हिन्दी अनुवाद
वही यह पुरातन योग आज मैंने तुमसे कहा है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और प्रिय सखा हो; यह योग बड़ा ही उत्तम और रहस्य की बात है।
भावार्थ
भगवान् बताते हैं कि अर्जुन को यह ज्ञान क्यों दिया जा रहा है — क्योंकि वे 'भक्त' और 'सखा' हैं। ज्ञान का पात्र वही है जिसके हृदय में भक्ति और प्रेम हो। केवल बुद्धि से यह रहस्य समझ में नहीं आता; उसके लिये श्रद्धा और आत्मीयता चाहिये। 'रहस्यम् उत्तमम्' — यह परम गोपनीय ज्ञान है, जो हर किसी को नहीं दिया जाता। अर्जुन का सौभाग्य है कि भगवान् स्वयं उन्हें अपना मित्र और भक्त मानकर यह ज्ञान दे रहे हैं। भक्ति ज्ञान का द्वार खोलती है।
४.४ अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥ ४ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — भवतः जन्म अपरम्, विवस्वतः जन्म परम्; त्वम् आदौ (एनं योगं) प्रोक्तवान् इति एतत् कथं विजानीयाम्?
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — आपका जन्म तो अभी हाल का है और सूर्य का जन्म बहुत पहले हुआ था; तो मैं इस बात को कैसे समझूँ कि आपने ही सृष्टि के आरम्भ में सूर्य से यह योग कहा था?
भावार्थ
अर्जुन का प्रश्न स्वाभाविक है। वे श्रीकृष्ण को अपने समकालीन, अपने ममेरे भाई के रूप में जानते हैं — जिनका जन्म देवकी के गर्भ से कुछ ही वर्ष पहले हुआ। फिर उन्होंने करोड़ों वर्ष पहले सूर्य को उपदेश कैसे दिया? यह प्रश्न अविश्वास से नहीं, जिज्ञासा से है। अर्जुन चाहते हैं कि भगवान् स्वयं अपने दिव्य स्वरूप का रहस्य बतायें। इस प्रश्न के बहाने भगवान् अवतार-तत्त्व का अद्भुत रहस्य प्रकट करेंगे, जो गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से है।
४.५ श्रीभगवानुवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥ ५ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — (हे) अर्जुन! मे तव च बहूनि जन्मानि व्यतीतानि; (हे) परन्तप! तानि सर्वाणि अहं वेद, त्वं न वेत्थ।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे बहुत-से जन्म हो चुके हैं; हे परन्तप! उन सबको मैं जानता हूँ, पर तुम नहीं जानते।
भावार्थ
भगवान् जीव और ईश्वर का मूल भेद बताते हैं। दोनों के अनेक जन्म हुए हैं, पर जीव अपने पिछले जन्मों को भूल जाता है, जबकि भगवान् को सब स्मरण है। जीव का जन्म कर्म-बन्धन और अज्ञान के कारण होता है, इसलिये उसकी स्मृति ढक जाती है; भगवान् का प्रकट होना उनकी स्वतन्त्र इच्छा से होता है, इसलिये उनका ज्ञान पूर्ण रहता है। यह श्लोक पुनर्जन्म के सिद्धान्त की भी पुष्टि करता है। हमारी वर्तमान पहचान इस जन्म तक सीमित नहीं; हम एक लम्बी यात्रा में हैं।
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥ ६ ॥
अन्वय
(अहम्) अजः अव्ययात्मा सन् अपि, भूतानाम् ईश्वरः सन् अपि, स्वां प्रकृतिम् अधिष्ठाय आत्ममायया सम्भवामि।
हिन्दी अनुवाद
मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी तथा सम्पूर्ण प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी, अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।
भावार्थ
भगवान् अपने अवतार का रहस्य बताते हैं। वे 'अज' हैं — वास्तव में जन्म नहीं लेते; 'अव्ययात्मा' — उनका स्वरूप कभी क्षीण नहीं होता; 'भूतानाम् ईश्वरः' — सब प्राणियों के स्वामी हैं। फिर भी वे संसार में प्रकट होते हैं, पर कर्म-बन्धन से नहीं, बल्कि अपनी 'योगमाया' — दिव्य शक्ति — से। जीव प्रकृति के अधीन होकर जन्म लेता है, भगवान् प्रकृति को अपने अधीन करके प्रकट होते हैं। यह अन्तर ही अवतार और साधारण जन्म का भेद है। उनका आना हमें बाँधने के लिये नहीं, मुक्त करने के लिये है।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥ ७ ॥
अन्वय
(हे) भारत! यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः, अधर्मस्य अभ्युत्थानं (च) भवति, तदा अहम् आत्मानं सृजामि।
हिन्दी अनुवाद
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप को रचता हूँ (साकार रूप से प्रकट होता हूँ)।
भावार्थ
यह गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है, जो अवतार का प्रयोजन बताता है। 'धर्म की ग्लानि' — जब सत्य, न्याय, करुणा जैसे मूल्य दुर्बल हो जाते हैं; 'अधर्म का अभ्युत्थान' — जब अन्याय, अत्याचार और असत्य प्रबल हो जाते हैं। ऐसे समय में भगवान् स्वयं प्रकट होते हैं। यह श्लोक मानवता को आश्वासन देता है कि अन्याय कितना भी प्रबल हो, अन्त में धर्म की विजय होती है। इतिहास में भी देखा गया है कि अन्धकार के युग के बाद कोई महान् प्रकाश अवश्य आया है।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥ ८ ॥
अन्वय
साधूनां परित्राणाय, दुष्कृतां च विनाशाय, धर्मसंस्थापनार्थाय (अहं) युगे युगे सम्भवामि।
हिन्दी अनुवाद
साधु पुरुषों की रक्षा करने के लिये, दुष्ट कर्म करने वालों का विनाश करने के लिये और धर्म की भली-भाँति स्थापना करने के लिये मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
भावार्थ
भगवान् अवतार के तीन प्रयोजन बताते हैं। पहला, 'साधूनां परित्राणाय' — सज्जनों की रक्षा; जो धर्म के मार्ग पर हैं और अत्याचार सह रहे हैं, उन्हें बचाना। दूसरा, 'दुष्कृतां विनाशाय' — दुष्टों का नाश; जो सुधार के योग्य नहीं रहे, उनका अन्त। तीसरा, 'धर्मसंस्थापनार्थाय' — धर्म की पुनः स्थापना, जो सबसे मुख्य उद्देश्य है। 'युगे युगे' — हर युग में, जब भी आवश्यकता हो। राम, कृष्ण आदि अवतार इसी उद्देश्य से आये। यह श्लोक सज्जनों के लिये आश्वासन और दुर्जनों के लिये चेतावनी है।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ ९ ॥
अन्वय
(हे) अर्जुन! मे जन्म कर्म च दिव्यम्; यः एवं तत्त्वतः वेत्ति, सः देहं त्यक्त्वा पुनर्जन्म न एति, माम् एति।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य (अलौकिक) हैं; इस प्रकार जो मनुष्य तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता, बल्कि मुझे ही प्राप्त होता है।
भावार्थ
भगवान् के जन्म और कर्म 'दिव्य' हैं — साधारण मनुष्य जैसे नहीं, बल्कि अलौकिक और कर्म-बन्धन से रहित। जो व्यक्ति इस सत्य को 'तत्त्वतः' — केवल सुनकर नहीं, गहराई से समझकर — जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है। क्योंकि भगवान् के दिव्य स्वरूप को जानने का अर्थ है उनके प्रति पूर्ण श्रद्धा और प्रेम उत्पन्न होना, जो स्वतः मुक्ति का कारण बनता है। भगवान् की लीलाओं का श्रवण और चिन्तन इसीलिये इतना महत्वपूर्ण माना गया है।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥ १० ॥
अन्वय
वीतरागभयक्रोधाः मन्मयाः माम् उपाश्रिताः ज्ञानतपसा पूताः बहवः मद्भावम् आगताः।
हिन्दी अनुवाद
राग, भय और क्रोध से रहित, मुझमें तन्मय हुए, मेरे आश्रित रहने वाले बहुत-से भक्त ज्ञान रूपी तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।
भावार्थ
भगवान् बताते हैं कि यह मार्ग केवल सिद्धान्त नहीं, अनेक लोगों ने इसे अपनाकर परम लक्ष्य पाया है। इसके लिये चार बातें आवश्यक हैं — राग, भय और क्रोध से मुक्ति; 'मन्मय' होना — मन को भगवान् में लगाना; 'माम् उपाश्रिताः' — भगवान् का आश्रय लेना; और 'ज्ञानतपसा पूताः' — ज्ञान रूपी तप से शुद्ध होना। राग, भय और क्रोध — ये तीनों मन को बाँधने वाली प्रमुख शक्तियाँ हैं। जब मन भगवान् में लगता है, तो ये स्वतः क्षीण हो जाती हैं। 'बहवः' — अनेक लोगों ने यह पाया; यह आशा और प्रेरणा का सन्देश है।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ ११ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! ये मां यथा प्रपद्यन्ते, अहं तान् तथा एव भजामि; मनुष्याः सर्वशः मम वर्त्म अनुवर्तन्ते।
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
भावार्थ
यह श्लोक भगवान् की उदारता और समदृष्टि को प्रकट करता है। जो जिस भाव से भगवान् को चाहता है — सखा, माता, पिता, स्वामी या पुत्र के रूप में — भगवान् उसी भाव से उसे उत्तर देते हैं। जो धन चाहता है, उसे धन; जो ज्ञान चाहता है, उसे ज्ञान; जो स्वयं भगवान् को चाहता है, उसे स्वयं भगवान् मिलते हैं। 'मम वर्त्म' — सभी मार्ग अन्ततः भगवान् की ओर ही जाते हैं। यह श्लोक धार्मिक सहिष्णुता का आधार है: विभिन्न उपासना-पद्धतियाँ एक ही परम सत्य की ओर ले जाती हैं।
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥ १२ ॥
अन्वय
इह कर्मणां सिद्धिं काङ्क्षन्तः देवताः यजन्ते; हि मानुषे लोके कर्मजा सिद्धिः क्षिप्रं भवति।
हिन्दी अनुवाद
इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल की इच्छा करने वाले लोग देवताओं का पूजन करते हैं, क्योंकि यहाँ कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र ही मिल जाती है।
भावार्थ
भगवान् बताते हैं कि अधिकांश लोग भगवान् के बजाय देवताओं की उपासना क्यों करते हैं — क्योंकि वे शीघ्र फल चाहते हैं। देवता इच्छित वस्तुएँ — धन, संतान, स्वास्थ्य — जल्दी दे देते हैं, जबकि परमात्मा की प्राप्ति धैर्य और त्याग माँगती है। यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह तात्कालिक लाभ को स्थायी कल्याण से अधिक महत्व देता है। भगवान् इसकी निन्दा नहीं करते, केवल वास्तविकता बताते हैं। पर बुद्धिमान् व्यक्ति वह है जो क्षणिक फलों से ऊपर उठकर शाश्वत की ओर बढ़े।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ १३ ॥
अन्वय
गुणकर्मविभागशः चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्; तस्य कर्तारम् अपि मां अकर्तारम् अव्ययं विद्धि।
हिन्दी अनुवाद
गुण और कर्म के विभाग के अनुसार चारों वर्णों की रचना मेरे द्वारा की गई है; उसका कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी को तुम वास्तव में अकर्ता ही जानो।
भावार्थ
भगवान् बताते हैं कि समाज के चार वर्ण — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र — 'गुणकर्मविभागशः' अर्थात् गुण और कर्म के आधार पर बनाये गये हैं, जन्म के आधार पर नहीं। जिसमें सत्त्वगुण प्रधान है, वह ज्ञान और शिक्षा के कार्य के योग्य है; जिसमें रजोगुण के साथ सत्त्व है, वह रक्षा और शासन के; आदि। यह समाज का स्वाभाविक श्रम-विभाजन है, जिसमें हर व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार योगदान दे। भगवान् इसके रचयिता होते हुए भी अकर्ता हैं, क्योंकि वे फल में आसक्त नहीं। कालान्तर में इस व्यवस्था में जन्म-आधारित भेदभाव आ गया, जो गीता के मूल भाव के विपरीत है।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ १४ ॥
अन्वय
कर्माणि मां न लिम्पन्ति, मे कर्मफले स्पृहा न (अस्ति); इति यः मां अभिजानाति, सः कर्मभिः न बध्यते।
हिन्दी अनुवाद
कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते; इस प्रकार जो मुझे तत्त्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता।
भावार्थ
भगवान् कर्म करते हैं — सृष्टि का संचालन, अवतार लेकर लीलाएँ — पर कर्म उन्हें बाँधते नहीं, क्योंकि उनमें फल की इच्छा नहीं। यही कर्म-बन्धन से मुक्ति का रहस्य है। जो व्यक्ति भगवान् के इस स्वरूप को समझ लेता है, वह स्वयं भी उनकी तरह निष्काम भाव से कर्म करना सीख जाता है, और इसलिये बँधता नहीं। भगवान् का जीवन हमारे लिये आदर्श है: कर्म करो, पूरी लगन से करो, पर फल की लालसा से मुक्त रहो। कमल जल में रहकर भी गीला नहीं होता — यही कर्मयोगी की स्थिति है।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥
अन्वय
पूर्वैः मुमुक्षुभिः अपि एवं ज्ञात्वा कर्म कृतम्; तस्मात् त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतं कर्म एव कुरु।
हिन्दी अनुवाद
पूर्वकाल के मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किये हैं; इसलिये तुम भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये जाने वाले कर्मों को ही करो।
भावार्थ
भगवान् परम्परा का उदाहरण देते हैं — प्राचीन काल के मुक्ति चाहने वाले महापुरुषों ने भी इसी ज्ञान को समझकर कर्म किये। उन्होंने कर्म नहीं छोड़ा, बल्कि कर्म को निष्काम भाव से करके मुक्ति पायी। अर्जुन को भी वही करना चाहिये जो उनके पूर्वजों ने किया। यह श्लोक बताता है कि कर्मयोग कोई नया प्रयोग नहीं, बल्कि परीक्षित और प्रमाणित मार्ग है। जब किसी मार्ग पर अनेक लोग चलकर लक्ष्य तक पहुँचे हों, तो उस पर विश्वास करना स्वाभाविक है।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १६ ॥
अन्वय
किं कर्म किम् अकर्म इति अत्र कवयः अपि मोहिताः; तत् कर्म ते प्रवक्ष्यामि, यत् ज्ञात्वा (त्वम्) अशुभात् मोक्ष्यसे।
हिन्दी अनुवाद
कर्म क्या है और अकर्म क्या है — इस विषय में बुद्धिमान् पुरुष भी मोहित हो जाते हैं; इसलिये वह कर्म-तत्त्व मैं तुम्हें भली-भाँति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ (संसार-बन्धन) से मुक्त हो जाओगे।
भावार्थ
भगवान् स्वीकार करते हैं कि कर्म का विषय अत्यन्त जटिल है; बड़े-बड़े विद्वान् भी इसमें भ्रमित हो जाते हैं। क्या करना कर्म है और क्या न करना अकर्म? क्या बाहर से निष्क्रिय दिखने वाला व्यक्ति वास्तव में कर्म-मुक्त है? क्या सक्रिय व्यक्ति आवश्यक रूप से बँधा है? ये प्रश्न सरल नहीं हैं। भगवान् वचन देते हैं कि वे इस रहस्य को स्पष्ट करेंगे, और इसे समझने से 'अशुभ' — जन्म-मृत्यु के बन्धन — से मुक्ति मिलेगी। सही समझ ही सही कर्म का आधार है।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥ १७ ॥
अन्वय
कर्मणः अपि बोद्धव्यम्, विकर्मणः च बोद्धव्यम्, अकर्मणः च बोद्धव्यम्; हि कर्मणः गतिः गहना।
हिन्दी अनुवाद
कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये, विकर्म (निषिद्ध कर्म) का स्वरूप भी जानना चाहिये और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये, क्योंकि कर्म की गति बड़ी गहन है।
भावार्थ
भगवान् कर्म के तीन प्रकार बताते हैं। 'कर्म' — शास्त्र-विहित, उचित कर्तव्य; 'विकर्म' — शास्त्र-निषिद्ध, अनुचित कर्म जैसे हिंसा, चोरी, असत्य; 'अकर्म' — कर्म करते हुए भी कर्म-बन्धन से मुक्त रहना, या कर्म का अभाव। इन तीनों को भली-भाँति समझना आवश्यक है, क्योंकि 'गहना कर्मणो गतिः' — कर्म का मार्ग अत्यन्त गूढ़ है। एक ही कार्य परिस्थिति और भाव के अनुसार कर्म, विकर्म या अकर्म हो सकता है। जैसे युद्ध में शत्रु को मारना धर्म हो सकता है, पर स्वार्थ के लिये हत्या पाप।
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥ १८ ॥
अन्वय
यः कर्मणि अकर्म पश्येत्, यः च अकर्मणि कर्म (पश्येत्), सः मनुष्येषु बुद्धिमान्, सः युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् (च)।
हिन्दी अनुवाद
जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान् है, वह योगी है और सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।
भावार्थ
यह गीता के सबसे गूढ़ श्लोकों में है। 'कर्म में अकर्म देखना' — अर्थात् निष्काम भाव से किये गये कर्म में बन्धन न देखना; ऐसा कर्म बाहर से कर्म है, पर भीतर से अकर्म, क्योंकि उसमें कर्तापन और फल की आसक्ति नहीं। 'अकर्म में कर्म देखना' — अर्थात् जो बाहर से कर्म छोड़कर बैठा है, पर मन में कामनाएँ रखता है, उसके अकर्म में भी कर्म (बन्धन) देखना। जो यह भेद समझता है, वह सच्चा बुद्धिमान् और योगी है। वास्तविक कर्म या अकर्म का निर्णय बाहरी क्रिया से नहीं, भीतरी भाव से होता है।
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥ १९ ॥
अन्वय
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः, ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तं बुधाः पण्डितम् आहुः।
हिन्दी अनुवाद
जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं, तथा जिसके सब कर्म ज्ञान रूपी अग्नि द्वारा भस्म हो गये हैं, उसे ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं।
भावार्थ
भगवान् सच्चे 'पण्डित' की परिभाषा देते हैं — वह नहीं जो बहुत शास्त्र पढ़ा हो, बल्कि वह जिसके कर्म 'कामसंकल्पवर्जित' हों — इच्छा और व्यक्तिगत योजना से रहित। वह कर्म करता है, पर अपने लिये नहीं; परिणाम की योजना नहीं बनाता, कर्तव्य करता है। उसके कर्म 'ज्ञान की अग्नि में जल गये' हैं — अर्थात् उनका बन्धनकारी प्रभाव समाप्त हो गया है, जैसे भुना हुआ बीज अंकुरित नहीं होता। ऐसे कर्म संसार के लिये कल्याणकारी होते हैं, पर कर्ता को बाँधते नहीं।
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥ २० ॥
अन्वय
(यः) कर्मफलासङ्गं त्यक्त्वा नित्यतृप्तः निराश्रयः (भवति), सः कर्मणि अभिप्रवृत्तः अपि किञ्चित् न एव करोति।
हिन्दी अनुवाद
जो पुरुष कर्मों में और उनके फल में आसक्ति का सर्वथा त्याग करके संसार के आश्रय से रहित हो गया है और परमात्मा में नित्य तृप्त है, वह कर्मों में भली-भाँति लगा हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता।
भावार्थ
कर्मयोगी की अद्भुत स्थिति का वर्णन है — वह पूरी तरह कर्म में लगा है, फिर भी 'कुछ नहीं करता'। यह विरोधाभास इसलिये है कि उसमें कर्तापन का अहंकार नहीं। वह 'नित्यतृप्त' है — परमात्मा में सदा सन्तुष्ट, उसे कर्म से कुछ पाना नहीं; और 'निराश्रय' है — किसी सांसारिक सहारे पर निर्भर नहीं। जैसे बाँसुरी से संगीत निकलता है, पर बाँसुरी संगीतकार नहीं — वैसे ही उसके माध्यम से कर्म होते हैं, पर वह स्वयं को कर्ता नहीं मानता। यह पूर्ण समर्पण की अवस्था है।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः। शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ २१ ॥
अन्वय
निराशीः यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः (सन्) केवलं शारीरं कर्म कुर्वन् किल्बिषं न आप्नोति।
हिन्दी अनुवाद
जिसका अन्तःकरण और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, जिसने सब प्रकार के भोगों की सामग्री का त्याग कर दिया है, ऐसा आशा-रहित पुरुष केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पाप को प्राप्त नहीं होता।
भावार्थ
भगवान् त्यागी साधक की स्थिति बताते हैं। वह 'निराशीः' — आशा से रहित; 'यतचित्तात्मा' — मन और शरीर पर नियन्त्रण रखने वाला; 'त्यक्तसर्वपरिग्रहः' — संग्रह की प्रवृत्ति छोड़ चुका। ऐसा व्यक्ति केवल शरीर-निर्वाह के लिये आवश्यक कर्म — भोजन, स्नान आदि — करता है, और इनसे उसे कोई पाप नहीं लगता। संग्रह की प्रवृत्ति ही अनेक पापों का मूल है; जो आवश्यकता से अधिक नहीं चाहता, वह अनायास ही निर्मल रहता है। सादगी और सन्तोष आध्यात्मिक जीवन के आधार हैं।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ २२ ॥
अन्वय
यदृच्छालाभसन्तुष्टः द्वन्द्वातीतः विमत्सरः सिद्धौ असिद्धौ च समः (सः) कृत्वा अपि न निबध्यते।
हिन्दी अनुवाद
जो बिना इच्छा के अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थ में सन्तुष्ट रहता है, जो द्वन्द्वों से परे हो गया है, ईर्ष्या से रहित है, तथा सफलता और असफलता में समान रहता है, वह कर्म करता हुआ भी नहीं बँधता।
भावार्थ
कर्मयोगी के चार और गुण बताये गये हैं। 'यदृच्छालाभसन्तुष्ट' — जो कुछ स्वाभाविक रूप से मिल जाये, उसी में सन्तुष्ट; अधिक के लिये लालायित नहीं। 'द्वन्द्वातीत' — सुख-दुःख, मान-अपमान जैसे द्वन्द्वों से ऊपर। 'विमत्सर' — दूसरों की उन्नति से ईर्ष्या न करने वाला। 'सिद्धि-असिद्धि में सम' — सफलता में घमण्ड नहीं, असफलता में निराशा नहीं। ये गुण केवल आध्यात्मिक नहीं, मानसिक स्वास्थ्य के भी सूत्र हैं। ईर्ष्या और असन्तोष से मुक्त व्यक्ति सबसे सुखी होता है।
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ २३ ॥
अन्वय
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः यज्ञाय आचरतः (पुरुषस्य) समग्रं कर्म प्रविलीयते।
हिन्दी अनुवाद
जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो देहाभिमान और ममता से रहित है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा के ज्ञान में स्थित रहता है, ऐसे केवल यज्ञ-सम्पादन के लिये कर्म करने वाले मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म भली-भाँति विलीन हो जाते हैं।
भावार्थ
जो कर्म यज्ञ-भाव से — निःस्वार्थ, ईश्वरार्पण भाव से — किये जाते हैं, वे 'प्रविलीयते' — पूरी तरह विलीन हो जाते हैं, कोई संस्कार या बन्धन नहीं छोड़ते। जैसे बर्फ़ पानी में घुलकर अपना अलग अस्तित्व खो देती है, वैसे ही निष्काम कर्म परमात्मा में विलीन हो जाते हैं। इसके लिये तीन शर्तें हैं — आसक्ति का नाश, ममता और अहंकार से मुक्ति, और चित्त का ज्ञान में स्थित होना। यह श्लोक आगे के यज्ञ-प्रकरण की भूमिका है, जिसमें भगवान् यज्ञ के विभिन्न रूप बतायेंगे।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४ ॥
अन्वय
अर्पणं ब्रह्म, हविः ब्रह्म, ब्रह्मणा ब्रह्माग्नौ हुतम्; ब्रह्मकर्मसमाधिना तेन ब्रह्म एव गन्तव्यम्।
हिन्दी अनुवाद
जिस यज्ञ में अर्पण (स्रुवा आदि) भी ब्रह्म है, हवन किया जाने वाला द्रव्य भी ब्रह्म है, तथा ब्रह्म रूप कर्ता द्वारा ब्रह्म रूप अग्नि में आहुति देने की क्रिया भी ब्रह्म है — उस ब्रह्मकर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किये जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही है।
भावार्थ
यह श्लोक भारतीय परम्परा में भोजन से पहले प्रार्थना के रूप में बोला जाता है, और इसका अर्थ अत्यन्त गहरा है। यज्ञ के सभी अंग — अर्पण का साधन, आहुति की सामग्री, अग्नि, आहुति देने वाला, और उसका फल — सब ब्रह्म ही हैं। जब यह दृष्टि आ जाती है, तो कर्ता, कर्म और फल का भेद मिट जाता है; सब कुछ एक परम सत्य की अभिव्यक्ति लगने लगता है। भोजन करना भी यज्ञ बन जाता है — भोजन ब्रह्म, खाने वाला ब्रह्म, पाचन-अग्नि ब्रह्म। यह अद्वैत-दृष्टि हर क्रिया को पवित्र बना देती है।
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते। ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ २५ ॥
अन्वय
अपरे योगिनः दैवम् एव यज्ञं पर्युपासते; अपरे ब्रह्माग्नौ यज्ञेन एव यज्ञम् उपजुह्वति।
हिन्दी अनुवाद
दूसरे योगीजन देवताओं के पूजन रूप यज्ञ का ही भली-भाँति अनुष्ठान करते हैं, और अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मा रूप अग्नि में अभेद-दर्शन रूप यज्ञ के द्वारा ही आत्मा रूप यज्ञ का हवन करते हैं।
भावार्थ
अब भगवान् विभिन्न प्रकार के यज्ञों का वर्णन आरम्भ करते हैं, जो दिखाता है कि साधना के अनेक रूप हैं। कुछ साधक देवताओं की पूजा-अर्चना रूप यज्ञ करते हैं — यह कर्मकाण्डी उपासना है। दूसरे साधक ब्रह्म रूपी अग्नि में आत्मा को ही अर्पित करते हैं — अर्थात् ज्ञान द्वारा अपने व्यक्तिगत अहंकार को परमात्मा में विलीन कर देते हैं। ये दो छोर हैं — एक बाहरी उपासना, दूसरी आन्तरिक ज्ञान-साधना। दोनों ही मान्य हैं; व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार मार्ग चुनता है।
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति। शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥ २६ ॥
अन्वय
अन्ये श्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि संयमाग्निषु जुह्वति; अन्ये शब्दादीन् विषयान् इन्द्रियाग्निषु जुह्वति।
हिन्दी अनुवाद
अन्य योगीजन कान आदि इन्द्रियों को संयम रूप अग्नियों में हवन करते हैं, और दूसरे योगी लोग शब्द आदि विषयों को इन्द्रिय रूप अग्नियों में हवन करते हैं।
भावार्थ
यहाँ दो और प्रकार के यज्ञ बताये गये हैं। पहला — इन्द्रिय-संयम का यज्ञ, जिसमें साधक इन्द्रियों को विषयों से हटाकर संयम में लगाता है; यह ब्रह्मचारी और तपस्वी का मार्ग है। दूसरा — विषयों को इन्द्रियों में हवन करना, अर्थात् विषयों का सेवन तो करना, पर राग-द्वेष रहित होकर, जैसे यज्ञ में आहुति दी जाती है; यह गृहस्थ कर्मयोगी का मार्ग है। एक में त्याग है, दूसरे में संयमित भोग; दोनों का उद्देश्य मन की शुद्धि है। यज्ञ की यह व्यापक परिभाषा जीवन के हर पहलू को साधना बना देती है।
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे। आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥
अन्वय
अपरे च सर्वाणि इन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि च ज्ञानदीपिते आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति।
हिन्दी अनुवाद
दूसरे योगीजन इन्द्रियों की सम्पूर्ण क्रियाओं और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म-संयम योग रूप अग्नि में हवन करते हैं।
भावार्थ
यह ध्यान-योगी का यज्ञ है। वह इन्द्रियों और प्राणों की सारी क्रियाओं को 'आत्मसंयम योग' की अग्नि में अर्पित करता है — अर्थात् गहरे ध्यान में मन, इन्द्रियाँ और प्राण सब शान्त हो जाते हैं, और साधक आत्मा में स्थित हो जाता है। यह अग्नि 'ज्ञानदीपित' — ज्ञान से प्रज्वलित है; ज्ञान के बिना केवल बाहरी संयम पर्याप्त नहीं। इस यज्ञ का विस्तार छठे अध्याय (ध्यानयोग) में मिलेगा। यह आन्तरिक साधना का उच्च स्तर है।
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे। स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥ २८ ॥
अन्वय
अपरे द्रव्ययज्ञाः, तपोयज्ञाः, योगयज्ञाः, तथा संशितव्रताः यतयः स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः च (भवन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
कुछ लोग द्रव्य-सम्बन्धी यज्ञ करने वाले हैं, कुछ तपस्या रूप यज्ञ करने वाले हैं, कुछ योग रूप यज्ञ करने वाले हैं, और कुछ कठोर व्रतों वाले प्रयत्नशील साधक स्वाध्याय और ज्ञान रूप यज्ञ करने वाले हैं।
भावार्थ
भगवान् चार और यज्ञ बताते हैं। 'द्रव्ययज्ञ' — धन का दान, लोक-कल्याण के लिये व्यय; 'तपोयज्ञ' — व्रत, उपवास, कठोर अनुशासन; 'योगयज्ञ' — अष्टांग योग का अभ्यास; 'स्वाध्याय-ज्ञानयज्ञ' — शास्त्रों का अध्ययन और चिन्तन। इन सभी को करने वाले 'यति' — प्रयत्नशील — और 'संशितव्रत' — दृढ़ व्रत वाले — होते हैं। यह विविधता बताती है कि हर व्यक्ति अपनी क्षमता और रुचि के अनुसार किसी न किसी रूप में यज्ञ कर सकता है। धनी व्यक्ति दान से, विद्वान् ज्ञान से, तपस्वी तप से — सब अपने-अपने ढंग से परमात्मा की ओर बढ़ते हैं।
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे। प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ २९ ॥
अन्वय
तथा अपरे प्राणायामपरायणाः प्राणापानगती रुद्ध्वा अपाने प्राणं, प्राणे अपानं जुह्वति।
हिन्दी अनुवाद
और दूसरे प्राणायाम-परायण साधक प्राण और अपान की गति को रोककर अपान वायु में प्राण वायु का और प्राण वायु में अपान वायु का हवन करते हैं।
भावार्थ
यह प्राणायाम रूपी यज्ञ है। 'प्राण' भीतर जाने वाली (श्वास) वायु है और 'अपान' बाहर जाने वाली (प्रश्वास) वायु। प्राणायाम में साधक श्वास को भीतर लेकर अपान में मिलाता है (पूरक), प्रश्वास को प्राण में मिलाता है (रेचक) और दोनों की गति को रोकता है (कुम्भक)। प्राण और मन का गहरा सम्बन्ध है — जब श्वास शान्त होती है, तो मन भी शान्त होता है। आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि नियन्त्रित श्वास तनाव कम करती है और एकाग्रता बढ़ाती है। प्राणायाम शरीर और मन दोनों की शुद्धि का सरल साधन है।
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति। सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥
अन्वय
अपरे नियताहाराः (सन्तः) प्राणान् प्राणेषु जुह्वति; एते सर्वे अपि यज्ञविदः यज्ञक्षपितकल्मषाः (सन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
दूसरे नियमित आहार करने वाले साधक प्राणों को प्राणों में ही हवन करते हैं; ये सभी साधक यज्ञों को जानने वाले हैं और यज्ञों द्वारा इनके पाप नष्ट हो चुके हैं।
भावार्थ
'नियताहार' — संयमित, नियमित भोजन करने वाले साधक भोजन को सीमित करके प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं, अर्थात् प्राण-शक्ति को संयमित करते हैं। भोजन और मन का गहरा सम्बन्ध है; अधिक या अनुचित भोजन मन को तामसिक बनाता है। भगवान् निष्कर्ष देते हैं — ये सभी, चाहे किसी भी प्रकार का यज्ञ करें, 'यज्ञवित्' हैं — यज्ञ के मर्म को जानने वाले, और 'यज्ञक्षपितकल्मष' — यज्ञ द्वारा पापों से मुक्त। सभी साधना-मार्गों का उद्देश्य एक ही है — मन की शुद्धि।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥
अन्वय
(हे) कुरुसत्तम! यज्ञशिष्टामृतभुजः सनातनं ब्रह्म यान्ति; अयज्ञस्य अयं लोकः न अस्ति, अन्यः (लोकः) कुतः?
हिन्दी अनुवाद
हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं; और यज्ञ न करने वाले पुरुष के लिये तो यह मनुष्य लोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है?
भावार्थ
यज्ञ का फल बताया गया है — जो यज्ञ से बचा हुआ 'अमृत' ग्रहण करते हैं, वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञशिष्ट को अमृत कहा गया, क्योंकि त्याग के बाद मिला भोग पवित्र और कल्याणकारी होता है। इसके विपरीत, जो कोई यज्ञ नहीं करता — कोई त्याग, सेवा या साधना नहीं — उसके लिये यह लोक भी सुखद नहीं, परलोक की तो बात ही क्या। स्वार्थी व्यक्ति को इस जीवन में भी सच्चा सुख और सम्मान नहीं मिलता। त्याग और सेवा ही दोनों लोकों में सुख का आधार हैं।
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥
अन्वय
एवं बहुविधाः यज्ञाः ब्रह्मणः मुखे वितताः; तान् सर्वान् कर्मजान् विद्धि; एवं ज्ञात्वा (त्वं) विमोक्ष्यसे।
हिन्दी अनुवाद
इस प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गये हैं; उन सबको तुम मन, इन्द्रिय और शरीर की क्रिया द्वारा सम्पन्न होने वाले जानो; इस प्रकार तत्त्व से जानकर तुम कर्मबन्धन से मुक्त हो जाओगे।
भावार्थ
भगवान् यज्ञ-प्रकरण का सारांश देते हैं — वेदों में अनेक प्रकार के यज्ञ बताये गये हैं, और ये सब 'कर्मज' हैं — कर्म से उत्पन्न होते हैं। अर्थात् कोई भी यज्ञ बिना कर्म के सम्भव नहीं; यज्ञ का अर्थ ही सही भाव से किया गया कर्म है। जो इस सत्य को समझ लेता है कि हर यज्ञ एक कर्म है, और हर कर्म यज्ञ बन सकता है, वह कर्म-बन्धन से मुक्त हो जाता है। यह ज्ञान कर्म और साधना के बीच की दीवार को गिरा देता है।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥
अन्वय
(हे) परन्तप! द्रव्यमयात् यज्ञात् ज्ञानयज्ञः श्रेयान्; (हे) पार्थ! सर्वं कर्म अखिलं ज्ञाने परिसमाप्यते।
हिन्दी अनुवाद
हे परन्तप! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है; क्योंकि हे पार्थ! सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं।
भावार्थ
सब यज्ञों में ज्ञानयज्ञ को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। द्रव्ययज्ञ — धन, सामग्री का दान — अच्छा है, पर उसका फल सीमित है। ज्ञानयज्ञ — आत्मा और परमात्मा का ज्ञान — सर्वोत्तम है, क्योंकि सारे कर्मों का अन्तिम लक्ष्य ज्ञान ही है। 'सर्वं कर्माखिलं ज्ञाने परिसमाप्यते' — जैसे नदियाँ समुद्र में जाकर समाप्त होती हैं, वैसे ही सब कर्म ज्ञान में पूर्ण होते हैं। ज्ञान मिल जाने पर कर्म का उद्देश्य पूरा हो जाता है। इसलिये हर कर्म ज्ञान की दिशा में होना चाहिये।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥
अन्वय
तत् (ज्ञानं) प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया (च) विद्धि; तत्त्वदर्शिनः ज्ञानिनः ते ज्ञानम् उपदेक्ष्यन्ति।
हिन्दी अनुवाद
उस ज्ञान को तुम तत्त्वदर्शी ज्ञानी महात्माओं के पास जाकर समझो; उनको भली-भाँति दण्डवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्त्व को भली-भाँति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुम्हें उस तत्त्व-ज्ञान का उपदेश देंगे।
भावार्थ
यह श्लोक ज्ञान प्राप्त करने की विधि बताता है — तीन सूत्र। 'प्रणिपात' — विनम्रता से झुकना, अहंकार छोड़ना; अहंकारी व्यक्ति कुछ नहीं सीख सकता। 'परिप्रश्न' — जिज्ञासापूर्ण, ईमानदार प्रश्न पूछना; वाद-विवाद या परीक्षा लेने के लिये नहीं, समझने के लिये। 'सेवा' — गुरु की सेवा, जो हृदय को शुद्ध और ग्रहणशील बनाती है। ज्ञान देने वाले गुरु 'तत्त्वदर्शी' होने चाहिये — केवल शास्त्र जानने वाले नहीं, बल्कि सत्य का अनुभव करने वाले। गुरु-शिष्य परम्परा का यह मूल सिद्धान्त आज भी हर प्रकार की शिक्षा में प्रासंगिक है।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५ ॥
अन्वय
(हे) पाण्डव! यत् ज्ञात्वा (त्वं) पुनः एवं मोहं न यास्यसि, येन अशेषेण भूतानि आत्मनि अथो मयि द्रक्ष्यसि।
हिन्दी अनुवाद
हे पाण्डव! जिसे जानकर तुम फिर इस प्रकार मोह को प्राप्त नहीं होगे, तथा जिस ज्ञान के द्वारा तुम सम्पूर्ण प्राणियों को निःशेष भाव से पहले अपने में और फिर मुझ परमात्मा में देखोगे।
भावार्थ
भगवान् ज्ञान का फल बताते हैं। पहला — फिर कभी ऐसा मोह नहीं होगा जैसा अभी अर्जुन को हुआ है। दूसरा — सब प्राणियों को अपने भीतर देखना, अर्थात् सबमें अपनी ही आत्मा का अनुभव; इससे द्वेष और भेद-भाव समाप्त हो जाता है। तीसरा — सबको परमात्मा में देखना, अर्थात् सारी सृष्टि को ईश्वर की अभिव्यक्ति के रूप में देखना। यह अद्वैत का अनुभव है, जहाँ 'मैं', 'तुम' और 'वह' का भेद मिट जाता है। जिसने सबमें स्वयं को और स्वयं में ईश्वर को देख लिया, वह किसके लिये शोक करे?
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः। सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥ ३६ ॥
अन्वय
अपि चेत् (त्वं) सर्वेभ्यः पापेभ्यः पापकृत्तमः असि, (तथापि) ज्ञानप्लवेन एव सर्वं वृजिनं सन्तरिष्यसि।
हिन्दी अनुवाद
यदि तुम अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, तो भी ज्ञान रूपी नौका द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भली-भाँति तर जाओगे।
भावार्थ
यह श्लोक अत्यन्त आशाजनक है। भगवान् कहते हैं कि कोई कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, ज्ञान रूपी नाव से वह पाप के समुद्र को पार कर सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि पाप करते रहो, बल्कि यह कि अतीत की गलतियों के बोझ से निराश मत हो — सच्चा ज्ञान सबको शुद्ध कर सकता है। वाल्मीकि और अंगुलिमाल जैसे उदाहरण बताते हैं कि परिवर्तन किसी के लिये भी सम्भव है। ज्ञान अतीत को नहीं बदलता, पर उसके बन्धन से मुक्त कर देता है।
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७ ॥
अन्वय
(हे) अर्जुन! यथा समिद्धः अग्निः एधांसि भस्मसात् कुरुते, तथा ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान रूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्म कर देती है।
भावार्थ
भगवान् ज्ञान की शक्ति को अग्नि की उपमा से समझाते हैं। जैसे प्रचण्ड अग्नि लकड़ियों के बड़े ढेर को भी कुछ ही समय में राख कर देती है, वैसे ही आत्मज्ञान जन्म-जन्मान्तर के संचित कर्म-संस्कारों को नष्ट कर देता है। इसका आशय यह है कि आत्मज्ञान के बाद कर्मों का बन्धनकारी प्रभाव समाप्त हो जाता है — व्यक्ति संचित कर्मों से मुक्त हो जाता है और नये कर्म उसे नहीं बाँधते। केवल प्रारब्ध कर्म (जिनसे यह शरीर बना है) भोगकर समाप्त होते हैं। ज्ञान सबसे बड़ी शुद्धि है।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ ३८ ॥
अन्वय
इह ज्ञानेन सदृशं पवित्रं न हि विद्यते; योगसंसिद्धः (पुरुषः) कालेन तत् स्वयम् आत्मनि विन्दति।
हिन्दी अनुवाद
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह कुछ भी नहीं है; उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग द्वारा शुद्ध अन्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है।
भावार्थ
'न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते' — यह भारतीय शिक्षा-परम्परा का आदर्श वाक्य है। गंगा-स्नान, तीर्थ-यात्रा, व्रत — ये सब पवित्र करते हैं, पर ज्ञान के समान कोई नहीं। यह ज्ञान बाहर से नहीं आता, बल्कि 'आत्मनि विन्दति' — अपने भीतर ही प्राप्त होता है, जब कर्मयोग द्वारा मन शुद्ध हो जाता है। 'कालेन' — समय के साथ, धैर्य से। ज्ञान कोई खरीदने की वस्तु नहीं, बल्कि साधना से भीतर प्रकट होने वाला प्रकाश है। कर्मयोग मन को शुद्ध करता है, और शुद्ध मन में ज्ञान स्वतः उदित होता है।
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥
अन्वय
श्रद्धावान् तत्परः संयतेन्द्रियः ज्ञानं लभते; ज्ञानं लब्ध्वा अचिरेण परां शान्तिम् अधिगच्छति।
हिन्दी अनुवाद
जितेन्द्रिय, साधन-परायण और श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है, तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है।
भावार्थ
ज्ञान-प्राप्ति की तीन योग्यताएँ बताई गई हैं। 'श्रद्धावान्' — शास्त्र, गुरु और ईश्वर में विश्वास रखने वाला; श्रद्धा के बिना कोई मार्ग पर चल ही नहीं सकता। 'तत्पर' — उस लक्ष्य में पूरी तरह लगा हुआ, एकनिष्ठ। 'संयतेन्द्रिय' — इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखने वाला; असंयमी मन में ज्ञान टिकता नहीं। जिसमें ये तीनों गुण हैं, उसे ज्ञान मिलता है, और ज्ञान मिलते ही 'परां शान्तिम्' — परम शान्ति — तुरन्त प्राप्त होती है। ज्ञान का फल शान्ति है; यदि ज्ञान से शान्ति न मिले, तो वह ज्ञान अधूरा है।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ ४० ॥
अन्वय
अज्ञः च अश्रद्दधानः च संशयात्मा (च) विनश्यति; संशयात्मनः अयं लोकः न अस्ति, न परः, न सुखम्।
हिन्दी अनुवाद
विवेकहीन, श्रद्धारहित और संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है; ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिये न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है।
भावार्थ
पिछले श्लोक के विपरीत, भगवान् पतन के तीन कारण बताते हैं — अज्ञान, अश्रद्धा और संशय। इनमें 'संशयात्मा' — जो हर बात में संशय करता रहता है — सबसे अधिक हानि में है। स्वस्थ प्रश्न पूछना और समझने के लिये संशय करना अच्छा है, पर जो व्यक्ति किसी भी बात पर कभी विश्वास नहीं कर पाता, वह कोई निर्णय नहीं ले सकता और कोई मार्ग नहीं अपना सकता। उसे न इस लोक में सफलता मिलती है, न परलोक में कल्याण, न मन की शान्ति। अनन्त संशय मन को पंगु बना देता है।
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्। आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥ ४१ ॥
अन्वय
(हे) धनञ्जय! योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् आत्मवन्तं कर्माणि न निबध्नन्ति।
हिन्दी अनुवाद
हे धनञ्जय! जिसने कर्मयोग की विधि से समस्त कर्मों को परमात्मा में अर्पण कर दिया है और जिसने विवेक द्वारा समस्त संशयों का नाश कर दिया है, ऐसे वश में किये हुए अन्तःकरण वाले पुरुष को कर्म नहीं बाँधते।
भावार्थ
भगवान् चौथे अध्याय के सार को एक श्लोक में समेटते हैं। कर्म-बन्धन से मुक्ति के लिये तीन बातें — 'योगसंन्यस्तकर्मा' (कर्मयोग द्वारा कर्मों को ईश्वर को समर्पित करना), 'ज्ञानसंछिन्नसंशय' (ज्ञान द्वारा सब संशयों को काट देना) और 'आत्मवान्' (आत्मसंयमी, आत्म-स्वरूप में स्थित)। यहाँ कर्म और ज्ञान का सुन्दर समन्वय है — कर्मयोग से समर्पण, ज्ञान से संशय-निवारण। जिसमें ये दोनों हैं, वह संसार में रहकर भी मुक्त है।
तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः। छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥ ४२ ॥
अन्वय
तस्मात् (हे) भारत! अज्ञानसम्भूतं हृत्स्थम् एनं संशयम् आत्मनः ज्ञानासिना छित्त्वा योगम् आतिष्ठ, उत्तिष्ठ।
हिन्दी अनुवाद
इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन! अज्ञान से उत्पन्न हुए और हृदय में स्थित इस अपने संशय का ज्ञान रूपी तलवार से छेदन करके समत्व रूप कर्मयोग में स्थित हो जाओ और युद्ध के लिये खड़े हो जाओ।
भावार्थ
चौथे अध्याय का समापन फिर से एक प्रेरक आह्वान से होता है — 'उत्तिष्ठ', उठो! अर्जुन के हृदय में संशय है, जो अज्ञान से उत्पन्न हुआ है। भगवान् कहते हैं कि इस संशय को 'ज्ञान की तलवार' से काट डालो। एक योद्धा के लिये तलवार का उपमान अत्यन्त उपयुक्त है — जैसे तलवार शत्रु को काटती है, वैसे ही ज्ञान भीतर के भ्रम को काटता है। फिर 'योगमातिष्ठ' — कर्मयोग में स्थित होकर अपना कर्तव्य करो। यह अध्याय 'ज्ञानकर्मसंन्यासयोग' कहलाता है, जिसमें अवतार-तत्त्व, कर्म-अकर्म का रहस्य, यज्ञ के प्रकार और ज्ञान की महिमा का अद्भुत वर्णन है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसंन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥

ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।
💬 ज्योतिषीय प्रश्न पूछें