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🪷 श्रीमद्भगवद्गीता

मूल श्लोक, अन्वय, सरल हिन्दी अनुवाद एवं विस्तृत भावार्थ सहित

अध्याय ९ — राजविद्याराजगुह्ययोग

३४ श्लोक · प्रत्येक पर अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ

📌 परम गोपनीय राजविद्या; अनन्य भक्ति, योगक्षेम का वचन, पत्र-पुष्प-फल-तोय का भाव।
९.१ श्रीभगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — अनसूयवे ते तु इदं गुह्यतमं विज्ञानसहितं ज्ञानं प्रवक्ष्यामि, यत् ज्ञात्वा (त्वम्) अशुभात् मोक्ष्यसे।
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — तुझ दोषदृष्टि-रहित भक्त के लिये इस परम गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान को पुनः भली-भाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू दुःख रूप संसार से मुक्त हो जायेगा।
भावार्थ
नौवाँ अध्याय 'राजविद्या राजगुह्ययोग' कहलाता है और गीता के हृदय के रूप में माना जाता है। भगवान् इसे 'गुह्यतम' — सबसे गोपनीय — ज्ञान कहते हैं। यह ज्ञान अर्जुन को इसलिये दिया जा रहा है कि वे 'अनसूयु' हैं — दोष देखने की प्रवृत्ति से रहित। जो व्यक्ति गुरु या भगवान् में दोष ढूँढता है, वह ज्ञान ग्रहण नहीं कर सकता। ईर्ष्या और छिद्रान्वेषण मन के द्वार बन्द कर देते हैं; श्रद्धा और विनम्रता उन्हें खोलती है।
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्। प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ २ ॥
अन्वय
इदं राजविद्या राजगुह्यम् उत्तमं पवित्रं प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं कर्तुं सुसुखम् अव्ययं (च अस्ति)।
हिन्दी अनुवाद
यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फल वाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है।
भावार्थ
भगवान् इस ज्ञान की आठ विशेषताएँ बताते हैं। 'राजविद्या' — सब विद्याओं का राजा; 'राजगुह्य' — सब रहस्यों का राजा; 'पवित्र' — शुद्ध करने वाला; 'उत्तम' — सर्वश्रेष्ठ; 'प्रत्यक्षावगम' — जिसका फल प्रत्यक्ष अनुभव होता है, केवल विश्वास पर आधारित नहीं; 'धर्म्य' — धर्म के अनुकूल; 'सुसुखं कर्तुम्' — करने में अत्यन्त सरल; और 'अव्यय' — जिसका फल कभी नष्ट नहीं होता। विशेष रूप से 'सुसुखं कर्तुम्' ध्यान देने योग्य है — भक्ति का मार्ग कठिन नहीं, सरल और आनन्दमय है।
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥ ३ ॥
अन्वय
(हे) परन्तप! अस्य धर्मस्य अश्रद्दधानाः पुरुषाः माम् अप्राप्य मृत्युसंसारवर्त्मनि निवर्तन्ते।
हिन्दी अनुवाद
हे परन्तप! इस उपर्युक्त धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्यु रूप संसार-चक्र में भ्रमण करते रहते हैं।
भावार्थ
इतना सरल और श्रेष्ठ मार्ग होते हुए भी सब लोग इसे क्यों नहीं अपनाते? कारण है 'अश्रद्धा'। जो इस धर्म में श्रद्धा नहीं रखते, वे भगवान् को प्राप्त नहीं होते और 'मृत्युसंसारवर्त्म' — जन्म-मृत्यु के चक्र के मार्ग — में लौटते रहते हैं। श्रद्धा आध्यात्मिक जीवन की नींव है। जैसे कोई दवा पर विश्वास न करे और उसे खाये ही नहीं, तो रोग ठीक नहीं होगा — चाहे दवा कितनी भी अच्छी हो।
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ४ ॥
अन्वय
अव्यक्तमूर्तिना मया इदं सर्वं जगत् ततम्; सर्वभूतानि मत्स्थानि, अहं च तेषु न अवस्थितः।
हिन्दी अनुवाद
मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत् जल से बर्फ़ के सदृश परिपूर्ण है, और सब भूत मेरे अन्तर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किन्तु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।
भावार्थ
भगवान् एक रहस्यमय सत्य प्रकट करते हैं। वे अपने 'अव्यक्त' — निराकार — रूप से सारे जगत् में व्याप्त हैं। सब प्राणी उनमें स्थित हैं, पर वे प्राणियों में स्थित नहीं। यह विरोधाभास इसलिये है कि भगवान् सबके आधार हैं, पर किसी पर निर्भर नहीं। जैसे पृथ्वी पर सब वस्तुएँ टिकी हैं, पर पृथ्वी उन वस्तुओं पर नहीं टिकी। भगवान् सबमें व्याप्त होते हुए भी सबसे परे और स्वतन्त्र हैं।
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५ ॥
अन्वय
भूतानि च मत्स्थानि न; मे ऐश्वरं योगं पश्य; मम आत्मा भूतभृत् भूतभावनः (च), न च भूतस्थः।
हिन्दी अनुवाद
वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं; किन्तु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है।
भावार्थ
विरोधाभास और गहरा होता है — अब भगवान् कहते हैं कि प्राणी भी उनमें स्थित नहीं! 'पश्य मे योगमैश्वरम्' — मेरे ईश्वरीय योग को देखो। यह भगवान् की अचिन्त्य शक्ति है, जिसे सामान्य तर्क से नहीं समझा जा सकता। वे सबको धारण करते हैं, सबको उत्पन्न करते हैं, फिर भी किसी से बँधे नहीं। परमार्थ दृष्टि से केवल भगवान् ही सत्य हैं; प्राणियों का अलग अस्तित्व भ्रम है। जैसे स्वप्न में सारी सृष्टि स्वप्नद्रष्टा के मन में है, पर जागने पर वह कहीं नहीं।
यथाऽऽकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥ ६ ॥
अन्वय
यथा सर्वत्रगः महान् वायुः नित्यम् आकाशस्थितः, तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानि इति उपधारय।
हिन्दी अनुवाद
जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरने वाला महान् वायु सदा आकाश में ही स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं — ऐसा जान।
भावार्थ
भगवान् इस गूढ़ सत्य को एक सुन्दर उपमा से समझाते हैं। वायु सब जगह बहता है, कभी तेज़, कभी धीमा, कभी आँधी बनकर — पर वह सदा आकाश में ही रहता है। आकाश वायु को स्थान देता है, पर वायु की हलचल से आकाश प्रभावित नहीं होता। वैसे ही सारे प्राणी भगवान् में रहते हैं, अपने-अपने कर्म करते हैं, पर भगवान् उनसे अछूते रहते हैं। यह उपमा भगवान् की सर्वव्यापकता और निर्लिप्तता दोनों को स्पष्ट करती है।
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्। कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! कल्पक्षये सर्वभूतानि मामिकां प्रकृतिं यान्ति; कल्पादौ पुनः अहं तानि विसृजामि।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात् प्रकृति में लीन होते हैं, और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ।
भावार्थ
सृष्टि का चक्र — कल्प (ब्रह्मा के एक दिन) के अन्त में सब प्राणी भगवान् की प्रकृति में लीन हो जाते हैं, और नये कल्प के आरम्भ में भगवान् उन्हें फिर से प्रकट करते हैं। यह अनन्त काल से चल रहा है। जैसे समुद्र में लहरें उठती और गिरती हैं, वैसे ही सृष्टि प्रकट और विलीन होती है। प्रलय विनाश नहीं, विश्राम है; और सृष्टि नया आरम्भ। इस चक्र का संचालन भगवान् करते हैं, पर इससे प्रभावित नहीं होते।
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥ ८ ॥
अन्वय
स्वां प्रकृतिम् अवष्टभ्य प्रकृतेः वशात् अवशम् इमं कृत्स्नं भूतग्रामं पुनः पुनः विसृजामि।
हिन्दी अनुवाद
अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण भूत-समुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ।
भावार्थ
भगवान् अपनी प्रकृति को 'अवष्टभ्य' — अपने अधीन करके — सृष्टि करते हैं। प्राणी 'अवश' — विवश — हैं, क्योंकि वे 'प्रकृतेर्वशात्' — प्रकृति (अपने स्वभाव और कर्म) के वश में हैं। यहाँ भगवान् और जीव का मूल अन्तर स्पष्ट है: भगवान् प्रकृति के स्वामी हैं, जीव प्रकृति का दास। जीव अपने पिछले कर्मों के अनुसार बार-बार जन्म लेता है; भगवान् केवल उस प्रक्रिया को संचालित करते हैं। जीव की मुक्ति तभी है जब वह प्रकृति के स्वामी की शरण ले।
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥ ९ ॥
अन्वय
(हे) धनञ्जय! तेषु कर्मसु असक्तम् उदासीनवत् आसीनं मां च तानि कर्माणि न निबध्नन्ति।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के सदृश स्थित मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बाँधते।
भावार्थ
सृष्टि, पालन और संहार जैसे विशाल कर्म करते हुए भी भगवान् उनसे बँधते नहीं। क्यों? क्योंकि वे 'असक्त' — आसक्तिरहित — और 'उदासीनवत्' — उदासीन की भाँति — हैं। 'उदासीन' का अर्थ यहाँ उपेक्षा नहीं, बल्कि निष्पक्षता और निर्लिप्तता है — जैसे एक न्यायाधीश निर्णय देता है, पर किसी पक्ष से जुड़ा नहीं। यह कर्मयोग का सर्वोच्च आदर्श है — भगवान् स्वयं इसके उदाहरण हैं। हम भी अपने कर्मों में ऐसी निर्लिप्तता अपनाकर बन्धन से मुक्त हो सकते हैं।
मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! मया अध्यक्षेण प्रकृतिः सचराचरं सूयते; अनेन हेतुना जगत् विपरिवर्तते।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! मुझ अधिष्ठाता के सकाश से प्रकृति चराचर सहित सर्वजगत् को रचती है, और इस हेतु से ही यह संसार-चक्र घूम रहा है।
भावार्थ
सृष्टि वास्तव में कौन करता है? प्रकृति करती है, पर भगवान् की 'अध्यक्षता' — निरीक्षण और अधिष्ठान — में। भगवान् प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं करते; उनकी उपस्थिति मात्र से प्रकृति सक्रिय होती है। जैसे सूर्य के प्रकाश में पौधे बढ़ते हैं, फूल खिलते हैं — सूर्य कुछ करता नहीं, पर उसके बिना कुछ नहीं होता। या जैसे चुम्बक की उपस्थिति से लोहा हिलता है। इसी कारण यह संसार-चक्र निरन्तर घूमता रहता है।
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥
अन्वय
मम भूतमहेश्वरं परं भावम् अजानन्तः मूढाः मानुषीं तनुम् आश्रितं माम् अवजानन्ति।
हिन्दी अनुवाद
मेरे परमभाव को न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ सम्पूर्ण भूतों के महान् ईश्वर को तुच्छ समझते हैं।
भावार्थ
भगवान् कहते हैं कि जब वे मनुष्य रूप में आते हैं, तो 'मूढ़' लोग उनकी 'अवज्ञा' करते हैं — उन्हें साधारण मनुष्य समझकर तुच्छ मानते हैं। वे उनके 'परम भाव' — सब प्राणियों के महान् ईश्वर होने के सत्य — को नहीं पहचानते। शिशुपाल, दुर्योधन, कंस जैसे लोगों ने श्रीकृष्ण को केवल एक ग्वाला या राजनीतिज्ञ समझा। बाहरी रूप देखकर भीतर के सत्य को न पहचानना — यह मानव स्वभाव की बड़ी भूल है, जो केवल भगवान् के प्रति नहीं, साधारण लोगों के प्रति भी होती है।
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥
अन्वय
मोघाशाः मोघकर्माणः मोघज्ञानाः विचेतसः (ते) राक्षसीम् आसुरीं मोहिनीं प्रकृतिं च एव श्रिताः।
हिन्दी अनुवाद
वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किये रहते हैं।
भावार्थ
भगवान् को न पहचानने वालों की दशा — उनकी 'आशा मोघ' (व्यर्थ) है, क्योंकि वे नश्वर वस्तुओं से स्थायी सुख की आशा करते हैं; उनके 'कर्म मोघ' हैं, क्योंकि उनसे कोई स्थायी लाभ नहीं होता; उनका 'ज्ञान मोघ' है, क्योंकि वह सत्य तक नहीं पहुँचता। वे 'विचेतस' — भ्रमित चित्त वाले — हैं। वे तीन प्रकार की प्रकृति धारण करते हैं — 'राक्षसी' (क्रूर, हिंसक), 'आसुरी' (अहंकारी, कामी) और 'मोहिनी' (भ्रम में डालने वाली)। भगवान् से विमुख जीवन अन्ततः खोखला होता है।
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥
अन्वय
तु (हे) पार्थ! दैवीं प्रकृतिम् आश्रिताः महात्मानः मां भूतादिम् अव्ययं ज्ञात्वा अनन्यमनसः (सन्तः) भजन्ति।
हिन्दी अनुवाद
परन्तु हे कुन्तीपुत्र! दैवी प्रकृति के आश्रित महात्माजन मुझको सब भूतों का सनातन कारण और नाशरहित अक्षर स्वरूप जानकर अनन्य मन से युक्त होकर निरन्तर भजते हैं।
भावार्थ
इसके विपरीत, 'महात्मा' 'दैवी प्रकृति' — सात्त्विक, दिव्य स्वभाव — का आश्रय लेते हैं। वे भगवान् को 'भूतादि' — सब प्राणियों का मूल — और 'अव्यय' — अविनाशी — जानकर 'अनन्य मन' से भजते हैं। 'महात्मा' शब्द का अर्थ है — महान् आत्मा, जिसका हृदय विशाल हो। सच्ची महानता धन, पद या ज्ञान में नहीं, बल्कि भगवान् के प्रति अनन्य प्रेम में है। दैवी प्रकृति के गुणों का विस्तृत वर्णन सोलहवें अध्याय में मिलेगा।
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥ १४ ॥
अन्वय
(ते) दृढव्रताः सततं मां कीर्तयन्तः यतन्तः च, भक्त्या मां नमस्यन्तः च, नित्ययुक्ताः (सन्तः) उपासते।
हिन्दी अनुवाद
वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिये यत्न करते हुए और मुझको बार-बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं।
भावार्थ
महात्माओं की भक्ति के चार रूप बताये गये हैं — 'कीर्तन' (भगवान् के नाम और गुणों का गान), 'यत्न' (भगवान् की प्राप्ति के लिये प्रयत्न), 'नमस्कार' (भक्तिपूर्वक प्रणाम) और 'नित्ययुक्त उपासना' (निरन्तर ध्यान)। और वे 'दृढ़व्रत' हैं — उनका संकल्प अटल है। कीर्तन भक्ति का सबसे सरल और आनन्दमय रूप है — चैतन्य महाप्रभु, मीराबाई, सूरदास जैसे भक्तों ने कीर्तन से ही भगवान् को पाया। नमस्कार अहंकार को मिटाता है। ये सब मिलकर पूर्ण भक्ति बनते हैं।
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥
अन्वय
अन्ये च अपि ज्ञानयज्ञेन यजन्तः मां एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् उपासते।
हिन्दी अनुवाद
दूसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण-निराकार ब्रह्म का ज्ञानयज्ञ द्वारा अभिन्न भाव से पूजन करते हुए भी मेरी उपासना करते हैं, और दूसरे मनुष्य बहुत प्रकार से स्थित मुझ विराट् स्वरूप परमेश्वर की पृथक् भाव से उपासना करते हैं।
भावार्थ
भगवान् उपासना के विभिन्न रूपों को स्वीकार करते हैं। कुछ 'ज्ञानयज्ञ' से उपासना करते हैं — 'एकत्वेन' (अद्वैत भाव से, स्वयं को भगवान् से अभिन्न मानकर); कुछ 'पृथक्त्वेन' (द्वैत भाव से, स्वयं को सेवक और भगवान् को स्वामी मानकर); और कुछ 'बहुधा' (अनेक रूपों में, विभिन्न देवताओं के रूप में) 'विश्वतोमुख' — सब ओर मुख वाले विराट् भगवान् की उपासना करते हैं। यह श्लोक भारतीय दर्शन की सभी धाराओं — अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत — को एक साथ स्थान देता है।
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम्। मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ १६ ॥
अन्वय
अहं क्रतुः, अहं यज्ञः, अहं स्वधा, अहम् औषधम्, अहं मन्त्रः, अहम् एव आज्यम्, अहम् अग्निः, अहं हुतम्।
हिन्दी अनुवाद
क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषधि मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवन रूप क्रिया भी मैं ही हूँ।
भावार्थ
भगवान् कहते हैं कि यज्ञ का प्रत्येक अंग वे ही हैं। 'क्रतु' — वैदिक यज्ञ; 'यज्ञ' — स्मृति-विहित यज्ञ; 'स्वधा' — पितरों को दिया जाने वाला अन्न; 'औषध' — यज्ञ की वनस्पतियाँ; 'मन्त्र' — यज्ञ में बोले जाने वाले मन्त्र; 'आज्य' — घी; 'अग्नि' — यज्ञ की अग्नि; 'हुत' — आहुति की क्रिया। यह चौथे अध्याय के 'ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः' श्लोक की याद दिलाता है। जब हर क्रिया में भगवान् दिखते हैं, तो पूरा जीवन यज्ञ बन जाता है।
पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक् साम यजुरेव च ॥ १७ ॥
अन्वय
अहम् अस्य जगतः पिता, माता, धाता, पितामहः, वेद्यं, पवित्रम्, ओङ्कारः, ऋक्, साम, यजुः च एव (अस्मि)।
हिन्दी अनुवाद
इस सम्पूर्ण जगत् का धाता अर्थात् धारण करने वाला एवं कर्मों के फल को देने वाला, पिता, माता, पितामह, जानने योग्य, पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।
भावार्थ
भगवान् सम्पूर्ण जगत् के साथ अपने विभिन्न सम्बन्ध बताते हैं — 'पिता' (उत्पन्न करने वाले), 'माता' (गर्भ में धारण करने वाली प्रकृति), 'धाता' (पालन करने वाले), 'पितामह' (पिता के भी पिता, आदि कारण)। वे 'वेद्य' — जानने योग्य एकमात्र तत्त्व — हैं, 'पवित्र' — शुद्ध करने वाले — हैं, 'ओंकार' हैं और तीनों वेद हैं। भगवान् को माता-पिता के रूप में देखना भक्ति का अत्यन्त मधुर भाव है — जैसे बच्चा माता-पिता पर पूर्ण विश्वास करता है, वैसे ही भक्त भगवान् पर।
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥
अन्वय
(अहं) गतिः, भर्ता, प्रभुः, साक्षी, निवासः, शरणं, सुहृत्, प्रभवः, प्रलयः, स्थानं, निधानम्, अव्ययं बीजम् (अस्मि)।
हिन्दी अनुवाद
प्राप्त होने योग्य परम धाम, भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाहकर हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति-प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार, निधान और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ।
भावार्थ
भगवान् के बारह और स्वरूप — 'गति' (अन्तिम लक्ष्य), 'भर्ता' (पालनकर्ता), 'प्रभु' (स्वामी), 'साक्षी' (सब कर्मों के द्रष्टा), 'निवास' (सबका घर), 'शरण' (आश्रय), 'सुहृत्' (निःस्वार्थ मित्र), 'प्रभव' (उत्पत्ति-स्थान), 'प्रलय' (लय-स्थान), 'स्थान' (आधार), 'निधान' (भण्डार, जहाँ प्रलय में सब संचित रहता है) और 'अव्यय बीज' (अविनाशी कारण)। इनमें 'शरण' और 'सुहृत्' विशेष सान्त्वना देते हैं — जीवन की हर कठिनाई में भगवान् हमारे आश्रय और सच्चे मित्र हैं।
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ ॥
अन्वय
(हे) अर्जुन! अहं तपामि, अहं वर्षं निगृह्णामि उत्सृजामि च; अहम् अमृतं च एव मृत्युः च, सत् असत् च (अस्मि)।
हिन्दी अनुवाद
मैं ही सूर्य रूप से तपता हूँ, वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत्-असत् भी मैं ही हूँ।
भावार्थ
भगवान् प्रकृति की शक्तियों के रूप में अपना वर्णन करते हैं — सूर्य बनकर तपते हैं, जल को वाष्प रूप में खींचते हैं और वर्षा के रूप में बरसाते हैं। फिर विरोधी द्वन्द्वों के रूप में — 'अमृत और मृत्यु', 'सत् और असत्' (व्यक्त और अव्यक्त, कारण और कार्य)। भगवान् केवल अच्छी चीज़ों में नहीं, हर चीज़ में हैं — जीवन में भी, मृत्यु में भी। यह दृष्टि हमें जीवन के हर पहलू को स्वीकार करना सिखाती है। सब कुछ भगवान् की ही लीला है।
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक- मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥ २० ॥
अन्वय
त्रैविद्याः सोमपाः पूतपापाः (जनाः) यज्ञैः माम् इष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते; ते पुण्यं सुरेन्द्रलोकम् आसाद्य दिवि दिव्यान् देवभोगान् अश्नन्ति।
हिन्दी अनुवाद
तीनों वेदों में विधान किये हुए सकाम कर्मों को करने वाले, सोमरस को पीने वाले, पापरहित पुरुष मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं; वे पुरुष अपने पुण्यों के फल रूप स्वर्गलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं।
भावार्थ
भगवान् सकाम यज्ञ करने वालों की गति बताते हैं। 'त्रैविद्य' — तीनों वेदों के ज्ञाता, 'सोमप' — यज्ञ में सोमरस पीने वाले, 'पूतपाप' — पापों से शुद्ध — ये लोग यज्ञों से भगवान् की पूजा करते हैं, पर उनकी प्रार्थना स्वर्ग के लिये होती है। उन्हें स्वर्ग मिलता भी है — इन्द्रलोक के दिव्य भोग। ध्यान दें कि ये लोग पापी नहीं, पुण्यात्मा हैं; पर उनकी दृष्टि सीमित है — वे भगवान् से भगवान् को नहीं, स्वर्ग को माँगते हैं।
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ २१ ॥
अन्वय
ते तं विशालं स्वर्गलोकं भुक्त्वा पुण्ये क्षीणे मर्त्यलोकं विशन्ति; एवं त्रयीधर्मम् अनुप्रपन्नाः कामकामाः गतागतं लभन्ते।
हिन्दी अनुवाद
वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक को प्राप्त होते हैं; इस प्रकार स्वर्ग के साधन रूप तीनों वेदों में कहे हुए सकाम कर्म का आश्रय लेने वाले और भोगों की कामना वाले पुरुष बार-बार आवागमन को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
स्वर्ग की सीमा — जब पुण्य 'क्षीण' हो जाता है, जैसे बैंक का खाता खाली हो जाये, तो उन्हें मृत्युलोक (पृथ्वी) पर लौटना पड़ता है। 'गतागतम्' — जाना और आना — यही उनकी नियति है। 'कामकामाः' — कामनाओं की कामना करने वाले — इस चक्र से नहीं छूटते। स्वर्ग अस्थायी पुरस्कार है, स्थायी घर नहीं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि सबसे ऊँचे सांसारिक सुख भी अन्ततः समाप्त होते हैं; स्थायी शान्ति केवल भगवान् में है।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥
अन्वय
ये जनाः अनन्याः (सन्तः) मां चिन्तयन्तः पर्युपासते, तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमम् अहं वहामि।
हिन्दी अनुवाद
जो अनन्य प्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते हैं, उन नित्य-निरन्तर मेरा चिन्तन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ।
भावार्थ
यह गीता के सबसे प्रिय और प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है — 'योगक्षेमं वहाम्यहम्'। 'योग' का अर्थ है जो नहीं है उसकी प्राप्ति, और 'क्षेम' का अर्थ है जो है उसकी रक्षा। भगवान् वचन देते हैं कि जो भक्त अनन्य भाव से उनका चिन्तन करते हैं, उनकी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति और रक्षा का भार वे स्वयं उठाते हैं — 'वहामि' — जैसे कोई बोझ अपने कन्धे पर ढोता है। जैसे माँ अपने छोटे बच्चे की हर आवश्यकता का ध्यान रखती है, बिना माँगे। भारतीय जीवन बीमा निगम का आदर्श वाक्य भी यही है।
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ २३ ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! ये अपि श्रद्धया अन्विताः अन्यदेवताभक्ताः (देवान्) यजन्ते, ते अपि माम् एव अविधिपूर्वकं यजन्ति।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! यद्यपि श्रद्धा से युक्त जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझको ही पूजते हैं; किन्तु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात् अज्ञानपूर्वक है।
भावार्थ
भगवान् की उदारता का एक और उदाहरण — जो लोग श्रद्धा से अन्य देवताओं की पूजा करते हैं, वे भी वास्तव में भगवान् की ही पूजा करते हैं, क्योंकि सब देवता भगवान् के ही रूप हैं। पर उनकी पूजा 'अविधिपूर्वक' है — सही समझ के बिना। जैसे कोई पेड़ की शाखाओं और पत्तों को पानी दे, जड़ को नहीं — पानी अन्ततः पेड़ तक ही पहुँचता है, पर प्रभावी तरीका जड़ को सींचना है। सीधे भगवान् की उपासना जड़ को सींचना है।
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥ २४ ॥
अन्वय
हि अहं सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुः एव च; तु ते मां तत्त्वेन न अभिजानन्ति, अतः च्यवन्ति।
हिन्दी अनुवाद
क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ; परन्तु वे मुझ परमेश्वर को तत्त्व से नहीं जानते, इसी से गिरते हैं अर्थात् पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
भगवान् सब यज्ञों के 'भोक्ता' (स्वीकार करने वाले) और 'प्रभु' (फल देने वाले स्वामी) हैं। जो इस सत्य को 'तत्त्व से' नहीं जानते, वे 'च्यवन्ति' — गिरते हैं, अर्थात् स्वर्ग आदि से वापस संसार में आते हैं। ज्ञान का अभाव ही पतन का कारण है। यदि वे जानते कि सारी पूजा भगवान् तक पहुँचती है, तो वे सीधे भगवान् को चाहते, और भगवान् को पाकर फिर गिरते नहीं।
यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन्यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥ २५ ॥
अन्वय
देवव्रताः देवान् यान्ति, पितृव्रताः पितॄन् यान्ति, भूतेज्याः भूतानि यान्ति, मद्याजिनः अपि मां यान्ति।
हिन्दी अनुवाद
देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं, और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
यह एक सार्वभौमिक सिद्धान्त है — जो जिसकी उपासना करता है, उसी को प्राप्त होता है। देवताओं के उपासक देवलोक को, पितरों के उपासक पितृलोक को, भूत-प्रेतों के उपासक उन्हीं की योनि को, और भगवान् के उपासक भगवान् को। हमारा लक्ष्य ही हमारी गति निर्धारित करता है। जैसे कोई जिस स्टेशन का टिकट लेता है, वहीं पहुँचता है। बुद्धिमानी यह है कि सर्वोच्च गन्तव्य — भगवान् — का टिकट लिया जाये।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥
अन्वय
यः भक्त्या मे पत्रं पुष्पं फलं तोयं प्रयच्छति, प्रयतात्मनः (तस्य) भक्त्युपहृतं तत् अहम् अश्नामि।
हिन्दी अनुवाद
जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुण रूप से प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ।
भावार्थ
यह भक्ति की सरलता का सबसे सुन्दर श्लोक है। भगवान् को प्रसन्न करने के लिये बड़े-बड़े यज्ञ, स्वर्ण या धन की आवश्यकता नहीं — एक पत्ता, एक फूल, एक फल, या थोड़ा जल भी पर्याप्त है, यदि वह 'भक्त्या' — प्रेम से — दिया जाये। भगवान् वस्तु नहीं, भाव देखते हैं। विदुर के घर केले के छिलके, शबरी के जूठे बेर, सुदामा के चावल — इन सबको भगवान् ने प्रेम से स्वीकार किया। गरीब से गरीब व्यक्ति भी भगवान् की पूजा कर सकता है। भक्ति में कोई धनी या निर्धन नहीं।
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७ ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! (त्वं) यत् करोषि, यत् अश्नासि, यत् जुहोषि, यत् ददासि, यत् तपस्यसि, तत् मदर्पणं कुरुष्व।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर।
भावार्थ
यह जीवन को पूजा बनाने का सूत्र है। जो कुछ करो, खाओ, हवन करो, दान दो, तप करो — सब भगवान् को अर्पित करो। इसका अर्थ है कि अलग से पूजा का समय निकालने के साथ-साथ जीवन की हर क्रिया को पूजा बना लो। भोजन से पहले भगवान् को भोग लगाना, कार्य आरम्भ करने से पहले उनका स्मरण करना, और दिन के अन्त में सब कुछ उन्हें अर्पित करना — यह इसका व्यावहारिक रूप है। जब सब कुछ भगवान् को अर्पित है, तो अहंकार और चिन्ता के लिये स्थान नहीं रहता।
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥
अन्वय
एवं (त्वं) शुभाशुभफलैः कर्मबन्धनैः मोक्ष्यसे; संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तः (सन्) माम् उपैष्यसि।
हिन्दी अनुवाद
इस प्रकार, जिसमें समस्त कर्म मुझ भगवान् के अर्पण होते हैं — ऐसे संन्यासयोग से युक्त चित्त वाला तू शुभाशुभ फल रूप कर्मबन्धन से मुक्त हो जायेगा और उनसे मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होगा।
भावार्थ
सब कुछ भगवान् को अर्पित करने का फल — 'शुभाशुभफलैः कर्मबन्धनैः मोक्ष्यसे' — शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के कर्म-फलों के बन्धन से मुक्ति। ध्यान दें — शुभ कर्म भी बाँधते हैं (स्वर्ग में ले जाते हैं, पर फिर लौटना होता है)। जब कर्म भगवान् को अर्पित होते हैं, तो उनका फल भी भगवान् का होता है, कर्ता का नहीं। यही 'संन्यासयोग' है — बाहर से कर्म करते हुए भीतर से उनका त्याग। ऐसा व्यक्ति 'विमुक्त' होकर भगवान् को प्राप्त होता है।
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ २९ ॥
अन्वय
अहं सर्वभूतेषु समः; मे द्वेष्यः न अस्ति, प्रियः न (अस्ति); तु ये मां भक्त्या भजन्ति, ते मयि, अहम् अपि च तेषु (अस्मि)।
हिन्दी अनुवाद
मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है; परन्तु जो भक्त मुझको प्रेम से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ।
भावार्थ
क्या भगवान् पक्षपाती हैं? नहीं — 'समोऽहं सर्वभूतेषु' — वे सबके प्रति सम हैं; न कोई उनका शत्रु है, न विशेष प्रिय। फिर भक्तों पर विशेष कृपा क्यों? भगवान् उत्तर देते हैं — 'जो मुझे प्रेम से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें'। यह पक्षपात नहीं, बल्कि स्वाभाविक नियम है। जैसे सूर्य सब पर समान रूप से चमकता है, पर जो खिड़की खोलता है, उसके घर में प्रकाश आता है; जो बन्द रखता है, उसके नहीं। भक्ति हृदय की खिड़की खोलना है।
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ ३० ॥
अन्वय
चेत् सुदुराचारः अपि अनन्यभाक् (सन्) मां भजते, सः साधुः एव मन्तव्यः; हि सः सम्यक् व्यवसितः।
हिन्दी अनुवाद
यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है।
भावार्थ
यह गीता का अत्यन्त क्रान्तिकारी और करुणामय श्लोक है। यदि कोई 'सुदुराचारी' — बहुत बुरे आचरण वाला — भी अनन्य भाव से भगवान् को भजने लगे, तो उसे 'साधु' ही मानना चाहिये। क्यों? क्योंकि वह 'सम्यग्व्यवसित' — सही निश्चय वाला — है। उसने सबसे महत्वपूर्ण निर्णय ले लिया है — भगवान् की ओर मुड़ने का। उसका अतीत बुरा हो सकता है, पर उसकी दिशा सही है। यह श्लोक किसी को भी, कितना भी गिरा हुआ हो, आशा देता है। भगवान् का द्वार सबके लिये खुला है।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥
अन्वय
(सः) क्षिप्रं धर्मात्मा भवति, शश्वत् शान्तिं निगच्छति; (हे) कौन्तेय! (त्वं) प्रतिजानीहि (यत्) मे भक्तः न प्रणश्यति।
हिन्दी अनुवाद
वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शान्ति को प्राप्त होता है। हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।
भावार्थ
वह दुराचारी भक्त 'क्षिप्रम्' — शीघ्र ही — धर्मात्मा बन जाता है। भक्ति स्वयं उसे बदल देती है; जैसे अग्नि में डाला गया लोहा भी लाल होकर चमकने लगता है। और उसे 'शाश्वत शान्ति' मिलती है। फिर भगवान् अर्जुन से एक अद्भुत बात कहते हैं — 'कौन्तेय प्रतिजानीहि' — हे अर्जुन, तुम प्रतिज्ञा करो, घोषणा करो कि 'मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता'। भगवान् स्वयं प्रतिज्ञा न करके अर्जुन से करवाते हैं, क्योंकि भगवान् कभी-कभी अपनी प्रतिज्ञा भक्त के लिये तोड़ देते हैं (जैसे भीष्म के लिये), पर भक्त की प्रतिज्ञा की रक्षा सदा करते हैं।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ ३२ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! ये अपि पापयोनयः स्युः, स्त्रियः वैश्याः तथा शूद्राः, ते अपि हि मां व्यपाश्रित्य परां गतिं यान्ति।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनि — चाण्डालादि — जो कोई भी हों, वे भी मेरे शरण होकर परमगति को ही प्राप्त होते हैं।
भावार्थ
उस समय के समाज में कुछ वर्गों को आध्यात्मिक अधिकारों से वंचित माना जाता था — स्त्रियाँ, वैश्य, शूद्र और तथाकथित 'पापयोनि' (निम्न कुल में जन्मे)। वेदों के अध्ययन और कई यज्ञों से उन्हें दूर रखा जाता था। भगवान् इस भेदभाव को तोड़ते हुए घोषणा करते हैं कि ये सब भी उनकी शरण लेकर 'परा गति' — सर्वोच्च लक्ष्य — को प्राप्त होते हैं। भक्ति का मार्ग जाति, लिंग या कुल के भेद से परे, सबके लिये समान रूप से खुला है। यह अपने समय का अत्यन्त प्रगतिशील उद्घोष है।
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा। अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥ ३३ ॥
अन्वय
पुण्याः ब्राह्मणाः तथा भक्ताः राजर्षयः (परां गतिं यान्ति इति) किं पुनः? (अतः त्वम्) इमम् अनित्यम् असुखं लोकं प्राप्य मां भजस्व।
हिन्दी अनुवाद
फिर इसमें तो कहना ही क्या है, जो पुण्यशील ब्राह्मण तथा राजर्षि भक्तजन मेरी शरण होकर परमगति को प्राप्त होते हैं। इसलिये तू सुखरहित और क्षणभंगुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर निरन्तर मेरा ही भजन कर।
भावार्थ
जब सामाजिक रूप से वंचित वर्ग भी भक्ति से परम गति पा सकते हैं, तो पुण्यात्मा ब्राह्मणों और राजर्षियों की तो बात ही क्या! अर्जुन स्वयं राजर्षि हैं — इसलिये उनके लिये तो यह मार्ग और भी सहज है। फिर भगवान् संसार का स्वरूप बताते हैं — 'अनित्यमसुखं लोकम्' — यह संसार अनित्य (क्षणभंगुर) और असुख (सुखरहित) है। ऐसे संसार में मनुष्य जन्म पाकर उसका सबसे अच्छा उपयोग है — भगवान् का भजन। मनुष्य जन्म दुर्लभ है; इसे व्यर्थ न गँवाओ।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥ ३४ ॥
अन्वय
(त्वं) मन्मनाः भव, मद्भक्तः (भव), मद्याजी (भव), मां नमस्कुरु; एवम् आत्मानं युक्त्वा मत्परायणः (सन्) माम् एव एष्यसि।
हिन्दी अनुवाद
मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो, मुझको प्रणाम कर; इस प्रकार आत्मा को मुझमें नियुक्त करके मेरे परायण होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा।
भावार्थ
नौवें अध्याय का समापन भक्ति के चार सूत्रों से होता है — 'मन्मना भव' (मन मुझमें लगाओ), 'मद्भक्तः' (मेरे भक्त बनो), 'मद्याजी' (मेरी पूजा करो), 'मां नमस्कुरु' (मुझे प्रणाम करो)। यह एक क्रमिक साधना है — मन से चिन्तन, हृदय से प्रेम, कर्म से पूजा और अहंकार से समर्पण। जो ऐसा करता है, वह निश्चित रूप से भगवान् को प्राप्त होता है। यही श्लोक लगभग इन्हीं शब्दों में अठारहवें अध्याय (18.65) में भी आता है, जो इसके महत्व को दर्शाता है। यह अध्याय 'राजविद्याराजगुह्ययोग' कहलाता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥

ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।
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