अर्जुन ने कहा — हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं?
भावार्थ
सातवें अध्याय के अन्त में भगवान् ने कुछ पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया था — ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ। अर्जुन एक सच्चे जिज्ञासु की तरह इन सबका अर्थ पूछते हैं। यह दिखाता है कि वे केवल सुन नहीं रहे, बल्कि हर शब्द को ध्यान से समझने का प्रयास कर रहे हैं। अच्छा शिष्य वही है जो संशय होने पर बिना संकोच प्रश्न पूछे। आठवें अध्याय का आरम्भ इन्हीं प्रश्नों से होता है।
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ २ ॥
अन्वय
(हे) मधुसूदन! अत्र अस्मिन् देहे अधियज्ञः कः, कथं (च)? नियतात्मभिः प्रयाणकाले च (त्वं) कथं ज्ञेयः असि?
हिन्दी अनुवाद
हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं?
भावार्थ
अर्जुन दो और प्रश्न जोड़ते हैं — अधियज्ञ कौन है और वह शरीर में कैसे रहता है? और सबसे महत्वपूर्ण — मृत्यु के समय संयमी पुरुष भगवान् को कैसे जानते हैं? यह अन्तिम प्रश्न हर मनुष्य के लिये गहरा महत्व रखता है। मृत्यु निश्चित है; उस समय मन की अवस्था क्या हो, और भगवान् का स्मरण कैसे बना रहे? इसका उत्तर इस अध्याय का मुख्य विषय है। कुल सात प्रश्न अर्जुन ने पूछे, जिनका उत्तर भगवान् क्रम से देंगे।
श्रीभगवान् ने कहा — परम अक्षर ब्रह्म है, अपना स्वरूप अर्थात् जीवात्मा अध्यात्म नाम से कहा जाता है, तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह कर्म नाम से कहा गया है।
भावार्थ
भगवान् क्रम से उत्तर देते हैं। 'ब्रह्म' — परम अक्षर, अविनाशी, जो कभी क्षीण नहीं होता; यही परम सत्य है। 'अध्यात्म' — 'स्वभाव', अर्थात् अपना वास्तविक स्वरूप, जीवात्मा; शरीर में रहने वाला चेतन तत्त्व। 'कर्म' — वह 'विसर्ग' (त्याग, सृजन की शक्ति) जो प्राणियों की उत्पत्ति और विकास का कारण है; यहाँ कर्म का अर्थ सृष्टि को चलाने वाली क्रिया है। ये तीन परिभाषाएँ सृष्टि के मूल तत्त्वों को स्पष्ट करती हैं।
उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष अधिदैव है, और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीर में मैं वासुदेव ही अन्तर्यामी रूप से अधियज्ञ हूँ।
भावार्थ
शेष परिभाषाएँ — 'अधिभूत' — 'क्षर भाव', अर्थात् नश्वर भौतिक जगत्, जो बनता और नष्ट होता है। 'अधिदैव' — 'पुरुष', अर्थात् विराट् पुरुष या हिरण्यगर्भ, जो सब देवताओं का अधिष्ठाता है। 'अधियज्ञ' — स्वयं भगवान्, जो इस शरीर में अन्तर्यामी रूप से रहते हैं और सब यज्ञों (कर्मों) के भोक्ता हैं। यह अद्भुत सत्य है कि भगवान् हमारे शरीर में ही विद्यमान हैं; उन्हें बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं। हमारा हर कर्म उन्हीं को अर्पित होता है।
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ ५ ॥
अन्वय
यः च अन्तकाले माम् एव स्मरन् कलेवरं मुक्त्वा प्रयाति, सः मद्भावं याति; अत्र संशयः न अस्ति।
हिन्दी अनुवाद
जो पुरुष अन्तकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह मेरे साक्षात् स्वरूप को प्राप्त होता है — इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
भावार्थ
अब अर्जुन के अन्तिम प्रश्न का उत्तर — मृत्यु के समय क्या हो? भगवान् कहते हैं: जो मृत्यु के समय भगवान् का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह निःसन्देह भगवान् को प्राप्त होता है। यह अत्यन्त आश्वासनदायक वचन है। 'नास्त्यत्र संशयः' — इसमें कोई संशय नहीं। भारतीय परम्परा में मृत्यु-शय्या पर भगवन्नाम सुनाने, गीता-पाठ करने की प्रथा इसी श्लोक पर आधारित है। अजामिल की कथा, जिसने मृत्यु के समय 'नारायण' पुकारा, इसका प्रसिद्ध उदाहरण है।
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥ ६ ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! (मनुष्यः) अन्ते यं यं वा अपि भावं स्मरन् कलेवरं त्यजति, सदा तद्भावभावितः (सः) तं तम् एव एति।
हिन्दी अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यह मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, उस-उस को ही प्राप्त होता है; क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है।
भावार्थ
यह एक सार्वभौमिक नियम है — मृत्यु के समय जो भाव मन में होता है, वही अगले जन्म का आधार बनता है। पर यहाँ एक महत्वपूर्ण शब्द है — 'सदा तद्भावभावितः' — जिस भाव से वह सदा भावित रहा। अर्थात् मृत्यु के समय का विचार अचानक नहीं आता; वह जीवन भर के विचारों और संस्कारों का परिणाम होता है। जो जीवन भर धन के बारे में सोचता रहा, मृत्यु के समय भी धन ही याद आयेगा। राजा भरत की कथा प्रसिद्ध है, जो हिरण के मोह में मरकर हिरण बने। इसलिये जीवन भर अच्छे विचारों का अभ्यास आवश्यक है।
इसलिये हे अर्जुन! तू सब समय में निरन्तर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर; इस प्रकार मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू निःसन्देह मुझको ही प्राप्त होगा।
भावार्थ
यह श्लोक गीता के व्यावहारिक सन्देश का सार है — 'मामनुस्मर युध्य च' — मेरा स्मरण करो और युद्ध भी करो। भगवान् यह नहीं कहते कि सब कुछ छोड़कर केवल स्मरण करो; वे कहते हैं कि अपना कर्तव्य करते हुए स्मरण करो। 'सर्वेषु कालेषु' — हर समय, हर परिस्थिति में। जैसे एक माँ घर के काम करते हुए भी अपने बच्चे का ध्यान रखती है। जब मन और बुद्धि भगवान् को अर्पित हों, तो कर्म भी पूजा बन जाता है, और मृत्यु के समय स्वतः भगवान् का स्मरण होता है।
हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाश रूप दिव्य पुरुष को अर्थात् परमेश्वर को ही प्राप्त होता है।
भावार्थ
निरन्तर स्मरण कैसे सम्भव है? 'अभ्यासयोग' से — बार-बार अभ्यास से। और चित्त 'नान्यगामी' हो — दूसरी ओर न भटकने वाला। आरम्भ में मन भटकेगा, पर अभ्यास से वह भगवान् में टिकने लगेगा। जैसे नदी बार-बार एक ही मार्ग से बहकर अपना गहरा मार्ग बना लेती है, वैसे ही बार-बार भगवान् का चिन्तन मन में एक गहरा संस्कार बना देता है। ऐसा साधक 'परम दिव्य पुरुष' को प्राप्त होता है।
जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता, सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करने वाले, अचिन्त्य स्वरूप, सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविद्या से अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का स्मरण करता है —
भावार्थ
यह भगवान् के ध्यान योग्य स्वरूप का अत्यन्त सुन्दर वर्णन है, जो त्रिष्टुप् छन्द में है। 'कवि' — सर्वज्ञ, द्रष्टा; 'पुराण' — सबसे प्राचीन, अनादि; 'अनुशासिता' — सबके नियन्ता; 'अणोरणीयान्' — सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, जो परमाणु में भी व्याप्त है; 'सर्वस्य धाता' — सबके पालनकर्ता; 'अचिन्त्यरूप' — जिनका रूप मन की कल्पना से परे है; 'आदित्यवर्ण' — सूर्य के समान तेजस्वी; 'तमसः परस्तात्' — अन्धकार (अज्ञान) से परे। ये आठ विशेषण ध्यान के लिये आधार प्रदान करते हैं। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।
वह भक्तियुक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है।
भावार्थ
मृत्यु के समय योगी की साधना का वर्णन है। तीन बातें आवश्यक हैं — 'अचल मन' (स्थिर, न डगमगाने वाला), 'भक्ति' (प्रेमपूर्ण समर्पण) और 'योगबल' (जीवन भर के अभ्यास से अर्जित शक्ति)। इनसे योगी प्राण को भौंहों के बीच (आज्ञा चक्र) में स्थापित करके शरीर छोड़ता है और परम पुरुष को प्राप्त होता है। ध्यान देने योग्य है कि यहाँ भक्ति और योग दोनों साथ हैं। मृत्यु के समय यह क्षमता अचानक नहीं आती; यह जीवन भर की साधना का फल है।
वेद के जानने वाले विद्वान् जिस सच्चिदानन्दघन रूप परमपद को अविनाशी कहते हैं, आसक्तिरहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परमपद को चाहने वाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परमपद को मैं तेरे लिये संक्षेप से कहूँगा।
भावार्थ
भगवान् उस परम पद का वर्णन करने का वचन देते हैं, जो सब साधकों का लक्ष्य है। वेद के ज्ञाता उसे 'अक्षर' (अविनाशी) कहते हैं; वीतराग संन्यासी उसमें प्रवेश करते हैं; और उसे पाने के लिये ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य का कठोर व्रत पालते हैं। विभिन्न परम्पराओं के साधक — विद्वान्, संन्यासी, ब्रह्मचारी — सब एक ही लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। भगवान् इसे 'संग्रहेण' — संक्षेप में — बतायेंगे, अर्थात् सार रूप में।
सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश में स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मन द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित करके, परमात्म-सम्बन्धी योगधारणा में स्थित होकर —
भावार्थ
मृत्यु के समय योगी की विधि का विस्तार — पहले सब इन्द्रियों के द्वारों (आँख, कान आदि) को बन्द करना, ताकि बाहरी विषय भीतर न आयें। फिर मन को हृदय में रोकना, जहाँ आत्मा का निवास माना गया है। फिर प्राण को 'मूर्धा' — सिर के ऊपरी भाग (ब्रह्मरन्ध्र) — में स्थापित करना। और 'योगधारणा' — योग की एकाग्रता — में स्थित रहना। यह उच्च योगियों की साधना है, जो जीवन भर के अभ्यास से ही सम्भव है। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है।
जो पुरुष 'ॐ' इस एक अक्षर रूप ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थ स्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिन्तन करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह पुरुष परमगति को प्राप्त होता है।
भावार्थ
'ॐ' को 'एकाक्षर ब्रह्म' कहा गया है — एक अक्षर में सम्पूर्ण ब्रह्म। ॐ में अ, उ, म — तीन ध्वनियाँ हैं, जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं के प्रतीक हैं, और उसके बाद का मौन तुरीय (चौथी, परम) अवस्था का। मृत्यु के समय ॐ का उच्चारण करते हुए और भगवान् का स्मरण करते हुए जो शरीर छोड़ता है, वह परम गति पाता है। ॐ सब मन्त्रों का मूल है; उसका जप जीवन भर करने से मृत्यु के समय वह स्वतः स्मरण में आता है।
हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्य चित्त होकर सदा ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमें युक्त हुए योगी के लिये मैं सुलभ हूँ, अर्थात् उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ।
भावार्थ
पिछले श्लोकों में कठिन योग-साधना का वर्णन था; अब भगवान् एक सरल मार्ग बताते हैं — 'अनन्यचेताः सततं' — अनन्य चित्त से निरन्तर स्मरण। जो ऐसा करता है, उसके लिये भगवान् 'सुलभ' — आसानी से प्राप्त होने वाले — हैं। यह भक्ति मार्ग की सरलता है। प्राण को ब्रह्मरन्ध्र में ले जाने जैसी जटिल विधियाँ सबके लिये सम्भव नहीं, पर प्रेम से निरन्तर स्मरण हर कोई कर सकता है। भगवान् प्रेम से बँधते हैं, तकनीक से नहीं।
परम सिद्धि को प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दुःखों के घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होते।
भावार्थ
भगवान् को प्राप्त होने का फल — फिर जन्म नहीं होता। और जन्म को दो विशेषण दिये गये हैं — 'दुःखालय' (दुःखों का घर) और 'अशाश्वत' (क्षणभंगुर)। संसार में जन्म लेना दुःखों के घर में रहने जैसा है — जन्म का कष्ट, रोग, बुढ़ापा, वियोग, मृत्यु। और यह सब अस्थायी भी है। जो महात्मा भगवान् को प्राप्त हो जाते हैं, वे इस चक्र से सदा के लिये मुक्त हो जाते हैं। यही 'परम संसिद्धि' — सर्वोच्च सफलता — है।
हे अर्जुन! ब्रह्मलोक पर्यन्त सब लोक पुनरावर्ती हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता।
भावार्थ
भगवान् एक बड़ा सत्य बताते हैं — ब्रह्मलोक तक, जो सर्वोच्च लोक माना जाता है, सब लोक 'पुनरावर्ती' हैं — वहाँ से भी लौटना पड़ता है। स्वर्ग, इन्द्रलोक, ब्रह्मलोक — कितने भी ऊँचे हों, वे स्थायी नहीं; पुण्य समाप्त होने पर वापस आना होता है। केवल भगवान् को प्राप्त होने पर ही पुनर्जन्म नहीं होता। इसलिये बुद्धिमान् साधक स्वर्ग की कामना नहीं करता, बल्कि सीधे भगवान् को चाहता है। स्वर्ग एक सुन्दर होटल है, पर घर नहीं।
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥
अन्वय
ये जनाः ब्रह्मणः यत् अहः सहस्रयुगपर्यन्तं, रात्रिं (च) युगसहस्रान्तां विदुः, ते अहोरात्रविदः (सन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
ब्रह्मा का जो एक दिन है, उसको एक हज़ार चतुर्युगी तक की अवधि वाला और रात्रि को भी एक हज़ार चतुर्युगी तक की अवधि वाली जो पुरुष तत्त्व से जानते हैं, वे योगीजन काल के तत्त्व को जानने वाले हैं।
भावार्थ
भगवान् ब्रह्माण्ड के विशाल काल-चक्र का वर्णन करते हैं। ब्रह्मा का एक दिन एक हज़ार चतुर्युगों (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि) के बराबर है — लगभग 4.32 अरब मानव वर्ष। और उनकी रात भी उतनी ही लम्बी। यह भारतीय काल-गणना की विशालता दिखाती है, जो आधुनिक विज्ञान द्वारा बताई गई ब्रह्माण्ड की आयु के आश्चर्यजनक रूप से निकट है। इस विशाल काल के सामने मनुष्य का जीवन एक क्षण से भी छोटा है — यह समझ हमें विनम्र बनाती है और सांसारिक आसक्ति को कम करती है।
सम्पूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेश काल में अव्यक्त से अर्थात् ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर से उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेश काल में उस अव्यक्त नामक ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर में ही लीन हो जाते हैं।
भावार्थ
सृष्टि और प्रलय का चक्र — ब्रह्मा के दिन के आरम्भ में सब व्यक्त पदार्थ 'अव्यक्त' — अप्रकट, सूक्ष्म अवस्था — से प्रकट होते हैं, और रात्रि आने पर उसी अव्यक्त में विलीन हो जाते हैं। जैसे वृक्ष बीज से निकलता है और अन्त में बीज में ही समा जाता है। सृष्टि शून्य से नहीं बनती और शून्य में नहीं मिटती; वह केवल प्रकट और अप्रकट होती रहती है। यह ऊर्जा-संरक्षण के वैज्ञानिक सिद्धान्त जैसा ही है — कुछ नष्ट नहीं होता, केवल रूप बदलता है।
हे पार्थ! वही यह भूत-समुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृति के वश में हुआ रात्रि के प्रवेश काल में लीन होता है और दिन के प्रवेश काल में फिर उत्पन्न होता है।
भावार्थ
प्राणियों का समूह बार-बार उत्पन्न होता और लीन होता रहता है — 'भूत्वा भूत्वा' — होकर, होकर। और यह सब 'अवशः' — विवशता से — होता है; प्राणियों का इस पर कोई नियन्त्रण नहीं। वे प्रकृति और कर्म के नियमों से बँधे हैं। यह संसार-चक्र की विवशता है, जिससे मुक्ति केवल भगवान् की प्राप्ति से ही सम्भव है। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि जब तक हम मुक्त नहीं होते, तब तक इस अनन्त चक्र में घूमते रहेंगे।
उस अव्यक्त से भी अति परे दूसरा अर्थात् विलक्षण जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह परम दिव्य पुरुष सब भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।
भावार्थ
अब भगवान् एक और 'अव्यक्त' की बात करते हैं, जो पहले वाले अव्यक्त (प्रकृति) से भी परे है। यह 'सनातन' — शाश्वत — है और जब सारे प्राणी, यहाँ तक कि ब्रह्मा भी नष्ट हो जाते हैं, तब भी यह नष्ट नहीं होता। यह परमात्मा का स्वरूप है। प्रकृति का अव्यक्त भी परिवर्तनशील है — वह सृष्टि और प्रलय के चक्र में है; पर परमात्मा का अव्यक्त स्वरूप इस चक्र से परे, सदा एक-सा है। यही वह परम सत्य है जिसे पाना सब साधनाओं का लक्ष्य है।
जो अव्यक्त 'अक्षर' इस नाम से कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परमगति कहते हैं, तथा जिस सनातन अव्यक्त भाव को प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परम धाम है।
भावार्थ
उस सनातन अव्यक्त को 'अक्षर' — अविनाशी — कहा गया है, और वही 'परमा गति' — सर्वोच्च लक्ष्य — है। उसे प्राप्त होकर कोई वापस नहीं लौटता। भगवान् उसे 'मम परमं धाम' — मेरा परम धाम — कहते हैं। यह वह स्थान (या अवस्था) है जहाँ भगवान् स्वयं निवास करते हैं। सभी आध्यात्मिक परम्पराएँ इसी परम धाम की बात करती हैं — कोई इसे वैकुण्ठ कहता है, कोई गोलोक, कोई ब्रह्म, कोई निर्वाण। नाम अलग हैं, सत्य एक है।
हे पार्थ! जिस परमात्मा के अन्तर्गत सर्वभूत हैं और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह समस्त जगत् परिपूर्ण है, वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है।
भावार्थ
उस परम पुरुष को कैसे पाया जाये? 'भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया' — केवल अनन्य भक्ति से। वह परम पुरुष ऐसे हैं कि सारे प्राणी उनके भीतर हैं और वे सारे जगत् में व्याप्त हैं — 'येन सर्वमिदं ततम्'। इतने विशाल, सर्वव्यापी परमात्मा को पाने का मार्ग जटिल नहीं, बल्कि सरल है — अनन्य प्रेम। 'अनन्य' का अर्थ है — किसी और की ओर ध्यान न हो, केवल भगवान्। यह श्लोक भक्ति की सर्वोच्चता को फिर से स्थापित करता है।
हे अर्जुन! जिस काल में शरीर त्यागकर गये हुए योगीजन तो वापस न लौटने वाली गति को और जिस काल में गये हुए वापस लौटने वाली गति को ही प्राप्त होते हैं, उस काल को अर्थात् दोनों मार्गों को कहूँगा।
भावार्थ
अब भगवान् मृत्यु के बाद के दो मार्गों का वर्णन करते हैं — एक जिससे लौटना नहीं होता (अनावृत्ति) और दूसरा जिससे लौटना होता है (आवृत्ति)। यहाँ 'काल' शब्द का अर्थ केवल समय नहीं, बल्कि उन समयों के अधिष्ठाता देवताओं द्वारा संचालित मार्ग है। यह विषय उपनिषदों (छान्दोग्य, बृहदारण्यक) में 'देवयान' और 'पितृयान' के रूप में वर्णित है। भगवान् इस प्राचीन ज्ञान को संक्षेप में बताते हैं।
जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता है, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गये हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपर्युक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाये जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
यह 'शुक्ल मार्ग' या 'देवयान' का वर्णन है — प्रकाश का मार्ग। अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण — ये सब प्रकाश के प्रतीक हैं। ब्रह्मज्ञानी इस मार्ग से जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं और लौटते नहीं। महाभारत में भीष्म पितामह ने उत्तरायण की प्रतीक्षा में शरशय्या पर प्राण रोके रखे थे, जो इसी मान्यता से जुड़ा है। आध्यात्मिक दृष्टि से, प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है — जो ज्ञान के प्रकाश में जीवन जीता है, वही इस मार्ग का अधिकारी है।
जिस मार्ग में धूमाभिमानी देवता है, रात्रि-अभिमानी देवता है तथा कृष्ण पक्ष का अभिमानी देवता है और दक्षिणायन के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गया हुआ सकाम कर्म करने वाला योगी उपर्युक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले गया हुआ चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभ कर्मों का फल भोगकर वापस आता है।
भावार्थ
यह 'कृष्ण मार्ग' या 'पितृयान' का वर्णन है — धुएँ और अन्धकार का मार्ग। धूम, रात्रि, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन — ये अन्धकार के प्रतीक हैं। सकाम कर्म करने वाले, जो पुण्य तो करते हैं पर फल की इच्छा से, इस मार्ग से चन्द्रलोक (स्वर्ग) जाते हैं, वहाँ पुण्य का फल भोगते हैं और फिर पृथ्वी पर लौट आते हैं। यह बुरा मार्ग नहीं, पर अपूर्ण है — इसमें मुक्ति नहीं। धुआँ अग्नि का अपूर्ण रूप है — वैसे ही सकाम कर्म ज्ञान का अपूर्ण रूप है।
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽऽवर्तते पुनः ॥ २६ ॥
अन्वय
हि जगतः एते शुक्लकृष्णे गती शाश्वते मते; एकया अनावृत्तिं याति, अन्यया पुनः आवर्तते।
हिन्दी अनुवाद
क्योंकि जगत् के ये दो प्रकार के — शुक्ल और कृष्ण अर्थात् देवयान और पितृयान — मार्ग सनातन माने गये हैं; इनमें एक द्वारा गया हुआ, जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता, उस परमगति को प्राप्त होता है और दूसरे के द्वारा गया हुआ फिर वापस आता है अर्थात् जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता है।
भावार्थ
भगवान् सारांश देते हैं — ये दोनों मार्ग, शुक्ल और कृष्ण, 'शाश्वत' — सदा से चले आ रहे — हैं। एक से जाने वाला लौटता नहीं, दूसरे से जाने वाला लौटता है। यह चुनाव हमारे हाथ में है — हम कैसा जीवन जीते हैं, किस भाव से कर्म करते हैं, उसी से निर्धारित होता है कि हम किस मार्ग से जायेंगे। ज्ञान और निष्काम भक्ति शुक्ल मार्ग की ओर ले जाते हैं; सकाम कर्म कृष्ण मार्ग की ओर।
हे पार्थ! इस प्रकार इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानता हुआ कोई भी योगी मोहित नहीं होता; इस कारण हे अर्जुन! तू सब काल में समबुद्धि रूप योग से युक्त हो अर्थात् निरन्तर मेरी प्राप्ति के लिये साधन करने वाला हो।
भावार्थ
इन दोनों मार्गों को जानने का क्या लाभ? जो योगी इन्हें जानता है, वह 'न मुह्यति' — मोहित नहीं होता। वह स्वर्ग के सुखों के लालच में नहीं पड़ता, क्योंकि जानता है कि वे अस्थायी हैं; वह सीधे परम लक्ष्य की ओर बढ़ता है। इसलिये भगवान् का निष्कर्ष है — 'सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भव' — हर समय योग में युक्त रहो। मृत्यु कब आयेगी, कोई नहीं जानता; इसलिये हर क्षण तैयार रहना चाहिये। उत्तरायण या दक्षिणायन से अधिक महत्वपूर्ण है मन की अवस्था।
योगी इदं विदित्वा, वेदेषु यज्ञेषु तपःसु दानेषु च एव यत् पुण्यफलं प्रदिष्टम्, तत् सर्वम् अत्येति, आद्यं परं स्थानं च उपैति।
हिन्दी अनुवाद
योगी पुरुष इस रहस्य को तत्त्व से जानकर वेदों के पढ़ने में तथा यज्ञ, तप और दानादि के करने में जो पुण्यफल कहा है, उन सबको निःसन्देह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परमपद को प्राप्त होता है।
भावार्थ
आठवें अध्याय का समापन — जो योगी इस ज्ञान को समझ लेता है, वह वेद-पाठ, यज्ञ, तप और दान से मिलने वाले सब पुण्य-फलों को 'अत्येति' — पार कर जाता है, उनसे ऊपर उठ जाता है। ये सब शुभ कर्म अच्छे हैं, पर उनका फल सीमित है। योगी इनसे ऊपर उठकर 'आद्य परम स्थान' — सबके मूल परम धाम — को प्राप्त होता है। यह अध्याय 'अक्षरब्रह्मयोग' कहलाता है, जिसमें ब्रह्म, अध्यात्म आदि की परिभाषाएँ, मृत्यु के समय स्मरण का महत्व और शुक्ल-कृष्ण मार्गों का वर्णन है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नाम अष्टमोऽध्यायः ॥
ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।