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🪷 श्रीमद्भगवद्गीता

मूल श्लोक, अन्वय, सरल हिन्दी अनुवाद एवं विस्तृत भावार्थ सहित

अध्याय १६ — दैवासुरसम्पद्विभागयोग

२४ श्लोक · प्रत्येक पर अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ

📌 दैवी और आसुरी सम्पदा; काम, क्रोध, लोभ — नरक के तीन द्वार; शास्त्र ही प्रमाण।
१६.१ श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥
अन्वय
श्रीभगवान् उवाच — अभयं, सत्त्वसंशुद्धिः, ज्ञानयोगव्यवस्थितिः, दानं, दमः च, यज्ञः च, स्वाध्यायः, तपः, आर्जवम् —
हिन्दी अनुवाद
श्रीभगवान् बोले — भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिये ध्यानयोग में निरन्तर दृढ़ स्थिति, सात्त्विक दान, इन्द्रियों का दमन, भगवान्, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्रादि उत्तम कर्मों का आचरण, वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान् के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिये कष्ट सहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता —
भावार्थ
सोलहवाँ अध्याय 'दैवासुरसम्पद्विभागयोग' कहलाता है, जिसमें दैवी (दिव्य) और आसुरी (राक्षसी) गुणों का वर्णन है। श्लोक 1–3 में दैवी सम्पदा के छब्बीस गुण बताये गये हैं। पहला गुण है 'अभय' — निर्भयता; यह सबसे पहले इसलिये है कि भय ही सब दुर्गुणों का मूल है। फिर 'सत्त्वसंशुद्धि' (हृदय की शुद्धता), 'ज्ञानयोग में स्थिति', 'दान', 'दम' (इन्द्रिय-संयम), 'यज्ञ', 'स्वाध्याय' (शास्त्रों का अध्ययन), 'तप' और 'आर्जव' (सरलता)। ये गुण 'सम्पदा' — धन — कहे गये हैं, क्योंकि ये ही सच्चा धन हैं।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥ २ ॥
अन्वय
अहिंसा, सत्यम्, अक्रोधः, त्यागः, शान्तिः, अपैशुनं, भूतेषु दया, अलोलुप्त्वं, मार्दवं, ह्रीः, अचापलम् —
हिन्दी अनुवाद
मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण, अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना, कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग, अन्तःकरण की उपरति अर्थात् चित्त की चंचलता का अभाव, किसी की भी निन्दादि न करना, सब भूत-प्राणियों में हेतुरहित दया, इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना, कोमलता, लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव —
भावार्थ
दैवी गुण जारी हैं — 'अहिंसा' (किसी को कष्ट न देना), 'सत्य', 'अक्रोध' (क्रोध न करना), 'त्याग', 'शान्ति', 'अपैशुन' (चुगली न करना, पीठ पीछे निन्दा न करना), 'भूतों पर दया', 'अलोलुप्त्व' (लालच न होना), 'मार्दव' (कोमलता), 'ह्री' (बुरे कार्यों में लज्जा) और 'अचापल' (चंचलता न होना)। 'अपैशुन' विशेष ध्यान देने योग्य है — पीठ पीछे निन्दा करना एक सामान्य पर गम्भीर दोष है, जो समाज में विष घोलता है। 'ह्री' — लज्जा — एक स्वस्थ नैतिक भावना है जो बुराई से रोकती है।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥
अन्वय
(हे) भारत! तेजः, क्षमा, धृतिः, शौचम्, अद्रोहः, न अतिमानिता — (एतानि) दैवीं सम्पदम् अभिजातस्य भवन्ति।
हिन्दी अनुवाद
तेज, क्षमा, धैर्य, बाहर की शुद्धि एवं किसी में भी शत्रुभाव का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव — ये सब तो हे अर्जुन! दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।
भावार्थ
अन्तिम दैवी गुण — 'तेज' (प्रभाव, आत्मबल), 'क्षमा', 'धृति' (धैर्य), 'शौच' (बाहरी शुद्धता), 'अद्रोह' (किसी से वैर न रखना) और 'नातिमानिता' (अधिक मान की इच्छा न होना)। ये छब्बीस गुण 'दैवी सम्पदा' लेकर जन्मे व्यक्ति के लक्षण हैं। 'अभिजात' का अर्थ है 'उस सम्पदा की ओर उन्मुख होकर जन्मा'। ये गुण कोई भी अभ्यास से विकसित कर सकता है। यह सूची आत्म-मूल्यांकन के लिये उत्तम दर्पण है।
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च। अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥ ४ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! दम्भः, दर्पः, अभिमानः च, क्रोधः, पारुष्यम् एव च, अज्ञानं च — (एतानि) आसुरीं सम्पदम् अभिजातस्य (भवन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
हे पार्थ! दम्भ, घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी — ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।
भावार्थ
अब आसुरी सम्पदा के छह मुख्य लक्षण — 'दम्भ' (पाखण्ड, दिखावा), 'दर्प' (घमण्ड), 'अभिमान' (स्वयं को बड़ा मानना), 'क्रोध', 'पारुष्य' (कठोरता, कटु वाणी) और 'अज्ञान'। दैवी गुण छब्बीस थे, आसुरी छह — पर ये छह इतने शक्तिशाली हैं कि सारे दैवी गुणों को नष्ट कर सकते हैं। दम्भ, दर्प और अभिमान — तीनों अहंकार के ही रूप हैं। अहंकार ही सब आसुरी गुणों की जड़ है।
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता। मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥ ५ ॥
अन्वय
दैवी सम्पत् विमोक्षाय, आसुरी निबन्धाय मता; (हे) पाण्डव! मा शुचः, (त्वं) दैवीं सम्पदम् अभिजातः असि।
हिन्दी अनुवाद
दैवी सम्पदा मुक्ति के लिये और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिये मानी गई है। इसलिये हे अर्जुन! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुआ है।
भावार्थ
दोनों सम्पदाओं का फल — दैवी सम्पदा 'विमोक्ष' (मुक्ति) देती है, आसुरी 'निबन्ध' (बन्धन)। फिर भगवान् अर्जुन को स्नेह से आश्वस्त करते हैं — 'मा शुचः' — शोक मत करो, तुम दैवी सम्पदा लेकर जन्मे हो। अर्जुन को शायद चिन्ता हुई होगी कि कहीं युद्ध में हिंसा करने से वे आसुरी तो नहीं हो जायेंगे। भगवान् बताते हैं कि धर्म के लिये युद्ध करना आसुरी नहीं; उनका स्वभाव दैवी है। भाव ही निर्णायक है, बाहरी कर्म नहीं।
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च। दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥ ६ ॥
अन्वय
(हे) पार्थ! अस्मिन् लोके दैवः आसुरः एव च (इति) द्वौ भूतसर्गौ (स्तः); दैवः विस्तरशः प्रोक्तः, आसुरं मे शृणु।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य-समुदाय दो ही प्रकार का है — एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला। उनमें से दैवी प्रकृति वाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य-समुदाय को भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुन।
भावार्थ
संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं — दैवी और आसुरी। यह विभाजन जन्म या जाति पर नहीं, स्वभाव पर आधारित है। एक ही परिवार में दैवी और आसुरी दोनों स्वभाव के लोग हो सकते हैं — जैसे हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद। दैवी स्वभाव का वर्णन पहले कई अध्यायों में हो चुका (स्थितप्रज्ञ, भक्त, ज्ञानी, गुणातीत के लक्षण); अब भगवान् आसुरी स्वभाव का विस्तार से वर्णन करेंगे, ताकि हम उसे पहचानकर उससे बच सकें।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः। न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ ७ ॥
अन्वय
आसुराः जनाः प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च न विदुः; तेषु न शौचं, न अपि च आचारः, न सत्यं विद्यते।
हिन्दी अनुवाद
आसुर-स्वभाव वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति — इन दोनों को ही नहीं जानते; इसलिये उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य-भाषण ही है।
भावार्थ
आसुरी लोगों का पहला लक्षण — वे 'प्रवृत्ति' (क्या करना चाहिये) और 'निवृत्ति' (क्या नहीं करना चाहिये) नहीं जानते। उन्हें कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेक नहीं। इसलिये उनमें न 'शौच' (पवित्रता) है, न 'आचार' (सदाचार), न 'सत्य'। जब व्यक्ति अपनी इच्छा को ही नियम मान लेता है, तो धर्म-अधर्म का भेद मिट जाता है। विवेक का अभाव ही आसुरी स्वभाव की जड़ है।
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ ८ ॥
अन्वय
ते जगत् असत्यम्, अप्रतिष्ठम्, अनीश्वरम्, अपरस्परसम्भूतं (च) आहुः; कामहैतुकम् (एव), अन्यत् किम्?
हिन्दी अनुवाद
वे आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत् आश्रयरहित, सर्वथा असत्य और बिना ईश्वर के, अपने-आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है; इसके सिवा और क्या है?
भावार्थ
आसुरी लोगों का विश्व-दृष्टिकोण — जगत् 'असत्य' (कोई परम सत्य नहीं), 'अप्रतिष्ठ' (कोई नैतिक आधार नहीं), 'अनीश्वर' (कोई ईश्वर नहीं), 'अपरस्परसम्भूत' (केवल संयोग से उत्पन्न) और 'कामहैतुक' (केवल काम-वासना ही इसका कारण)। यह भोगवादी दर्शन है — 'जो कुछ है, यही जीवन है; खाओ, पियो, मौज करो।' जब कोई ईश्वर, धर्म या परलोक नहीं मानता, तो उसके लिये भोग ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन जाता है।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः। प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ ९ ॥
अन्वय
एतां दृष्टिम् अवष्टभ्य नष्टात्मानः अल्पबुद्धयः उग्रकर्माणः अहिताः (ते) जगतः क्षयाय प्रभवन्ति।
हिन्दी अनुवाद
इस मिथ्या ज्ञान को अवलम्बन करके — जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि मन्द है, वे सबका अपकार करने वाले क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगत् के नाश के लिये ही उत्पन्न होते हैं।
भावार्थ
इस दृष्टिकोण का परिणाम — ऐसे लोग 'नष्टात्मा' (जिनकी आत्मा पतित हो गई), 'अल्पबुद्धि' (संकीर्ण बुद्धि), 'उग्रकर्मा' (क्रूर कर्म करने वाले) और 'अहित' (सबका अहित करने वाले) बन जाते हैं, और 'जगतः क्षयाय' — संसार के विनाश के लिये — कार्य करते हैं। इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जहाँ ऐसी विचारधाराओं ने युद्ध, अत्याचार और विनाश को जन्म दिया। विचार ही कर्म बनते हैं; गलत विचार विनाशकारी कर्मों की ओर ले जाते हैं।
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः। मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥ १० ॥
अन्वय
दुष्पूरं कामम् आश्रित्य दम्भमानमदान्विताः अशुचिव्रताः (ते) मोहात् असद्ग्राहान् गृहीत्वा प्रवर्तन्ते।
हिन्दी अनुवाद
वे दम्भ, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धान्तों को ग्रहण करके और भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसार में विचरते हैं।
भावार्थ
आसुरी व्यक्ति 'दुष्पूर काम' — कभी पूरी न होने वाली कामनाओं — का आश्रय लेते हैं। जैसे आग में घी डालने से आग बुझती नहीं, बल्कि भड़कती है; वैसे ही भोग से कामना शान्त नहीं होती। वे 'दम्भ' (पाखण्ड), 'मान' (अहंकार) और 'मद' (नशा, उन्माद) से भरे होते हैं, 'असद्ग्राह' (गलत सिद्धान्त) अपनाते हैं और 'अशुचिव्रत' (अपवित्र आचरण) करते हैं। यह आसुरी जीवन का चित्र है।
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः। कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥ ११ ॥
अन्वय
प्रलयान्ताम् अपरिमेयां चिन्ताम् उपाश्रिताः च, कामोपभोगपरमाः (ते) 'एतावत् (एव सुखम्)' इति निश्चिताः —
हिन्दी अनुवाद
तथा वे मृत्युपर्यन्त रहने वाली असंख्य चिन्ताओं का आश्रय लेने वाले, विषय-भोगों के भोगने में तत्पर रहने वाले और 'इतना ही सुख है' — इस प्रकार मानने वाले होते हैं।
भावार्थ
आसुरी लोगों की मानसिक दशा — वे 'अपरिमेय चिन्ता' (असीमित चिन्ता) में डूबे रहते हैं, जो 'प्रलयान्त' — मृत्यु तक — बनी रहती है। उनका जीवन 'कामोपभोगपरम' — भोग को ही परम लक्ष्य मानने वाला — होता है। और वे निश्चित हैं कि 'एतावत्' — बस इतना ही है, भोग से बढ़कर कुछ नहीं। भोगवादी व्यक्ति कभी चिन्ता से मुक्त नहीं होता — पाने की चिन्ता, खोने का भय, और अधिक की लालसा। यह वाक्य अगले श्लोक में जारी है।
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः। ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥ १२ ॥
अन्वय
आशापाशशतैः बद्धाः कामक्रोधपरायणाः (ते) कामभोगार्थम् अन्यायेन अर्थसञ्चयान् ईहन्ते।
हिन्दी अनुवाद
वे आशा की सैकड़ों फाँसियों से बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोध के परायण होकर विषय-भोगों के लिये अन्यायपूर्वक धनादि पदार्थों का संग्रह करने की चेष्टा करते रहते हैं।
भावार्थ
आसुरी व्यक्ति 'आशापाशशत' — आशा की सैकड़ों रस्सियों — से बँधे होते हैं। हर आशा एक नया बन्धन है — 'यह मिल जाये, वह हो जाये'। वे 'कामक्रोधपरायण' होते हैं और भोग के लिये 'अन्याय से' धन इकट्ठा करते हैं — भ्रष्टाचार, शोषण, धोखाधड़ी से। जब भोग ही लक्ष्य हो, तो साधन की पवित्रता का कोई महत्व नहीं रहता। यह आधुनिक भ्रष्टाचार और लालच का सटीक चित्रण है।
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्। इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥
अन्वय
इदम् अद्य मया लब्धम्, इमं मनोरथं प्राप्स्ये; इदम् अस्ति, इदम् अपि धनं मे पुनः भविष्यति —
हिन्दी अनुवाद
वे सोचा करते हैं कि मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूँगा; मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह हो जायेगा।
भावार्थ
भगवान् आसुरी व्यक्ति के मन का एक जीवन्त चित्र खींचते हैं — 'आज मैंने यह पाया, कल वह पाऊँगा; इतना धन मेरे पास है, और भी आयेगा।' यह अनन्त लालसा का चक्र है। ऐसा व्यक्ति कभी वर्तमान में सन्तुष्ट नहीं होता; उसका मन सदा अगली उपलब्धि पर होता है। आज की सफलता कल की चिन्ता बन जाती है। यह आत्म-निरीक्षण के लिये एक दर्पण है — क्या हमारा मन भी ऐसे ही सोचता है?
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि। ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥
अन्वय
असौ शत्रुः मया हतः, अपरान् अपि च हनिष्ये; अहम् ईश्वरः, अहं भोगी, अहं सिद्धः, बलवान्, सुखी (अस्मि) —
हिन्दी अनुवाद
वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओं को भी मैं मार डालूँगा। मैं ईश्वर हूँ, ऐश्वर्य को भोगने वाला हूँ, मैं सब सिद्धियों से युक्त हूँ और बलवान् तथा सुखी हूँ।
भावार्थ
आसुरी अहंकार का चरम — 'उस शत्रु को मैंने मारा, दूसरों को भी मारूँगा। मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, बलवान् और सुखी हूँ।' इसमें 'मैं' की बार-बार पुनरावृत्ति ध्यान देने योग्य है — आसुरी व्यक्ति का पूरा संसार 'मैं' के इर्द-गिर्द घूमता है। वह स्वयं को ईश्वर मानता है। रावण, कंस, हिरण्यकशिपु जैसे असुरों में यही अहंकार था, और यही उनके विनाश का कारण बना।
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥
अन्वय
(अहम्) आढ्यः अभिजनवान् अस्मि, मया सदृशः अन्यः कः अस्ति? यक्ष्ये, दास्यामि, मोदिष्ये — इति अज्ञानविमोहिताः (वदन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा — इस प्रकार अज्ञान से मोहित रहने वाले।
भावार्थ
आसुरी अहंकार जारी है — 'मैं धनी हूँ, बड़े कुल का हूँ, मेरे समान कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, मौज करूँगा।' ध्यान दें — यहाँ यज्ञ और दान भी अहंकार के साधन बन गये हैं! वे दिखावे के लिये, अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये दान करते हैं, धर्म के लिये नहीं। अच्छे कर्म भी गलत भाव से किये जायें, तो आसुरी बन जाते हैं। 'अज्ञानविमोहित' — अज्ञान से मोहित — यही उनकी वास्तविक स्थिति है।
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥
अन्वय
अनेकचित्तविभ्रान्ताः मोहजालसमावृताः कामभोगेषु प्रसक्ताः (ते) अशुचौ नरके पतन्ति।
हिन्दी अनुवाद
अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले, मोह रूप जाल से समावृत और विषय-भोगों में अत्यन्त आसक्त आसुर लोग महान् अपवित्र नरक में गिरते हैं।
भावार्थ
आसुरी जीवन का परिणाम — 'अनेकचित्तविभ्रान्त' (अनेक इच्छाओं में बिखरा, भ्रमित मन), 'मोहजालसमावृत' (मोह के जाल में फँसे), 'कामभोगेषु प्रसक्त' (भोगों में आसक्त) — ऐसे लोग 'अशुचि नरक' — अपवित्र नरक — में गिरते हैं। नरक केवल मृत्यु के बाद का स्थान नहीं; ऐसा व्यक्ति इसी जीवन में भी चिन्ता, भय, असन्तोष और अकेलेपन का नरक भोगता है। जिसका मन शान्त नहीं, वह महल में भी नरक में है।
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः। यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥
अन्वय
आत्मसम्भाविताः स्तब्धाः धनमानमदान्विताः ते दम्भेन अविधिपूर्वकं नामयज्ञैः यजन्ते।
हिन्दी अनुवाद
वे अपने-आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमण्डी पुरुष धन और मान के मद से युक्त होकर केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखण्ड से शास्त्रविधिरहित यजन करते हैं।
भावार्थ
आसुरी लोगों का धार्मिक पाखण्ड — वे 'आत्मसम्भावित' (स्वयं को श्रेष्ठ मानने वाले), 'स्तब्ध' (अकड़े हुए, विनम्रता रहित) और 'धनमानमदान्वित' (धन और मान के नशे में) होकर 'नामयज्ञ' — केवल नाम के यज्ञ — करते हैं, 'दम्भ' से, शास्त्र-विधि के बिना। उनका धर्म दिखावे के लिये है — बड़े आयोजन, प्रचार, नाम की पट्टिकाएँ। पर भीतर श्रद्धा या भक्ति नहीं। धर्म का व्यापार आसुरी लक्षण है।
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ १८ ॥
अन्वय
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः अभ्यसूयकाः (ते) आत्मपरदेहेषु मां प्रद्विषन्तः (सन्ति)।
हिन्दी अनुवाद
वे अहंकार, बल, घमण्ड, कामना और क्रोधादि के परायण और दूसरों की निन्दा करने वाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अन्तर्यामी से द्वेष करने वाले होते हैं।
भावार्थ
आसुरी लोग अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध का आश्रय लेते हैं, दूसरों के गुणों में दोष देखते हैं ('अभ्यसूयक'), और 'आत्मपरदेहेषु मां प्रद्विषन्तः' — अपने और दूसरों के शरीर में स्थित भगवान् से द्वेष करते हैं। यह गहरी बात है — जब हम किसी से घृणा करते हैं, तो वास्तव में उसमें स्थित भगवान् से घृणा करते हैं। और जब हम अपने शरीर का दुरुपयोग करते हैं, तो अपने भीतर के भगवान् का अपमान करते हैं।
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्। क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥ १९ ॥
अन्वय
तान् द्विषतः क्रूरान् अशुभान् नराधमान् अहं संसारेषु आसुरीषु एव योनिषु अजस्रं क्षिपामि।
हिन्दी अनुवाद
उन द्वेष करने वाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ।
भावार्थ
भगवान् कर्म के नियम को बताते हैं — जो द्वेषी, क्रूर, अशुभ और 'नराधम' (मनुष्यों में नीच) हैं, उन्हें वे बार-बार आसुरी योनियों में डालते हैं। यह भगवान् का क्रोध या प्रतिशोध नहीं, बल्कि कर्म का स्वाभाविक परिणाम है। जैसा स्वभाव, वैसा जन्म। जो आसुरी गुणों को पोषित करता है, वह अगले जन्म में भी उन्हीं गुणों के अनुकूल परिस्थिति पाता है। भगवान् केवल न्याय की व्यवस्था करते हैं।
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि। मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ २० ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! आसुरीं योनिम् आपन्नाः मूढाः जन्मनि जन्मनि माम् अप्राप्य एव ततः अधमां गतिं यान्ति।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! वे मूढ़ मुझको न प्राप्त होकर ही जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अति नीच गति को ही प्राप्त होते हैं अर्थात् घोर नरकों में पड़ते हैं।
भावार्थ
आसुरी योनि में पड़े 'मूढ़' जन्म-जन्म में भगवान् को प्राप्त नहीं कर पाते और और भी 'अधम गति' — निम्नतर अवस्था — में गिरते जाते हैं। यह पतन का चक्र है — बुरे स्वभाव से बुरे कर्म, बुरे कर्मों से बुरा जन्म, बुरे जन्म में और बुरा स्वभाव। पर यह चक्र तोड़ा जा सकता है — नौवें अध्याय (9.30) में भगवान् ने कहा था कि सबसे बड़ा दुराचारी भी भक्ति से शीघ्र धर्मात्मा बन जाता है। आशा कभी समाप्त नहीं होती।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥
अन्वय
कामः क्रोधः तथा लोभः — इदं त्रिविधम् आत्मनः नाशनं नरकस्य द्वारम्; तस्मात् एतत् त्रयं त्यजेत्।
हिन्दी अनुवाद
काम, क्रोध तथा लोभ — ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले अर्थात् उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं; अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिये।
भावार्थ
यह गीता का अत्यन्त प्रसिद्ध और व्यावहारिक श्लोक है। भगवान् सारे आसुरी स्वभाव को तीन मूल दोषों में समेटते हैं — 'काम' (वासना, अतृप्त इच्छा), 'क्रोध' और 'लोभ' (लालच)। ये तीन 'नरक के द्वार' हैं और 'आत्मा का नाश' करने वाले हैं। इसलिये इन तीनों को त्याग दो। ये तीनों परस्पर जुड़े हैं — इच्छा पूरी न हो तो क्रोध, पूरी हो तो और की लालसा (लोभ)। इन तीनों पर विजय ही नरक से मुक्ति है।
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः। आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ॥
अन्वय
(हे) कौन्तेय! एतैः त्रिभिः तमोद्वारैः विमुक्तः नरः आत्मनः श्रेयः आचरति, ततः परां गतिं याति।
हिन्दी अनुवाद
हे अर्जुन! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है, इससे वह परमगति को जाता है अर्थात् मुझको प्राप्त हो जाता है।
भावार्थ
जो इन तीन 'तमोद्वारों' — अन्धकार के द्वारों — से मुक्त हो जाता है, वह स्वाभाविक रूप से 'आत्मनः श्रेयः' — अपने कल्याण — का आचरण करने लगता है, और परम गति को प्राप्त होता है। काम, क्रोध और लोभ हटते ही मन में शान्ति, विवेक और सद्गुण स्वयं प्रकट होते हैं। जैसे बादल हटते ही सूर्य दिखने लगता है। नकारात्मक को हटाना ही सकारात्मक को पाने का मार्ग है।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ २३ ॥
अन्वय
यः शास्त्रविधिम् उत्सृज्य कामकारतः वर्तते, सः न सिद्धिम् अवाप्नोति, न सुखं, न परां गतिम्।
हिन्दी अनुवाद
जो पुरुष शास्त्रविधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही।
भावार्थ
भगवान् एक महत्वपूर्ण चेतावनी देते हैं — जो 'शास्त्रविधि' — शास्त्रों के मार्गदर्शन — को छोड़कर 'कामकारतः' — अपनी इच्छा से, मनमाने ढंग से — आचरण करता है, उसे न सिद्धि मिलती है, न सुख, न परम गति। मनुष्य की इच्छाएँ अक्सर उसे गलत दिशा में ले जाती हैं; शास्त्र — ऋषियों के अनुभव पर आधारित ज्ञान — सही मार्ग दिखाते हैं। जैसे अपरिचित मार्ग पर नक्शे के बिना चलना भटकाव है।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥
अन्वय
तस्मात् कार्याकार्यव्यवस्थितौ ते शास्त्रं प्रमाणम्; शास्त्रविधानोक्तं ज्ञात्वा इह कर्म कर्तुम् (त्वम्) अर्हसि।
हिन्दी अनुवाद
इससे तेरे लिये इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्रविधि से नियत कर्म ही करने योग्य है।
भावार्थ
सोलहवें अध्याय का समापन — 'तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते' — इसलिये क्या करना चाहिये और क्या नहीं, इसके निर्णय में शास्त्र ही प्रमाण है। शास्त्र के विधान को जानकर कर्म करो। यहाँ 'शास्त्र' का अर्थ केवल कर्मकाण्ड के नियम नहीं, बल्कि धर्म के सनातन सिद्धान्त हैं — सत्य, अहिंसा, करुणा, संयम। जब मन भ्रमित हो, तो व्यक्तिगत इच्छा के बजाय सिद्ध महापुरुषों के मार्गदर्शन पर चलना बुद्धिमानी है। यह अध्याय 'दैवासुरसम्पद्विभागयोग' कहलाता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः ॥

ⓘ मूल श्लोक सार्वजनिक गीता-पाठ से हैं (गीताप्रेस-क्रमांक)। अन्वय, हिन्दी अनुवाद व भावार्थ इस साइट हेतु AI-सहायता से नये सिरे से लिखे गये हैं — किसी प्रकाशित टीका की प्रति नहीं। गहन अध्ययन हेतु आचार्यों की प्रामाणिक टीकाएँ भी अवश्य देखें; कोई त्रुटि दिखे तो सूचित करें।
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