अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — यः कर्मफलम् अनाश्रितः (सन्) कार्यं कर्म करोति, सः संन्यासी च योगी च (अस्ति); निरग्निः न, अक्रियः च न।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है।
भावार्थ
छठे अध्याय का आरम्भ फिर सच्चे संन्यास की परिभाषा से होता है। प्राचीन काल में संन्यासी यज्ञ की अग्नि छोड़ देते थे, इसलिये उन्हें 'निरग्नि' कहा जाता था। भगवान् कहते हैं कि केवल अग्नि या कर्म छोड़ देने से कोई संन्यासी या योगी नहीं बनता। सच्चा संन्यासी और योगी वह है जो 'कार्यं कर्म' — कर्तव्य कर्म — करता है, पर फल पर आश्रित नहीं रहता। संन्यास बाहरी त्याग नहीं, फल की आसक्ति का त्याग है। यह पाँचवें अध्याय की शिक्षा का निष्कर्ष है।
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥
अन्वय
(हे) पाण्डव! यं संन्यासम् इति प्राहुः, तं योगं विद्धि; हि असंन्यस्तसङ्कल्पः कश्चन योगी न भवति।
हिन्दी अनुवाद
हे पाण्डव! जिसको संन्यास ऐसा कहते हैं, उसी को तुम योग जानो; क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।
भावार्थ
संन्यास और योग वास्तव में एक ही हैं — दोनों का सार है 'संकल्प-त्याग'। संकल्प का अर्थ है मन की योजनाएँ और कामनाएँ — 'मुझे यह मिले', 'ऐसा हो जाये'। जब तक मन में ऐसे संकल्प उठते रहते हैं, तब तक व्यक्ति योगी नहीं बन सकता, क्योंकि संकल्प ही मन को चंचल बनाते हैं। संकल्पों को छोड़ना ही संन्यास है, और वही योग का आधार है। मन की शान्ति के लिये इच्छाओं की योजनाओं से मुक्त होना आवश्यक है।
योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिये योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है, और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है, वही कल्याण में हेतु कहा जाता है।
भावार्थ
भगवान् साधना की दो अवस्थाएँ बताते हैं। 'आरुरुक्षु' — जो योग की ओर चढ़ना चाहता है, आरम्भिक साधक — उसके लिये 'कर्म' साधन है; निष्काम कर्म से मन शुद्ध होता है। 'योगारूढ़' — जो योग में स्थित हो गया — उसके लिये 'शम' (मन की शान्ति) साधन है। जैसे सीढ़ी चढ़ने के लिये पैरों का चलना आवश्यक है, पर छत पर पहुँचकर विश्राम ही उचित है। साधना की हर अवस्था के अपने उपयुक्त साधन हैं; आरम्भ में कर्म छोड़ना हानिकारक है।
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥
अन्वय
यदा हि (साधकः) न इन्द्रियार्थेषु, न कर्मसु अनुषज्जते, तदा (सः) सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढः उच्यते।
हिन्दी अनुवाद
जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है।
भावार्थ
योगारूढ़ की पहचान — जब व्यक्ति न इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है, न कर्मों में। कई लोग विषय-भोगों से तो विरक्त हो जाते हैं, पर कर्म के प्रति आसक्ति बनी रहती है — 'मैं इतना सेवा-कार्य करता हूँ', 'मेरा यह प्रोजेक्ट'। योगारूढ़ इन दोनों से मुक्त होता है। वह 'सर्वसंकल्पसंन्यासी' है — उसके मन में कोई व्यक्तिगत योजना या कामना नहीं। यह योग की पूर्णता की अवस्था है, जहाँ मन पूर्ण रूप से शान्त है।
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥
अन्वय
आत्मना आत्मानम् उद्धरेत्, आत्मानं न अवसादयेत्; हि आत्मा एव आत्मनः बन्धुः, आत्मा एव आत्मनः रिपुः।
हिन्दी अनुवाद
अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले; क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।
भावार्थ
यह गीता के सबसे प्रेरक श्लोकों में से एक है। 'उद्धरेदात्मनात्मानम्' — अपना उद्धार स्वयं करो। कोई दूसरा — गुरु, देवता, या भाग्य — तुम्हारे लिये यह काम नहीं कर सकता; वे मार्ग दिखा सकते हैं, पर चलना तुम्हें ही है। 'नात्मानमवसादयेत्' — स्वयं को गिराओ मत, निराश मत करो। मनुष्य स्वयं ही अपना सबसे अच्छा मित्र है और स्वयं ही सबसे बड़ा शत्रु। हमारे विचार, आदतें और निर्णय ही हमें ऊपर उठाते या नीचे गिराते हैं। यह आत्म-उत्तरदायित्व और आत्म-विश्वास का अमर सन्देश है।
जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है; और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिये वह आप ही शत्रु के सदृश शत्रुता में बर्तता है।
भावार्थ
पिछले श्लोक की व्याख्या — कब मन मित्र होता है और कब शत्रु? जिसने अपने मन को जीत लिया, उसका मन उसका सबसे अच्छा मित्र बन जाता है — वह सही दिशा में ले जाता है, शान्ति और आनन्द देता है। जिसने मन को नहीं जीता, उसका मन शत्रु की तरह व्यवहार करता है — गलत इच्छाओं में फँसाता है, चिन्ता और भय से भर देता है। बाहरी शत्रु से तो बचा जा सकता है, पर भीतर के शत्रु से कैसे बचें? इसलिये मन पर विजय सबसे बड़ी विजय है।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७ ॥
अन्वय
जितात्मनः प्रशान्तस्य (पुरुषस्य) शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः परमात्मा समाहितः (भवति)।
हिन्दी अनुवाद
सरदी-गरमी और सुख-दुःखादि में तथा मान और अपमान में जिसके अन्तःकरण की वृत्तियाँ भली-भाँति शान्त हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मा वाले पुरुष के ज्ञान में सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक् प्रकार से स्थित है।
भावार्थ
जिसने मन को जीत लिया और जो प्रशान्त है, उसके हृदय में परमात्मा स्थिर रूप से प्रकट होते हैं। ऐसा व्यक्ति सर्दी-गर्मी (शारीरिक द्वन्द्व), सुख-दुःख (मानसिक द्वन्द्व) और मान-अपमान (सामाजिक द्वन्द्व) — तीनों स्तरों पर सम रहता है। मान-अपमान को सहना सबसे कठिन है; शरीर का कष्ट सह लेने वाले भी अपमान से विचलित हो जाते हैं। जो इन सबमें शान्त रहे, उसके भीतर परमात्मा का अनुभव निरन्तर बना रहता है। शान्त जल में ही चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखता है।
जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भली-भाँति जीती हुई हैं और जिसके लिये मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी युक्त अर्थात् भगवत्प्राप्त है, ऐसे कहा जाता है।
भावार्थ
युक्त योगी के लक्षण — 'ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा' — ज्ञान (शास्त्रीय समझ) और विज्ञान (अनुभव) से तृप्त; उसे और कुछ जानने की लालसा नहीं। 'कूटस्थ' — लोहार की निहाई की तरह अविचल; उस पर कितनी भी चोट पड़े, वह नहीं बदलती। 'समलोष्टाश्मकाञ्चन' — मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना उसके लिये समान हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि वह इनका भेद नहीं जानता, बल्कि यह कि सोने के प्रति उसमें लोभ नहीं। धन का मोह जिसके मन से चला गया, वह सचमुच स्वतन्त्र है।
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९ ॥
अन्वय
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु साधुषु पापेषु च अपि समबुद्धिः (योगी) विशिष्यते।
हिन्दी अनुवाद
सुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और बन्धुगणों में, धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यन्त श्रेष्ठ है।
भावार्थ
पिछले श्लोक में वस्तुओं के प्रति समता की बात थी, अब व्यक्तियों के प्रति। सुहृद् (बिना स्वार्थ के हितैषी), मित्र, शत्रु, उदासीन (जो किसी पक्ष में न हो), मध्यस्थ (जो दोनों का भला चाहे), द्वेष्य (जिससे द्वेष हो) और बन्धु — इन सबके प्रति, यहाँ तक कि साधु और पापी के प्रति भी समबुद्धि रखने वाला सर्वश्रेष्ठ है। वस्तुओं के प्रति सम होना कठिन है, पर व्यक्तियों के प्रति — विशेषकर शत्रुओं और पापियों के प्रति — सम होना उससे भी कठिन है। इसका अर्थ पाप का समर्थन नहीं, बल्कि पापी में भी आत्मा को देखना और उसके प्रति द्वेष न रखना है।
मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकान्त स्थान में स्थित होकर आत्मा को निरन्तर परमात्मा में लगावे।
भावार्थ
अब भगवान् ध्यानयोग की विस्तृत विधि आरम्भ करते हैं। ध्यान के लिये पहली आवश्यकताएँ — 'रहसि' (एकान्त स्थान, जहाँ विघ्न न हो), 'एकाकी' (अकेले, बिना साथियों के), 'यतचित्तात्मा' (मन और शरीर संयमित), 'निराशीः' (कोई आशा या कामना नहीं) और 'अपरिग्रह' (संग्रह की प्रवृत्ति नहीं)। ये बाहरी और भीतरी दोनों तैयारियाँ हैं। भीड़-भाड़ में मन बिखरता है, और कामनाओं से भरा मन ध्यान में टिकता नहीं। ध्यान से पहले वातावरण और मन दोनों को तैयार करना होता है।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥
अन्वय
शुचौ देशे न अत्युच्छ्रितं न अतिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् आत्मनः स्थिरम् आसनं प्रतिष्ठाप्य —
हिन्दी अनुवाद
शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके —
भावार्थ
ध्यान के आसन की विधि बताई गई है। स्थान 'शुचि' — पवित्र और स्वच्छ हो। आसन न बहुत ऊँचा हो (गिरने का भय) और न बहुत नीचा (भूमि की ठण्ड और कीड़ों से कष्ट)। पारम्परिक रूप से नीचे कुशा घास, उस पर मृगछाला और सबसे ऊपर वस्त्र बिछाया जाता था — कुशा भूमि की नमी से बचाती है, मृगछाला ऊष्मा देती है और वस्त्र कोमलता। आज के सन्दर्भ में इसका सार यह है कि ध्यान का स्थान स्वच्छ हो और आसन स्थिर तथा आरामदायक हो, ताकि शरीर का ध्यान न भटके।
उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिये योग का अभ्यास करे।
भावार्थ
आसन पर बैठकर क्या करना है — चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को नियन्त्रित करना और मन को 'एकाग्र' — एक बिन्दु पर केन्द्रित — करना। ध्यान का उद्देश्य है 'आत्मविशुद्धि' — अन्तःकरण की शुद्धि। ध्यान कोई चमत्कारिक शक्तियाँ पाने का साधन नहीं, बल्कि मन को निर्मल करने की प्रक्रिया है। जैसे हिलते पानी को स्थिर छोड़ देने से मिट्टी नीचे बैठ जाती है और पानी साफ़ हो जाता है, वैसे ही एकाग्रता से मन की अशुद्धियाँ शान्त हो जाती हैं।
काया, सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ —
भावार्थ
ध्यान की शारीरिक मुद्रा बताई गई है। शरीर, सिर और गर्दन एक सीधी रेखा में हों — 'सम' और 'अचल'। रीढ़ की हड्डी सीधी रखने से प्राण का प्रवाह सुचारु होता है और नींद या आलस्य नहीं आता। दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर टिकी हो — इससे आँखें न पूरी खुली रहती हैं (जिससे बाहरी विक्षेप हो) और न पूरी बन्द (जिससे नींद आ सकती है)। 'दिशश्चानवलोकयन्' — इधर-उधर न देखना। शरीर की स्थिरता मन की स्थिरता का आधार है।
ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, भयरहित तथा भली-भाँति शान्त अन्तःकरण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्त वाला और मेरे परायण होकर स्थित होवे।
भावार्थ
ध्यान के समय मन की अवस्था — 'प्रशान्तात्मा' (शान्त), 'विगतभीः' (भयरहित) और 'ब्रह्मचारिव्रते स्थितः' (संयम के व्रत में स्थित)। भय ध्यान का बड़ा विघ्न है — अज्ञात का भय, अकेलेपन का भय। ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल शारीरिक संयम नहीं, बल्कि सब इन्द्रियों का संयम और ब्रह्म में विचरण है। फिर मन को संयमित करके 'मच्चित्त' — भगवान् में चित्त लगाकर, 'मत्पर' — भगवान् को ही परम लक्ष्य मानकर बैठना है। यहाँ ध्यान भक्ति से जुड़ता है — ध्यान का लक्ष्य शून्य नहीं, परमात्मा है।
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५ ॥
अन्वय
एवं सदा आत्मानं युञ्जन् नियतमानसः योगी मत्संस्थां निर्वाणपरमां शान्तिम् अधिगच्छति।
हिन्दी अनुवाद
वश में किये हुए मन वाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरन्तर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठा रूप शान्ति को प्राप्त होता है।
भावार्थ
ध्यान के निरन्तर अभ्यास का फल — 'निर्वाणपरमा शान्ति' — ऐसी शान्ति जिसकी पराकाष्ठा निर्वाण (मुक्ति) है, और जो 'मत्संस्था' — भगवान् में स्थित है। 'सदा' शब्द महत्वपूर्ण है — ध्यान कभी-कभार करने से नहीं, नियमित और निरन्तर अभ्यास से फल मिलता है। जैसे बीज बोकर रोज़ पानी देने से ही वृक्ष बनता है। यह शान्ति कोई अस्थायी अनुभव नहीं, बल्कि परमात्मा में स्थायी स्थिति है।
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६ ॥
अन्वय
तु (हे) अर्जुन! अति अश्नतः योगः न अस्ति, एकान्तम् अनश्नतः च न, अतिस्वप्नशीलस्य च न, जाग्रतः च न एव (अस्ति)।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बिलकुल न खाने वाले का, न बहुत शयन करने के स्वभाव वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
भावार्थ
भगवान् योग के लिये संतुलन का सिद्धान्त देते हैं — अति हर चीज़ की बुरी है। अधिक भोजन से शरीर भारी और मन आलसी होता है; बिल्कुल न खाने से शरीर दुर्बल और मन भोजन के चिन्तन में लगा रहता है। अधिक सोने से तमोगुण बढ़ता है; बिल्कुल न सोने से शरीर थकता और मन अस्थिर होता है। यह 'मध्यम मार्ग' है — न कठोर तपस्या, न भोग-विलास। योग शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि उसे संतुलित रखना है। यह शिक्षा आधुनिक स्वास्थ्य-विज्ञान के भी अनुकूल है।
दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
भावार्थ
पिछले श्लोक का सकारात्मक पक्ष — 'युक्त' अर्थात् संतुलित जीवन-शैली। 'युक्ताहार' — उचित मात्रा में, सात्त्विक भोजन; 'युक्तविहार' — उचित मनोरंजन और भ्रमण; 'युक्तचेष्टा' — कर्मों में उचित परिश्रम, न अधिक न कम; 'युक्तस्वप्नावबोध' — उचित समय पर सोना और जागना। ऐसे संतुलित जीवन वाले के लिये योग 'दुःखहा' — दुःखों का नाश करने वाला — बनता है। योग केवल ध्यान के कुछ मिनट नहीं, पूरी दिनचर्या का अनुशासन है। स्वस्थ शरीर और संतुलित जीवन ही आध्यात्मिक उन्नति की नींव है।
अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में ही भली-भाँति स्थित हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण भोगों से स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है।
भावार्थ
योग की सिद्धि कब मानी जाये? जब 'विनियत' — भली-भाँति वश में किया हुआ — चित्त केवल आत्मा में स्थित हो जाये, और व्यक्ति सब कामनाओं से 'निःस्पृह' — इच्छारहित — हो जाये। मन का स्वभाव है बाहर भटकना; जब वह अपने स्रोत, आत्मा में ठहर जाता है, तो उसे बाहर कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती। जैसे नदी समुद्र में मिलकर शान्त हो जाती है। यह योग की अवस्था है — 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः'।
जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की कही गई है।
भावार्थ
यह ध्यान की सबसे सुन्दर उपमा है — 'निवातस्थ दीप'। जहाँ हवा नहीं चलती, वहाँ दीपक की लौ बिल्कुल स्थिर रहती है, ऊपर की ओर सीधी जलती है। योगी का चित्त ध्यान में ऐसा ही स्थिर हो जाता है। हवा के झोंके यहाँ इच्छाओं, विचारों और भावनाओं के प्रतीक हैं; जब ये शान्त हो जाते हैं, तो चित्त की ज्योति निश्चल हो जाती है। और जैसे स्थिर लौ अधिक प्रकाश देती है, वैसे ही स्थिर मन में आत्म-ज्ञान का प्रकाश स्पष्ट होता है।
योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त जिस अवस्था में उपराम हो जाता है और जिस अवस्था में परमात्मा के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा परमात्मा को साक्षात् करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही सन्तुष्ट रहता है —
भावार्थ
यहाँ से चार श्लोकों (20–23) में भगवान् योग की परम अवस्था — समाधि — का वर्णन करते हैं, जो एक लम्बा वाक्य है। पहली विशेषता — योग के अभ्यास से रोका गया चित्त 'उपरमते' — विश्राम पाता है, शान्त हो जाता है। दूसरी — साधक 'आत्मना आत्मानं पश्यन्' — अपने द्वारा अपने को देखता है, अर्थात् आत्म-साक्षात्कार करता है, और 'आत्मनि तुष्यति' — आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है। उसे सन्तोष के लिये किसी बाहरी वस्तु की आवश्यकता नहीं रहती। यह आत्म-निर्भर आनन्द की अवस्था है।
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥ २१ ॥
अन्वय
यत् तत् बुद्धिग्राह्यम् अतीन्द्रियम् आत्यन्तिकं सुखम् (अस्ति), यत्र (तत्) वेत्ति, यत्र च स्थितः अयं तत्त्वतः न एव चलति —
हिन्दी अनुवाद
इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है, और जिस अवस्था में स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरूप से विचलित होता ही नहीं —
भावार्थ
समाधि का सुख कैसा है? 'आत्यन्तिक' — अनन्त, जिसकी कोई सीमा नहीं; 'अतीन्द्रिय' — इन्द्रियों से परे, उनके द्वारा अनुभव नहीं किया जा सकता; 'बुद्धिग्राह्य' — केवल शुद्ध, सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण किया जा सकता है। इन्द्रियों का सुख सीमित और क्षणिक है, पर यह सुख अनन्त और स्थायी है। और इस अवस्था में स्थित होकर योगी 'तत्त्वतः न चलति' — सत्य से कभी विचलित नहीं होता। एक बार यह अनुभव हो जाने पर संसार के सुख फीके लगने लगते हैं।
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥ २२ ॥
अन्वय
यं च लब्ध्वा ततः अधिकम् अपरं लाभं न मन्यते, यस्मिन् स्थितः (सन्) गुरुणा दुःखेन अपि न विचाल्यते —
हिन्दी अनुवाद
परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उसके अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता, और परमात्मा प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता —
भावार्थ
समाधि की दो और विशेषताएँ — इसे पाकर व्यक्ति इससे बड़ा कोई और लाभ नहीं मानता; संसार की सारी सम्पत्ति, पद और यश उसके सामने तुच्छ लगते हैं। और इसमें स्थित होकर वह 'गुरुणा दुःखेन' — भारी से भारी दुःख से भी विचलित नहीं होता। रोग, हानि, प्रियजन का वियोग — कुछ भी उसकी आन्तरिक शान्ति को भंग नहीं कर सकता। यह इसलिये कि उसका आनन्द बाहरी परिस्थितियों पर नहीं, आत्मा पर आधारित है। जिसके पास सबसे बड़ा खज़ाना है, वह छोटी हानियों से नहीं घबराता।
जो दुःख रूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिये; वह योग न उकताये हुए अर्थात् धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है।
भावार्थ
भगवान् योग की एक अनूठी परिभाषा देते हैं — 'दुःखसंयोगवियोग' — दुःख के संयोग से वियोग, अर्थात् दुःख से सम्बन्ध का टूट जाना। सामान्यतः 'योग' का अर्थ जुड़ना है, पर यहाँ उसका अर्थ है दुःख से अलग होना — जो वास्तव में परमात्मा से जुड़ना ही है। इस योग का अभ्यास कैसे करें? 'निश्चयेन' — दृढ़ निश्चय से और 'अनिर्विण्णचेतसा' — बिना ऊबे, बिना निराश हुए। साधना में शीघ्र फल न मिलने पर लोग हतोत्साहित हो जाते हैं; पर धैर्य और उत्साह बनाये रखने वाला ही सफल होता है।
संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःशेष रूप से त्यागकर और मन के द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सभी ओर से भली-भाँति रोककर —
भावार्थ
अब भगवान् ध्यान की आन्तरिक प्रक्रिया बताते हैं। पहला चरण — 'संकल्पप्रभव कामों' का पूर्ण त्याग। कामनाएँ संकल्प से उत्पन्न होती हैं — पहले मन में विचार आता है, फिर उसके प्रति इच्छा। 'अशेषतः' — बिना कुछ शेष छोड़े, पूर्ण रूप से। दूसरा चरण — मन के द्वारा इन्द्रियों के समूह को सब ओर से रोकना। इन्द्रियाँ बाहर की ओर भागती हैं; मन उन्हें भीतर की ओर मोड़ता है। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।
क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरामता को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे।
भावार्थ
ध्यान की कुंजी — 'शनैः शनैः' — धीरे-धीरे। मन को ज़बरदस्ती नहीं, धीरे-धीरे शान्त करना है। जैसे जंगली घोड़े को एक दिन में नहीं साधा जा सकता, वैसे ही मन को धैर्य से साधना होता है। इसके लिये बुद्धि 'धृतिगृहीत' — धैर्य से युक्त — हो। फिर मन को आत्मा में स्थापित करके 'न किंचिदपि चिन्तयेत्' — कुछ भी चिन्तन न करे। यह विचार-शून्यता की अवस्था है, जो आरम्भ में कठिन लगती है, पर अभ्यास से सहज हो जाती है।
यह स्थिर न रहने वाला और चंचल मन जिस-जिस शब्दादि विषय के निमित्त से संसार में विचरता है, उस-उस विषय से रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार परमात्मा में ही निरुद्ध करे।
भावार्थ
यह ध्यान करने वाले हर व्यक्ति के लिये सबसे व्यावहारिक निर्देश है। मन 'चंचल' और 'अस्थिर' है — ध्यान में बैठते ही वह इधर-उधर भागने लगता है। भगवान् निराश होने को नहीं कहते, बल्कि उपाय बताते हैं — 'यतो यतो' — जहाँ-जहाँ मन भागे, 'ततस्ततो' — वहाँ-वहाँ से उसे वापस लाओ, और फिर आत्मा में लगाओ। यह बार-बार करना है, बिना खीझे। जैसे एक माँ खेलते बच्चे को बार-बार प्यार से वापस लाती है। मन का भटकना असफलता नहीं; उसे वापस लाना ही ध्यान का अभ्यास है।
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥
अन्वय
हि प्रशान्तमनसं शान्तरजसम् अकल्मषं ब्रह्मभूतम् एनं योगिनम् उत्तमं सुखम् उपैति।
हिन्दी अनुवाद
क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शान्त है, जो पाप से रहित है और जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को उत्तम आनन्द प्राप्त होता है।
भावार्थ
ध्यान के अभ्यास का फल — 'उत्तम सुख' स्वयं योगी के पास आता है ('उपैति')। उसे सुख के पीछे भागना नहीं पड़ता। इसके लिये योगी 'प्रशान्तमना' (शान्त मन), 'शान्तरजस्' (रजोगुण अर्थात् चंचलता और वासना शान्त), 'अकल्मष' (पापरहित) और 'ब्रह्मभूत' (ब्रह्म के साथ एक) होता है। रजोगुण ही मन की बेचैनी और इच्छाओं का कारण है; जब वह शान्त होता है, तो सत्त्वगुण का प्रकाश और आनन्द प्रकट होता है।
वह पापरहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनन्त आनन्द का अनुभव करता है।
भावार्थ
निरन्तर ध्यान से योगी 'ब्रह्मसंस्पर्श' — ब्रह्म के स्पर्श — का अनन्त सुख 'सुखेन' — सहजता से — अनुभव करता है। आरम्भ में ध्यान प्रयास-साध्य होता है, पर अभ्यास परिपक्व होने पर वह सहज और आनन्दमय हो जाता है। 'ब्रह्मसंस्पर्श' एक सुन्दर शब्द है — जैसे किसी प्रियजन का स्पर्श आनन्द देता है, वैसे ही परमात्मा का आन्तरिक स्पर्श अनन्त आनन्द देता है। यह अनुभव ही आध्यात्मिक जीवन का सार और लक्ष्य है।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ २९ ॥
अन्वय
योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः (योगी) आत्मानं सर्वभूतस्थं, सर्वभूतानि च आत्मनि ईक्षते।
हिन्दी अनुवाद
सर्वव्यापी अनन्त चेतन में एकीभाव से स्थिति रूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सब में समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है।
भावार्थ
ध्यान की परिपक्वता का फल — एकत्व की दृष्टि। योगी अपनी आत्मा को सब प्राणियों में और सब प्राणियों को अपनी आत्मा में देखता है। यह ईशोपनिषद् के प्रसिद्ध मन्त्र की प्रतिध्वनि है — 'यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति'। ऐसा व्यक्ति 'सर्वत्र समदर्शन' — सब जगह समान देखने वाला — होता है। जब हम सबमें स्वयं को देखते हैं, तो किसी से घृणा, ईर्ष्या या भय नहीं रहता। ध्यान का अन्तिम परिणाम एकान्त में बैठा व्यक्ति नहीं, बल्कि सारी सृष्टि से एकात्म अनुभव करने वाला प्रेमी हृदय है।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥
अन्वय
यः मां सर्वत्र पश्यति, सर्वं च मयि पश्यति, तस्य अहं न प्रणश्यामि, सः च मे न प्रणश्यति।
हिन्दी अनुवाद
जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।
भावार्थ
यह भक्ति और ज्ञान के मिलन का सुन्दर श्लोक है। जो भगवान् को सब जगह और सबको भगवान् में देखता है, उसके लिये भगवान् कभी 'प्रणश्यति' — ओझल — नहीं होते, और वह भी भगवान् की दृष्टि से कभी ओझल नहीं होता। यह परस्पर प्रेम का अटूट सम्बन्ध है। ऐसे भक्त के लिये हर फूल, हर चेहरा, हर घटना भगवान् का दर्शन है। और भगवान् भी उसे सदा अपनी दृष्टि में रखते हैं, उसकी रक्षा करते हैं। यह आश्वासन है कि सच्चा भक्त कभी अकेला नहीं होता।
जो पुरुष एकीभाव में स्थित होकर सम्पूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है।
भावार्थ
जो एकत्व-भाव में स्थित होकर सब प्राणियों में स्थित भगवान् को भजता है, वह 'सर्वथा वर्तमानोऽपि' — किसी भी परिस्थिति में, कोई भी कार्य करते हुए — भगवान् में ही रहता है। उसे ध्यान के लिये विशेष समय या स्थान की आवश्यकता नहीं; उसका सारा जीवन ही ध्यान बन जाता है। चाहे वह घर में हो या बाज़ार में, युद्ध में हो या पूजा में — वह सदा भगवान् में स्थित है। सबकी सेवा उसके लिये भगवान् की सेवा है।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥ ३२ ॥
अन्वय
(हे) अर्जुन! यः आत्मौपम्येन सर्वत्र सुखं वा यदि वा दुःखं समं पश्यति, सः योगी परमः मतः।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।
भावार्थ
परम योगी की कसौटी — 'आत्मौपम्य' — अपनी उपमा से, अपने जैसा मानकर सबके सुख-दुःख को देखना। जैसे मुझे दुःख अप्रिय है, वैसे ही सबको है; जैसे मुझे सुख प्रिय है, वैसे ही सबको। इस भाव से व्यक्ति स्वतः ही किसी को दुःख नहीं देता और सबके सुख में सहायक बनता है। यह करुणा और सहानुभूति का सर्वोच्च सिद्धान्त है, जो सब धर्मों का सार है — 'दूसरों के साथ वैसा व्यवहार करो जैसा तुम अपने साथ चाहते हो'। ध्यान का शिखर करुणा है।
अर्जुन बोले — हे मधुसूदन! जो यह योग आपने समभाव से कहा है, मन के चंचल होने से मैं इसकी नित्य स्थिति को नहीं देखता हूँ।
भावार्थ
अर्जुन ईमानदारी से अपनी कठिनाई रखते हैं। भगवान् ने समत्व-योग का जो सुन्दर वर्णन किया, वह सुनने में अद्भुत है, पर अर्जुन को उसकी 'स्थिर स्थिति' — स्थायी रूप से उसमें रहना — सम्भव नहीं लगता। कारण है मन की चंचलता। यह प्रश्न हर साधक का है — आदर्श सुन्दर है, पर मन साथ नहीं देता। अर्जुन का यह संशय भगवान् को अभ्यास और वैराग्य का अमूल्य उपदेश देने का अवसर देता है।
क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान् है; इसलिये उसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ।
भावार्थ
अर्जुन मन के चार स्वभाव बताते हैं — 'चंचल' (एक जगह नहीं टिकता), 'प्रमाथि' (मथ डालने वाला, विचलित कर देने वाला), 'बलवत्' (बहुत शक्तिशाली) और 'दृढ़' (हठी, अपनी आदतों में जड़ा हुआ)। उसे वश में करना वायु को मुट्ठी में बाँधने जैसा कठिन है। यह वर्णन अत्यन्त सटीक है और हर मनुष्य का अनुभव है। महान् योद्धा अर्जुन, जिन्होंने अनेक शत्रुओं को जीता, स्वीकार करते हैं कि मन को जीतना उनके लिये सबसे कठिन है। यह विनम्र स्वीकारोक्ति ही सीखने की शुरुआत है।
श्रीभगवान् बोले — हे महाबाहो! निःसन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; परन्तु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है।
भावार्थ
भगवान् अर्जुन की बात को पूरी तरह स्वीकार करते हैं — 'असंशयम्', निःसन्देह मन चंचल और कठिनाई से वश में होने वाला है। वे समस्या को छोटा नहीं बताते। पर फिर समाधान देते हैं — दो उपाय: 'अभ्यास' और 'वैराग्य'। अभ्यास — मन को बार-बार परमात्मा में लगाने का निरन्तर प्रयास। वैराग्य — विषयों के प्रति आसक्ति का त्याग, उनकी नश्वरता को समझना। अभ्यास मन को सही दिशा देता है, वैराग्य उसे गलत दिशा में जाने से रोकता है — जैसे पक्षी के दो पंख। पतंजलि के योगसूत्र में भी यही सूत्र है — 'अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः'।
जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है और वश में किये हुए मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन से उसका प्राप्त होना सहज है — यह मेरा मत है।
भावार्थ
भगवान् स्पष्ट करते हैं — जिसने मन को संयमित करने का प्रयास ही नहीं किया, उसके लिये योग कठिन है। पर जो 'यतता' — निरन्तर प्रयत्न करता है — और 'उपायतः' — सही उपायों से (अभ्यास और वैराग्य से) — आगे बढ़ता है, उसके लिये योग प्राप्त करना सम्भव है। सफलता प्रयत्न और सही विधि पर निर्भर है। कठिन होने का अर्थ असम्भव होना नहीं। यह श्लोक हर साधक को आशा देता है।
अर्जुन बोले — हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात् भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है?
भावार्थ
अर्जुन एक बहुत मानवीय और महत्वपूर्ण प्रश्न पूछते हैं — उस साधक का क्या होगा जिसमें श्रद्धा है, पर पर्याप्त प्रयत्न नहीं कर पाया, और जिसका मन योग से भटक गया, और वह सिद्धि पाने से पहले ही मर गया? क्या उसकी सारी साधना व्यर्थ हो गई? यह प्रश्न हर उस व्यक्ति के मन में उठता है जो आध्यात्मिक मार्ग पर चलना चाहता है, पर अपनी कमज़ोरियों से डरता है। भगवान् का उत्तर अत्यन्त आश्वासनदायक होगा।
हे महाबाहो! क्या वह भगवत्प्राप्ति के मार्ग में मोहित और आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादल की भाँति दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?
भावार्थ
अर्जुन का भय एक सुन्दर उपमा से व्यक्त होता है — 'छिन्नाभ्रमिव' — फटे हुए बादल की तरह। जैसे एक छोटा बादल का टुकड़ा बड़े बादल से अलग होकर, पर दूसरे बादल तक न पहुँचकर, आकाश में ही बिखर जाता है — न वर्षा कर पाता है, न कहीं का रहता है। वैसे ही क्या वह साधक, जिसने संसार के सुख छोड़ दिये पर परमात्मा को नहीं पाया, 'उभयविभ्रष्ट' — दोनों ओर से गिरा हुआ — नष्ट नहीं हो जाता? यह भय स्वाभाविक है।
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥ ३९ ॥
अन्वय
(हे) कृष्ण! मे एतं संशयम् अशेषतः छेत्तुम् (त्वम्) अर्हसि; हि त्वत् अन्यः अस्य संशयस्य छेत्ता न उपपद्यते।
हिन्दी अनुवाद
हे श्रीकृष्ण! मेरे इस संशय को सम्पूर्ण रूप से छेदन करने के लिये आप ही योग्य हैं; क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशय का छेदन करने वाला मिलना सम्भव नहीं है।
भावार्थ
अर्जुन भगवान् से अपने संशय को 'अशेषतः' — पूरी तरह — दूर करने की प्रार्थना करते हैं, और कहते हैं कि आपके सिवा कोई दूसरा यह कर नहीं सकता। यह इसलिये कि यह प्रश्न मृत्यु के बाद की गति का है, जिसे केवल सर्वज्ञ भगवान् ही निश्चित रूप से बता सकते हैं। अर्जुन की यह पूर्ण श्रद्धा और विनम्रता दिखाती है कि वे सच्चे जिज्ञासु हैं। सही गुरु के प्रति ऐसी श्रद्धा ही ज्ञान प्राप्ति का द्वार है।
श्रीभगवान् उवाच — (हे) पार्थ! तस्य न एव इह न अमुत्र विनाशः विद्यते; हि (हे) तात! कश्चित् कल्याणकृत् दुर्गतिं न गच्छति।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही; क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धार के लिये अर्थात् भगवत्प्राप्ति के लिये कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
भावार्थ
यह गीता के सबसे सान्त्वनादायक श्लोकों में से एक है। भगवान् अर्जुन को 'तात' — प्यारे, वत्स — कहकर सम्बोधित करते हैं, जो उनके स्नेह को प्रकट करता है। उत्तर स्पष्ट है — ऐसे साधक का न इस लोक में नाश होता है, न परलोक में। 'न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति' — कल्याण के मार्ग पर चलने वाला कोई भी व्यक्ति कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता। आध्यात्मिक मार्ग पर उठाया गया एक भी कदम व्यर्थ नहीं जाता। यह आश्वासन हर साधक को निर्भय होकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को अर्थात् स्वर्गादि उत्तम लोकों को प्राप्त होकर, उनमें बहुत वर्षों तक निवास करके फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमान् पुरुषों के घर में जन्म लेता है।
भावार्थ
भगवान् योगभ्रष्ट साधक की गति बताते हैं। पहले वह पुण्यात्माओं के लोकों (स्वर्गादि) में बहुत समय तक रहता है, अपनी साधना के पुण्य का फल भोगता है। फिर पृथ्वी पर 'शुचि' (पवित्र आचरण वाले) और 'श्रीमान्' (समृद्ध) परिवार में जन्म लेता है। ऐसे परिवार में जन्म का लाभ यह है कि उसे धर्म के संस्कार मिलते हैं और आजीविका की चिन्ता से मुक्त होकर वह साधना को आगे बढ़ा सकता है। साधना का कोई भी अंश खो नहीं जाता; वह अगले जन्म की नींव बनता है।
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२ ॥
अन्वय
अथवा धीमतां योगिनाम् एव कुले भवति; हि ईदृशं यत् जन्म, एतत् लोके दुर्लभतरम्।
हिन्दी अनुवाद
अथवा वैराग्यवान् पुरुष उन लोकों में न जाकर ज्ञानवान् योगियों के ही कुल में जन्म लेता है; परन्तु इस प्रकार का जो यह जन्म है, सो संसार में निःसन्देह अत्यन्त दुर्लभ है।
भावार्थ
दूसरी सम्भावना — जो साधक अधिक उन्नत था और जिसमें वैराग्य अधिक था, वह स्वर्ग में न जाकर सीधे 'धीमान् योगियों' — ज्ञानी योगियों — के कुल में जन्म लेता है। ऐसा जन्म 'दुर्लभतर' — अत्यन्त दुर्लभ — है, क्योंकि ऐसे परिवार में बचपन से ही आध्यात्मिक वातावरण, गुरु का सान्निध्य और साधना के संस्कार मिलते हैं। आदि शंकराचार्य, ज्ञानेश्वर जैसे महापुरुषों ने अल्पायु में ही जो ज्ञान प्रकट किया, उसे इसी पूर्व-जन्म की साधना का फल माना जाता है।
वहाँ उस पहले शरीर में संग्रह किये हुए बुद्धि-संयोग को अर्थात् समबुद्धि रूप योग के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है; और हे कुरुनन्दन! उसके प्रभाव से वह फिर परमात्मा की प्राप्ति रूप सिद्धि के लिये पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है।
भावार्थ
नये जन्म में साधक को 'पौर्वदेहिक बुद्धिसंयोग' — पिछले शरीर में अर्जित योग-बुद्धि के संस्कार — स्वतः प्राप्त हो जाते हैं। वह शून्य से आरम्भ नहीं करता, बल्कि जहाँ छोड़ा था वहीं से आगे बढ़ता है। और उन संस्कारों के प्रभाव से वह 'भूयः' — पहले से भी अधिक — प्रयत्न करता है। यह बताता है कि आध्यात्मिक प्रगति संचित होती है; जैसे बैंक में जमा धन ब्याज सहित वापस मिलता है। कुछ बच्चों में जन्म से ही भक्ति या ज्ञान की असाधारण रुचि इसी का प्रमाण मानी जाती है।
वह श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहले के अभ्यास से ही निःसन्देह भगवान् की ओर आकर्षित किया जाता है; तथा समबुद्धि रूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों के फल को उल्लंघन कर जाता है।
भावार्थ
पूर्व जन्म के अभ्यास की शक्ति अद्भुत है — व्यक्ति 'अवशः' — न चाहते हुए भी, परिस्थितियों के विपरीत होते हुए भी — उसी दिशा में खिंचता चला जाता है। जैसे चुम्बक लोहे को खींचता है। और योग का केवल 'जिज्ञासु' — जिसमें केवल जानने की इच्छा जगी हो — वह भी 'शब्दब्रह्म' — वेदों के कर्मकाण्ड और उनके सकाम फलों — से ऊपर उठ जाता है। अर्थात् आध्यात्मिक जिज्ञासा का होना ही इतना मूल्यवान है कि वह व्यक्ति को सांसारिक कर्मकाण्ड से ऊपर ले जाता है।
परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी तो पिछले अनेक जन्मों के संस्कारबल से इसी जन्म में संसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापों से रहित हो फिर तत्काल ही परमगति को प्राप्त हो जाता है।
भावार्थ
भगवान् योगभ्रष्ट की यात्रा का अन्त बताते हैं — वह प्रयत्नपूर्वक साधना करता हुआ, सब पापों से शुद्ध होकर, 'अनेकजन्मसंसिद्ध' — अनेक जन्मों की साधना से सिद्ध होकर — परम गति को प्राप्त होता है। आध्यात्मिक यात्रा कई जन्मों तक चल सकती है, पर हर कदम लक्ष्य की ओर ही ले जाता है। कोई प्रयास व्यर्थ नहीं जाता। यह धैर्य और आशा का सन्देश है — हमें एक जन्म में सब कुछ पा लेने का दबाव नहीं लेना चाहिये, बस निरन्तर चलते रहना चाहिये।
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है; इसलिये हे अर्जुन! तू योगी हो।
भावार्थ
भगवान् योगी की श्रेष्ठता घोषित करते हैं — वह 'तपस्वियों' (कठोर शारीरिक तप करने वालों) से श्रेष्ठ है, 'ज्ञानियों' (केवल शास्त्र पढ़ने वालों) से श्रेष्ठ है और 'कर्मियों' (सकाम कर्मकाण्ड करने वालों) से श्रेष्ठ है। क्यों? क्योंकि तपस्वी शरीर को साधता है, ज्ञानी बुद्धि को, कर्मी कर्म को — पर योगी सम्पूर्ण व्यक्तित्व को परमात्मा से जोड़ता है। इसलिये भगवान् का आह्वान है — 'तस्माद्योगी भवार्जुन' — हे अर्जुन, तुम योगी बनो! यह हर मनुष्य के लिये आह्वान है।
सम्पूर्ण योगियों में भी जो श्रद्धावान् योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मा से मुझको निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है।
भावार्थ
छठे अध्याय का समापन एक अद्भुत मोड़ से होता है। योगियों में भी सर्वश्रेष्ठ कौन? वह जो 'श्रद्धावान्' है और 'मद्गतेन अन्तरात्मना' — भगवान् में लीन हृदय से — भगवान् को भजता है। अर्थात् योग का शिखर भक्ति है। ध्यान, प्राणायाम, आसन — ये सब साधन हैं; उनका सर्वोच्च लक्ष्य भगवान् के प्रति प्रेमपूर्ण समर्पण है। यह श्लोक गीता के अगले छह अध्यायों (7–12) की भूमिका है, जिनमें भक्ति और भगवान् के स्वरूप का विस्तार से वर्णन है। यह अध्याय 'आत्मसंयमयोग' या 'ध्यानयोग' कहलाता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥
ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।