संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥
अन्वय
अर्जुनः उवाच — (हे) कृष्ण! (त्वं) कर्मणां संन्यासं पुनः योगं च शंससि; एतयोः यत् एकं श्रेयः (स्यात्), तत् सुनिश्चितं मे ब्रूहि।
हिन्दी अनुवाद
अर्जुन बोले — हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं; इन दोनों में से जो एक मेरे लिये भली-भाँति निश्चित कल्याणकारी साधन हो, उसको कहिये।
भावार्थ
पाँचवें अध्याय का आरम्भ अर्जुन के उसी प्रश्न से होता है जो तीसरे अध्याय के आरम्भ में था, पर अब प्रसंग गहरा है। चौथे अध्याय के अन्त में भगवान् ने ज्ञान से कर्मों के भस्म होने और कर्म-संन्यास की बात कही, साथ ही 'योगमातिष्ठ' — कर्मयोग में स्थित होने को भी कहा। अर्जुन को लगता है कि ये दोनों विरोधी हैं — एक में कर्म छोड़ना, दूसरे में कर्म करना। इसलिये वे एक निश्चित उत्तर चाहते हैं। यह प्रश्न हर साधक का है: संसार छोड़ दें या संसार में रहकर साधना करें?
श्रीभगवान् बोले — कर्मसंन्यास और कर्मयोग — ये दोनों ही परम कल्याण करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में भी कर्मसंन्यास से कर्मयोग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है।
भावार्थ
भगवान् का उत्तर संतुलित है — दोनों मार्ग मोक्ष देने वाले हैं, पर कर्मयोग 'विशिष्यते' — श्रेष्ठ है। क्यों? क्योंकि कर्मसंन्यास कठिन है; मन के शुद्ध हुए बिना कर्म छोड़ना केवल बाहरी दिखावा बन जाता है। कर्मयोग सरल और व्यावहारिक है — व्यक्ति अपने कर्तव्य करते हुए धीरे-धीरे मन को शुद्ध करता है। साथ ही, कर्मयोगी समाज के लिये भी उपयोगी रहता है। अधिकांश लोगों के लिये, विशेषकर अर्जुन जैसे क्षत्रिय के लिये, कर्मयोग ही उचित मार्ग है।
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
अन्वय
(हे) महाबाहो! यः न द्वेष्टि, न काङ्क्षति, सः नित्यसंन्यासी ज्ञेयः; हि निर्द्वन्द्वः (सः) बन्धात् सुखं प्रमुच्यते।
हिन्दी अनुवाद
हे महाबाहो! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है; क्योंकि राग-द्वेषादि द्वन्द्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है।
भावार्थ
भगवान् सच्चे संन्यास की परिभाषा देते हैं — वह बाहरी वेश या घर छोड़ने में नहीं, बल्कि मन की अवस्था में है। जो किसी से द्वेष नहीं करता और किसी वस्तु की लालसा नहीं रखता, वह गृहस्थ होते हुए भी 'नित्यसंन्यासी' — सदा का संन्यासी है। इसके विपरीत, गेरुआ वस्त्र पहनकर भी जिसके मन में राग-द्वेष हैं, वह सच्चा संन्यासी नहीं। 'सुखं बन्धात्प्रमुच्यते' — ऐसा व्यक्ति सहजता से, बिना कठिन तपस्या के, बन्धन से छूट जाता है। संन्यास भीतर का त्याग है, बाहर का नहीं।
सांख्य (ज्ञानयोग) और कर्मयोग को अज्ञानी लोग अलग-अलग फल देने वाले कहते हैं, न कि पण्डितजन; क्योंकि दोनों में से एक में भी भली-भाँति स्थित पुरुष दोनों के फल रूप परमात्मा को प्राप्त होता है।
भावार्थ
भगवान् कहते हैं कि ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग को अलग-अलग मानना 'बाल' — अपरिपक्व बुद्धि — का लक्षण है। ज्ञानी जानते हैं कि दोनों का लक्ष्य एक है। जैसे एक पहाड़ की चोटी पर पहुँचने के दो रास्ते हों — दोनों से एक ही चोटी मिलती है। जो किसी एक मार्ग पर भी पूरी निष्ठा से चलता है, उसे वही फल मिलता है जो दूसरे मार्ग से मिलता। यह श्लोक साम्प्रदायिक संकीर्णता के विरुद्ध है — मार्गों पर झगड़ना व्यर्थ है, महत्व लक्ष्य का है।
यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५ ॥
अन्वय
सांख्यैः यत् स्थानं प्राप्यते, तत् योगैः अपि गम्यते; यः सांख्यं च योगं च एकं पश्यति, सः (यथार्थं) पश्यति।
हिन्दी अनुवाद
ज्ञानयोगियों द्वारा जो परम धाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है; इसलिये जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है।
भावार्थ
पिछले श्लोक की बात को और दृढ़ किया गया है। 'यः पश्यति स पश्यति' — जो दोनों को एक देखता है, वही वास्तव में देखता है; बाकी लोग देखते हुए भी अन्धे हैं। यह वाक्य गीता में कई बार आता है और सम्यक् दृष्टि को रेखांकित करता है। ज्ञानयोगी विवेक से अहंकार को मिटाता है, कर्मयोगी निष्काम सेवा से — दोनों अन्ततः एक ही स्थिति में पहुँचते हैं जहाँ 'मैं' का भ्रम मिट जाता है। सत्य एक है, उस तक पहुँचने के रास्ते अनेक।
परन्तु हे महाबाहो! कर्मयोग के बिना संन्यास अर्थात् मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है; और भगवत्स्वरूप का मनन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है।
भावार्थ
यहाँ भगवान् स्पष्ट करते हैं कि कर्मयोग क्यों श्रेष्ठ है — क्योंकि कर्मयोग के बिना सच्चा संन्यास प्राप्त करना कठिन है। जिसका मन अभी शुद्ध नहीं हुआ, वह कर्म छोड़कर बैठे तो मन विषयों का चिन्तन करता रहेगा। कर्मयोग मन को शुद्ध करने की सीढ़ी है; शुद्ध मन में ही सच्चा संन्यास सम्भव है। इसलिये कर्मयोगी 'नचिरेण' — शीघ्र ही ब्रह्म को पा लेता है। यह व्यावहारिक आध्यात्मिकता है — पहले कर्तव्य से मन को निर्मल करो, फिर त्याग स्वतः आयेगा।
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७ ॥
अन्वय
योगयुक्तः विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः सर्वभूतात्मभूतात्मा (पुरुषः) कुर्वन् अपि न लिप्यते।
हिन्दी अनुवाद
जिसका मन अपने वश में है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरण वाला है और सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।
भावार्थ
कर्मयोगी के पाँच लक्षण बताये गये हैं — 'योगयुक्त' (समत्व में स्थित), 'विशुद्धात्मा' (शुद्ध हृदय वाला), 'विजितात्मा' (मन को जीतने वाला), 'जितेन्द्रिय' (इन्द्रियों को वश में रखने वाला), और 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' — जो सब प्राणियों में अपनी ही आत्मा को देखता है। अन्तिम गुण सबसे महत्वपूर्ण है: जब व्यक्ति सबमें स्वयं को देखता है, तो वह किसी का अहित नहीं कर सकता और उसके सारे कर्म सबके हित में होते हैं। ऐसे कर्म उसे बाँधते नहीं। यह विश्व-बन्धुत्व की आध्यात्मिक नींव है।
तत्त्व को जानने वाला योगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, चलता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ —
भावार्थ
यह और अगला श्लोक मिलकर एक वाक्य बनाते हैं। तत्त्वज्ञानी योगी जीवन की सब सामान्य क्रियाएँ करता है — देखना, सुनना, छूना, सूँघना, खाना, चलना, सोना, साँस लेना — फिर भी भीतर से यह मानता है कि 'मैं कुछ नहीं करता'। यह आलस्य नहीं, बल्कि गहरी समझ है कि ये क्रियाएँ प्रकृति के द्वारा, इन्द्रियों के द्वारा हो रही हैं; आत्मा केवल साक्षी है। यहाँ ज्ञानेन्द्रियों (देखना, सुनना आदि) और कर्मेन्द्रियों (चलना, खाना आदि) तथा प्राण (श्वास) — सबकी क्रियाओं को गिनाया गया है, ताकि स्पष्ट हो कि कोई भी क्रिया आत्मा की नहीं।
बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बरत रही हैं — इस प्रकार समझकर निःसन्देह ऐसा माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ।
भावार्थ
पिछले श्लोक का वाक्य यहाँ पूरा होता है। बोलना, मल-मूत्र त्यागना, ग्रहण करना, पलक खोलना-मूँदना — इन सब क्रियाओं के बीच भी योगी यह धारणा रखता है कि 'इन्द्रियाँ अपने विषयों में बरत रही हैं', मैं (आत्मा) इनसे अलग हूँ। यह साक्षी-भाव का अभ्यास है। जब हम अपने को शरीर और इन्द्रियों से अलग देखने लगते हैं, तो उनके सुख-दुःख हमें विचलित नहीं करते। यह कोई काल्पनिक विचार नहीं, बल्कि आत्म-स्वरूप की सच्चाई है, जिसे अभ्यास से अनुभव किया जा सकता है।
जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता।
भावार्थ
यह गीता की सबसे सुन्दर उपमाओं में से एक है — 'पद्मपत्रमिवाम्भसा'। कमल का पत्ता जल में ही रहता है, पर उस पर जल की एक बूँद भी नहीं ठहरती। वैसे ही जो व्यक्ति अपने सब कर्म भगवान् को अर्पित करके, आसक्ति छोड़कर करता है, वह संसार में रहते हुए भी पाप से अछूता रहता है। संसार छोड़ने की आवश्यकता नहीं; संसार में रहो, पर संसार को अपने भीतर मत आने दो। कमल कीचड़ में खिलता है, फिर भी पवित्रता का प्रतीक है — यही कर्मयोगी का आदर्श है।
कर्मयोगी ममत्वबुद्धि-रहित केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा भी आसक्ति को त्यागकर अन्तःकरण की शुद्धि के लिये कर्म करते हैं।
भावार्थ
कर्मयोगी कर्म क्यों करते हैं? 'आत्मशुद्धये' — अन्तःकरण की शुद्धि के लिये। उनका उद्देश्य धन, यश या भोग नहीं, बल्कि मन की निर्मलता है। 'केवलैः' शब्द महत्वपूर्ण है — वे केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों से कर्म करते हैं, उनमें 'मैं' और 'मेरा' का भाव नहीं जोड़ते। जैसे मैले कपड़े को साबुन से रगड़कर धोया जाता है, वैसे ही निष्काम कर्म से मन का मैल धुलता है। कर्म साधन बन जाता है, साध्य नहीं।
कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत्प्राप्ति रूप शान्ति को प्राप्त होता है, और सकाम पुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बँधता है।
भावार्थ
दो प्रकार के व्यक्तियों की तुलना है। 'युक्त' — योगी — फल की चिन्ता छोड़कर कर्म करता है और 'नैष्ठिकी शान्ति' — स्थायी, अटल शान्ति पाता है। 'अयुक्त' — जो योग से रहित है — इच्छाओं से प्रेरित होकर कर्म करता है, फल में आसक्त रहता है और बँधता है। एक ही कर्म दो लोगों के लिये अलग परिणाम देता है — एक के लिये मुक्ति, दूसरे के लिये बन्धन। अन्तर कर्म में नहीं, भाव में है। फल की आसक्ति ही चिन्ता, भय और निराशा का कारण है।
वशी देही मनसा सर्वकर्माणि संन्यस्य नवद्वारे पुरे न एव कुर्वन् न कारयन् सुखम् आस्ते।
हिन्दी अनुवाद
अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्ययोग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नौ द्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनन्दपूर्वक सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है।
भावार्थ
शरीर को 'नवद्वार पुर' — नौ द्वारों वाला नगर — कहा गया है: दो आँखें, दो कान, दो नासिका-छिद्र, मुख, गुदा और उपस्थ। आत्मा इस नगर का निवासी है, स्वामी नहीं। ज्ञानी यह जानकर कि सारी क्रियाएँ इन द्वारों और इन्द्रियों द्वारा हो रही हैं, मन से सब कर्मों का त्याग कर देता है — वह न स्वयं करता है, न दूसरों से करवाता है, बस साक्षी बनकर सुखपूर्वक रहता है। जैसे किसी नगर का निवासी नगर के कार्यों को देखता है पर उनका कर्ता नहीं, वैसे ही आत्मा शरीर की क्रियाओं का साक्षी है।
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४ ॥
अन्वय
प्रभुः लोकस्य न कर्तृत्वं, न कर्माणि, न कर्मफलसंयोगं सृजति; तु स्वभावः प्रवर्तते।
हिन्दी अनुवाद
परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं; किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है।
भावार्थ
यह श्लोक एक बड़े प्रश्न का उत्तर देता है — क्या ईश्वर हमारे कर्मों का कर्ता है? भगवान् कहते हैं — नहीं। ईश्वर न किसी को कर्ता बनाते हैं, न कर्म करवाते हैं, न फल जोड़ते हैं। 'स्वभावस्तु प्रवर्तते' — जीव का अपना स्वभाव, उसकी प्रकृति, उसके पुराने संस्कार ही उसे कर्म में प्रवृत्त करते हैं। ईश्वर पर दोष डालना कि 'उन्होंने मुझसे यह करवाया' — उचित नहीं। प्रत्येक जीव अपने कर्मों का उत्तरदायी है। यह श्लोक मनुष्य की स्वतन्त्रता और उत्तरदायित्व दोनों को स्थापित करता है।
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५ ॥
अन्वय
विभुः कस्यचित् पापं न आदत्ते, सुकृतं च न एव (आदत्ते); अज्ञानेन ज्ञानम् आवृतम्, तेन जन्तवः मुह्यन्ति।
हिन्दी अनुवाद
सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभ कर्म को ही ग्रहण करता है; किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं।
भावार्थ
ईश्वर निष्पक्ष है — वह न किसी के पाप लेता है, न पुण्य। हर व्यक्ति अपने कर्मों का फल स्वयं भोगता है। तब लोग भ्रम में क्यों हैं? क्योंकि 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्' — ज्ञान अज्ञान से ढका है, जैसे सूर्य बादलों से ढक जाता है। सूर्य हमेशा है, पर बादल उसे छिपा देते हैं; वैसे ही आत्म-ज्ञान हमारे भीतर सदा है, पर अज्ञान उसे ढक देता है। इसी आवरण के कारण जीव अपने को कर्ता और भोक्ता मानकर सुख-दुःख में उलझा रहता है। बादल हटाने की देर है, सूर्य स्वयं प्रकाशित है।
परन्तु जिनका वह अज्ञान परमात्मा के तत्त्वज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस सच्चिदानन्दघन परमात्मा को प्रकाशित कर देता है।
भावार्थ
पिछले श्लोक की उपमा आगे बढ़ती है। जब ज्ञान से अज्ञान नष्ट हो जाता है, तो वह ज्ञान 'आदित्यवत्' — सूर्य की तरह — परम सत्य को प्रकाशित कर देता है। जैसे सूर्योदय होते ही अन्धकार स्वयं भाग जाता है और सब वस्तुएँ स्पष्ट दिखने लगती हैं, वैसे ही आत्म-ज्ञान होते ही परमात्मा का स्वरूप स्पष्ट हो जाता है। ज्ञान को कुछ बनाना नहीं पड़ता, केवल अज्ञान को हटाना पड़ता है। सत्य पहले से है; केवल उसे देखने वाली आँख खुलनी चाहिये।
जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही जिनकी निरन्तर एकीभाव से स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति को अर्थात् परमगति को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
परमात्मा की प्राप्ति के लिये चार स्तर बताये गये हैं — 'तद्बुद्धि' (बुद्धि परमात्मा में लगी हो), 'तदात्मा' (मन परमात्मा में तल्लीन हो), 'तन्निष्ठ' (पूरी निष्ठा परमात्मा में हो) और 'तत्परायण' (परमात्मा ही जीवन का परम लक्ष्य हो)। जब सम्पूर्ण व्यक्तित्व — बुद्धि, मन, निष्ठा और लक्ष्य — परमात्मा में केन्द्रित हो जाता है, तो ज्ञान से सारे पाप धुल जाते हैं और व्यक्ति 'अपुनरावृत्ति' — फिर संसार में न लौटने वाली गति — पाता है। यह पूर्ण मुक्ति की अवस्था है।
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८ ॥
अन्वय
पण्डिताः विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे, गवि, हस्तिनि, शुनि च श्वपाके च एव समदर्शिनः (भवन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी ही होते हैं।
भावार्थ
यह गीता का समता का प्रसिद्ध श्लोक है। सच्चा ज्ञानी विद्वान् और विनम्र ब्राह्मण, पवित्र मानी जाने वाली गाय, विशाल हाथी, साधारण कुत्ते और समाज से बहिष्कृत चाण्डाल — सबमें 'समदर्शी' होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह सबसे एक जैसा व्यवहार करता है — गाय को घास और मनुष्य को भोजन देगा — बल्कि यह कि वह सबमें एक ही आत्मा, एक ही परमात्मा देखता है। बाहरी भेद — जाति, प्रजाति, ज्ञान — शरीर के हैं, आत्मा के नहीं। यह श्लोक सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध गीता का स्पष्ट उद्घोष है।
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९ ॥
अन्वय
येषां मनः साम्ये स्थितम्, तैः इह एव सर्गः जितः; हि ब्रह्म निर्दोषं समम्, तस्मात् ते ब्रह्मणि स्थिताः।
हिन्दी अनुवाद
जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है; क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही स्थित हैं।
भावार्थ
जिसका मन समता में स्थित है, उसने 'इहैव' — इसी जीवन में, मृत्यु से पहले ही — संसार को जीत लिया। संसार को जीतने का अर्थ है जन्म-मृत्यु के चक्र पर विजय। क्यों? क्योंकि ब्रह्म स्वयं 'निर्दोष' और 'सम' है; जो समता में स्थित है, वह ब्रह्म के समान हो गया, ब्रह्म में स्थित हो गया। मुक्ति मृत्यु के बाद मिलने वाली कोई वस्तु नहीं; यह जीवित रहते ही प्राप्त की जा सकती है — इसे 'जीवन्मुक्ति' कहते हैं। समता ही मुक्ति का द्वार है।
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥ २० ॥
अन्वय
स्थिरबुद्धिः असम्मूढः ब्रह्मवित् ब्रह्मणि स्थितः (पुरुषः) प्रियं प्राप्य न प्रहृष्येत्, अप्रियं च प्राप्य न उद्विजेत्।
हिन्दी अनुवाद
जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिरबुद्धि, संशयरहित, ब्रह्मवेत्ता पुरुष सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा में एकीभाव से नित्य स्थित है।
भावार्थ
ब्रह्मज्ञानी का व्यावहारिक लक्षण — प्रिय वस्तु मिलने पर अधिक हर्ष नहीं, अप्रिय मिलने पर उद्वेग नहीं। इसका अर्थ भावनाहीन होना नहीं, बल्कि भावनाओं का गुलाम न होना है। वह 'स्थिरबुद्धि' है — उसकी बुद्धि परिस्थितियों से डगमगाती नहीं; 'असम्मूढ' है — मोह से रहित। जीवन में अच्छी-बुरी घटनाएँ आती रहेंगी; उनसे विचलित न होना ही आन्तरिक स्वतन्त्रता है। जैसे समुद्र में लहरें उठती-गिरती हैं, पर समुद्र की गहराई शान्त रहती है।
बाहर के विषयों में आसक्ति-रहित अन्तःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित जो ध्यानजनित सात्त्विक आनन्द है, उसको प्राप्त होता है; तदनन्तर वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के ध्यान रूप योग में अभिन्न भाव से स्थित पुरुष अक्षय आनन्द का अनुभव करता है।
भावार्थ
सुख के दो स्रोत हैं — बाहरी विषय और भीतर की आत्मा। जो बाहरी विषयों — रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द — में आसक्त नहीं, वह अपने भीतर एक गहरा सुख पाता है। यह सुख किसी वस्तु पर निर्भर नहीं, इसलिये 'अक्षय' — कभी समाप्त न होने वाला है। बाहरी सुख क्षणिक हैं, क्योंकि वस्तुएँ बदलती और नष्ट होती हैं; आन्तरिक सुख स्थायी है, क्योंकि आत्मा शाश्वत है। जो सुख की खोज बाहर करता है, वह सदा प्यासा रहता है; जो भीतर खोजता है, वह तृप्त हो जाता है।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! ये हि संस्पर्शजाः भोगाः, ते आद्यन्तवन्तः दुःखयोनयः एव; बुधः तेषु न रमते।
हिन्दी अनुवाद
जो ये इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, वे यद्यपि विषयी पुरुषों को सुख रूप भासते हैं, तो भी दुःख के ही हेतु हैं और आदि-अन्त वाले अर्थात् अनित्य हैं; इसलिये हे कुन्तीपुत्र! बुद्धिमान् विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता।
भावार्थ
भगवान् विषय-भोगों का वास्तविक स्वरूप बताते हैं — वे 'दुःखयोनि' हैं, दुःख के गर्भ हैं। कैसे? पहले उन्हें पाने की इच्छा में दुःख, पाने के प्रयास में दुःख, मिल जाने पर खोने का भय, और खो जाने पर शोक। साथ ही वे 'आद्यन्तवन्त' हैं — उनका आरम्भ और अन्त है, वे स्थायी नहीं। स्वादिष्ट भोजन का सुख जीभ पर कुछ क्षण रहता है, फिर अधिक खाने पर पीड़ा। इसलिये 'बुध' — समझदार व्यक्ति — उनमें रमता नहीं; वह उनका उपयोग करता है, पर उनका दास नहीं बनता।
जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है।
भावार्थ
सच्चा सुखी कौन? वह जो काम (इच्छा) और क्रोध के 'वेग' — आवेग, तूफ़ान — को सहन कर सके। काम और क्रोध नदी की बाढ़ की तरह आते हैं; जो उन्हें रोक सकता है, बह नहीं जाता, वही योगी है। 'प्राक् शरीरविमोक्षणात्' — मृत्यु से पहले, इसी जीवन में यह क्षमता प्राप्त करनी चाहिये। इच्छा या क्रोध का आना स्वाभाविक है; उनके आवेग में बहकर कुछ कर देना कमज़ोरी है। आधुनिक मनोविज्ञान भी आवेग-नियन्त्रण को मानसिक परिपक्वता और सुख का आधार मानता है।
जो पुरुष अन्तरात्मा में ही सुख वाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त सांख्ययोगी शान्त ब्रह्म को प्राप्त होता है।
भावार्थ
योगी की तीन आन्तरिक विशेषताएँ — 'अन्तःसुख' (सुख भीतर से), 'अन्तराराम' (विश्राम और रमण भीतर) और 'अन्तर्ज्योति' (प्रकाश, ज्ञान भीतर से)। उसे सुख, आनन्द या ज्ञान के लिये बाहर देखने की आवश्यकता नहीं; वह आत्म-निर्भर है। ऐसा योगी 'ब्रह्मभूत' — ब्रह्म रूप हो जाता है और 'ब्रह्मनिर्वाण' पाता है। 'निर्वाण' का अर्थ है बुझ जाना — अहंकार, इच्छा और दुःख की ज्वाला का बुझ जाना; और 'ब्रह्मनिर्वाण' — ब्रह्म में पूर्ण शान्ति। यह परम मुक्ति की अवस्था है।
जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गये हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शान्त ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
ब्रह्मनिर्वाण पाने वाले ऋषियों के चार गुण — 'क्षीणकल्मष' (पाप नष्ट), 'छिन्नद्वैध' (द्वैत और संशय मिटे), 'यतात्मा' (मन संयमित) और 'सर्वभूतहिते रताः' — सब प्राणियों के कल्याण में लगे हुए। अन्तिम गुण विशेष ध्यान देने योग्य है: मुक्त व्यक्ति संसार से उदासीन नहीं होता, बल्कि सबके हित में लगा रहता है। उसकी मुक्ति स्वार्थी नहीं, करुणामय है। आध्यात्मिक उन्नति का सच्चा प्रमाण यही है कि व्यक्ति दूसरों के प्रति कितना करुणाशील हुआ।
काम-क्रोध से रहित, जीते हुए चित्त वाले, परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किये हुए ज्ञानी पुरुषों के लिये सब ओर से शान्त परब्रह्म परमात्मा ही परिपूर्ण है।
भावार्थ
जो काम और क्रोध से मुक्त हैं, जिनका चित्त संयमित है और जिन्होंने आत्मा को जान लिया है, उनके लिये ब्रह्मनिर्वाण 'अभितः' — चारों ओर, सब जगह — विद्यमान है। उन्हें मुक्ति पाने के लिये मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती; वे जीते-जी और मृत्यु के बाद भी, हर स्थिति में मुक्त हैं। जैसे मछली के लिये जल चारों ओर है, वैसे ही ज्ञानी के लिये शान्ति चारों ओर है। जहाँ भी वे हैं, वहीं स्वर्ग है।
बाहर के विषय-भोगों को न चिन्तन करता हुआ बाहर ही निकालकर और नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके —
भावार्थ
यहाँ से भगवान् ध्यानयोग की संक्षिप्त विधि बताते हैं, जिसका विस्तार छठे अध्याय में होगा। पहला चरण — बाहरी विषयों को मन से बाहर कर देना, उनका चिन्तन न करना। दूसरा — दृष्टि को भौंहों के बीच (आज्ञा चक्र) पर स्थिर करना, जिससे मन एकाग्र होता है। तीसरा — नासिका में चलने वाले प्राण और अपान (श्वास-प्रश्वास) को सम करना, अर्थात् श्वास को धीमा, लयबद्ध और शान्त करना। ये तीनों मिलकर मन को बाहर से भीतर की ओर मोड़ते हैं। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८ ॥
अन्वय
यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मोक्षपरायणः विगतेच्छाभयक्रोधः यः मुनिः (भवति), सः सदा मुक्तः एव।
हिन्दी अनुवाद
जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जीती हुई हैं, ऐसा जो मोक्षपरायण मुनि इच्छा, भय और क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है।
भावार्थ
ध्यान का अभ्यास करने वाले मुनि की अवस्था — इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि नियन्त्रण में; जीवन का लक्ष्य केवल मोक्ष; और इच्छा, भय तथा क्रोध से पूर्ण मुक्ति। ऐसा व्यक्ति 'सदा मुक्त एव' — सदा मुक्त ही है, उसे किसी भविष्य की मुक्ति की प्रतीक्षा नहीं। इच्छा, भय और क्रोध — ये तीन मन की सबसे बड़ी बेड़ियाँ हैं। इच्छा से असन्तोष, भय से असुरक्षा, और क्रोध से अशान्ति आती है। जो इनसे मुक्त है, वह सचमुच स्वतन्त्र है।
मेरा भक्त मुझको सब यज्ञ और तपों का भोगने वाला, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर तथा सम्पूर्ण प्राणियों का सुहृद् अर्थात् स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी, ऐसा तत्त्व से जानकर शान्ति को प्राप्त होता है।
भावार्थ
पाँचवें अध्याय का समापन भक्ति के मधुर स्वर से होता है। भगवान् अपने तीन रूप बताते हैं — 'यज्ञतपसां भोक्ता' (सब यज्ञों और तपस्याओं को स्वीकार करने वाले), 'सर्वलोकमहेश्वर' (सब लोकों के परम स्वामी) और 'सुहृदं सर्वभूतानाम्' — सब प्राणियों के बिना स्वार्थ के हितैषी मित्र। अन्तिम विशेषण अत्यन्त सान्त्वनादायक है: इतने महान् ईश्वर भी हमारे सच्चे मित्र हैं, जो बिना किसी अपेक्षा के हमारा भला चाहते हैं। जो इसे जान लेता है, उसे परम शान्ति मिलती है — क्योंकि जिसका मित्र स्वयं परमेश्वर हो, उसे किसका भय? यह अध्याय 'कर्मसंन्यासयोग' कहलाता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥
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